उत्पादकता क्या है

उत्पादकता कोई माप है, जिसे मापा जाता है, इसमें संदेह नहीं है। आगम-निर्गम के आदर्श अनुपात को उत्पादकता कहने में भी आपत्ति नहीं है, जैसे कहा जाता है – Ratio of output (निर्गम) to input (आगम) over a specific period compared to given such (आदर्श) Ratio. यह सब कुछ उत्पादकता को मापने की विधि है, किन्तु उत्पादकता क्या है, इस प्रश्न का उत्तर इसमें नहीं है।

आगम-निर्गम के अनुपात को उत्पादकता कहें और आगम-निर्गम के अन्तर को लाभ कहें, इसे युक्ति संगत नहीं माना जा सकता, क्योंकि लाभ और उत्पादकता एक दूसरे पर आधारित सर्वथा भिन्न विषय हैं।

समान आगम और निर्गम से दोनों की गणना (माप) जंचने वाला विषय नहीं है। आगम-निर्गम के अन्तर को लाभ कहना सही है। उत्पादकता को अलग चशमे से देखने की आवश्यकता है।

हमने इस सम्बन्ध में प्रयास किया है, उसकी चर्चा करेंगे।

4.05 उत्पादकता

‘कठोरता’ किसी पदार्थ का वह लक्षण है, जिस कारण वह पदार्थ कठोर कहलाता है। ‘मानवता’ वह लक्षण है, जिस कारण व्यक्ति मानव बना रहता है अन्यथा व्यक्ति दानव कहलाएगा। ‘कठोरता’ और ‘मानवता’ की भांति ‘उत्पादकता’ भी लक्षण विशेष है, जिसका सम्बन्ध उत्पादक से है।

हमें याद रखना होगा कि उत्पाद उत्पन्न होते हैं, उत्पाद उत्पन्न नहीं किए जाते हैं, इसलिए उत्पाद उत्पन्न करने वाला कोई व्यक्ति नहीं होगा, जिसे उत्पादक कहा जा सके, वस्तुतः  उद्योगरत व्यक्ति उत्पादक है, यह हमने कहा है, इसकी विस्तृत चर्चा हम ‘उत्पादक कौन है’ शीर्षक से कर चुके हैं।

‘मानवता’ वह लक्षण है, जिस कारण व्यक्ति मानव बना रहता है, वैसा ही वह लक्षण जिसके कारण कोई व्यक्ति उत्पादक बना रहता है, उस लक्षण विशेष को सहज ही उत्पादकता कहते हैं। उत्पादक कोई न कोई व्यक्ति होगा, उत्पादक बने रहने के लिए उस व्यक्ति के लिए आवश्यक लक्षण विशेष को उत्पादकता कहते हुए उस लक्षण विशेष ‘उत्पादकता’ की विस्तृत चर्चा हम यहाँ कर रहें हैं।

लक्षण विशेष है उत्पादकता :

अनेक प्रकार के वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) व्यक्ति की आवश्यकताएँ हैं। अपने श्रम से अपने आवश्यकताओं की पूर्ति व्यक्ति कर ले यह किसी व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं है।

अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक व्यक्तियों के साथ व्यक्ति समुदाय में रहता है, अपनी सेवाएँ प्रदान कर समुदाय स्तर पर अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, बदले में अनेक अन्य व्यक्ति की सेवाएँ व्यक्ति को अदा होने से स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

व्यक्ति के सामुदायिक जीवन को व्यापक अर्थ में बाजार कहते हैं। बाजार में व्यक्ति अपनी सेवाएँ प्रदान कर बदले में बैंकनोट (रुपए) लेता है और लिए गए बैंकनोट देने से बदले में अन्य व्यक्ति की सेवाएँ व्यक्ति को अदा होती हैं। बाजार में बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से व्यक्ति तथा अन्य व्यक्ति के सेवाओं का आदान-प्रदान होकर व्यक्ति तथा उन पर निर्भर अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न होकर किसी अन्य व्यक्ति को व्यक्ति अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं। प्रदत्त सेवाओं के बदले बैंकनोट लेकर व प्राप्त बैंकनोट देकर बदले में व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ प्राप्त करते हैं। बैंकनोट देकर ‘वस्तु आदि’ लेकर उसका स्वामित्व प्राप्त कर व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का उपभोग करता है। स्वामित्व प्राप्त करना ‘वस्तु आदि’ उत्पन्न करना है और उत्पन्न करने वाला व्यक्ति उत्पादक है।

वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का स्वामित्व प्राप्त होने से ‘वस्तु आदि’ उत्पन्न कर व्यक्ति उत्पादक बनकर अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, अर्थात् अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति उत्पादक बनता है।

अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन करता है। उत्पादन से संलग्न व्यक्ति उत्पादक है, अर्थात् अन्य व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति उत्पादक बनता है।

महत्वपूर्ण यही है कि –

अन्य किन्हीं व्यक्तियों से निर्धारित किसी माप में बैंकनोट लेकर उन व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करता हुआ व्यक्ति जहाँ ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न होकर उत्पादक बनता है। दूसरी ओर लिए गए उन्हीं बैंकनोटों में से अन्य व्यक्तियों को निर्धारित किसी माप में बैंकनोट देकर व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता हुआ ‘वस्तु आदि’ को उत्पन्न कर वह उत्पादक बनता है।

व्यक्ति उत्पादक बना रहे इसके लिए प्राथमिक आवश्यकता यही है कि –

समुदाय स्तर पर व्यक्ति अपना और अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करें।

इसके लिए वह व्यक्ति समुदाय स्तर पर ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन तथा उपभोग करें।

आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति तथा अन्य व्यक्ति बैंकनोटों का लेन-देन करें।

बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में व्यक्ति वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का आदान-प्रदान करें।

बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान सदैव निर्धारित किसी माप में होता है। यह माप जहाँ एक ओर बैंकनोटों पर मुद्रित होता है वहीं ‘वस्तु आदि’ पर भी उनका विक्रय मूल्य (माप) अंकित होता है।

आप ध्यान देकर पढ़ें पचास रुपए के किसी बैंकनोट पर वचनखण्ड मुद्रित होता है ‘मैं धारक को पचास रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ बैंकनोटों के निर्धारित माप को ही दर्शाता है।

बैंकनोटों पर मुद्रित उस वचनखण्ड में बैंकनोट देने वाले व्यक्ति को ‘धारक’ शब्द से सम्बोधित किया गया है एवं बैंकनोट लेने वाले व्यक्ति को ‘मैं’ शब्द से सम्बोधित किया गया है।

बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का अंश “धारक को (पचास रुपए) अदा करना” ‘वस्तु आदि’ की व्यक्ति की मांग के संगत बैंकनोटों की आय दर्शाता है, जहाँ बैंकनोट व्यय कर व्यक्ति (धारक) आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की मांग रख कर ‘वस्तु आदि’ उत्पन्न करता है एवं अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह उत्पादक बनता है।

बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का अंश “मैं (पचास रुपए देने का) वचन देता हूँ” ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति के संगत बैंकनोटों की आय को दर्शाता है। व्यक्ति (मैं) को बैंकनोटों की आय होती है। वह (मैं) ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति का वचन देता है। यह वचन अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति का वचन है, इसके लिए वह (मैं) बैंकनोट लेकर बदले में अपनी सेवाएँ प्रदान कर ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न होकर व्यक्ति उत्पादक बनता है।

कोई व्यक्ति (धारक) बैंकनोटों की जो राशि व्यय करता है, वह राशि ही अन्य किसी व्यक्ति (मैं) की आय होती है। किसी व्यक्ति (धारक) के मांग की ही आपूर्ति अन्य कोई व्यक्ति (मैं) करता है।

