‘वस्तु आदि’ के मांग-आपूर्ति के संगत रुपए अथवा बैंकनोटों के लोगों की आय-व्यय के घटनाक्रम के अधीन आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के उपभोग के लिए लोग बाजार में ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन करते हैं।
‘वस्तु आदि’ के उपभोग के लिए उत्पादन एवं रुपयों के व्यय के लिए रुपयों की आय लोग करते हैं ।
रुपयों का आय-व्यय तथा ‘वस्तु आदि’ का उपभोग-उत्पादन, लोगों के मध्य उनके आश्रय-आश्रित सम्बन्धों के अधीन निरन्तर जारी रहता है, यह लोगों का ट्रस्टीभाव है जो बाजार के घटनाक्रम को जारी रखने के लिए आवश्यक है, इसे हमने बाजार में ट्रस्टीभाव कहा है, इसकी चर्चा भी हम करेंगे।
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3.07 उपभोक्ता
उपभोग, भोग से भिन्न विषय है। उपभोग करने वाला व्यक्ति ‘उपभोक्ता’ है जब कि भोग करने वाला व्यक्ति ‘भोक्ता है। भोक्ता और उपभोक्ता दोनों के लिए एक शब्द केवल ‘उपभोक्ता’ शब्द का प्रयोग बोलचाल में होने से उपभोक्ता शब्द के अर्थ में भ्रम है। जिस प्रसंग में ‘भोक्ता’ शब्द का प्रयोग होना चाहिए उसके लिए ‘उपभोक्ता शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए। उपभोग क्या है और उपभोक्ता कौन है इसे जानने के लिए भोग व उपभोग तथा भोक्ता व उपभोक्ता में अन्तर को समझने की आवश्यकता है। भोक्ता और उपभोक्ता में वही अन्तर है जो अन्तर प्रधानमंत्री और उपप्रधानमंत्री में है।
प्रधानमंत्री के अनुपस्थिति में यद्यपि उपप्रधानमंत्री प्रधानमंत्री के दायित्व का निर्वाह करता है तथापि नियत दायित्व निर्वाह के लिए प्रधानमंत्री स्वतंत्र होता है जब कि नियत दायित्व निर्वाह के लिए उपप्रधानमंत्री स्वतंत्र नहीं होता है बल्कि सीमित दायरे में रहकर ही प्रधानमंत्री के लिए नियत दायित्वों का वह (उपप्रधानमंत्री) निर्वाह करता है। दायित्व निर्वाह का सीमित दायरा व्यक्ति को ‘उप’प्रधानमंत्री होने का बोध कराता है, वैसा ही सीमित भोग कर सकने की सम्भावना से व्यक्ति ‘उप’भोक्ता कहलाएगा।
भोग का तात्पर्य है वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का प्रयोग व्यक्ति ने अपने व उस पर निर्भर अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया है। आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग करने के लिए भोक्ता कोई व्यक्ति स्वतंत्र होगा। उपभोक्ता भोग करने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा, बल्कि सीमित दायरे में रहकर ही आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपभोक्ता कोई व्यक्ति कर सकेगा।
आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रमुख दो स्त्रोत व्यक्ति के लिए हैं। आवश्यक ‘वस्तु आदि’ व्यक्ति प्रकृति से प्राप्त करता है, अथवा अन्य व्यक्ति को बैंकनोट देकर बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ व्यक्ति प्राप्त करता है। प्रकृति से ‘वस्तु आदि’ प्राप्त करने के अवसरों पर व्यक्ति प्रकृति को बैंकनोट नहीं देता है, इसलिए प्रकृति से आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रसंग में आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति बैंकनोटों के लेन-देन पर निर्भर नहीं होगा। अन्य किन्हीं व्यक्तियों को बैंकनोट देकर बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ प्राप्त करने के अवसरों पर व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बैंकनोटों के लेन-देन पर निर्भर होगा।
