क्रयशक्ति का माप

रुपए व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है। उन सेवाओं को मापने का साधन बैंकनोट हैं।

बैंकनोटों के लेन-देन में सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान (वचन निर्वाह) से बैंकनोट, रुपए बनते हैं।

रुपए बने बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होने से रुपए बने बैंकनोट मुद्रा कहलाते हैं।

मुद्रा बने बैंकनोटों के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति जिस अनुपात में होती है, उस अनुपात में लोगों की क्रयशक्ति बनती है।

बैंकनोटों के लेन-देन के किसी अवसर पर बैंकनोट रुपए बने। रुपए बने बैंकनोटों के लेन-देन के अन्य अवसर पर रुपए बने वही बैंकनोट मुद्रा बने। मुद्रा बने, रुपए बने बैंकनोटों के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होना सर्वथा भिन्न विषय है, जिसका सम्बन्ध न बैंकनोटों से है, न रुपए बने बैंकनोटों से है, न मुद्रा बने उन रुपयों या कहें रुपए बने बैंकनोटों से है।

बैंकनोटों का रुपए बनना और मुद्रा बनने की प्रक्रिया में लोगों की क्रयशक्ति बनती है अर्थात् हमारी क्रयशक्ति बनने की एक निश्चित प्रक्रिया है, जिसका उल्लेख हमने किया है। हमारी क्रयशक्ति

कितनी बनी या नहीं बनी, इसकी चर्चा यहां करेंगे। क्रयशक्ति बनने की प्रक्रिया की चर्चाआगे करेंगे।

5.03 क्रयशक्ति का माप

मापनिर्धारण के लिए माप की ‘इकाई’ आवश्यक होगा जो देशकाल परिस्थिति निरपेक्ष किसी स्थिर मान से युक्त होगा। देश से तात्पर्य स्थान से है और काल से तात्पर्य समय की अवधि से है।

क्रयशक्ति के माप की इकाई के प्रसंग में ‘मुद्रा’ का विचार किया जा सकता है। एक मुद्रा अर्थात् ‘मुद्रा’ का मान, बैंकनोटों की वह राशि है जो समान रूप से किसी भी व्यक्ति को उसके प्रतिघण्टे की सेवाओं के लिए न्यूनतम दिया जाना चाहिए (व्यक्ति की आय) जिससे कि व्यक्ति प्रतिमास कम से कम 200 घण्टों की सेवाएँ प्रदान कर इकाई परिवार (व्यक्ति और आश्रित तीन व्यक्ति) के भरण-पोषण की व्यवस्था के लिए (व्यक्ति का व्यय) निर्धारित न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति वह प्रतिमास कर सके।

एक ‘मुद्रा’ अर्थात् मुद्रा का मान 5 रुपए या 15 रुपए या बैंकनोटों (रुपए) की अन्य कोई राशि निर्धारित हो सकती है। यह वैसा ही विषय है जैसे वैश्विक स्तर पर लेन-देन में एक डालर (अमेरिकी मुद्रा) 60 रुपए या 55 रुपए या बैंकनोटों (रुपए) की अन्य कोई राशि निर्धारित होता है। मुद्रा और उसके मान के सम्बन्ध में हमने विस्तार से ‘मुद्रा का मान’ शीर्षक से चर्चा किया है।

क्रयशक्ति के प्रसंग में आवश्यकताओं की पूर्ति को ‘कार्य’ कहा गया है। बैंकनोटों के व्यय के अनुपात में व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इसलिए आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति जितने बैंकनोट (रुपए) व्यय करता है उससे व्यक्ति द्वारा सम्पन्न कार्य का माप व्यक्त होगा।

व्यक्ति को होने वाली बैंकनोटों की आय से आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति द्वारा व्यतीत समय अथवा अन्य शब्दों में कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति द्वारा व्यतीत समय का माप व्यक्त होगा।

‘मुद्रा’ का मान बैंकनोटों की जो कुछ राशि निर्धारित होती है उसके आधार में चूँकि व्यक्ति की ‘आय तथा ‘व्यय’ दोनों है, जहाँ ‘व्यय’ से सम्पन्न कार्य एवं ‘आय’ से समय का माप व्यक्त होकर सम्पन्न कार्य का समय-दर अर्थात् व्यक्ति के क्रयशक्ति का माप ‘मुद्रा’ के पदों (Terms) में व्यक्त होगा।