किसी व्यक्ति (धारक) के माग के संगत व्यय (धारक को… अदा करना) एवं अन्य व्यक्ति (मैं) के आपूर्ति के संगत आय (मैं…. वचन देता हूँ) पृथक न होकर सम्बन्धित विषय हैं। सम्बन्धित विषय बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड में व्यक्त हुए हैं।

बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड में व्यक्त विषय “मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय” है, इसका स्पष्ट अर्थ है-

वचनखण्ड़ का ‘धारक’ कोई व्यक्ति है और वचनखण्ड़ का ‘मैं भी कोई व्यक्ति है।

‘धारक कोई व्यक्ति बैंकनोट देता है और मैं की भूमिका में व्यक्ति बैंकनोट लेता है।

कोई व्यक्ति बैंकनोट लेकर लिए गए उन बैंकनोटों को ही वह व्यक्ति देता है।

अर्थात् कोई व्यक्ति ‘धारक और ‘मैं’ दोनों भूमिकाओं में साथ-साथ होता है।

मैं की भूमिका में व्यक्ति को बैंकनोटों की ‘आय’ होती है।

‘धारक’ की भूमिका में व्यक्ति बैंकनोटों का व्यय करता है।

‘मैं’ की भूमिका में ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति व्यक्ति करता है।

‘धारक’ की भूमिका में ‘वस्तु आदि’ की ‘मांग’ व्यक्ति को अदा होती है।

किसी व्यक्ति (धारक) द्वारा किया गया व्यय अन्य व्यक्ति (मैं) की ‘आय’ बनती है।

अर्थात् ‘धारक किसी व्यक्ति के कारण अन्य कोई व्यक्ति में की भूमिका में होता है।

‘मैं’ की भूमिका में किसी व्यक्ति द्वारा किया गया ‘वस्तु आदि’ की ‘आपूर्ति ही, अन्य व्यक्ति के ‘वस्तु आदि’ की मांग उसे अदा होती है जो व्यक्ति ‘धारक’ की भूमिका में है।

किसी व्यक्ति के ‘मैं’ की भूमिका के कारण अन्य व्यक्ति ‘धारक’ की भूमिका में होता है। व्यक्ति ‘मैं’ की भूमिका में अन्य व्यक्ति के कारण है। व्यक्ति धारक’ की भूमिका में अन्य व्यक्ति के कारण है।

‘वस्तु आदि’ की ‘मांग’ अन्य व्यक्ति के कारण हमें अदा होती है। ‘वस्तु आदि’ की ‘आपूर्ति अन्य व्यक्ति के कारण हम कर पाते हैं। ‘वस्तु आदि के मांग-पूर्ति के संगत बैंकनोटों के आय-व्यय का यह विषय ही बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड में निहित वह व्यवस्था है जो समुदाय स्तर पर अनेकानेक व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के घटना के मूल में है।

व्यक्ति की आवश्यकताएँ प्रतिदिन प्रस्तुत होती हैं तथा उस काल तक अनवरत प्रस्तुत होती रहेंगी जब तक व्यक्तिसमुदाय में अनेकानेक व्यक्ति जीवित होंगे।

आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कोई व्यक्ति बैंकनोटों की जिन राशियों का लेन-देन करता है, बैंकनोटों की समान उन्हीं राशियों का लेन-देन अनेकानेक व्यक्ति भी करते हैं।

बैंकनोटों के लेन-देन के उन सब अवसरों पर मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय की घटनाएँ पुनः पुनः क्रमवार प्रस्तुत होती जाती हैं जो अनवरत जारी रहता है। अतएव जिसे मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय की घटना कहा गया है, वह व्यापक अर्थ में मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम है।

यह घटनाक्रम है समुदाय स्तर पर बैंकनोटों के लेन-देन का घटनाक्रम और बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में समुदाय स्तर पर व्यक्ति अथवा व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान का घटनाक्रम है।

