रुपए और बैंकनोट

रुपए, बैंकनोट और मुद्रा इन तीन शब्दों का प्रयोग उनके तीन अर्थ में न करते हुए कमोबेश एक अर्थ में तीनों शब्दों का प्रयोग किया जाता है। रुपए को भारतीय मुद्रा कहते हैं, ऐसा कहते हुए रुपए और मुद्रा में भेद नहीं किया गया। बैंकनोटों को रुपए कह कर पुकारते हैं, ऐसा कहते हुए रुपए और बैंकनोटों में भेद नहीं किया गया। ऐसा इसलिए  क्योंकि अर्थशास्त्र में रुपए, बैंकनोट और मुद्रा परिभाषित नहीं हैं।

 न केवल रुपए और बैंकनोट बल्कि अर्थशास्त्र को परिभाषित नहीं किया जा सकता है, ऐसा अर्थशास्त्र के पुस्तकों में लिखा हुआ आप पड़ेंगे, बावजूद इसके अर्थशास्त्र को विज्ञान कहा जाता है। विज्ञान परिभाषित न हो यह संभव नहीं है, इसलिए अर्थशास्त्र और उसमें रुपए तथा बैंकनोट आदि से सम्बन्धित विषयों को को हमने परिभाषित किया है। इसकी चर्चा करेंगे।

 1.01 रुपए व बैंकनोटों का अतीत और वर्तमान

 वर्तमान में  ‘रुपए’ कहते ही रुपए माप अंकित स्टेनलेस स्टील के बने रुपए के उन सिक्कों की याद आती है जिन पर 1 रुपए, 2 रुपए, 5 रुपए आदि माप अंकित कर भारत सरकार जारी करती है।

 ‘रुपए कहते ही रुपए माप अंकित कागज की उन पर्चियों का भी बोध होता है जिन पर 10 रुपए, 20 रुपए, 50 रुपए आदि माप छाप-छाप कर भारतीय रिजर्व बैंक उन्हें जारी करता है और जिन्हें रिज़र्व बैंक द्वारा जारी बैंकनोट कहते हैं।

 स्टेनलेस स्टील सिक्के अथवा रिजर्व बैंक द्वारा जारी कागज के बैंकनोट रुपए है अथवा नहीं इसकी चर्चा हम करें कि उससे पहले रुपए व बैंकनोटों के अतीत और वर्तमान की चर्चा कर लेना आवश्यक है।

 मुगल सम्राट शेरशाह सूरी के शासनकाल से लेकर द्वितीय विश्वयुद्ध तक के सुदीर्घ कालखण्ड़ में भारतवर्ष में 400 वर्षों (1540-1939) तक ‘रुपए’ कहने का तात्पर्य एक तोला चांदी से बना सिक्का था।

 एक तोला चांदी से बने सिक्के पर एक रुपए अंकित होने से उन वर्षों में एक तोला चांदी का बाजार मूल्य एक रुपए निर्धारित होकर एक तोला चांदी से बना सिक्का एक रुपए है, इन शब्दों में अतीत में ‘रुपए’ (एक रुपए) परिभाषित हुआ।

 एक तोला चांदी से बना सिक्का ‘रुपए’ कहलाया वहीं एक तोला सोना से बना सिक्का मुहर कहलाता था, जिसके बदले में चांदी के सोलह रुपए के सिक्कों का लेन-देन होता था। अतीत में ‘रुपए’ के लेन-देन का अर्थ सोना, चांदी के सिक्कों के लेन-देन से था।

 20 रुपए, 50 रुपए… आदि रुपए माप अंकित कागज की पर्चियाँ बैंकनोट कहलाते हैं। लेन-देन में बैंकनोटों का प्रयोग वर्ष 1770 ई0 से भारतवर्ष में प्रारम्भ हुआ जब कुछ निजी बैंकों ने बैंकनोटों को जारी किया। बैंकनोटों पर ‘I promise to pay the bearer on demand the sum of Rupees…’ अर्थात् मांग रखने पर ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ, यह वचनखण्ड मुद्रित कर वह निजी बैंक बैंकनोट जारी करते थे। बैंकनोट जारी करने वाले बैंक के लिए निर्धारित वचनबद्धता बहुत स्पष्ट था कि बैंकनोटों का धारक कोई व्यक्ति यदि बैंकनोट सुपुर्द (Surrender) कर बैंक के सम्मुख रुपए पाने की अपनी मांग (Demand) रखता था तो उस व्यक्ति को सोना, चांदी के सिक्के उतने ‘रुपए’ बैंकनोटों के धारक को बैंक अदा करता था।

 बैंकनोटों के धारक को अधिकार था कि वह बैंकनोट देकर बदले में सोना, चांदी के सिक्के बैंक से प्राप्त करे और “अदा करने के वचन” की संकल्पना के आधार पर ही लेन-देन में बैंकनोटों का प्रयोग भी उन दिनों स्वीकार्य हुआ था, अन्यथा लेन-देन में बैंकनोटों का प्रयोग उन दिनों स्वीकार्य नहीं होता।

 बैंकनोटों के बदले में बैंकनोटों के धारक को सोना, चांदी के सिक्के बैंकों से मिलने से बैंकनोटों का प्रयोग उन्हें ‘रुपए’ (सोना, चांदी के सिक्के) मानकर अनेक वर्षों तक किया गया, इसलिए ‘रुपए कहते ही बैंकनोटों का बोध हो जाता है, जब कि बैंकनोट ‘रुपए’ नहीं हैं। बैंकनोट रुपए होते तो उन पर बैंकनोटों के धारक को ‘रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ यह  रिज़र्व बैंक मुद्रित नहीं करता।