अन्य व्यक्तियों से जिस माप में बैंकनोटों का लेन-देन कोई व्यक्ति करता है, उस अनुपात में उस व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति अन्य व्यक्ति करते हैं। स्पष्ट है कि बैंकनोटों के लेन-देन के दायरे (सीमा) में रहकर ही कोई व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर सकेगा, जब कि प्रकृति से आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रसंग में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन चाहे जितने प्राप्त कर ले इसके लिए व्यक्ति स्वतंत्र है।
व्यक्ति तथा पशु-पक्षी आदि सभी ‘वस्तु आदि’ का भोग करते हैं, किन्तु उपभोक्ता जिसे भी कहा जाता है वह कोई न कोई ‘व्यक्ति’ होता है, क्योंकि बैंकनोटों के लेन-देन से कोई न कोई व्यक्ति ही संलग्न होता है। व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो बैंकनोटों का लेन-देन करता हो। ‘वस्तु आदि’ के उपभोग के उद्देश्य से कोई व्यक्ति ही बैंकनोट देता है और वही व्यक्ति बैंकनोट दे सकता है जिसके पास बैंकनोट हैं, अर्थात् जो व्यक्ति बैंकनोटों का ‘धारक’ होगा। बैंकनोटों का धारक कोई व्यक्ति बैंकनोट अन्य किसी व्यक्ति को देगा जिसके बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ धारक उस व्यक्ति को वह अन्य व्यक्ति देगा। आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि प्राप्त होने से आवश्यकताओं की पूर्ति होने से बैंकनोटों का धारक कोई व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का उपभोग करता है और बैंकनोटों के धारक किसी व्यक्ति को ‘उपभोक्ता’ कहते हैं।
उपभोक्ता इन शब्दों में परिभाषित होगा:
बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट देने वाला व्यक्ति उपभोक्ता है।
दिए गए बैंकनोटों के बदले अन्य व्यक्ति से ‘वस्तु आदि की अदायगी उपभोक्ता को होती है।
3.08 ग्राहक
ग्रहण करने वाला व्यक्ति ग्राहक है। यह (ग्रहण करना) व्यापक अर्थ में लेना अर्थात् स्वीकार करने से किंचित भिन्न विषय है। उदाहरण के लिए अदालत से जारी किसी नोटिस (सूचना) को हम लेते हैं और इसका अर्थ स्वीकार करने से है। अदालती नोटिस अस्वीकार करना चाहें तो हम उसे नहीं लेंगे और लौटा देंगे। लेने अथवा ग्रहण करने के अन्तर्गत हम स्वीकार अवश्य करते हैं. यह लेने और ग्रहण करने में समानता है। लेने और ग्रहण करने में प्रमुख अन्तर है कि लेने के प्रसंग में हम लेना अस्वीकार कर सकते हैं किन्तु ग्रहण करने के प्रसंग में हम लेना अस्वीकार नहीं करते हैं। अन्न-जल ग्रहण करने के प्रसंग में भोजन नहीं करने के लिए हम स्वतंत्र होते हुए भी अन्न-जल ग्रहण (लेना) करना हम अस्वीकार नहीं करते हैं। भगवान के नाम से बंट रहे प्रसाद को ग्रहण करने के प्रसंग में अस्वीकार करना नहीं है। अस्वीकार करना जहां लेने के प्रसंग में सम्भव है वही ग्रहण करने के प्रसंग में अस्वीकार करने की सम्भावना नहीं होती।
