व्यक्ति का श्रम

व्यक्ति जब कभी श्रम करेगा वह किसी न किसी कार्य को सम्पन्न करेगा और कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति अपने तन और मन तथा बुद्धि का प्रयोग करेगा एवं कुछ समय भी व्यतीत करेगा।

व्यक्ति स्वयं अर्थात् उसका तन और मन एवं उसके द्वारा सम्पन्न कार्य तथा कार्य में प्रयुक्त बुद्धि और कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति द्वारा व्यतीत समय आदि व्यक्ति के श्रम के प्रमुख पांच तत्व हैं। सबसे पहले इन पांच तत्वों की चर्चा करते हुए व्यक्ति के श्रम की चर्चा हम यहाँ करेंगे।

व्यक्ति का श्रम ऊर्जा है। ऊर्जा जो कुछ है, जैसा भी है, ऊर्जा अविनाशी होगा, उसका न निर्माण होगा न नाश होगा। ऊर्जा अन्य रूपों में रूपांतरित होता रहेगा। व्यक्ति के श्रम के अन्य रूपों की चर्चा हम यहाँ करेंगे।

श्रम के अन्य रूपों में श्रम करता हुआ व्यक्ति को अन्य नामों से जाना जाता है, जब कि व्यक्ति वही रहता है और व्यक्ति द्वारा किया गया श्रम भी वही रहता है, बदलता है व्यक्ति का नाम जैसे व्यक्ति श्रमिक, व्यापारी, व्यवसायी आदि अन्य नामों से जाना जाता है, इसकी चर्चा भी हम यहाँ करेंगे।   

2.01 कार्य, व्यक्ति, बुद्धि

कोई क्रिया सम्पन्न होकर ‘कार्य’ कहलाता है। सम्पन्न होने का तात्पर्य समापन अर्थात् समाप्त होने से है। सम्पन्न (समाप्त) क्रिया का आरम्भ अवश्य होगा। आरम्भ और अन्त होने से ‘क्रिया’ समय की किसी अवधि में सम्पन्न (समापन) होकर कार्य कहलाएगा। कुएँ से पानी निकालना कार्य है।

निरन्तर जारी रहने वाली क्रियाएँ सम्पन्न नहीं होती हैं। पृथ्वी निरन्तर सूर्य की परिक्रमा करती (क्रिया) है, व्यक्ति निरन्तर सांस लेता (क्रिया) है। निरन्तर जारी रहने वाली क्रियाओं को प्रकृति कहना उपयुक्त होगा। सांस लेना व्यक्ति की प्रकृति है। पृथ्वी का सूर्य की परिक्रमा प्रकृति है।

क्रियाएँ जो सम्पन्न नहीं होती हैं, अर्थात् निरन्तर जारी रहती हैं अथवा जो क्रियाएँ सम्पन्न (समापन) हो जाती हैं. दोनों ही क्रियाओं के परिणाम होते हैं और दोनों ही क्रियाएँ किसी उर्जा के प्रयोग से जारी रहती हैं तथा प्रयोग किए गए उर्जा का रूपान्तरण होता है।

निरन्तर जारी रहने वाली क्रियाओं में प्रयुक्त उर्जा (प्रयोग किए गए) का रूपान्तरण चक्रीय क्रम में जारी रहता है। चक्रीय क्रम में उर्जा का रूपान्तरण (उर्जा चक्र) होकर निरन्तर जारी रहनेवाली क्रियाओं का संचालन उर्जा चक्र के कारण होता है और उनका परिणाम निरन्तर आता रहता है।

प्रकृति से तात्पर्य निरन्तर जारी रहने वाली उन क्रियाओं से है जिनका निरन्तर परिणाम आता रहता है और जो उर्जा चक्र के कारण जारी रहते हैं।

समय की किसी अवधि में सम्पन्न होने वाली क्रियाओं में प्रयुक्त उर्जा का रूपान्तरण चरणों में होता है। उर्जा का रूपान्तरण चरणों में होकर रूपान्तरित उर्जा के प्रयोग से समय के किसी अवधि में सम्पन्न होने वाली क्रियाओं का निश्चित परिणाम आने को ‘कार्य’ कहा जाता है।

‘कार्य से तात्पर्य उन क्रियाओं से है जो रूपान्तरित उर्जा के प्रयोग से किए जाते हैं और निश्चित कोई परिणाम देकर समय के किसी अवधि में सम्पन्न (समापन) होती हैं।

कार्य करने के अवसरों पर कार्य सम्पन्न करने वाला कर्ता अवश्य होगा। कर्ता जो कोई भी होगा वह परिणाम के लिए कार्य (क्रिया) करेगा। परिणाम जो कर्ता का आचरण बन जाता है और स्वभाविक रूप से कर्ता प्रस्तुत करता है, जैसे भोजन करना अथवा निद्रामग्न होना आदि ‘आचरण’ का विषय होने से क्रियाएँ महत्वपूर्ण होती हैं और कार्य उन क्रियाओं से ही जाने जाते हैं।

किसी व्यक्ति द्वारा भोजन अथवा स्नान किया जाना या किसी पक्षी द्वारा घोंसला बनाया जाना उनके द्वारा किए गए कार्य होते हुए भी उनके आचरण से संबंधित होने से उनके कार्य अन्य शब्दों में उनके ‘कर्म’ कहलाते हैं।

कर्ता के क्रिया के परिणाम ऐसे भी होते हैं जो कर्ता के आचरण का विषय नहीं होते। कार्य कहने का स्पष्ट अभिप्राय वैसे क्रियाओं से है जो समय के किसी अवधि में सम्पन्न होती हैं और जो क्रिया को सम्पन्न करने वाले कर्ता के आचरण का विषय नहीं होता है, अर्थात् क्रिया के परिणाम महत्वपूर्ण होते हैं और कार्य परिणाम के नाम से जाना जाता है। जैसे कुएँ से पानी निकालना व्यक्ति का कार्य है, जब कि भोजन करना व्यक्ति का कर्म है।

जीय, जन्तु पशु, पक्षी…आदि का जीवन आचरण प्रधान होता है, अतः उनके द्वारा किए गए कार्य को कर्म कहना उपयुक्त होगा। व्यक्ति के जीवन में उसका आचरण है और आचरण के अतिरिक्त भी व्यक्ति का जीवन है। व्यक्ति कर्म करता है और वह कार्य भी करता है।

व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई जिन कार्यों को सम्पन्न करते हैं वह या तो उनकी प्रकृति कहलाएगा अथवा उनका कर्म कहलाएगा। कार्य का कर्ता सदैव कोई न कोई व्यक्ति होगा। कोई कार्य जब भी होगा उसे कोई व्यक्ति करेगा। व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो कार्य कर सके।

कार्य सदैव कोई व्यक्ति करता है। कार्य करने के लिए व्यक्ति का प्रयोग अवश्य होगा। व्यक्ति के प्रयोग से तात्पर्य है- कार्य करने के लिए व्यक्ति उस उर्जा का भी प्रयोग करेगा जिस उर्जा का सम्बन्ध स्वयं व्यक्ति से है।

कार्य करने के लिए व्यक्ति अपने जिस उर्जा का प्रयोग स्वयं वह करता है, उसे व्यक्ति का संस्कार उर्जा कहते हैं। अपने संस्कारों के अधीन व्यक्ति कोई कार्य करता है व अन्य शब्दों में संस्कार उर्जा का प्रयोग ‘व्यक्ति’ किसी कार्य को करने के लिए करता है।