 बैंकनोटों के धारक किसी व्यक्ति को बैंकनोटों के बदले सोना, चांदी के सिक्के (रुपए) देने की वचनबद्धता जब तक बैंकों की थी तब तक लेन-देन के प्रयोग के लिए बैंकनोट जारी करने वाले बैंक उतने ‘रुपए’ के बैंकनोट जारी करते थे जितना सोना,चांदी उनके पास संचित (Reserve) होता था।

 जो बैंक बैंकनोटों के बदले में बैंकनोटों के धारक को सोना, चांदी के सिक्के (रुपए) देने में असमर्थ रहे वह बैंक दिवालिया घोषित हुए और इस कारण वह बैंक बंद भी हुए, उन बैंकों द्वारा जारी बैंकनोटों की मान्यता रद्द हुई।

 सोना, चांदी के संचित (Reserves) सिक्कों के एवज मे बैंकनोट जारी करने वाले सीमित कार्यक्षेत्र के कई निजी बैंक भारतवर्ष में कार्यरत थे। उनमें से प्रमुख कुछ बैंकों के नाम व उनका कार्यकाल यहाँ दिया गया है- बैंक ऑफ हिन्दुस्थान (1770-1831), एशियाटिक बैंक (1804-1820), मद्रास गवर्नमेंट बैंक (1806-1843), बैंक ऑफ बंगाल (1809-1861), कॉमर्शियल बैंक (1819-1831),

 कलकत्ता बैंक  (1824-1829), इन्डियन बैंक (1829-1848), बैंक ऑफ बम्बई (1840-1861), बैंक आफ वेस्टर्न इण्डिया (1842-1845), ओरियन्टल बैंक (1842-1861), बैंक ऑफ मद्रास (1843-1861), कॉमर्शियल बैंक ऑफ इण्डिया (1845-1861) एवं अन्य छोटे बड़े निजी बैंक लगभग 90 वर्षों तक भारत में बैंकनोट जारी करते रहे। उन बैंकों द्वारा जारी बैंकनोटों का लेन-देन बैंकों के अपने कार्यक्षेत्र (स्थान विशेष) तक सीमित था और वह बैंक 1861 ईस्वी तक सक्रिय रहे, उसके बाद बैंकनोटों को जारी करने का अधिकार निजी बैंकों का नहीं रहा।

 भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जिसे तब की ब्रिटिश सरकार ने ‘गदर’ की संज्ञा दी थी वह 1857 ईस्वीं की महत्वपूर्ण घटना थी। इससे पूर्व ब्रिटिश सरकार ने भारत पर शासन करने का अधिकार ईस्ट इन्डिया कम्पनी को दे रखा था और ईस्ट इन्डिया कम्पनी ने ही 1857 ईस्वीं से पूर्व बैंकनोटों को जारी करने का अधिकार निजी बैंकों को दिया हुआ था।

 1857 ईस्वीं की महत्वपूर्ण उस घटना के बाद भारत की शासन व्यवस्था गवर्नमेंट आफॅ इन्डिया (भारत सरकार) नाम से स्वयं ब्रिटिश सरकार सम्हालने लगी। इन्डियन पेपरमनी एक्ट-1861 बनाकर और भारत में कमिश्नर आफॅ करन्सी नियुक्त कर ब्रिटिश सरकार ने भारत में बैंकनोटों को जारी करने का अधिकार भारत सरकार (ब्रिटिश सरकार के अधीन) को दिया।

 1861 ईस्वीं के बाद स्वतंत्रता (1947) पूर्व तक ब्रिटिश सरकार के अधीन भारत सरकार द्वारा जारी बैंकनोट गवर्नमेंट आफॅ इन्डिया बैंकनोट कहलाए। यह कलकत्ता, बम्बई, मद्रास तीन शहरों को केन्द्र बनाकर तब की भारत सरकार द्वारा जारी किए गए जिनका लेन-देन अपने क्षेत्र विशेष में होता रहा।

 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यह आवश्यक समझा जाने लगा कि बैंकनोट वह जारी किए जाँए जो पूरे भारत में लेन-देन के लिए मान्य हों और प्रत्येक व्यक्ति उनका लेन-देन भारत में कहीं भी कर सके। इसके लिए रिज़र्व बैंक आफॅ इन्डिया एक्ट-1935 बनाकर भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना हुई और रिज़र्व बैंक द्वारा जारी बैंकनोटों का लेन-देन पूरे भारत में होने लगा।

 स्वतंत्रता पूर्व बैंकनोटों को चाहे निजी बैंकों ने अथवा रिज़र्व बैंक ने जारी किया हो वह बैंक लेन-देन के लिए उस माप में बैंकनोट जारी करते रहे जितने तोला सोना, चांदी (Bullion) के सिक्के उन बैंकों के पास संचित (Reserve) होता था।

 बैंकनोटों के संदर्भ में द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) महत्वपूर्ण घटनाक्रम सिद्ध हुआ। औद्योगिक क्रांति भी उस काल की युगान्तकारी घटना थी। वैश्विक स्तर पर एक के बाद एक अनेक देशों में लोकतंत्र की स्थापना होने से उन देशों में नए-नए विधान भी उस काल में बने।