मुद्रा का मान बैंकनोटों की जो कोई राशि निर्धारित हो, इकाई परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था के लिए निर्धारित न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति को प्रतिमास एक समान 200 मुद्रा के लिए निर्धारित बैंकनोटों की राशि व्यय करना आवश्यक होगा।

बैंकनोटों की आय से संलग्न किसी भी व्यक्ति के लिए सर्वमान्य रूप से यह आवश्यक होगा कि उसे कम से कम प्रतिमास औसत 200 मुद्रा के लिए निर्धारित बैंकनोटों की राशि की आय हो जिससे कि परिवार इकाई के लिए निर्धारित न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति वह प्रतिमास कर सके, अतः 200 मुद्रा के लिए निर्धारित बैंकनोटों की राशि व्यक्ति के क्रयशक्ति के न्यूनतम मान (एक अर्थात् इकाई क्रयशक्ति) को दर्शाएगा।

क्रयशक्ति का न्यूनतम मान अर्थात् 200 मुद्रा के लिए निर्धारित बैंकनोटों की राशि व्यक्ति के क्रयशक्ति का इकाई माप है। मुद्रा का मान निर्धारित 15 रुपए की राशि हो तो व्यक्ति की क्रयशक्ति का इकाई माप ‘3000 रुपए’ होगा एवं अन्य परिस्थतियों में मुद्रा का निर्धारित मान 5 रुपए की राशि हो तो व्यक्ति के क्रयशक्ति का इकाई माप ‘1000 रुपए होगा।

मुद्रा का मान मात्र सांख्यिक मान नहीं है. क्योंकि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपेक्षाकृत बैंकनोटों की कम राशि की आवश्यकता हो इसके लिए मुद्रा के मान को निम्न स्तर पर अथवा यथावत बनाए रखने के लिए उत्पादकता की उपलब्धियाँ पाना होगा,

अर्थात् क्रयशक्ति के लिए मुद्रा का मान ‘अर्जित’ किया जाता है। अतएव क्रयशक्ति का माप रुपए में व्यक्त होकर क्रयशक्ति के माप की इकाई को ‘अर्जितमुद्रा’ कह सकते हैं। मुद्रा का मान निर्धारित 5 रुपए हो तो ‘1000 रुपए’ क्रयशक्ति का इकाई माप होगा और एक अर्जितमुद्रा ‘1000 रुपए’ होगा।

व्यक्ति की क्रयशक्ति, इन शब्दों में परिभाषित होगा : अर्जितमुद्रा रुपए व्यक्ति की क्रयशक्ति है।

व्यक्ति के प्रयासों से निर्धारित मुद्रा के मान को व्यक्ति द्वारा ‘अर्जितमुद्रा’ कहा गया है। आय में प्राप्त बैंकनोटों में अर्जितमुद्रा का जो कुछ माप प्रस्तुत होता है उससे व्यक्ति की क्रयशक्ति के माप को निर्धारित किया गया है।

व्यक्ति की आय 10,000 रुपए बनी रहे किन्तु मुद्रा का मान अपेक्षाकृत रुपए की अधिक राशि निर्धारित हो तो व्यक्ति के क्रयशक्ति का माप अपेक्षाकृत कम निर्धारित होगा।

जैसे मुद्रा का मान निर्धारित 12 रुपए की राशि होने से 10,000 रुपए की आय के लिए व्यक्ति के क्रयशक्ति का माप ‘4.16 अर्जितमुद्रा’ रुपए निर्धारित होता है।

मुद्रा का मान निर्धारित 15 रुपए की राशि होने से अर्थात् अपेक्षाकृत रुपए की अधिक राशि निर्धारित होने से 10,000 रुपए की आय के लिए व्यक्ति के क्रयशक्ति का माप 3.33अर्जितमुद्रा’ निर्धारित होगा।