कार्य करने के लिए व्यक्ति के संस्कार उर्जा का प्रयोग अनिवार्य है, इसके आतिरिक्त आवश्यकतानुसार ताप, विद्युत… आदि अन्य किसी उर्जा का भी प्रयोग वह करता है। कार्य करने के लिए जिस किसी उर्जा का प्रयोग होता है, प्रयोग के बाद वह उर्जा रूपान्तरित हो जाता है।

व्यक्ति का ‘संस्कार उर्जा’ प्रयोग के बाद रूपान्तरित होकर प्रकारान्तर से व्यक्ति का ‘श्रम उर्जा’ बनकर प्रकट होता है।

‘श्रम उर्जा’ व्यक्ति के ‘संस्कार उर्जा’ का रूपान्तरण भर है, जो व्यक्ति द्वारा कोई कार्य सम्पन्न किए जाने से कार्य करने में व्यक्ति द्वारा किया गया ‘श्रम’ (उर्जा) बनकर प्रकट होता है।

2.02 व्यक्ति कहने का स्पष्ट अर्थ है

व्यक्त इकाई ‘व्यक्ति’ है। ‘व्यक्त’ कहने का तात्पर्य सब कुछ स्पष्ट होना अर्थात् सब कुछ जानने से है। अपने सम्बन्ध में व्यक्ति सब कुछ जानता है और बता सकता है अर्थात् वह व्यक्त है।

व्यक्ति का वर्तमान में जो कुछ स्वरूप है उससे भिन्न किसी स्वरूप में व्यक्ति के प्रस्तुत होने की सम्भावना दूर-दूर तक कहीं नहीं है, अर्थात् वह न किसी प्रकार से कम है अथवा अधिक है अर्थात् वह अंशों (भिन्न) में नहीं है बल्कि वह अपने आप में ‘एक’ है अर्थात् इकाई है। अंशों (भिन्न) में नहीं होने से व्यक्ति जो कुछ है जैसा भी है वह पूर्ण (एक) है कहा जाएगा।

व्यक्ति को ‘पूर्ण’ कहने का अभिप्राय इन पंक्तियों में यह नहीं है कि व्यक्ति सर्वस्व अथवा सर्वेसर्वा है, बल्कि व्यक्ति ‘पूर्ण’ है कहने का अभिप्राय है कि व्यक्ति के सम्बन्ध में जितना कुछ हम जानते हैं वही सब कुछ है। ऐसा स्वीकार नहीं करने से व्यत्ति को रहस्यपूर्ण मानने से व्यक्ति के ‘श्रम’ के सम्बन्ध में हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकेंगे।

व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य प्रत्येक इकाई (पूर्ण) होते हुए भी ‘व्यक्त’ नहीं होने से अर्थात् अपने सम्बन्ध में स्वयं सब कुछ नहीं जानने से वह (प्रत्येक इकाई) ‘व्यक्ति’ नहीं है बल्कि उन्हें जीव, जन्तु, पशु, पक्षी…आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है।

व्यक्ति के ‘श्रम’ के विचार के इस प्रसंग में ‘पूर्ण व्यक्त इकाई’ उस व्यक्ति का ही विचार यहां किया गया है जो व्यक्त है एवं व्यक्त ही नहीं जो पूर्ण भी है तथा जो पूर्ण व्यक्त इकाई है। व्यक्त इकाई केवल व्यक्ति है। पूर्ण व्यक्त इकाई व्यक्ति के नाम से जो कुछ हम देखते हैं वह यही है कि व्यक्ति का हाड़ मांस से बना एक शरीर है एवं उस शरीर में व्यक्ति का मन है।

किसी दूरी को तय करने के लिए जिस प्रकार हमारे दोनों पाँव साथ हो लेते हैं अन्यथा दोनों पाँव स्वतंत्र होते हैं उसी प्रकार से किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए हमारा शरीर और मन साथ हो लेते हैं अन्यथा व्यक्ति का शरीर और मन दोनों स्वतंत्र है, यद्यपि दोनों का सम्बन्ध व्यक्ति से है।

व्यक्ति का शरीर और व्यक्ति का मन दोनों स्वतंत्र है कहने का अभिप्राय स्पष्ट है, हाड़-मांस से बने व्यक्ति के शरीर को भूख लगती है, गर्मी-सर्दी का अहसास होता है किन्तु व्यक्ति के मन को न भूख लगती है और न गर्मी सर्दी का अहसास होता है। व्यक्ति का शरीर ही है जो बीमार होता है अथवा दुर्घटनाग्रस्त होता है. किन्तु व्यक्ति का मन उससे (शरीर) भिन्न है।

शरीर जब बीमार हो अथवा दुर्घटनाग्रस्त हो तो उस कारण मन न बीमार होता है और न ही दुर्घटनाग्रस्त होता है। व्यक्ति का शरीर जहाँ स्थूल है, वहीं व्यक्ति का मन सूक्ष्म है। व्यक्ति का शरीर एवं मन यही मुख्य रूप से ‘व्यक्ति’ है। स्थूल और सूक्ष्म का विलक्षण योग व्यक्ति है।

ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि स्थूल (पदार्थ) और सूक्ष्म (उर्जा) के योग से व्यक्ति के समतुल्य किसी रचना को मूर्त रूप देना अब तक संभव नहीं हुआ है।

2.03 बुद्धि कहने का स्पष्ट अर्थ है

व्यक्ति का शरीर व्यक्ति का स्थूल भाग है। स्थूल भाग व्यक्ति के शरीर की आकृति है एवं आकार होने मात्र से शरीर का वासस्थान सिद्ध होता है, अर्थात् व्यक्ति का शरीर अपने आकार में कहीं न कहीं बसता है, अर्थात् शरीर का निज कोई न कोई वासस्थान है।

व्यक्ति का ‘मन’ व्यक्ति का सूक्ष्म भाग है। सूक्ष्म अर्थात् अकृतिहीन व्यक्ति के मन का आकार नहीं होना यह सिद्ध करता है कि व्यक्ति के मन का निज कोई वासस्थान नहीं है।

व्यक्ति का ‘मन’ वस्तुतः व्यक्ति के शरीर में ही वास करता है। व्यक्ति का शरीर और व्यक्ति का मन दोनों पृथक विषय होते हुए भी बिना मन का व्यक्ति का शरीर क्रियाशील नहीं और बिना शरीर के मन का कोई वास नहीं अतः व्यक्ति का शरीर और व्यक्ति का मन एक दूसरे के बिना अर्थहीन हैं, अर्थात् व्यक्ति का शरीर और मन साथ-साथ व्यक्ति कहलाता है।

व्यक्ति के श्रम के विचार के इस प्रसंग में जैसे व्यक्ति को रहस्यपूर्ण मानने से व्यक्ति के श्रम के सम्बन्ध में हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकेंगे वैसा ही व्यक्ति के मन को अगम, अबोध, अनादि आदि कहकर व्यक्ति के ‘श्रम’ के सम्बन्ध में हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकेंगे। यह सम्भव है व्यक्ति का ‘मन’ अगम, अबोध, अनादि हो किन्तु ‘श्रम’ विषय में चर्चा करने के लिए व्यक्ति के मन के सम्बन्ध में स्पष्ट धारणा हमें लेनी होगी।

व्यक्ति के शरीर का गठन अनेक अवयवों से हुआ है। वह अवयव शरीर के स्थूल भाग का घटक मात्र हैं अर्थात् वह अवयव स्थूल प्रकृति के हैं, जैसे हाड़, मांस, नस, नाड़ियाँ, रस, रक्त आदि। व्यक्ति के शरीर के कुछ अवयव जैसे पेट, हृदय आदि उस स्थूल भाग का हिस्सा होते हुए भी किसी कार्यशाला की भांति व्यवहार करते हैं। उदाहरण के लिए कार्यशाला ‘पेट’ में ग्रहण किए गए अन्न का पाचन होता है जिससे शरीर का पोषण होता है।