 विश्वयुद्ध के कारण जहाँ सोना, चाँदी और अन्य धातुओं के मूल्य में वृद्धि हुई उनकी उपलब्धता भी कम हुई और इसके विपरीत बैंकनोटों का लेन-देन व्यापक रूप से होने लगा। फलस्वरूप कालान्तर में अपरिहार्य कारणों से रिज़र्व बैंक अपने Reserves से अधिक माप में बैंकनोट जारी करना चाहते थे।

 इसके लिए संसद में बहुमत का आधार लेकर रिज़र्व बैंक आफॅ इन्डिया एक्ट में एक के बाद एक संशोधन किए गए। 1956 ई० में Proportionate Reserve System की नीति बनी। एक दशक बाद ही वर्ष 1965 में Minimum Reserve System की नीति बनी। Reserves शब्द को त्याग कर Assets शब्द का प्रयोग किया जाने लगा, Assets शब्द का अर्थ परिसम्पत्तियों से है।

 Reserves का तात्पर्य संचय से है. वह बिकने के लिए उपलब्ध नहीं होते। Reserves स्वयं मूल्य होता है, उसका मूल्य नहीं लगाया जाता है। जिसका मूल्य लगाया जाता है वह सम्पत्ति Assets है। Assets का मूल्य लगाया जाता है, वर्ष दर वर्ष उनके मूल्य में वृद्धि होती रहती है, Assets वही रहते हैं उनके बडे हुए मूल्य पर अधिकाधिक बैंकनोट रिज़र्व बैंक छापते जाता है।

 अतीत में बैंक सोना, चांदी को Reserves में रखकर उतने रुपए के बैंकनोटों को जारी करते थे। बैंकनोट अधिक जारी करना होता तो उस अनुपात में सोना,चाँदी का Reserves बनाकर उनके एवज में बैंकनोट छापे जाते रहे किन्तु इस सम्बन्ध में वर्तमान व्यवस्था बैंक के Assets पर आधारित है।

 वर्तमान में रिज़र्व बैंक के पास उपलब्ध सोना व चाँदी उसकी सम्पत्ति (Assets) है। इसके अतिरिक्त Foreign Securities तथा Government of India Rupee Securities को रिज़र्व बैंक अपनी सम्पत्ति (Assets) मानता है। रिज़र्व बैंक अपनी कुल सम्पत्ति का बाजार मूल्य लगाकर उतने रुपए के बैंकनोट छाप कर आज जारी कर देता है। जो कुछ सम्पत्ति बैंक की है उसके बढ़े हुए बाजार मूल्य का आधार लेकर रिज़र्व बैंक वर्ष दर वर्ष अतिरिक्त बैंकनोट छाप देता है।

 बैंकनोटों का अन्य नाम Promissory notes है, जिसे हिन्दी में ‘साख पत्र’ कहते हैं। Promissory Notes का Promise शब्द बैंकनोटों पर मुद्रित “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचनखण्ड़ से निर्धारित बैंक की वचनबद्धता (Promise) ही है।

 अतीत में बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ में लिखित ‘रुपए’ से तात्पर्य एक तोला चांदी से बना सिक्का था और बैंकनोटों के बदले चांदी के रुपए के सिक्के बैंकनोटों के धारक किसी व्यक्ति को देने के लिए बैंक वचनबद्ध थे। जो बैंक इसके लिए वचनबद्ध नहीं रहे उन बैंकों द्वारा जारी बैंकनोटों की साख भी नहीं रही, अर्थात् लोग उन बैंकों द्वारा जारी बैंकनोटों को लेन-देन के लिए स्वीकार नहीं करते थे।

 अतीत में बैंकों द्वारा जारी बैंकनोट ‘साख पत्र’ होते थे और बैंकनोटों के बदले बैंक से ‘रुपए मांगने का अधिकार बैंकों ने बैंकनोटों के धारक प्रत्येक व्यक्ति को दिया हुआ था। इसके लिए बैंकनोटों पर बैंकों ने ‘I promise to pay the bearer on deamand the sum of Rs..’ यह वचनखण्ड़ मुद्रित किया हुआ था। जब कि वर्तमान में रिज़र्व बैंक ने वचनखण्ड का on deamand अंश हटाकर बैंकनोटों पर ‘I promise to pay the bearer the sum of Rs..’ यह वचनखण्ड़ मुद्रित किया हुआ है। इस कारण बैंकनोटों के बदले में रिज़र्व बैंक से ‘रुपए’ मांगने का अधिकार बैंकनोटों के धारक किसी व्यक्ति को आज नहीं है।

 विगत वर्षों में रिज़र्व बैंक ऑफ इण्डिया एक्ट में ऐसे संशोधन भी किए गए जिसके अनुसार यदि रुपए के सिक्के रिजर्व बैंक के पास नहीं हैं तो किसी व्यक्ति को बैंकनोटों के बदले रुपए के सिक्के न देने की रिज़र्व बैंक को छूट मिली है। इस कारण बैंकनोटों के धारक किसी व्यक्ति को रुपए देने के लिए रिज़र्व बैंक आज वचनबद्ध नहीं है, इसलिए बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचनखण्ड़ का पृथक कोई अर्थ नहीं रह गया, जो कि अतीत में हुआ करता था।

रुपए की परिभाषा :

