बैंकनोट देकर बदले में आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएं (वस्तु आदि) लेकर आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेना और उसे अपनी क्रयशक्ति मान लेना ‘क्रयशक्ति’ का एकांगी विचार है।
हमारी क्रयशक्ति व्यापक विषय है, जिसे अन्य कोई नहीं बल्कि हम स्वयं अपनी क्रयशक्ति बनाते हैं।
क्रयशक्ति का समग्र विचार हम करें कि इससे पूर्व ‘उर्जा और शक्ति’ से सम्बन्धित विषय को समझना हमारे लिए आवश्यक है। अपनी क्रयशक्ति हम स्वयं कैसे बनाते हैं, इसकी चर्चा आगे करेंगे
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5.01 उर्जा और शक्ति
उर्जा अव्यक्त, अदृश्य है। उर्जा के प्रयोग से कोई कार्य सम्पन्न होता है एवं सम्पन्न कार्य से किसी उर्जा का प्रयोग हुआ का बोध होता है। उर्जा के प्रयोग से कोई कार्य सम्पन्न होने से चूँकि उर्जा का बोध होता है, इसलिए उर्जा को अन्य शब्दों में कार्य करने की क्षमता कहते हैं।
उर्जा का माप उर्जा के प्रयोग से सम्पन्न कार्य के माप से निर्धारित होता है। उर्जा के प्रयोग से कार्य सम्पन्न (समापन) होगा अथवा नहीं होगा, इसका निर्धारण उर्जा के प्रयोग पर निर्भर करता है, किन्तु कितना कार्य सम्पन्न होगा यह उर्जा की क्षमता पर निर्भर करता है।
कार्य कैसा भी हो कार्य सम्पन्न करने के लिए कम-अधिक कुछ न कुछ समय अवश्य व्यतीत होगा। कम क्षमता की उर्जा का प्रयोग होने से कार्य सम्पन्न करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक समय लगेगा। अधिक क्षमता की उर्जा का प्रयोग होने से कार्य सम्पन्न करने के लिए अपेक्षाकृत कम समय लगेगा।
कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यतीत समय में जितना कार्य सम्पन्न हुआ, अर्थात् उर्जा का माप एवं व्यतीत उस समय के माप के अनुपात से इकाई समय में सम्पन्न कार्य का माप अर्थात् कार्य सम्पन्न करने का समय-दर निर्धारित होगा। कार्य सम्पन्न करने के समय दर से उर्जा की क्षमता का माप व्यक्त होगा।
उर्जा की क्षमता ‘शक्ति’ है।
उर्जा के प्रयोग से कार्य सम्पन्न करने का समय-दर ‘शक्ति’ के माप को दर्शाता है।
कार्य करने की क्षमता उर्जा है, उर्जा के प्रयोग से सम्पन्न कार्य का माप उर्जा का माप है।
उर्जा और शक्ति भिन्न अर्थ वाले दोनों शब्दों का सम्बन्ध चूँकि क्षमता से है, इसलिए क्षमता के अर्थ में इन दो शब्दों का प्रयोग समान अर्थ में हो जाता है।
उदाहरण के लिए उर्जा का हास (कमी) हुआ कहा जाता है, जब कि उर्जा अविनाशी है, इसलिए उर्जा का हास (क्षरण) होना सम्भव नहीं है। हास अर्थात् कमी या क्षरण शक्ति का होता है, उर्जा का नहीं होता है। शक्ति का ‘क्षय’ होता है और उसे उर्जा का क्षय कह दिया जाता है।
यहाँ क्षमता की चर्चा कर लेना आवश्यक है। क्षमता से तात्पर्य कर सकने से है अथवा सामर्थ्य से है। इस संदर्भ में सक्षम और अक्षम विपरीत अर्थ वाले दो शब्द हैं। कर सकने का सामर्थ्य जिसमें है वह सक्षम कहलाता है, उसकी (उर्जा) क्षमता शून्य से अधिक है।
कर सकने का सामर्थ्य जिसमें नहीं है वह अक्षम कहलाता है या अन्य शब्दों में उसकी (उर्जा) क्षमता शून्य है या उसे शक्तिशून्य कहा जाता है। इन्हीं शब्दों में जो सक्षम है या अन्य शब्दों में जिसकी (उर्जा) क्षमता शून्य से अधिक कोई मान लिए होता है, उसे ‘शक्तिमान’ कहते हैं।