कार्यशाला ‘हृदय’ में प्राणवायु के श्वसन से रक्त शुद्ध होता है एवं शरीर में रक्त प्रवाह बनता है। पेट और हृदय की भांति व्यक्ति के शरीर का ‘वीर्य’ शरीर का वैसा ही अवयव है जो कार्यशाला की भांति व्यवहार करता है। कार्यशाला ‘वीर्य’ मे व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों का मनन करता है। ‘मनन’ यह पाचन या श्वसन जैसी ही क्रिया है जिसे व्यक्ति करते हैं। ज्ञात शब्दों के ‘मनन’ से व्यक्ति के शरीर में उर्जा प्रकट होती है।

उर्जा जो कुछ है जैसा भी है, वह अविनाशी होने से, वह सूक्ष्म होने से उसकी आकृति नहीं होने से, उसका निज नाम नहीं होता है. बल्कि उर्जा के प्रयोग से जो किया सम्पन्न होती है अथवा सम्पन्न उस क्रिया का जो परिणाम होता है. उस क्रिया व उस परिणाम के नाम से उर्जा परिचित (नाम) होती है।

इस आधार पर ज्ञात शब्दों के ‘मनन से प्रकट हुई उर्जा को ‘मन’ की संज्ञा दी गई है जो व्यक्ति को ज्ञात शब्दों के मनन से व्यक्ति के वीर्य (कार्यशाला) में प्रकट होती है।

व्यक्ति का वीर्य (तेज) चूँकि व्यक्ति के शरीर में उसके नख शिखान्त व्याप्त है, इसलिए व्यक्ति के ‘मन’ के प्रसंग में व्यक्ति के वीर्य में प्रकट हुई उर्जा को व्यक्ति के शरीर की उर्जा कहा जाता है, न कि व्यक्ति के वीर्य तक सीमित कर उसके सम्बन्ध में कुछ कहा जाता है।

ज्ञात शब्दों के मनन से व्यक्ति के वीर्य में उर्जा प्रकट होना वीर्य का संस्कारित होना कहते हैं। व्यक्ति का वीर्य संस्कारित होने को व्यक्ति संस्कारित हुआ कहा जाता है। पुस्तक, पत्र, पत्रिकाओं में लिखे शब्दों को पढ़ने मात्र से अथवा किसी व्यक्ति का भाषण या सिनेमा और टी.वी, रेडियो आदि देखने सुनने मात्र से कोई व्यक्ति किन्हीं शब्दों का अपने जीवन में तब तक प्रयोग नहीं कर सकता है जब तक वे शब्द उसे ज्ञात नहीं हो जाते। विविध शब्द ज्ञात होना ही संस्कारित होना है।

व्यक्ति अपने संस्कारों का आधार लेकर अर्थात् उसे जितने शब्द ज्ञात हैं उसके आधार पर वह पुस्तक, पत्र, पत्रिकाओं में लिखे शब्दों को याद रख पाता है तथा किसी व्यक्ति के भाषण व टी. वी. रेडियो, सिनेमा आदि देखकर उनके कथानक वह समझ पाता है। दो व्यक्ति के संस्कार भिन्न हैं इसका तात्पर्य है, दोनों व्यक्ति को भिन्न शब्द ज्ञात हैं, दोनों व्यक्ति ज्ञात शब्दों का भिन्न प्रकार से प्रयोग करते हैं।

व्यक्ति को निश्चित कुछ शब्द ज्ञात होना, उन शब्दों का निश्चित एक प्रकार से प्रयोग करने में व्यक्ति की क्षमता के आधार में वस्तुतः  व्यक्ति के संस्कार हैं। भिन्न शब्दों का ज्ञान होने के कारण और ज्ञात शब्दों का भिन्न प्रकार से प्रयोग करने के कारण दोनों व्यक्ति भिन्न प्रकार से विचार करेंगे तथा भिन्न प्रकार से बुद्धि का प्रयोग करेंगे।

व्यक्ति के विचार व उसकी बुद्धि एवं उसका ज्ञान आदि भिन्न रचनाएँ हैं, जिन्हें व्यक्ति संस्कारित होने के क्रम में अर्थात् व्यक्ति को शब्द ज्ञात होने के क्रम में व्यक्ति उसके शरीर में स्थित कार्यशाला ‘वीर्य’ में वह स्वयं बनाता है। यह व्यक्ति उसी प्रकार करता है जैसे शरीर में कार्यशाला पेट में अन्न के पाचन से शरीर के ‘बल’ आदि का वह निर्माण करता है।

उर्जा चाहे जो हो जैसी भी हो उर्जा आकृतिहीन (सूक्ष्म) अविनाशी (न नाश, न निर्माण) होता है। उर्जा की आकृति नहीं होने से उर्जा के प्रयोग से होने वाली क्रिया से उर्जा परिचित (नाम) होती है। क्रिया व्यापक अर्थ में कार्य है। कार्य के नाम से कार्यशाला का नामकरण होता है। कोई ‘क्रिया’ अथवा सम्पन्न किसी ‘कार्य’ या ‘कार्यशाला’ के नाम से उर्जा का नामकरण होगा।

व्यक्ति उसके शरीर में कार्यशाला ‘वीर्य’ में उसे ज्ञात शब्दों के मनन से वह विचार, बुद्धि, ज्ञान…..आदि रचनाओं का निर्माण करता है और इस निर्माण से निःसृत उर्जा व्यक्ति की उर्जा है जिसे व्यक्ति का ‘मन’ कहा गया है। ज्ञात शब्दों के मनन से निःसृत उर्जा व्यक्ति का ‘मन’ कहलाया।

व्यक्ति के मन का वासस्थान व्यक्ति के शरीर में उसका वीर्य (कार्यशाला) कहकर और उस कार्यशाला (वीर्य) में व्यक्ति ने विचार, बुद्धि, ज्ञान आदि का निर्माण किया है कहकर व्यापक अर्थ में यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति का मन कार्यशाला है एवं मन रूपी कार्यशाला में व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों के मनन से वह अपने विचार, बुद्धि आदि का निर्माण करता है।

व्यक्ति के विचार आदि के निर्माण का प्रसंग उसी प्रकार का प्रसंग है जैसे कोई बढ़ई उसे उपलब्ध लकड़ी को कॉट-छॉट कर मेज, कुर्सी आदि विभिन्न उपादान बनाता है। व्यक्ति के विचार, उसकी बुद्धि, उसका ज्ञान आदि मेज, कुर्सी आदि की भांति विभिन्न उपादान ही हैं जिन्हें व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों के कॉट-छॉट (मनन) से वह मन रूपी कार्यशाला में विचार, बुद्धि, ज्ञान आदि उपादानों का निर्माण करता है।

मेज, कुर्सी आदि भौतिक निर्माण (उपादान) है। व्यक्ति के विचार आदि अभौतिक निर्माण (उपादान) हैं। भौतिक उपादान तीन आयामी रचना हैं, तीन आयाम हैं लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई। अभौतिक निर्माण व्यक्ति के विचार आदि के भी तीन आयाम हैं- हाँ. नहीं हाँ-न से परे। व्यक्ति के विचार आदि कभी ‘हाँ’ का उत्तर पाते हैं, कभी न का उत्तर पाते हैं, उत्तर हाँ-न से परे होता है, जैसे पृथ्वी गोल है इस सम्बन्ध में किसी प्रश्न का उत्तर हाँ-न से परे है।