कोई श्रमिक अपने सेवाओं का निर्धारित मूल्य बैंकनोटों (रुपए) की राशि अन्य व्यक्ति से ग्रहण करता है, वह लेना अस्वीकार नहीं करता है। कोई व्यापारी किसी ‘वस्तु आदि’ का निर्धारित मूल्य बैंकनोट (रुपए) अन्य व्यक्ति से ग्रहण करता है। बैंकनोट ग्रहण करने वाला व्यक्ति चाहे वह कोई व्यापारी हो अथवा कोई श्रमिक हो व कोई कर्मचारी अथवा डाक्टर, वकील आदि हों प्रत्येक ग्राहक हैं। बैंकनोट ग्रहण कर ग्राहक कोई व्यक्ति निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ के आपूर्ति की जवाबदेही को भी ग्रहण करता है। बैंकनोट ग्रहण कर बदले में ‘वस्तु आदि’ के आपूर्ति की जवाबदेही नहीं ग्रहण करने के लिए ग्राहक कोई व्यक्ति स्वतंत्र नहीं होगा अपितु ग्रहण किए गए बैंकनोटों के बदले माँगी गई (मांग) ‘वस्तु आदि’ के आपूर्ति के लिए ग्राहक प्रत्येक व्यक्ति ‘वचनबद्ध’ होगा।
ग्राहक प्रत्येक व्यक्ति की वचनबद्धता उसके द्वारा ग्रहण (लेना) किए गए बैंकनोटों पर मुद्रित “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचनखण्ड से निर्धारित होती है। बैंकनोटों पर मुद्रित “मैं धारक को पांच सौ रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचनखण्ड का अर्थ कोई व्यक्ति यह माने कि यदि वह पांच सौ रुपए का बैंकनोट रिज़र्व बैंक अथवा अन्य बैंक को देता है तो बदले में बैंक उसे एक सौ रुपए के पांच बैंकनोट देने के लिए वचनबद्ध है तो यह उस व्यक्ति की कोरी भावुकता को ही दर्शाता है, क्योंकि रिज़र्व बैंक को बैंकनोट देकर बदले में उससे बैंकनोट लेना बैंकनोटों के लेन-देन का उद्देश्य कतई नहीं है।
बैंकनोटों के लेन-देन का उद्देश्य यह अवश्य है कि बैंकनोटों देने से बदले में निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ की अदायगी वह अन्य व्यक्ति करे जिसने दिए गए बैंकनोटों को लिया है। उपभोक्ता बना प्रत्येक व्यक्ति बैंकनोट अवश्य व्यय करता है, वह किन्हीं वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि का उपभोग भी अवश्य करता है। ग्राहक प्रत्येक व्यक्ति को बैंकनोटों की आय अवश्य होती है और वह किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से अवश्य संलग्न होता है।
ग्राहक इन शब्दों में परिभाषित होगा:
बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट लेने (ग्रहण करना) वाला व्यक्ति ग्राहक है।
लिए गए बैंकनोटों के बदले अन्य व्यक्ति को ‘वस्तु आदि प्रदान करने के लिए ग्राहक वचनबद्ध है।
उपभोक्ता एवं ग्राहक
बैंकनोटों के लेन-देन के किसी अवसर पर वह व्यक्ति जो ‘उपभोक्ता’ बना हुआ था (बैंकनोट दे रहा था) उपभोक्ता वह व्यक्ति बैंकनोटों (रुपए) की उस अथवा अन्य राशि के लेन-देन के अन्य अवसर पर ‘ग्राहक’ बन सकता है (बैंकनोट लेने वाला व्यक्ति हो सकता है) किन्तु बैंकनोटों के लेन-देन के समान अवसर पर कोई व्यक्ति ‘उपभोक्ता औरं ग्राहक’ साथ-साथ नहीं हो सकता है।
‘वस्तु आदि की आपूर्ति से संलग्न होना एवं बैंकनोट आय में प्राप्त करना अर्थात् अन्य किन्हीं व्यक्तियों के किन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए न सम्भव है और न ही प्रत्येक व्यक्ति को उसका अवसर अनिवार्य रूप से मिलता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्य रूप से ग्राहक नहीं है, इसके विपरीत प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्य रूप से अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति अनविार्य रूप से ‘उपभोक्ता’ है।