यह घटनाक्रम है, बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में सेवाओं के आदान-प्रदान में समुदाय स्तर पर वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि (वस्तु आदि) के आदान-प्रदान का घटनाक्रम और बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में बदले में समुदाय स्तर पर स्वयं व्यक्ति एवं अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति का यह घटनाक्रम है।

समुदाय स्तर पर घटित होने वाला यह घटनाक्रम जो मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के घटनाक्रम को अभिव्यक्त करता है, इसके अधीन व्यक्ति का श्रम पुनः पुनः प्रस्तुत होता है, जिसे व्यक्ति के श्रम का आवर्तन कह सकते हैं। श्रम का आवर्तन जारी रहना इस बात पर निर्भर करता है कि लेन-देन में प्रयुक्त बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचन के निर्वाह के लिए बैंकनोटों के लेन-देन से संलग्न व्यक्ति किस अनुपात में वचनबद्ध हैं। बैंकनोटों के भिन्न राशियों के लेन-देन में निर्धारित सममाप में व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं का आदान-प्रदान होने से मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम (बाजार) निरन्तर जारी रहेगा।

इसके विपरीत – बैंकनोटों के भिन्न राशियों के लेन-देन में निर्धारित माप से कममाप में व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं का आदान-प्रदान होने से मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम (बाजार) क्षीण होता जाएगा परिणाम स्वरूप बाजार का घटनाक्रम निरन्तर जारी नहीं रह सकेगा।

बैंकनोटों के किसी राशि के लेन-देन से संलग्न होते ही बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचन का निर्वाह करने के लिए व्यक्ति की वचनबद्धता निर्धारित हो जाती है।

निर्धारित वचनबद्धता के अनुरूप बैंकनोटों के लेन-देन के प्रत्येक अवसर पर निर्धारित सममाप में व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान से बाजार के घटनाक्रम की निरन्तरता बनी रहती है एवं श्रम का आवर्तन जारी रहता है तथा व्यक्ति की उत्पादक की भूमिका सुनिश्चित होती है।

यह सत्य है कि- बैंकनोट बिना अपवाद के किसी न किसी व्यक्ति द्वारा लिया जाता है एवं किसी न किसी व्यक्ति द्वारा दिया जाता है। बैंकनोटों का लेन-देन जब भी होता है किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच होता है और व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो बैंकनोटों का लेन-देन करता हो।

प्राकृतिक संसाधन प्रकृति से निःशुल्क प्राप्त होते हैं। इस सत्य का आधार लेकर यह कहा जा सकता है किसी ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न एक व एक से अधिक किन्हीं व्यक्तियों को उनके सेवाओं के बदले दिए गए बैंकनोटों की कुल राशि से उस ‘वस्तु आदि’ का मूल्य बैंकनोटों की वह राशि निर्धारित होता है।

निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में बदले में निर्धारित बैंकनोट देने वाला व्यक्ति एवं दिए गए बैंकनोटों की वह राशि लेने वाला अन्य व्यक्ति वस्तुतः उस व्यक्ति अथवा व्यक्तिसमुदाय के किन्हीं सेवाओं का ही आदान-प्रदान करते हैं जो व्यक्ति अथवा व्यक्तिसमुदाय उस वस्तु आदि’ के निर्माण अथवा उत्पादन से संलग्न थे।

सेवाओं के आदान-प्रदान के इस व्यापक अर्थ में सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान की व्यक्ति की वचनबद्धता को निम्न उदाहरण से समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए ‘अ’ कोई व्यक्ति है तथा अन्य कोई व्यक्ति ‘ब’ है। मान लिया व्यक्ति ‘अ’ अपने दो घण्टों के सेवाओं के बदले ’25 रुपए’ का बैंकनोट लेना निर्धारित किया है। व्यक्ति ‘ब’ के प्रतिघण्टे के सेवाओं के लिए 100 रुपए का बैंकनोट देना निर्धारित है। व्यक्ति ‘अ’ अपने आठ घण्टे की सेवाएँ प्रदान कर बदले में बैंकनोटों की जो कुछ राशि पाता है, बैंकनोटों की वह राशि देने से यदि व्यक्ति ‘अ’ को अन्य व्यक्ति ‘ब’ के एक घण्टे की सेवाएँ अदा होती हैं तो बैंकनोटों की राशि के लेन-देन में निर्धारित माप में अर्थात् सममाप में सेवाओं का आदान-प्रदान हुआ है कहा जाएगा।