‘शब्द’ बिन्दु समान हैं। एवं शब्दों को मिलाकर बना कथन, बुद्धि, विवेक आदि भिन्न वह रचनाएं हैं जिन्हें व्यक्ति अपने मन रूपी कार्यशाला में बनाता है। जो कुछ रचना व्यक्ति अपने मन में शब्दों के कॉट-छॉट से बनाता है, शब्दों से बनी उस रचना को विविध कार्य कोई आकार प्रदान करते हैं। कार्य के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति के कथन उसके विचार कहलाते हैं, व्यक्ति के वह विचार उसे ज्ञात शब्दों के कॉट-छॉट से बनी एक आयामी रचना है, मान सकते हैं।

विचारित उस कार्य को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति बुद्धि का प्रयोग करता है और व्यक्ति की वह ‘बुद्धि’ उसे ज्ञात शब्दों के कॉट छॉट से बनी दो आयामी रचना है, मान सकते हैं। कार्यान्वयन का व्यक्ति का ‘ज्ञान’ उसे ज्ञात शब्दों के कॉट-से बनी तीन आयामी रचना है, मान सकते हैं।

2.04 श्रम फलित होता है

ज्ञात शब्दों (बिन्दु) के कॉट-छॉट से जब व्यक्ति अपने विचार आदि को बनाता है और उन्हें आयाम (आकार) देता है तो उसके मन में किसी कार्य के सम्बन्ध में एक शब्दाकृति बनती है। यह शब्दाकृति वस्तुतः वह कार्य ही है जिसे व्यक्ति सम्पन्न (समापन) करना चाहता है।

व्यक्ति के मन में जितनी संख्या में शब्दाकृतियां बनेंगी उस संख्या में व्यक्ति के कार्य निर्धारित होंगे एवं व्यक्ति निर्धारित उन कार्यों को सम्पन्न करने के लिए संलग्न (जुड़ना) होगा। किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए कोई व्यक्ति जब भी संलग्न होगा उस व्यक्ति के मन में उस कार्य के सम्बन्ध में एक शब्दाकृति अवश्य बनेगी।

व्यक्ति के मन में बनी प्रत्येक शब्दाकृति को उसका ‘काम’ कहते हैं। यह काम अर्थात् कार्यविशेष के सम्बन्ध में व्यक्ति के मन में बनी कोई शब्दाकृति चूँकि व्यक्ति से संलग्न किसी कार्य का प्रतिरूप होता है इसलिए बोलचाल में ‘कार्य’ को ‘काम शब्द से सम्बोधित करते हैं। कार्य के लिए काम का सहज सम्बोधन त्रुटिपूर्ण है। ‘काम’ और ‘कार्य’ दो भिन्न शब्द हैं, दोनों के भिन्न अर्थ हैं।

कौन व्यक्ति किस कार्य को सम्पन्न करेगा इसका निर्धारण ‘काम’ से होता है। जिस किसी व्यक्ति का वह ‘काम’ होगा अर्थात् जिस किसी व्यक्ति के लिए कोई कार्य सम्पन्न करना निर्धारित होगा उस व्यक्ति के मन में उस कार्य के सम्बन्ध में बनी शब्दाकृति के कारण वह व्यक्ति उस कार्य से संलग्न होकर कार्य सम्पन्न करेगा। व्यक्ति कार्य से संलग्न होता है, अर्थात् कार्य व्यक्ति से पृथक विषय है।

‘काम’ व्यक्ति के मन में बनी कोई शब्दाकृति है,अर्थात् ‘काम’ व्यक्ति से पृथक नहीं बल्कि व्यक्ति का विषय है, जब कि ‘कार्य’ व्यक्ति से पृथक विषय है। किसी कार्य के सम्बन्ध में कोई शब्दाकृति व्यक्ति के मन में बनने से अर्थात् किसी काम को मन में धारण करने से उस ‘काम’ के अनुरूप व्यक्ति के शरीर में होनेवाले हलचल (क्रिया) को व्यक्ति का ‘कर्म’ कहते हैं।

कर्म व्यक्ति के आचरण का विषय है जो व्यक्ति की शारीरिक क्रिया मात्र है। आचरण के अन्तर्गत व्यक्ति सहज स्वाभाविक रूप से आदतन शारीरिक क्रियाएँ करता है। ‘काम’ के अनुरूप शारीरिक क्रिया जिसे हमने व्यक्ति का ‘कर्म’ कहा वह व्यक्ति के आचरण से किंचित भिन्न विषय है।

व्यक्ति आजीवन ‘काम’ और ‘कर्म’ करता रहता है। निश्चित कोई कालखण्ड़ में अर्थात् समय के किसी अवधि में व्यक्ति द्वारा किया गया कोई ‘काम’ एवं ‘कर्म’ के परिणामस्वरूप कोई एक कार्य सम्पन्न होता है। किसी व्यक्ति द्वारा सम्पन्न कोई कार्य उस व्यक्ति द्वारा सम्पन्न अन्य कार्य से केवल इसलिए भिन्न है क्योंकि भिन्न समयावधियों में वह उन्हें सम्पन्न करता है। भिन्न कार्यों के काम और कर्म समान हो सकते हैं अथवा भिन्न हो सकते हैं, किन्तु भिन्न कार्यों को सम्पन्न करने की समयावधि भिन्न होंगे।

‘काम’ करता हुआ व्यक्ति के विचार, बुद्धि…..आदि महत्वपूर्ण हैं। ‘कर्म’ करता हुआ व्यक्ति के विचार, बुद्धि… आदि के साथ उसके शारीरिक क्रियाएँ भी महत्वपूर्ण हैं। ‘कार्य करता हुआ व्यक्ति के विचार, बुद्धि व शारीरिक क्रियाओं के साथ उसका व्यतीत समय भी महत्वपूर्ण है।

सम्पन्न किसी कार्य के केन्द्र में कोई न कोई व्यक्ति होता है एवं वह व्यक्ति कार्य सम्पन्न करने के लिए विचार, बुद्धि… आदि का प्रयोग करता है। कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति सशरीर तन, मन से प्रयत्न करता है। कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति समय व्यतीत करता है।

कोई कार्य सम्पन्न हुआ इसका तात्पर्य है, किसी उर्जा का प्रयोग निश्चित रूप से हुआ है। सम्पन्न किसी कार्य के केन्द्र में जो कोई व्यक्ति होता है, उस व्यक्ति के व्यतीत समय में वह व्यक्ति सशरीर बुद्धि आदि के प्रयोग से ‘जो कुछ’ करता है, चूँकि उससे वह कार्य सम्पन्न होता है इसलिए सशरीर बुद्धि आदि के प्रयोग से समय व्यतीत कर किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए कोई व्यक्ति जो कुछ करता है वह वस्तुतः उस कार्य को सम्पन्न करने की उर्जा होती है।

कार्य को सम्पन्न करने की यह उर्जा जिसका सम्बन्ध किसी व्यक्ति से है एवं उस व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किसी कार्य से है, उस उर्जा को किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए उस व्यक्ति द्वारा किया गया ‘श्रम कहते हैं। व्यक्ति का ‘श्रम’ वह उर्जा है जिसके प्रयोग से कोई व्यक्ति किसी कार्य को सम्पन्न करता है।

कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति जो कुछ ‘श्रम’ करता है उसके अंतर्गत वह कार्य सम्पन्न करने के लिए सशरीर उपस्थित रहता है एवं कार्य सम्पन्न करने के लिए विचार, बुद्धि…. आदि का प्रयोग करता है तथा कुछ समय भी अवश्य व्यतीत करता है।