किन्हीं ‘वस्तु आदि’ का उपभोग कोई व्यक्ति करे तभी उन वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि के मांग की आपूर्ति से कोई अन्य व्यक्ति संलग्न होगा। ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति कोई व्यक्ति करे तभी उन ‘वस्तु आदि’ का उपभोग अन्य किसी व्यक्ति के लिए सम्भव होगा। अतएव उपभोक्ता प्रत्येक व्यक्ति ग्राहक बने अन्य किन्हीं व्यक्तियों पर आश्रित होंगे एवं ग्राहक प्रत्येक व्यक्ति उपभोक्ता बने अन्य किन्हीं व्यक्तियों पर आश्रित होंगे। उपभोक्ता एवं ग्राहक व्यवहारों के संदर्भ में समुदाय स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति अन्य अनेक व्यक्ति पर आश्रित होते हैं एवं प्रत्येक व्यक्ति अन्य अनेक व्यक्ति को आश्रय प्रदान करते हैं। व्यक्ति तथा अन्य व्यक्ति के मध्य आश्रय-आश्रित सम्बन्धों की चर्चा ट्रस्टीशिप शीर्षक देकर आगे हमने की है।
3.09 ट्रस्टीशिप
‘ट्रस्टीशिप अंग्रेजी भाषा का शब्द है। इस शब्द के मूल में जो ट्रस (Truss) शब्द है, यह ‘ट्रस’ विशेष व्यवस्था में बने एक भौतिक इकाई का नाम है जो साधारणतः लोहे की पत्ती अथवा छड़ या पाइप आदि से बना होता है एवं उस (ट्रस) पर उद्योगों की कार्यशाला का छत अथवा अन्य कोई विस्तृत व भारी भरकम छत ‘ट्रस’ पर टिका होता है। ट्रस के सम्बन्ध में विशेष बात यह है कि वह स्वयं कम वजन का होता है किन्तु भारी भरकम छत के वजन का वह टेक ले लेता है। ऐसा ट्रस के विशिष्ट बनावट के कारण सम्भव होता है। ट्रस के विशिष्ट बनावट के कारण ट्रस में अंतर्निहित व्यवस्था को अन्य शब्दों में ट्रस्टीशिप कहते हैं।
ट्रस नाम के उस भौतिक इकाई का रेखांकन ऊपर दर्शाया गया है।
ऊपर रेखांकित किए गए ट्रस में अंतर्निहित व्यवस्था कोई क्रिया व उसकी प्रतिक्रिया से सम्बन्धित विषय है। प्रत्येक क्रिया की अनिवार्य प्रतिक्रिया होती है एवं वह प्रतिक्रिया क्रिया के ‘समान माप’ में और क्रिया के ‘विपरीत दिशा’ में प्रकट होता है। क्रिया के स्त्रोत अधिक हों तो प्रत्येक क्रिया की भिन्न प्रतिक्रिया होती है। एक से अधिक क्रिया आरोपित हो रहे हों और वह (आरोपित क्रिया) संघठित हों तो यह आवश्यक नहीं कि उनकी संघठित प्रतिक्रिया हो। प्रतिक्रिया संघठित करने के लिए बनी व्यवस्था ही ‘ट्रस’ है।
कोई वस्तु चाहे उसका आकार कैसा भी हो वस्तु का भार उसके गुरुत्व केन्द्र से क्रिया करता है। अतएव वस्तु के भार के कारण आरोपित क्रिया संघठित क्रिया है। किसी उद्योग की कार्यशाला का छत ट्रस पर टिका होने से छत का भार ‘ट्रस’ पर संघठित क्रिया आरोपित करता है। ट्रस पर टिका उद्योग की कार्यशाला का छत ट्रस के भिन्न बिन्दुओं का टेक (आधार) लेता हुआ वह छत अपने भार के कारण ट्रस के भिन्न बिन्दुओं पर क्रिया करता है। इस क्रिया के प्रतिक्रिया के विविध अंश ट्रस मे प्रकट होते हैं। प्रतिक्रिया के विविध अंश ट्रस के विशिष्ट बनावट के कारण संघठित होकर, छत के भार के कारण ट्रस पर आरोपित संघठित क्रिया के विरुद्ध संघठित प्रतिक्रिया बनती है। भारी भरकम छत को सुदृढ़ आधार प्रदान होता है।