वर्तमान में वचनखण्ड़ का इतना ही अर्थ रह गया है कि बैंकनोटों के धारक को बैंकनोटों के बदले ‘रुपए देने की अपनी वचनबद्धता के अन्तर्गत रिज़र्व बैंक पुनः  पुनः  ‘रुपए माप अंकित’ बैंकनोट ही लौटाता है, अतः ‘रुपए’ किसी माप को दर्शाता है। जैसे मैं धारक को पचास रुपए अदा करने का वचन देता है यह वचनखण्ड बैंकनोटों पर मंद्रित होने से बैंकनोटों का माप ‘पचास रुपए’ निर्धारित होता है।

 मैं धारक को एक सौ रुपए अदा करने का वचन देता है यह वचनखण्ड बैंकनोटों पर मुद्रित होने से उस आधार पर बैंकनोटों का माप एक सौ रुपए निर्धारित होता है। वर्तमान में बैंकनोटों पर मुद्रित मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हैं इस वचनखण्ड से बैंकनोटों का ‘माप’ केवल निर्धारित होता है।

 पचास रुपए अथवा एक सौ रुपए माप के बैंकनोटों में अन्तर कुछ भी नहीं है अन्तर मात्र उन पर मुद्रित वचनखण्ड में लिखित 50 रुपए अथवा 100 रुपए आदि भिन्न मापों का है। बैंकनोटों पर अंकित 50 रुपए, 100 रुपए आदि बैंकनोटों का कोरा माप है। 50, 100 आदि तो निश्चित रूप से माप हैं और उनके साथ का शब्द ‘रुपए’ माप की इकाई है, जैसे ’50 मीटर’ और ‘100 किलो’ आदि में ‘मीटर’ व ‘किलो’ आदि माप की इकाइयाँ हैं।

 किसी व्यक्ति ने अपने किन्हीं सेवाओं के बदले अन्य व्यक्ति से 40 रुपए माप के बैंकनोट लिया हो तो यह ’40 रुपए’ उस व्यक्ति के उन सेवाओं का माप है। सेवाओं का यह माप ’40 रुपए’ में शब्द ‘रुपए’ व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है तथा अंक ’40’ व्यक्ति के सेवाओं के माप को दर्शाता है, अतः रुपए व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है। आप इसे रुपए की परिभाषा कह सकते हैं।

 अतीत में रुपए (सिक्के व बैंकनोट) का निज मूल्य था जब कि वर्तमान में वह केवल माप दर्शाता है। यह परिवर्तन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के घटनाक्रम की देन है जब वैश्विक स्तर पर औद्योगिक प्रगति एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आगाज हुआ। अधिकाधिक बैंकनोट छापना आवश्यक होने से देश के संसद में बहुमत का आधार लेकर कानून में एक के बाद एक ऐसे संशोधन किए गए कि रुपए तथा बैंकनोटों का निज मूल्य नहीं रहा और मूल्यवान नहीं होने से ‘रुपए’ शब्द कोरा माप दर्शाता है।

1.02 रुपए परिभाषित था, आज रुपए परिभाषित नहीं है

 द्वितीय विश्वयुद्ध पूर्व भारतवर्ष में ‘रुपए’ कहने का तात्पर्य सोना व चाँदी जैसे मूल्यवान धातुओं के सिक्कों से था। एक तोला चाँदी का मूल्य एक ‘रुपए था और एक तोला चाँदी से बने सिक्कों को ‘रुपए’ कहते थे। सिक्के में चाँदी का मूल्य ही ‘रुपए’ कहलाया। रुपए का मूल्य रुपए की परिभाषा थी और ‘रुपए’ कहने से किसी मूल्य का बोध होता था।

 मूल्यहीन स्टेनलेस स्टील के रुपए के सिकों का लेन-देन आज जब हम कर रहे हैं तब किसी मूल्य को ‘रुपए’ कहा जाना उचित नहीं है, क्योंकि रुपए (स्टेनलेस स्टील के सिक्के) का निज मूल्य नहीं है। ‘रुपए’ कहते हुए किसी मूल्य का बोध कराना है तो मूल्यहीन स्टेनलेस स्टील के सिक्कों से ‘रुपए’ परिभाषित नहीं होगा।

1.03 बैंकनोट परिभाषित था, आज बैंकनोट परिभाषित नहीं है

 द्वितीय विश्वयुद्ध पूर्व बैंकनोट सोना, चाँदी के सिक्कों के समतुल्य थे। बैंकनोट देने से बदले में सोना, चाँदी के बने रुपए के सिक्के बैंकनोटों के धारक को बैंक दिया करते थे। इस कारण बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ से बैंक के लिए निर्धारित वचनबद्धता बैंकनोटों की परिभाषा थी।

 वर्तमान में बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं वचन देता है’ इस वचनखण्ड से बैंक के लिए निर्धारित वचनबद्धता बेमानी है. क्योंकि रिजर्व बैंक बैंकनोटों के धारक को बैंकनोटों के बदले हर बार पुनः  बैंकनोट लौटाता है। बैंकनोटों के बदले बैंकनोट दिए जाने से बैंकनोट कागज की पर्चियों से अधिक कुछ नहीं हैं, इसलिए वर्तमान में बैंकनोट परिभाषित नहीं हैं।

1.04 मुद्रा परिभाषित था, आज मुद्रा परिभाषित नहीं है

 द्वितीय विश्वयुद्ध पूर्व भारतवर्ष में मुद्रा कहने का तात्पर्य सिक्के अथवा बैंकनोटों पर मुद्रित राजमुद्रा (राज्य का प्रतीक स्टाम्प) से था जिसके कारण राज्य उन सिक्कों अथवा बैंकनोटों का गॉरण्टर हुआ करता था। गॉरण्टी सिक्कों अथवा बैंकनोटों के मूल्य को लेकर थी। इस कारण बैंकनोटों पर मुद्रित ‘केन्द्र सरकार द्वारा प्रत्याभूत’ इस वचनखण्ड का अर्थ मुद्रा की परिभाषा थी।