व्यक्ति के श्रम प्रसंग में कोई कार्य व उस कार्य को सम्पन्न करने की व्यक्ति की संलग्नता अर्थात् व्यक्ति का तन और मन एवं कार्य को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति द्वारा बुद्धि… आदि का प्रयोग तथा कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति द्वारा व्यतीत समय अर्थात् तन, मन बुद्धि, कार्य, समय आदि व्यक्ति के श्रम के आधारभूत पाँच तत्व हैं।

मिट्टी में बीज बोकर उसे जल से सींचकर वायु के सेवन से वह बीज पौधा बन जाता है एवं वह पौधा फलों से लद जाता है। व्यक्ति के श्रम प्रसंग में जो कुछ ‘कार्य’ है उसे बीज मान लें, व्यक्ति के ‘तन’ को मिट्टी व ‘मन’ को जल तथा ‘व्यतीत समय’ को वायु मान लें एवं जितना कुछ बुद्धि का प्रयोग किया जाता है उसे पौधा मान लें तो मिट्टी, जल, वायु, बीज, पौधा इन पाँच तत्वों से जैसे कोई फल किसी पौधे से प्राप्त होता है वैसा ही व्यक्ति के तन, मन, बुद्धि, कार्य, समय आदि पाँच तत्वों से जो फल बुद्धि के प्रयोग से प्राप्त होता है, उसका नाम ही व्यक्ति का ‘श्रम’ है, अर्थात् श्रम फलित होता है।

श्रम को इन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है।

कार्य सम्पन्न करने के लिए कार्य पर उपस्थित किसी व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त बुद्धि व व्यतीत समय का फ़लितांश (फलित अंश) उसका श्रम है।

कार्य पर उपस्थित किसी व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त विवेक व व्यतीत समय का फ़लितांश उसका श्रम है।

कार्य पर उपस्थित किसी व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त ज्ञान व व्यतीत समय का फ़लितांश उसका श्रम है।

बुद्धि, विवेक, ज्ञान आदि भिन्न उपादान हैं, जिन्हें कोई व्यक्ति अपने ‘मन’ रूपी कार्यशाला में बनाता है। 

‘कार्य’ व कार्य पर उपस्थित व्यक्ति का ‘तन’ और ‘मन’ एवं उसकी ‘बुद्धि’ तथा ‘समय’ आदि व्यक्ति के श्रम के पांच तत्व हैं। कार्य सम्पन्न करने के लिए कार्य पर उपस्थित व्यक्ति (तन. मन) द्वारा प्रयुक्त बुद्धि व समय का फ़लितांश (फलित अंश) उसका श्रम है।

कार्य सम्पन्न करने के लिए अपने तन, मन, बुद्धि आदि का प्रयोग करते हुए व इनके प्रयोग में व्यक्ति समय व्यतीत करता है तो व्यक्ति ने ‘श्रम’ किया है कहा जाता है। कार्य करता हुआ किसी व्यक्ति के श्रम का महत्व (मूल्य), समान उसी कार्य को करता हुआ अन्य व्यक्ति के श्रम से भिन्न महत्व (मूल्य) का हो सकता है, ऐसा इसलिए कि कार्य करने के लिए दोनों व्यक्तियों द्वारा प्रयुक्त बुद्धि, विवेक, ज्ञान…आदि में अन्तर के कारण समान कार्य करता हुआ दोनों व्यक्तियों के श्रम का महत्व (मूल्य) भिन्न होगा।

ऊर्जा जो कुछ है, जैसा भी है, ऊर्जा अविनाशी होगा, ऊर्जा का न निर्माण होता है, न ऊर्जा का नाश होता है, ऊर्जा का मात्र रूपांतरण होता है। व्यक्ति का श्रम उर्जा है, ‘श्रम’ अविनाशी है।

श्रम का न निर्माण होता है और न ही श्रम का नाश होता है, बल्कि विविध रूपों में व्यक्ति का श्रम रूपान्तरित होता है। साधना, सेवाएँ, परिश्रम, व्यवसाय, उद्योग, व्यापार आदि श्रम के विविध रूप हैं। भिन्न रूपों में जो कुछ ‘श्रम’ है उसे यहाँ परिभाषित करते हुए ‘श्रम उर्जा’ के रूपांतरण तथा श्रम के ऊर्जा स्वरूप की विस्तृत चर्चा हम आगे करेंगे।

2.05 व्यक्ति के श्रम के अन्य रूप

जिस रूप में भी ऊर्जा है, ऊर्जा अव्यक्त होगा, उसे न देखा जा सकेगा, न वह अनुभव का विषय है। ऊर्जा के प्रयोग से कोई कार्य सम्पन्न (समापन) होता है, सम्पन्न कार्य से किसी ऊर्जा के प्रयोग का बोध होता है, अर्थात् ऊर्जा की उपस्थिति दर्ज होती है, अतः  कहा गया है, कार्य करने की क्षमता ऊर्जा है।

कार्य सम्पन्न होते ही ऊर्जा का रूपांतरण होता है, सम्पन्न उस कार्य के नाम से ऊर्जा जाना जाता है,

जैसे सेवाएं, व्यवसाय, उद्योग, परिश्रम, साधना आदि श्रम ऊर्जा के अन्य नाम या कहें अन्य रूप हैं।

ऊर्जा के प्रयोग से सम्पन्न कार्य का माप ऊर्जा की क्षमता का माप होता है, अर्थात् ऊर्जा का माप होता है। ऊर्जा के प्रयोग से कार्य सम्पन्न करने का समय-दर ऊर्जा के ‘शक्ति’ का माप होता है।

व्यक्ति के श्रम के सन्दर्भ में केवल व्यक्ति के परिश्रम का समय-दर मापा जा सकेगा।

सेवाएं, व्यवसाय, उद्योग का माप उनका मूल्य रुपए की राशि में मापा जाएगा। व्यक्ति की साधना (ऊर्जा) का माप उसके साधना के स्तर से निर्धारित होगा, जैसे स्नातक, शोधकर्ता आदि।

व्यक्ति का परिश्रम और उस परिश्रम का माप, इसकी चर्चा अलग से करेंगे, इन पंक्तियों में व्यक्ति के सेवाएं, व्यवसाय, उद्योग तथा उसकी साधना की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

2.06 व्यक्ति की सेवाएँ

व्यक्ति वस्त्र धारण करता है, यह व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कार्य है। व्यक्ति पुस्तक पढ़ता है, यह व्यक्ति द्वारा किया गया अन्य कार्य है। कोई व्यक्ति मिट्टी का घड़ा बनाता है, कोई व्यक्ति खेत में गेहूँ उपजाता है, कोई व्यक्ति कोयला का उत्खनन करता है, कोई व्यक्ति पठन-पाठन या भजन-पूजन करा रहा है, यह सब भिन्न व्यक्तियों द्वारा किए गए भिन्न कार्य हैं।

भिन्न कार्य भिन्न विधियों से सम्पन्न होते हैं, किन्तु कार्य करने की विधि से व्यक्ति के ‘श्रम’ का सम्बन्ध नहीं है। व्यक्ति का ‘श्रम’ कार्य करने की विधि से भिन्न कार्य करने के लिए आवश्यक व्यक्ति की ‘उर्जा’ है।