उर्जा अविनाशी है, उर्जा का न नाश होता है और न ही उसका निर्माण होता है, उर्जा का रूपान्तरण भर होता है। किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए जिस रूप में उर्जा का प्रयोग आवश्यक है, उससे भिन्न रूप में उर्जा का प्रयोग उस कार्य को सम्पन्न करने के लिए नहीं किया जा सकता है, अर्थात् उर्जा का प्रयोग अनावश्यक हो सकता है।
कार्यविशेष को सम्पन्न करने के प्रसंग में किसी रूप में उर्जा आवश्यक (शक्तिमान) अथवा अनावश्यक (शक्तिशून्य) हो सकता है। उदाहरण के लिए यांत्रिक उर्जा से किसी यंत्र को चलाया जा सकता है। उर्जा के उसी रूप, अर्थात यांत्रिक उर्जा से किसी चूल्हे को तपाया नहीं जा सकता है।
कार्यविशेष ‘यंत्र चलाने के लिए प्रयुक्त यांत्रिक उर्जा शक्तिमान होगा।
कार्यविशेष ‘चूल्हे को तपाने के लिए यांत्रिक उर्जा शक्तिशून्य होगा।
किस रूप में उर्जा शक्तिमान है अथवा शक्तिशून्य है, इसका निर्धारण उर्जा के उस रूप से नहीं होता है बल्कि उस रूप में उर्जा के प्रयोग से कार्यविशेष कोई कार्य सम्पन्न हुआ है अथवा वह कार्य सम्पन्न नहीं हुआ है, इस पर आधारित होता है।
शक्तिमान उर्जा के प्रयोग से कार्य सम्पन्न होने से कार्य सम्पन्न करने का समय-दर अर्थात् शक्ति का मान शून्य से अधिक कोई मान लिए होता है। शक्ति के मान में कमी उर्जा को शक्तिशून्य बनाता है।
अर्थात् कार्य सम्पन्न करने का समय दर शून्य के निकट होता जाता है, अर्थात् कार्य सम्पन्न करने के लिए उर्जा अप्रयुक्त रह जाता है। उर्जा अप्रयुक्त रह जाने का तात्पर्य उर्जा का शक्तिशून्य होना है।
5.02 क्रयशक्ति का प्रसंग
कार्य सम्पन्न (समापन) करने के लिए कर्ता कोई क्रिया करता है और किसी उर्जा का प्रयोग करता है। शक्ति का सम्बन्ध उस उर्जा से है जिस उर्जा का प्रयोग किसी कर्ता ने कोई कार्य सम्पन्न करने के लिए किया है। कार्य, कर्ता, क्रिया, उर्जा, शक्ति आदि पाँच तत्वों का यह प्रसंग है।
क्रयशक्ति के प्रसंग में 1) कर्ता हम स्वयं हैं और 2) कार्य है ‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति तथा
3) क्रिया है बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान एवं …
4) उर्जा है हममें स्थित ‘जीव’ जिसे भूख लगती है और जिसकी अनेक आवश्यकताएँ हैं तथा …
5) शक्ति है हमारी ‘क्रयशक्ति’ जिसका सम्बन्ध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सामुदायिक स्तर पर किए जा रहे रुपए अथवा बैंकनोटों के लेन-देन से है।
प्रत्येक व्यक्ति को एक जैसा भूख लगती है, वह एक जैसे बीमार होते हैं तथा उनके व्याधियों का निदान भी एक जैसा है। भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कलाकौशल, यातायात सब प्रकार की आवश्यकताएँ सबकी हैं। यह आवश्यकताएँ व्यक्ति की इसलिए हैं, क्योंकि व्यक्ति के शरीर में जीव है।
भूखा व्यक्ति का जीव तड़पता है, अन्न खाने के बाद व्यक्ति का जीव तृप्त होता है, उसका शरीर नहीं। व्यक्ति के शरीर में ‘जीव’ के कारण व्यक्ति का जीवन है एवं व्यक्ति को जीवित कहा जाता है, जीव निकल जाए तो व्यक्ति जीवित नहीं रहता। जीव निकल जाए तो शरीर के होते हुए भी आवश्यकताएँ हमारी नहीं होतीं।
हममें स्थित ‘जीव’ हमारी उर्जा है, जीव निकल जाए तो जीवन का अन्त हो जाता है।
आवश्यकताओं की पूर्ति ‘जीव उर्जा’ के प्रयोग से सम्पन्न कार्य है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रसंग में, जैसे किसी व्यक्ति को भूख लगी, उसने अन्न ग्रहण किया और उस व्यक्ति के किसी आवश्यकता की पूर्ति हुई एवं कोई कार्य सम्पन्न हुआ कहा जाएगा।
