मुद्रामंत्र की प्रसव पीड़ा

जमशेदपुर, झारखण्ड स्थित टाटा टिनप्लेट डिवीजन (TTD) उद्योग में कार्यरत रहने के दौरान नब्बे के दशक के उत्तरार्ध (1985-1990) में विभाग में अनपेक्षित कार्य का दबाव, जिसका सम्बन्ध उद्योग में उत्पादकता की उपलब्धियों से था, हमारे लिए उत्पादकता के पक्ष को स्पष्ट करना बाध्यकारी हो गया था।

बाध्यकारी परिस्थितियों में गहन चिंतन मनन से उत्पादकता विषय में स्पष्ट धरना हमारी बनी कि बैंकनोटों पर लिखित “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूं” यह वचन जिसका अर्थ है बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएं आदि (वस्तु आदि) के आदान-प्रदान में सममाप में लोगों के सेवाओं के आदान-प्रदान की लोगों की वचनबद्धता है, यह विषय वस्तुतः उत्पादकता है।

उत्पादकता के सम्बन्ध में वर्षों 191पत्रों का पत्राचार कार्यरत उद्योग प्रबन्धन से किया। वर्तमान में प्रचलित उत्पादकता की अवधारणा को समझने के लिए राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC) से वर्षों 164 पत्रों का पत्राचार किया। इस कालखंड में अनेक मित्रों एवं विद्वानों से निरन्तर नियमित चर्चाओं के बाद स्पष्ट हो चुका था कि लोगों के सेवाओं का सममाप में आदान-प्रदान उत्पादकता है। यह बैंकनोटों पर लिखित “मैं धारक को …..वचन देता हूं” वचन निर्वाह है, इसलिए वर्षों 280 पत्रों का पत्राचार RBI से किया।

बाध्यकारी परिस्थितियों में उत्पादकता के सम्बन्ध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए वर्षों TTD, NPC और RBI से निरन्तर नियमित रूप से किया गया 635 पत्रों का पत्राचार किसी प्रसव पीड़ा से कम न था। जिसे हमने प्रसव पीड़ा कहा है उसके कारण ‘मुद्रामंत्र’ स्पष्ट विचार बना, विचार का जन्म कह सकते हैं।

बैंकनोटों (रुपए) के लेन-देन में बदले में सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान की लोगों की वचनबद्धता जिसे उत्पादकता कहा गया है, इसमें नया कुछ भी नहीं, यह तो स्वयं रिज़र्व बैंक के आचरण का विषय है, जिसे न मानने का प्रश्न ही नहीं है। रुपयों के लेन-देन में वचन निर्वाह से है, रुपयों के लेन-देन में सुधार होकर लोगों के आर्थिक सामाजिक सब समस्याओं का समाधान होगा, यह मुद्रामंत्र का विषय है।

टाटा टिनप्लेट डिवीजन (TTD) और राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC) तथा भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), इनसे किये गए पत्राचार की प्रतिलिपियां संलग्न हैं। अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करें।

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