 वर्तमान स्टेनलेस स्टील के सिक्के और बैंकनोट जो कागज की पर्चियाँ मात्र हैं; मूल्यहीन होने से बैंकनोटों पर मुद्रित ‘केन्द्र सरकार द्वारा प्रत्याभूत’ इस वचनखण्ड़ का अर्थ अर्थात् बैंकनोटों की सरकारी गारंटी अप्रासंगिक होकर आज ‘मुद्रा’ भी परिभाषित नहीं है।

1.05 सीमा से बाहर जाकर कानून बने

 चुनाव जीतकर जनादेश के नाम पर बहुमत से निर्णय लेना लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और उस प्रक्रिया से देश की संसद में कानून बनाए जाते हैं। कानून बनाने की सीमाएँ हैं, जैसे पत्थर नीचे न गिरे या आग के लपटों में गर्मी न हो इस सम्बन्ध में संसद में कानून नहीं बनाए जा सकते।

 जो कानून बनाए नहीं जा सकते वह यदि हम संसद में बनाते हैं तो उसे हमने सीमा से बाहर जाकर कानून बनाना कहा है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत रुपए, बैंकनोट व मुद्रा जिसे बोलचाल में (Money) कहते हैं उस ‘धन’ के संदर्भ में संसद में सीमा से बाहर जाकर कानून बने।

 संसद में बने कानूनों से मूल्यहीन स्टेनलेस स्टील के सिक्के जारी करना कानून सम्मत हो गया और रिज़र्व बैंक द्वारा मूल्यहीन (बिना रिजर्व) बैंकनोट छाप-छाप कर जारी किया जाना भी कानून सम्मत हो गया। माना ऐसा इसीलिए किया गया क्योंकि वर्तमान में सोना, चाँदी, तांबा जैसे मूल्यवान धातु के बने सिक्के और उन सिक्कों के समतुल्य (रिजर्व) मूल्य के बैंकनोट रिज़र्व बैंक द्वारा जारी नहीं किए जा सकते। इसलिए माना स्टेनलेस स्टील से बने रुपए के सिक्कों को जारी करना गलत नहीं है और माना कि उसके लिए संसद में कानून बनाना भी गलत नहीं है।

 कानून बनाकर मूल्यहीन सिक्के और बैंकनोट जारी किए जाने से किसी मूल्य को ‘रुपए’ कहने का अधिकार चूँकि हम स्वतः  खो देते हैं, इसलिए ‘रुपए’ को मूल्य कहकर किसी ‘वस्तु आदि’ के मूल्य को ‘रुपए’ में व्यक्त करना गलत है।

 किन्हीं वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के मूल्य को ‘रुपए’ में व्यक्त करना हो तो मूल्यहीन रुपए के सिक्के और बैंकनोटों को जारी करने के लिए जो भी कानून संसद में बने हैं, वह भी गलत हैं और वह सीमा से बाहर जाकर बनाए गए कानून (संविधान संशोधन) हैं।

1.06 मूल्य नहीं माप है ‘रुपए’

 मूल्यहीन स्टेनलेस स्टील के बने रुपए के सिक्के और रिज़र्व बैंक द्वारा जारी रुपए माप अंकित बैंकनोट मूल्यहीन होने से उनकी सरकारी गॉरण्टी अप्रासंगिक होकर बैंकनोटों को ‘मुद्रा’ भी न कहा जा सके तो किसी मूल्य को ‘रुपए’ में व्यक्त नहीं किया जा सकता। बैंकनोटों (रुपए) के मूल्य के सम्बन्ध में रिज़र्व बैंक से यदि पूछें तो बैंक कोई जानकारी नहीं देगा, इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्री भी कुछ नहीं बताएँगे।

बैंकनोटों (रुपए) के मूल्य के सम्बन्ध में अर्थशास्त्र के पुस्तकों में कुछ लिखा हुआ नहीं है। केन्द्र सरकार और रिजर्व बैंक तथा अर्थशास्त्री जब न बतावें तो बैंकनोट मूल्यवान कैसे हुए? ‘रुपए’ नाम से जिन सिक्कों व बैंकनोटों का लेन-देन हम कर रहें हैं वह मूल्यवान नहीं होने से ‘रुपए’ कहने से कोई मूल्य नहीं बल्कि कोरा कोई माप ही व्यक्त होगा, रुपए से व्यक्ति के सेवाओं का माप व्यक्त होता है, जैसे ‘मीटर’ ‘लीटर’ आदि से कोरा माप व्यक्त होता है।  रुपए व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है।

1.07 माप का साधन बैंकनोट

बैंकनोटों के प्रसंग में सत्य यही है-

कि दिए गए बैंकनोट ही लिए जाते हैं और लिए गए बैंकनोट ही दिए जाते हैं।

कि व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो बैंकनोटों का लेन-देन करता हो।

कि बैंकनोटों का प्रत्येक लेन-देन किन्हीं दो व्यक्तियों के मध्य होता है।

कि एक व्यक्ति के हाथों अथवा उसके खाते से बैंकनोट दिए जाते हैं और दिए गए बैंकनोट अन्य व्यक्ति के हाथों लिए जाते हैं अथवा उसके खाते में जमा होता है।