किसी अन्य व्यक्ति को दूर परदेश जाना है, उसने रेल टिकट खरीदा और रेल का सफर पूरा कर परदेश की अपनी यात्रा पूरी की, इससे उस व्यक्ति के किसी आवश्यकता की पूर्ति होकर कोई कार्य सम्पन्न हुआ कहा जाएगा।
भूख लगने पर अन्न ग्रहण करने का कार्य व्यक्ति स्वयं करता है, उसमें करने के लिए ‘जीव’ के लिए क्या बचा है। व्यक्ति के रेलयात्रा के प्रसंग में भी व्यक्ति अपनी सेवाएँ (श्रम) प्रदान कर बैंकनोट आय में प्राप्त करता है एवं बैंकनोटों के व्यय से व्यक्ति रेल यात्रा सम्पन्न करता है।
आवश्यकताओं की पूर्ति व्यक्ति के ‘जीव’ ने किया है ऐसा नहीं है। व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रसंग में व्यक्ति के ‘जीव’ का योगदान वस्तुतः व्यक्ति के ‘श्रम’ को पुनः पुनः प्रस्तुत करने की है।
‘जीव उर्जा’ का प्रयोग कर व्यक्ति पुनः पुनः अपनी सेवाएँ (श्रम) प्रदान करता है एवं उन सेवाओं के बदले वह पुनः पुनः बैंकनोट आय में प्राप्त करता है तथा आय में प्राप्त बैंकनोटों के पुनः पुनः व्यय से व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति पुनः पुनः करता है।
जीवित प्रत्येक व्यक्ति जीवनयापन (बैंकनोटों की आय) के क्रम में अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करता है तथा जीवनधारण (बैंकनोटों का व्यय) के क्रम में वह स्वयं अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
व्यक्ति के क्रयशक्ति के प्रसंग में जिस क्रिया की बात हम करते हैं, वह बैंकनोटों के आय-व्यय (लेन-देन) से व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति का कार्य सम्पन्न करने की क्रिया है।
जीवनयापन, जीवनधारण तथा इनसे सम्बन्धित अन्य विषय एवं इसमें जीव उर्जा के प्रयोग का विषय आदि की चर्चा ‘श्रम उर्जा है’ शीर्षक देकर हमने विस्तार से किया है।
कार्य करने की क्षमता उर्जा है और उर्जा की क्षमता शक्ति है। उर्जा के प्रयोग से सम्पन्न कार्य का माप उर्जा का माप है तथा कार्य सम्पन्न करने का समय दर शक्ति का माप है।
मशीन के संदर्भ में जो विषय शक्ति है, व्यक्ति के संदर्भ में वह विषय क्रयशक्ति है, जहाँ व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति कार्य है और बैंकनोटों का आय-व्यय अर्थात् रुपए अथवा बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान क्रिया है।
बैंकनोटों की आय के लिए व्यक्ति प्रति कार्यदिवस औसत 8 घण्टे व अवकाश आदि के अतिरिक्त प्रतिमास औसत 25 कार्यदिवस, अर्थात् प्रतिमास औसत 200 घण्टे की सेवाएँ प्रदान करता है।
इसलिए क्रयशक्ति के प्रसंग में बैंकनोटों की व्यक्ति की ‘आय’ आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति द्वारा व्यतीत ‘समय के माप’ को दर्शाता है।
बैंकनोटों के व्यय के अनुपात में चूँकि व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, इसलिए क्रयशक्ति के प्रसंग में बैंकनोटों का ‘व्यय’ व्यक्ति के ‘आवश्यकताओं की पूर्ति (कार्य) के माप’ को दर्शाता है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति बैंकनोटों की जितनी राशि व्यय करता है एवं बैंकनोटों की उतनी ही राशि की आय में व्यक्ति ने जो कुछ समय व्यतीत किया है, दोनों माप निर्धारित कर कार्य सम्पन्न करने के समय-दर को ज्ञात कर व्यक्ति के क्रयशक्ति के माप को निर्धारित कर सकते हैं।