श्रम उर्जा व्यक्ति में निहित उर्जा है जिसे व्यक्ति की उर्जा कहेंगे। कार्य करने के लिए व्यक्ति की उर्जा (श्रम उर्जा) का प्रयोग अनिवार्य रूप से होता है, क्योंकि कार्य करने वाला अनिवार्य रूप से कोई व्यक्ति होता है। कार्य किया गया तो निश्चय ही किसी व्यक्ति ने कार्य किया होगा एवं उस व्यक्ति ने कार्य करने के लिए निश्चय ही श्रम उर्जा (व्यक्ति की उर्जा) का प्रयोग किया होगा।

व्यक्ति ने श्रम किया एवं कोई कार्य किया हो तो दो ही सम्भावनाएँ होती हैं। व्यक्ति ने अपने लिए कार्य किया है अथवा व्यक्ति ने अन्य किसी व्यक्ति के लिए कार्य किया है।

उदाहरण के लिए किसी समाचार पत्र का कोई पाठक किसी व्यक्ति ने मान लिया उस समाचार पत्र के सम्पादक को एक पत्र लिखा है। सम्पादक के नाम पत्र लिखने का कार्य व्यक्ति (पाठक) अपने लिए करता है, क्योंकि सम्पादक को अपने विचारों से अवगत कराना पाठक (व्यक्ति) की आवश्यकता है।

समाचार पत्र का संवाददाता कोई व्यक्ति जब समाचार पत्र के सम्पादक को कोई पत्र लिखता है तो वह संवाददाता पत्र अपने लिए नहीं बल्कि सम्पादक के लिए लिखता है। सम्पादक संवाददाताओं से मिले पत्रों पर निर्भर होता है जब कि सम्पादक पाठकों से मिले पत्रों पर निर्भर नहीं होता है। समाचार पत्र का पाठक कोई व्यक्ति पत्र लिखकर अपने लिए कार्य करता है। समाचार पत्र का संवाददाता कोई व्यक्ति पत्र लिखकर सम्पादक के लिए कार्य करता है, अर्थात् वह ‘अन्य व्यक्ति’ के लिए कार्य करता है।

कोई व्यक्ति चाहे अपने लिए कार्य करे अथवा अन्य व्यक्ति के लिए कार्य करे वह कार्य करने के लिए ‘श्रम’ अवश्य करेगा जिसके लिए व्यक्ति तन, मन, बुद्धि आदि का प्रयोग करेगा एवं उसके लिए समय व्यतीत करेगा। व्यक्ति द्वारा किए गए ‘श्रम’ में कोई भेद नहीं होता है।

श्रम में भेद नहीं होने से भी किए गए श्रम में ‘अन्य भेद’ है, स्वयं अपने लिए श्रम करना अथवा अन्य किसी व्यक्ति के लिए श्रम करना। इस अन्य भेद के कारण अन्य किसी व्यक्ति के लिए कार्य करने के लिए व्यक्ति द्वारा किए गए श्रम को अन्य नाम ‘सेवाएँ’ कहकर पुकारते हैं। कोई व्यक्ति जब अन्य व्यक्ति के किसी कार्य को करने के लिए श्रम करता है तो व्यक्ति के ‘श्रम’ को उसकी ‘सेवाएँ’ कहते हैं।

श्रम और सेवाओं में अन्तर उनके नाम का है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को कोई (उसकी पुत्री) पिता कहती है। उसी व्यक्ति को कोई (उसकी पत्नी) पति कहती है। समान व्यक्ति को दो व्यक्ति दो नामों से पुकारते हैं, पिता और पति यह दो नाम एक ही व्यक्ति के हैं।

उसी प्रकार से श्रम तथा सेवाएँ समान एक विषय के दो नाम हैं। किसी ‘व्यक्ति’ के लिए जो विषय श्रम है, समान वह विषय किसी अन्य व्यक्ति के लिए ‘व्यक्ति’ की सेवाएँ कहलाता है। व्यक्ति जब सेवाएँ प्रदान करता है तो वह ‘श्रम’ कर रहा होता है। सेवाएँ प्रदान करते हुए वह अन्य व्यक्ति के लिए ‘श्रम’ कर रहा होता है।

व्यक्ति की सेवाएँ इन शब्दों में परिभाषित होगा।

अन्य व्यक्ति के लिए किसी व्यक्ति द्वारा किया गया ‘श्रम’ उस व्यक्ति की सेवाएँ है।

सेवाएँ प्रदान करता हुआ व्यक्ति ‘श्रम’ कर रहा होता है, अर्थात् व्यक्ति कोई ‘कार्य’ कर रहा होता है और कार्य करने के लिए ‘तन, मन, बुद्धि’ का प्रयोग वह कर रहा होता है तथा इसके लिए वह ‘समय’ व्यतीत कर रहा होता है। कार्य, तन, मन, बुद्धि, समय आदि श्रम के पांच तत्व हैं, यह पांच तत्व सेवाओं के भी हैं। सेवाएँ व्यक्ति का श्रम है।

2.07 व्यक्ति का व्यवसाय

अन्य व्यक्ति के किसी कार्य को करने के लिए व्यक्ति सेवाएँ प्रदान करता है और इसके लिए वह श्रम करता है तथा श्रम करने के लिए व्यक्ति अपने तन, मन, बुद्धि आदि का प्रयोग करता है एवं इसके लिए वह समय व्यतीत करता है।

सेवाएँ प्रदान करने के लिए व्यक्ति श्रम करेगा और श्रम करने के लिए व्यक्ति समय व्यतीत करेगा।

व्यक्ति के सेवाओं के प्रसंग में अन्य व्यक्ति की आवश्यकता जिसे अन्य व्यक्ति की मांग कहते हैं ऐसे किसी मांग की आपूर्ति के लिए कोई व्यक्ति उस अन्य व्यक्ति के किसी कार्य को करने के लिए वह व्यक्ति श्रम करता है।

व्यक्ति के सम्मुख किसी अन्य व्यक्ति की कोई मांग यदि न हो तो व्यक्ति चाह कर भी अपनी सेवाएँ (श्रम) प्रदान नहीं कर सकेगा। व्यक्ति जब कभी अपनी सेवाएँ अन्य व्यक्ति को प्रदान करेगा वह अन्य व्यक्ति के किसी मांग की आपूर्ति के लिए ‘श्रम’ करेगा और अपनी सेवाएँ अन्य व्यक्ति को प्रदान करेगा।

श्रम करने के लिए चूँकि व्यक्ति के लिए समय व्यतीत करना आवश्यक है इसीलिए जिस अनुपात में व्यक्ति समय व्यतीत करेगा उस अनुपात में व्यक्ति श्रम करेगा एवं उस अनुपात में व्यक्ति अपनी सेवाएँ प्रदान कर अन्य व्यक्ति के किसी मांग की आपूर्ति कर सकेगा।

प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 24 घण्टे का समय समान रूप से उपलब्ध है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्य रूप से ‘अबाध’ व्यतीत करते जाता है। किसी कारण से अन्य व्यक्ति की मांग नहीं बनने से अथवा अन्य व्यक्ति को अपनी सेवाएँ प्रदान करने के अवसर नहीं मिलने से अबाध (न रुकने वाला) व्यतीत होने वाला व्यक्ति का समय बिना कोई श्रम किए व्यतीत होता जाएगा।

भविष्य में मांग एकमुश्त अथवा बहुतायत में बनने से उस अनुपात में व्यक्ति को अपनी सेवाएँ प्रदान करने के अवसर मिलने से उस मांग अथवा वह सेवाएँ प्रदान करने के लिए उस अनुपात में व्यक्ति अधिकाधिक समय व्यतीत करने की स्थिति में नहीं होगा, क्योंकि प्रतिदिन 24 घण्टे का अधिकतम समय ही व्यक्ति व्यतीत कर सकेगा।