कि किसी संस्था की ओर से या बहुसंख्य किन्हीं व्यक्तियों की ओर से बैंकनोटों का लेन-देन हो रहा हो तो भी उस संस्था या बहुसंख्य उन लोगों की ओर से एक व्यक्ति उस संस्था या बहुसंख्य उन व्यक्तियों का प्रतिनिधि बनकर उस एक व्यक्ति के हाथों बहुसंख्य उन व्यक्तियों के बैंक खाते से रुपए का लेन-देन होता है।

कि जिस किसी माप के बैंकनोटों का लेन-देन जिस किसी ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान के लिए हुआ उस ‘वस्तु आदि’ का मूल्य या शुल्क आदि बैंकनोटों का वह माप निर्धारित हो जाता है।

कि प्राकृतिक संसाधनों के लिए व्यक्ति प्रकृति को चूँकि बैंकनोट नहीं देता है, इसलिए प्राकृतिक संसाधन प्रकृति से निःशुल्क (बिना मूल्य) प्राप्त होते हैं।

कि प्राकृतिक संसाधनों के खनन, दोहन, परिवहन आदि व सम्बन्धित भिन्न कार्यों को सम्पन्न करने के लिए एक व एक से अधिक कुछ व्यक्ति अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं तथा उन सेवाओं के बदले उन्हें रुपए माप अंकित बैंकनोट दिए जाते हैं। दिए गए कुल बैंकनोटों के माप से किसी प्राकृतिक संसाधन का मूल्य ‘रुपए’ की इकाई में निर्धारित होता है।

कि मूल्य देकर किसी ‘प्राकृतिक संसाधन’ को लेने के अवसर पर दिए गए बैंकनोटों के बदले वस्तुतः  एक से अधिक अन्य उन कुछ व्यक्तियों की सेवाएँ अदा होती हैं, जिन्हें बैंकनोट दिया गया है और बदले में जिनकी सेवाएँ प्रदान होने से खनन, दोहन, परिवहन आदि सम्पन्न होकर वह ‘प्राकृतिक संसाधन’ उपलब्ध होता है। 

कि किसी वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) के उत्पादन में एक अथवा एक से अधिक व्यक्ति अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं तथा उन सेवाओं के बदले उन व्यक्तियों को दिए गए बैंकनोटों (रुपए) के माप से उस ‘वस्तु आदि’ का मूल्य (माप) निर्धारित होता है।

अतः  बैंकनोट (रुपए) देकर किए गए ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में एक से अधिक व्यक्तियों के किन्हीं सेवाओं का ही आदान-प्रदान बैंकनोटों के लेन-देन में होता है।

बैंकनोटों के लेन-देन के प्रसंग में उपरोक्त जो कुछ सत्य हैं उनके आधार पर हम कह सकते हैं कि जब भी बैंकनोटों का लेन-देन होगा और उसका हेतु जो भी होगा, व्यापक अर्थ में सदैव एक से अधिक कुछ व्यक्ति के किन्हीं सेवाओं का ही आदान-प्रदान बैंकनोटों के लेन-देन में होगा।

कोई व्यक्ति किन्हीं सेवाओं के बदले अन्य किसी व्यक्ति से जिस माप के ‘बैंकनोट’ लेता है अथवा वह अन्य व्यक्ति उस व्यक्ति को सेवाओं के बदले जिस माप के ‘बैंकनोट’ देता है, लेन-देन में प्रयुक्त बैंकनोटों’ के माप से उस व्यक्ति के उन सेवाओं का माप वह अन्य व्यक्ति निर्धारित करता है।

उदाहरण के लिए 50 रुपए माप अंकित बैंकनोट किसी व्यक्ति ने यदि अन्य किसी व्यक्ति को उसके सेवाओं के बदले दिया हो तो उस अन्य व्यक्ति के उन सेवाओं का माप 50 रुपए निर्धारित होगा।  

सेवाओं का माप ‘बैंकनोटों के लेन-देन से निर्धारित होता है,

इसलिए ‘बैंकनोट’ व्यक्ति के सेवाओं के माप का साधन कहलाएगा।

बैंकनोट व्यक्ति के सेवाओं को मापने का वैसा ही साधन है जैसे कलम लिखने का साधन है और हथौड़ी चोट करने का साधन हैं। बढ़ई और लोहार हथौडी जैसे बार-बार प्रयोग करते हैं। बैंकनोटों का भी लेन-देन में व्यक्ति बार-बार प्रयोग करते हैं।

व्यक्ति द्वारा बैंकनोटों का बार-बार प्रयोग से तात्पर्य है जिन बैंकनोटों का लेन-देन (प्रयोग) कोई एक व्यक्ति करता है वह बैंकनोट हर लेन-देन के बाद वैसा ही बने रहते हैं और वह बैंकनोट पुनः  पुनः  स्वयं उस व्यक्ति के एवं अन्य अनेक व्यक्तियों द्वारा किए गए बैंकनोटों के लेन-देन में प्रयोग होते हैं।

बैंकनोटों के सम्बन्ध में बिना अपवाद के यही कहा जाएगा कि ‘रुपए’ व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है और बैंकनोट व्यक्ति के उन सेवाओं को तथा उन सेवाओं के आदान-प्रदान को मापने का साधन हैं। आप इसे बैंकनोटों की परिभाषा कह सकते हैं।