व्यक्ति का ‘जीव जिसे उर्जा कहा गया है वह एक नहीं तो दूसरे, तीसरे, चौथे व्यक्ति में अर्थात् अनेक व्यक्ति में वह सदैव बना रहता है। अनेकानेक व्यक्ति में समान एक जीव है, धनी, निर्धन, ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष, अबाल वृद्ध सब में एक समान जीव है, ‘जीव’ जिसे उर्जा कहा गया है वह सर्वव्यापक है।

व्यक्ति में सर्वव्यापक जीव के कारण व्यक्ति जन्म से मृत्युपर्यन्त समुदाय में रहता है, जिसे व्यक्ति का सामुदायिक जीवन कहते हैं। समुदायिक जीवन में व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होने से सर्वव्यापी जीव जो उस व्यक्तिविशेष में भी है उस व्यक्ति (जीव) के द्वारा कार्य सम्पन्न हुआ का बोध होता है।

समुदाय स्तर पर छोटी-बड़ी कई इकाईयों में व्यक्ति रहता है एवं अन्य कुछ व्यक्तियों को आश्रय प्रदान करता है तथा अन्य कुछ व्यक्तियों के आश्रित होता है। समुदाय स्तर पर अनेक व्यक्ति आश्रित होंगे अथवा आश्रय बनेंगे। आश्रय बनने अथवा आश्रित बनने के अतिरिक्त विकल्प व्यक्ति के सम्मुख नहीं है।

‘आश्रय प्रदान करते हुए व्यक्ति उस पर आश्रित कुछ व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। ‘आश्रित’ बनकर उसे आश्रय प्रदान करने वाले अन्य कुछ व्यक्तियों से अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। आश्रय-आश्रित की भूमिका में व्यक्ति अपने सामुदायिक जीवन में जिन छोटी-बड़ी इकाईयों में रहता है, उनमें व्यक्ति का परिवार आधारभूत इकाई है।

किसी परिवार में ‘आश्रय’ बना व्यक्ति बैंकनोटों की आय से संलग्न (जुड़ा) होगा एवं परिवार के अन्य व्यक्ति उस व्यक्ति पर आश्रित होंगे। आश्रय बना व्यक्ति स्वयं अपना तथा परिवार के अन्य व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति से संलग्न (जुड़ा) होगा।

क्रयशक्ति के प्रसंग में रुपयों  की आय से संलग्न प्रत्येक व्यक्ति ‘केन्द्र’ में होता है एवं उस व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के विचार के साथ अन्य कुछ व्यक्ति जो उस पर आश्रित होते हैं, उनके आवश्यकताओं की पूर्ति का विचार भी होता है।

मुद्रा का मान रुपयों  की जो कुछ राशि निर्धारित होता है, उसके निर्धारण में व्यक्ति स्वयं और उस पर आश्रित अन्य तीन व्यक्तियों के इकाई परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था अर्थात् आवश्यकताओं की पूर्ति का विचार किया जाता है।

संयुक्त परिवार की व्यवस्था में उस परिवार में एक से अधिक व्यक्ति रुपयों  के आय से संलग्न हों तो भी जब व्यक्ति की क्रयशक्ति के माप का प्रसंग होगा ‘आश्रय’ बने प्रत्येक व्यक्ति अर्थात् रुपयों  की आय से संलग्न प्रत्येक व्यक्ति को केन्द्र में लेकर उस इकाई परिवार का ही विचार प्रस्तुत होगा  जिस इकाई परिवार को मुद्रा का मान रुपयों की निर्धारित किसी राशि का आधार माना गया है।

समुदाय स्तर पर रुपयों  की आय से अधिकाधिक व्यक्ति संलग्न हों तो इकाई परिवार में आश्रय बने व्यक्ति पर आश्रित व्यक्ति कम होंगे, इसके विपरीत रुपयों की आय से कम व्यक्ति संलग्न हों तो इकाई परिवार में आश्रय बने व्यक्ति पर आश्रित व्यक्ति अधिक होंगे।

परिवार इकाई में आश्रय बने व्यक्ति पर आश्रित व्यक्ति कम हों तो परिवार इकाई के भरण-पोषण की व्यवस्था के लिए निर्धारित प्रतिमास की न्यूनतम आवश्यकताएँ कम होने से मुद्रा का मान रुपयों  की कम राशि निर्धारित होगा।