अधिकाधिक किन्हीं व्यक्तियों के अधिकाधिक किन्हीं मांगों की आपूर्ति करने के उद्देश्य से व्यक्ति प्रतिदिन ‘अबाध’ व्यतीत हो रहे समय में अन्य उन व्यक्तियों के उन मांगों के पूर्वानुमान के आधार पर वह (व्यक्ति) श्रम करता हुआ आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का उत्पादन कर उनका संचय कर लेता है।

‘वस्तु आदि’ का उत्पादन कर उनका संचय व्यक्ति इसलिए करता है, क्योंकि भविष्य में अधिकाधिक ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति करने के लिए उसके (व्यक्ति) लिए अधिकाधिक श्रम करना आवश्यक होगा, जब कि अधिक श्रम करने के लिए किसी दिन अधिक समय व्यतीत करना आवश्यक होने पर व्यक्ति अधिक समय व्यतीत नहीं कर सकेगा।

‘वस्तु आदि’ का उत्पादन कर उनका संचय व्यक्ति वस्तुतः ‘श्रम संचय’ के उद्देश्य से ही करता है, अतः ‘वस्तु आदि’ के संचय से व्यक्ति का ‘श्रम’ उनमें संचित हो गया है, यह मान सकते हैं। ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन कर उनके संचय से व्यक्ति के ‘श्रम संचय’ को व्यक्ति का व्यवसाय कहते हैं।

किन्हीं व्यक्तियों की कोई मांग जब कभी प्रस्तुत होती है तो अन्य उन व्यक्तियों को व्यक्ति व्यवसाय के अर्न्तगत संचित श्रम (संचित ‘वस्तु आदि) प्रदान करता है।

अन्य व्यक्ति के ‘वस्तु आदि’ की ‘मांग’ या उस मांग के पूर्वानुमान के आधार पर अन्य व्यक्ति के लिए किसी व्यक्ति द्वारा किया गया ‘श्रम’ व्यक्ति का व्यवसाय कहलाता है।

व्यवसाय इन शब्दों में परिभाषित होगा

स्वयं को अन्य व्यक्ति के स्थान पर रखकर अन्य व्यक्ति के लिए (स्वयं के लिए नहीं) व्यक्ति द्वारा किया गया ‘श्रम’ उसका व्यवसाय है।

2.08 व्यक्ति का उद्योग

वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) व्यक्ति की आवश्यकताएँ हैं। आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग व्यक्ति तभी कर सकता है जब वह उस ‘वस्तु आदि’ का स्वामी होता है। इसलिए किसी ‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व प्राप्त हो यह किसी व्यक्ति के लिए उतना ही आवश्यक है जितनी आवश्यकता उस व्यक्ति को उस ‘वस्तु आदि’ की है।

‘वस्तु आदि का निर्माता कोई व्यक्ति स्वाभाविक रूप से ‘वस्तु आदि’ का स्वामी होता है और स्वामी की हैसियत से ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग करने के लिए व्यक्ति स्वतः स्वाभाविक रूप से समर्थ होता है। किसी भी व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं कि वह आवश्यक प्रत्येक ‘वस्तु आदि’ का निर्माण कर उनका स्वामित्व हासिल कर ले।

‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व हासिल करने के लिए व्यक्ति के सामने अन्य विकल्प है कि व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ को उत्पन्न करे, इससे निर्माण किए बिना वस्तु का स्वामित्व व्यक्ति को प्राप्त होकर वह ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग कर सकता है।

‘रुपए’ व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है और ‘बैंकनोट’ उन सेवाओं के माप का साधन है। रुपए माप अंकित बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट देने वाले व्यक्ति को अन्य व्यक्ति की सेवाएँ अदा होती हैं तथा बैंकनोट लेने वाला व्यक्ति सेवाएँ प्रदान करता है।

बैंकनोटों के लेन-देन में सेवाओं के आदान-प्रदान से किसी ‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व उस ‘वस्तु आदि’ के निर्माता (स्वामी) से बैंकनोट देने वाले व्यक्ति को हस्तांतरित होकर ‘वस्तु आदि’ उत्पन्न करने की प्रक्रिया पूरी होती है और उत्पन्न कोई वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) ‘उत्पाद’ कहलाता है।

उत्पाद (वस्तु आदि) को उत्पन्न करने की प्रक्रिया एक से अधिक चरणों में पूरी होती हो तो प्रत्येक चरण में जितना कुछ उत्पन्न होता है, उसे उस चरण का उत्पादन (वस्तु आदि) कहते हैं।

एक से अधिक चरणों में सम्पन्न हो रहे उत्पाद के उत्पादन के भिन्न प्रत्येक चरण के उत्पादन से एक अथवा एक से अधिक व्यक्ति संलग्न होते हैं। प्रत्येक चरण का उत्पादन वह व्यक्ति अगले चरण के उत्पादन में हस्तांतरित करते हैं।

अन्तिम चरण का उत्पादन जिस व्यक्ति को हस्तांतरित होता है वह व्यक्ति अन्तिम चरण के उस उत्पादन को जो वस्तुतः उत्पाद होता है, उसे उत्पाद की मांग रखने वाले किसी अन्य व्यक्ति को वह व्यक्ति उत्पाद (वस्तु आदि) की आपूर्ति करता है।

उत्पाद (वस्तु आदि) की मांग रखने वाला वह व्यक्ति उत्पाद के मूल्य स्वरूप निर्धारित माप में बैंकनोट उत्पाद की आपूर्ति करने वाले अन्य व्यक्ति को देता है। अन्य व्यक्ति से लिए गए बैंकनोट, वह व्यक्ति जिसे उत्पाद के उत्पादन के अन्तिम चरण के उत्पादन का हस्तांतरण हुआ है, वह व्यक्ति पूर्व चरण के उत्पादन से संलग्न व्यक्तियों में बैंकनोटों को वितरित करता है।

उत्पाद के उत्पादन से संलग्न व्यक्ति जहाँ प्रत्येक चरण का उत्पादन आरोही क्रम में अगले चरण में हस्तांतरित करते हैं वहीं वह व्यक्ति वितरण के लिए प्रस्तुत बैंकनोटों को (उत्पाद का मूल्य) उत्पाद के उत्पादन के अन्तिम चरण से वितरण के लिए प्रस्तुत कर पूर्व चरणों के उत्पादन से संलग्न व्यक्तियों में अवरोही क्रम में वितरित करते हैं।

इसे संक्षेप में उत्पाद का उत्पादन-वितरण कह सकते हैं और यह उस उत्पाद की किसी व्यक्ति की मांग से प्रारम्भ होकर अन्य किसी व्यक्ति द्वारा उस मांग की आपूर्ति किए जाने पर सम्पन्न (समापन) होती है।

उत्पाद का उत्पादन-वितरण वस्तुतः उत्पाद उत्पन्न करने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में उत्पाद के उत्पादन के भिन्न चरणों से संलग्न (जुड़ा हुआ) व्यक्ति, जो उत्पादन उन्हें हस्तांतरित हुआ है उसकी मांग पूर्व चरण के उत्पादन से संलग्न व्यक्ति से करते हैं एवं उत्पाद के मूल्य स्वरूप वितरण के लिए प्रस्तुत बैंकनोट उन्हें देते हैं।

उत्पाद के उत्पादन के भिन्न चरणों से संलग्न प्रत्येक व्यक्ति, जहाँ पूर्व चरण के उत्पादन से संलग्न व्यक्ति को बैंकनोट देता है वहीं वह व्यक्ति अगले चरण के उत्पादन से संलग्न व्यक्ति से बैंकनोट लेता है।