1.08 माप का सजीव साधन हैं बैंकनोट

मीटर किसी वस्तु के लम्बाई के माप की इकाई है और मीटर माप अंकित छड़ अथवा फीता आदि मीटर इकाई में किसी वस्तु के लम्बाई को मापने का साधन है। ‘वस्तु आदि’ निर्जीव पदार्थ हैं और मीटर माप अंकित छड़ आदि निर्जीव किसी वस्तु के लम्बाई को मापने का निर्जीव साधन है।

इसके विपरीत व्यक्ति सजीव इकाई है और रुपए अथवा बैंकनोट आदि सजीव व्यक्ति के सेवाओं के माप से सम्बंधित विषय हैं। बैंकनोट जहाँ सजीव व्यक्ति के सेवाओं को मापने के सजीव साधन हैं, वहीं ‘रुपए’ सजीव व्यक्ति के सेवाओं के माप की सजीव इकाई है। निर्जीव और सजीव में मौलिक अन्तर है।

निर्जीव पदार्थों की मात्र उपस्थिति दर्ज होती है, जब कि सजीव इकाईयों का निज अस्तित्व होता है। बैंकनोटों का निज अस्तित्व है। बैंकनोटों का अस्तित्व ‘मंदी के समय समझ में आता है, जब धनी व्यक्ति भी बैंकनोट पाने के लिए तरस जाते हैं और बैंकनोट मिलें इसका बाट जोहते रहते हैं।

बैंकनोटों का अस्तित्व बैंकनोटों का सजीव होने का बोध कराता है जिसे मंदी का दुश्चक्र के संदर्भ में आगे हमने स्पष्ट किया है। निर्जीव और सजीव में अन्य मौलिक अन्तर है।

निर्जीव जितना कुछ है, वह सब कुछ हमारे और आपके अथवा सबके सम्मुख प्रत्यक्ष है, अतः  निर्जीव ‘वस्तु आदि’ का प्रत्यक्ष माप हम लेते हैं। सजीव जितना कुछ हमारे और आपके सम्मुख प्रत्यक्ष है, सजीव वह इकाई उससे अधिक और व्यापक होती है और वह व्याप कितना अधिक होगा उसका हम और आप केवल अनुमान ही लगा सकते हैं।

अतः  सजीव इकाईयों का माप जैसा भी हम लें वह सदैव अनुमानित माप होगा। ‘रुपए’ की इकाई में लिए गए अनुमानित माप को ‘रुपए की राशि’ कहते हुए सजीव इकाई ‘रुपए’ के संदर्भ को हमने आगे स्पष्ट किया है।

1.09 रुपए की राशि

ढेर (Heap) लगा कर दर्शाए गए माप को राशि कहते हैं। हाट बाजारों में आज भी साग-सब्जी या मिर्च-अदरक आदि के छोटे-बड़े ढेर लगाकर उन ढ़ेरों के दाम लगाए जाते हैं और उन्हें खरीदा अथवा बेचा जाता है। खेतों पर टमाटर अथवा बगीचों में आम के ढेर लगाकर उनके मूल्य के लिए बोली लगाकर उन ढ़ेरों के आधार पर उन्हें खरीदा अथवा बेचा जाना आज भी जारी है।

शहर के मण्डियों में भी ढेर लगाकर फल-सब्जियों को बेचते हुए देखा जा सकता है। अतः ढेर स्वयं एक माप है। ढेर लगे माप में न गिनती, न वजन का कोई स्थान है, यह माप महज अनुमानित होता है। धोबी घाट पर धोबी कपड़ों का देर लगा देता है। किसान खलिहानों में अनाज के ढेर लगा देता है।

यह ढेर किसी माप को नहीं दर्शाते क्योंकि किसान अथवा धोबी उन ढेरों को बेचने के उद्देश्य से नहीं लगाते। जो ढेर माप दर्शाने के लिए लगाए जाँए और वह भी महज अनुमानित माप को दर्शाते हों तो अनुमानित वैसे माप को ‘राशि’ कहते हैं। धोबी घाट पर कपड़ों का ढेर उसे केवल ढेर कहते हैं, वह राशि नहीं है।

राशि सहज उस ढ़ेर को कहते हैं जो किसी माप को दर्शाता है और वह माप महज अनुमानित होता है।

‘रुपए’ की इकाई में जो भी माप प्रस्तुत होता है वह अनुमानित होता है। उदाहरण के लिए कोई कुम्हार किसी घड़े के आदान-प्रदान में किसी अन्य व्यक्ति से प्रति घड़ा 8 रुपए का लेन-देन करता हो तो घड़े का मूल्य (माप) ‘8 रुपए’ प्रति घड़ा निर्धारित होगा।

 वह अथवा अन्य कोई कुम्हार समान वैसा ही किसी घड़े के आदान-प्रदान में उस अन्य व्यक्ति से अथवा अन्य किसी व्यक्ति से प्रति घड़ा ’10 रुपए’ का लेन-देन करता हो तो समान वैसा ही घड़े का मूल्य (माप) 10 रुपए प्रति घड़ा निर्धारित होगा जब कि रुपए के लेन-देन के अन्य अवसर पर घड़े का मूल्य 8 रुपए प्रति घड़ा भी निर्धारित हुआ है।

घड़े का मूल्य 8 रुपए, 10 रुपए आदि ‘रुपए’ की इकाई में व्यक्त अनुमानित माप हैं। यदि यह माप अनुमानित नहीं होते तो समान घड़े के दो मूल्य (माप) नहीं बल्कि उनके मूल्य का माप एक जैसा होता। घड़े का मूल्य 8 रुपए अथवा 10 रुपए आदि रुपए की राशियाँ हैं।