व्यक्ति ‘अ’ ने चार घण्टे की सेवाएँ प्रदान किया है तथा बदले में उसने बैंकनोटों की जो कुछ राशि प्राप्त किया है, बैंकनोटों की वह राशि देने से बदले में उसे अन्य व्यक्ति ‘ब’ के आधे घण्टे से कम सेवाएँ अदा हो रही हों तो बैंकनोटों के लेन-देन में निर्धारित माप से कममाप में सेवाओं का आदान-प्रदान हुआ है कहा जाएगा। बैंकनोटों के लेन-देन में निर्धारित माप से अधिकमाप में सेवाओं का आदान-प्रदान सम्भव नहीं है। उदाहरण के लिए व्यक्ति ‘अ’ ने 50 रुपए का बैंकनोट दिया हो एवं उसे अधिकमाप की सेवाएँ मान लिया 60 रुपए माप की सेवाएँ अन्य व्यक्ति ‘ब’ ने अदा किया हो तो निश्चय ही उस अन्य व्यक्ति ‘ब’ को उसके 60 रुपए माप की सेवाओं के बदले बैंकनोटों की कम राशि 50 रुपए की राशि मिलने से वह अन्य व्यक्ति ‘ब’ जब 50 रुपए का बैंकनोट किसी तीसरे, चौथे व्यक्ति को देगा तो बदले में निर्धारित 50 रुपए माप की सेवाएँ उस अन्य व्यक्ति ‘ब’ को प्राप्त होगा, जिसने (ब) 60 रुपए माप की सेवाएँ निर्धारित 50 रुपए का बैंकनोट लेकर बदले में किसी व्यक्ति को प्रदान किया है, इसलिए बैंकनोटों के लेन-देन में सेवाओं का आदान-प्रदान निर्धारित माप से अधिकमाप में नहीं होगा।

निर्धारित सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान की व्यक्ति की वचनबद्धता बैंकनोटों पर मुद्रित “मैं धारक को वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड से व्यक्ति के लिए निर्धारित होता है। बैंकनोटों के लेन-देन के प्रत्येक अवसर पर निर्धारित सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान से व्यक्ति के श्रम का आवर्तन जारी रहता है तथा व्यक्ति पुनः पुनः श्रम के अवसर पाता है और उस कारण उत्पादक बने रहने की सम्भावनाएँ व्यक्ति के लिए बनती है।

उत्पादक बने रहने की सम्भावनाएँ बनना और उसके आधार में व्यक्ति का वह लक्षण कि वह बैंकनोटों के लेन-देन के प्रत्येक अवसर पर बैंकनोटों पर मुद्रित वचन का निर्वाह करे व अन्य शब्दों में निर्धारित सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान की व्यक्ति की वचनबद्धता वस्तुतः  वह लक्षण विशेष है जिसे ‘उत्पादकता’ कहेंगे।

उत्पादकता इन शब्दों में परिभाषित होगा

निर्धारित सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान की व्यक्ति की वचनबद्धता उत्पादकता है।

बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ यह वचनखण्ड़ जहाँ मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम, अर्थात् बाजार के घटनाक्रम को दर्शाता है।

वहीं निर्धारित सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान की व्यक्ति की वचनबद्धता अर्थात् उत्पादकता की परिभाषा बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ से अभिव्यक्त होती है।

इससे आगे बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ से निर्धारित वचनबद्धता के निर्वाह से उत्पादकता की उपलब्धियों को पाकर बाजार में हमारी क्रयशक्ति भी बनती है, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

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