परिवार इकाई में आश्रय बने व्यक्ति पर आश्रित व्यक्ति अधिक हों तो मुद्रा का मान रुपयों की अधिक राशि निर्धारित होगा।

मुद्रा का मान रुपयों  की कम राशि निर्धारित हो तो व्यक्ति के क्रयशक्ति का मान अधिक होगा एव मुद्रा का मान रुपयों की अधिक राशि निर्धारित हो तो व्यक्ति के क्रयशक्ति का माप कम होगा।

अतएव समुदाय स्तर पर रुपयों की आय से कम अथवा अधिक संख्या में व्यक्ति संलग्न हो तो व्यक्ति के क्रयशक्ति का माप अधिक अथवा कम निर्धारित होता है।

व्यक्ति के क्रयशक्ति के प्रसंग में व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति सम्पन्न कार्य है। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए जिस उर्जा का प्रयोग होता है, उसे व्यक्ति में स्थित जीव कहा गया है जो व्यक्ति को पुनः  पुनः  श्रम (सेवाएँ) करने के अवसर प्रदान कर व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति का कार्य सम्पन्न करता है।

अन्य अनेक व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति कर बदले में व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होने के अवसरों पर ही व्यक्ति को पुनः  पुनः  श्रम करने के अवसर प्राप्त होते है, जब व्यक्ति के जीव उर्जा का प्रयोग होता है।

समुदाय स्तर पर अन्य अनेक व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति कर बदले में व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होने के अवसरों पर समुदाय स्तर पर, व्यक्ति के लिए पुनः  पुनः  श्रम करने (रोजगार) के कम अवसर बनने से जीव उर्जा की क्षमता अर्थात् ‘क्रयशक्ति’ का माप कम प्रस्तुत होगा।

व्यक्ति के लिए पुनः पुनः श्रम करने के (रोजगार) अधिक अवसर बनने से उर्जा (जीव उर्जा) की क्षमता अर्थात् ‘क्रयशक्ति’ का माप अधिक प्रस्तुत होगा।

व्यक्ति क्रयशक्ति सम्पन्न (प्राप्त) हो गया एवं वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) को क्रय करके उसने अपने आवश्यकताओं की पूर्ति कर लिया यह विचार सत्य नहीं है, इस सम्बन्ध में सत्य यही है कि समुदाय स्तर पर अन्य अनेक व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति कर बदले में उसने अपने आवश्यकताओं की पूर्ति किया है, जो व्यक्तिसमुदाय के अनेकानेक प्रत्येक व्यक्ति में स्थित समान जीव (उर्जा) के कारण सम्भव होता है।

व्यक्ति में स्थित यह जीव उर्जा है जिसकी क्षमता का माप व्यक्ति की क्रयशक्ति है। व्यक्ति की क्रयशक्ति उसके जीव उर्जा से भिन्न शुद्ध एक माप है, माप के अतिरिक्त क्रयशक्ति का व्यक्ति के लिए कोई महत्व नहीं है।

मुद्रा का मान रुपए की इकाई में बैंकनोटों की कौन सी राशि निर्धारित होता है, क्रयशक्ति का माप उस पर निर्भर करता है। समुदाय स्तर पर अनेकानेक व्यक्ति के लिए पुनः  पुनः  श्रम करने के (रोजगार) कितने अवसर बनते हैं, क्रयशक्ति का माप उस पर निर्भर करता है।

श्रम करना ही व्यक्ति के वश में है, जिसे वह करता है।

अपनी क्रयशक्ति बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति अन्य अनेक व्यक्तियों पर निर्भर है।

क्रयशक्ति शुद्ध एक माप है और माप के अतिरिक्त व्यक्ति की क्रयशक्ति कुछ भी नहीं है कि …

व्यक्ति अपनी क्रयशक्ति अपने स्तर पर इसे बना सके।

व्यक्ति की क्रयशक्ति कैसे बने इस सम्बन्ध में ‘क्रयशक्ति का गठन’ शीर्षक से अपने विचार हमने विस्तार से आगे लिखा है।

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