किसी ‘वस्तु आदि’ का मूल्य जितने रुपए होगा वह ‘रुपए की राशि’ कहलाएगी। रुपए की राशि कहने का अभिप्राय बैंकनोटों के किसी ढेर या ऐसा कहें कि बैंकनोटों के बंडल या गड्डियों से नहीं है, बल्कि रुपए की इकाई में अनुमानित किसी माप के बैंकनोटों को रुपए की राशि कहा गया है।

 किसी वस्तु के मूल्यनिर्धारण जैसा ही किसी व्यक्ति के सेवाओं के मूल्यनिर्धारण के प्रसंग में मुख्य विषय यही है कि किसी व्यक्ति के सेवाओं के आदान-प्रदान में जितने रुपए का लेन-देन कोई व्यक्ति अन्य किसी व्यक्ति से करता है उस व्यक्ति के सेवाओं का मूल्य (माप) उतने रुपए निर्धारित हो जाता है।

उदाहरण के लिए नामी गिरामी किसी उद्योग में कोई व्यक्ति अपने मासिक सेवाओं के लिए 10,000 रुपए (बैंकनोट) पाता (लेता) हो तो उस व्यक्ति के मासिक सेवाओं का (मूल्य) माप 10,000 रुपए निर्धारित होगा। किसी कारण से उस उद्योग से उस व्यक्ति का सम्बन्ध न रह जाए एवं किसी लघु उद्योग में समान उसी व्यक्ति को उसके मासिक सेवाओं के लिए 3,000 रुपए दिए जाते हों तो उस व्यक्ति के मासिक सेवाओं का (मूल्य) माप 3,000 रुपए निर्धारित होगा।

व्यक्ति के सेवाओं का मूल्य मासिक 10,000 रुपए, 3000 रुपए आदि रुपए की इकाई में दिए गए अथवा लिए गए बैंकनोटों के भिन्न माप हैं जो अनुमानित माप हैं। 10,000 रुपए, 3000 रुपए आदि जो किसी व्यक्ति के सेवाओं का अनुमानित मूल्य (माप) रुपए के पदों (Terms) में व्यक्त हुआ है, वह (10,000 रुपए, 3000 रुपए आदि) रुपए की राशियां,कहलाएंगे।

वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के बदले बैंकनोटों (रुपए) का लेन-देन होने से ‘वस्तु आदि’ का मूल्य (माप) रुपए में निर्धारित होकर वह माप रुपए की राशि कहलाता है। रुपए की राशि स्वयं माप है और बैंकनोट माप का साधन मात्र हैं, स्वयं कोई माप नहीं। बैंकों के तिजोरियों में बैंकनोट रखे हुए हैं, न कि रुपए की राशियाँ। रिज़र्व बैंक लेन-देन के लिए बैंकनोट जारी करता है, न कि रुपए की राशियां।

बैंक अथवा वित्तीय संस्था आदि भी बैंकनोटों का लेन-देन करते हैं, क्योंकि उनके लेन-देन में वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) के आदान-प्रदान में बदले में बैंकनोटों का लेन-देन नहीं होता है, बल्कि बैंकनोटों के बदले में बैंकनोटों का लेन-देन होता है।

बैंकनोट और रुपए की राशि में अन्तर सहज शब्दों में बताना हो तो यह कहना उपयुक्त होगा कि बैंकनोटों के लेन-देन के जिन अवसरों पर बदले में वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का आदान-प्रदान नहीं होता हो तो उन अवसरों पर लेन-देन बैंकनोटों का होता है।

बैंकनोटों के लेन-देन के जिन अवसरों पर बदले में ‘वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का आदान-प्रदान होता हो उन अवसरों पर किए गए बैंकनोटों के लेन-देन को हम रुपए की राशियों (Amount of Rupees) का लेन-देन कह सकते हैं, रुपए की राशि रुपए की इकाई में अनुमानित कोई माप है।

उदाहरण के लिए किसी व्यापारी से रुपए के लेन-देन के किसी अवसर पर एक क्विंटल चावल 1400 रुपए देकर लिया गया हो और किसी व्यापारी से रुपए के लेन-देन के अन्य अवसर पर एक क्विंटल वैसा ही चावल 1550 रुपए देकर लिया गया हो तो 1400 रुपए और 1550 रुपए यह दोनों रुपए की राशियाँ हैं, यह दोनों एक क्विंटल चावल के अनुमानित माप (मूल्य) को दर्शाते हैं।

 बैंक में अपने खातों में 1550 रुपए जमा किए गए हों और 1400 रुपए की निकासी अपने खाते से किया गया हो तो 1400 रुपए और 1550 रुपए यह दोनों ही बैंकनोट मात्र हैं, जिन्हें सहज ही ‘रुपए कह कर पुकारते हैं। बैंकों से हम रुपए का लेन-देन करते हैं।

रुपए की राशियों का लेन-देन और रुपए (बैंकनोटों) के लेन-देन में अन्तर है। रुपए की राशियों के लेन-देन के अन्तर्गत रुपए की राशियों (जैसे किसी ‘वस्तु आदि’ का मूल्य 525 रुपए) के ‘रुपए’ शब्द को हमने व्यक्ति के सेवाओं के माप की सजीव इकाई कहा है। व्यक्ति के सेवाओं के माप का सजीव साधन बैंकनोट हैं, जिसे मंदी के संदर्भ का उदाहरण देकर विस्तार से स्पष्ट किया गया है।

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