ट्रस की बनावट किसी अन्य प्रकार से हो तो छत के उस आधार (ट्स) के भिन्न बिन्दुओं पर छत के भार के कारण आरोपित संघठित क्रिया की प्रतिक्रिया संघठित नहीं होगी, परिणामस्वरुप छत को सुदृढ़ आधार प्रदान नहीं होगा एवं दुर्बल आधार पर भारी भरकम छत टिका नहीं रह सकेगा। इस कारण किसी अन्य प्रकार से बनी ‘ट्रस’ पर छत के भार की निर्भरता सुनिश्चित नहीं होगी। ट्रस पर आरोपित संघठित क्रिया की प्रतिक्रिया को संघठित करना ट्रस के विशिष्ट बनावट के कारण सम्भव होता है। प्रतिक्रिया को संघठित करने की इस सम्भावना को ट्रस्टीशिप कहते हैं। ‘ट्रस्टीशिप’ एक ‘सम्भावना’ है जो ट्रस के विशिष्ट बनावट के कारण सम्भव होता है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य अनेक व्यक्तियों (व्यक्तिसमुदाय) पर व्यक्ति आश्रित है, आवश्यकताओं की पूर्ति से व्यक्ति की संलग्नता व्यक्तिसमुदाय पर आरोपित व्यक्ति की क्रिया है। आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुदाय स्तर पर अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति से व्यक्ति स्वयं संलग्न होता है तो वह अन्य उन व्यक्तियों को ‘आश्रय’ प्रदान करता है, यह व्यक्तिसमुदाय पर आरोपित वह ‘प्रतिक्रिया’ है जो व्यक्तिसमुदाय पर आरोपित व्यक्ति की क्रिया के कारण बना है।
व्यक्ति के सामुदायिक जीवन के प्रसंग में व्यक्ति का सामुदायिक जीवन ‘ट्रस’ तुल्य है। व्यक्ति की बहुविध आवश्यकताएँ भारी भरकम विस्तृत छत तुल्य है। व्यक्ति के उपभोक्ता व्यवहार ‘ट्रस’ पर आरोपित क्रिया तुल्य है। उस व्यक्ति के ग्राहक व्यवहार उस क्रिया के प्रतिक्रिया तुल्य है। व्यक्ति अनिवार्य रूप से उपभोक्ता है, यह संघठित क्रिया आरोपित करने जैसा है। व्यक्ति अनिवार्य रूप से ग्राहक नहीं है, यह आरोपित संघठित क्रिया की प्रतिक्रिया का संघठित नहीं होना दर्शाता है।
सामुदायिक जीवन जीने के क्रम में आश्रय-आश्रित सम्बन्धों के अधीन व्यक्ति के सुनिश्चित ग्राहक व्यवहार संघठित प्रतिक्रिया को दर्शाता है। सुनिश्चित ग्राहक व्यवहारों से तात्पर्य है कि व्यक्ति अपने किन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के बदलें में वह अन्य व्यक्तियों के किन्हीं आवश्यकताओं की आपूर्ति अवश्य करता है। उस परिस्थिति में प्रतिक्रिया संघठित होगा। व्यक्ति के ग्राहक व्यवहारों को सुनिश्चित करने के लिए बैंकनोटों पर “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचनखण्ड़ को मुद्रित कर बैंकनोटों के लेन-देन से संलग्न प्रत्येक व्यक्ति को निर्धारित समान माप में सेवाओं का आदान-प्रदान करने के लिए वचनबद्ध किया जाता है। बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ से व्यक्ति के लिए निर्धारित वचनबद्धता व्यक्ति के सामुदायिक जीवन में अन्तर्निहित वह व्यवस्था है जिसे ‘ट्रस्टीशिप’ कहा गया है।
समुदाय स्तर पर बैंकनोटों के लेन-देन में व्यक्ति तथा अन्य अनेक व्यक्ति निर्धारित सममाप में सेवाओं का आदान-प्रदान (सम अदायगी) करते हैं तो यह उन व्यक्तियों के ट्रस्टीशिप व्यवहार को दर्शाएगा। समुदाय स्तर पर व्यक्ति के ट्रस्टीशिप व्यवहारों के कारण व्यक्ति के उपभोक्ता व्यवहार अन्य अनेक व्यक्ति को ग्राहक बनने का अवसर प्रदान करेगा एवं व्यक्ति के ग्राहक व्यवहार से अन्य अनेक व्यक्ति के उपभोक्ता हितों की रक्षा होगी। व्यक्ति अपने ‘उपभोक्ता हितों की रक्षा के लिए ‘ग्राहक बनकर’ अन्य अनेक व्यक्तियों के ‘उपभोक्ता हितों को जब सुनिश्चित करता है तो व्यक्ति तथा अन्य अनेक व्यक्ति उपभोक्ता एवं ग्राहक व्यवहारों के कारण ट्रस्टीशिप पर आधारित समुदायिक जीवन की रचना करते हैं, जिसे बोलचाल में ‘बाजार’ कहते हैं।