उत्पाद की मांग से प्रारम्भ होकर उसकी आपूर्ति तक उत्पाद के उत्पादन के भिन्न चरणों से संलग्न प्रत्येक व्यक्ति को अर्थात् उत्पाद को उत्पन्न करने की प्रक्रिया से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को बैंकनोटों की छोटी अथवा बड़ी जो भी राशि दी जाती है, बैंकनोटों की प्रत्येक राशि प्रत्येक व्यक्ति को उत्पाद उत्पन्न करने के लिए उनकी सेवाओं के बदले में उन्हें दी जाती है।

दी गई बैंकनोटों की वह राशि उत्पन्न उत्पाद का मूल्य निर्धारित होता है। उत्पाद का निर्धारित मूल्य बैंकनोटों की यह राशि ही उत्पाद की मांग करने वाला व्यक्ति उत्पाद के उत्पादन के अन्तिम चरण से जुड़े और उत्पाद की आपूर्ति करने वाले व्यक्ति को देता है।

किसी उत्पाद का मूल्य बैंकनोटों की जो कुछ राशि निर्धारित होगा उत्पाद का निर्धारित मूल्य बैंकनोटों की उस राशि में उत्पाद के उत्पादन-वितरण (उत्पाद उत्पन्न करने की प्रक्रिया) से संलग्न प्रत्येक व्यक्ति को उनके सेवाओं के लिए दी गई बैंकनोटों की प्रत्येक राशि का प्रत्येक अंश अवश्य होता है।

अन्य शब्दों में किसी उत्पाद का मूल्य बैंकनोटों की कोई राशि निर्धारित होने के क्रम में किसी व्यक्ति की सेवाएँ एक से अधिक उन व्यक्तियों के सेवाओं के साथ अभिन्न हो जाता है, जो व्यक्ति उत्पाद की मांग से उसकी आपूर्ति तक उत्पाद के उत्पादन के भिन्न चरणों के उत्पादन से संलग्न हैं।

किसी व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के साथ अभिन्न व्यक्ति की सेवाएँ जो किसी उत्पाद के निर्धारित मूल्य बैंकनोटों (रुपए) की राशि में व्यक्त होता है, व्यक्ति की सेवाएँ अपनी पृथक पहचान खो देता है एवं व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के नाम से जानी जाती हैं। व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के साथ अभिन्न व्यक्ति के उन सेवाओं को व्यक्ति का ‘उद्योग’ कहते हैं।

व्यक्ति का उद्योग इन शब्दों में परिभाषित होगा

व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के साथ अभिन्न व्यक्ति की सेवाएँ (श्रम) उसका उद्योग है।

व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं को नहीं बल्कि व्यक्ति के सेवाओं को उद्योग कहते हैं। श्रम हो, सेवाएं हो, व्यवसाय हो, उद्योग हो, सब कुछ व्यक्ति से सम्बंधित विषय हैं और वह व्यक्ति का ‘श्रम’ ही है जो भिन्न नामों से जाने जाते हैं।

‘वस्तु आदि’ का मूल्य निर्धारित होने के क्रम में व्यक्ति का ‘श्रम’ उसका ‘उद्योग’ बनकर प्रस्तुत होता है। जिस ‘इकाई’ में व्यक्ति उद्योगरत होते हैं उस इकाई (entity) को बोलचाल में उद्योग भी कहा जाता है।

2.09 व्यक्ति की साधना

विद्यावान और शिक्षित होने के लिए हम जितने भी पाठ पढ़ते हैं और सीखते हैं, उन पाठों के ‘व्यक्त तथा अव्यक्त’ दो भाग हैं। पाठ पढ़ने के प्रसंग में जितने भी संसाधनों का प्रयोग हम करते हैं, वह व्यक्त हैं, अर्थात् वह सब कुछ प्रत्यक्ष है। पढ़े गये अथवा सीखे गये पाठों के जिस अर्थ को हम ग्रहण करते हैं वह अव्यक्त है।

अव्यक्त जो कुछ है वह उर्जा का कोई रूप होता है। पाठ के अव्यक्त भाग के उस उर्जा का नाम ‘शब्द उर्जा’ है। शब्द उर्जा जो अव्यक्त है और जो किसी पाठ का अर्थ है, अक्षरों के मेल से बने पदों (Terms) में साकार (व्यक्त) होकर वही (अर्थ) पाठ कहलाता है।

पाठ और पाठ के अर्थ में वहीं सम्बन्ध है जो गेहूँ व उसमें विद्यमान प्रोटीन आदि पोषक तत्वों में सम्बन्ध है। अक्षरों के मेल को सहज ही शब्द कहते हैं। ध्वनि को भी ‘शब्द’ कहते हैं। इतिहास में पृथ्वीराज चौहान को शब्द भेदी बाण चलाने में दक्ष योद्धा कहा गया है।

वीणा के तारों के झंकार से निकली ध्वनियाँ शब्द हैं, ध्वनि के अर्थ में ‘शब्द’ उर्जा है। पढ़े गए पाठ के व्यापक अर्थ में भी ‘शब्द’ उर्जा है। उर्जा चाहे जो हो उर्जा का प्रयोग होने से कोई न कोई कार्य सम्पन्न होता है और कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति श्रम करता है तथा समय व्यतीत करता है।

शब्द उर्जा के प्रयोग के प्रसंग में सम्पन्न कार्य है ‘पाठ पढ़ना’ और पढ़े गये पाठ के अर्थ (शब्द उर्जा) की सीख का प्रयोग भिन्न कार्यों को सम्पन्न करने के लिए करना। किसी पाठ को पढ़ने के लिए और ‘सीख’ जो पढ़े गये पाठ के कारण व्यक्ति को होती है उस ‘सीख’ के आधार पर किन्हीं कार्यों को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति समय व्यतीत करता है और श्रम करता है, व्यतीत इस समय में शब्द उर्जा के प्रयोग से सीखने अथवा जानने, समझने के लिए व्यक्ति जिन कार्यों को सम्पन्न करता है और उन कार्यों को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति जो श्रम करता है उसके उस श्रम को व्यक्ति की ‘साधना’ कहते हैं।

पाठों को पढ़ने के लिए और पढ़े गए पाठों के अर्थ सीखने के लिए तथा सीख के आधार पर भिन्न कार्यों को सम्पन्न करते हुए विषय को जानने, समझने के लिए व्यक्ति जो श्रम करता है उसे व्यक्ति की साधना कहा गया है।

सीखने की कोई उम्र नहीं होती अर्थात् व्यक्ति सीखना चाहे तो जीवन भर वह कुछ न कुछ सीखता रहता है। सीखना व्यापक अर्थ में जानना, समझना है। सीखना व्यापक अर्थ में क्या है, इसे स्पष्ट करते हुए विद्या और शिक्षा के सम्बन्ध में मौलिक कुछ बातों को हमने आगे स्पष्ट किया है।

विद्यावान और शिक्षित होने का तात्पर्य सीखना ही है जिसके लिए व्यक्ति साधना करता है। साधना इन शब्दों में परिभाषित होगा –

जानने, समझने व सीखने के लिए व्यक्ति द्वारा किया गया श्रम व्यक्ति की साधना है।

2.10 श्रमिक और व्यवसायी

श्रम करता हुआ व्यक्ति श्रमिक है, किन्तु श्रम करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति श्रमिक नहीं है। अपने किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति श्रम कर रहा हो तो अपने लिए किए गए उस श्रम का वह व्यक्ति स्वयं मालिक है। अपने लिए किए गए श्रम के लिए कोई व्यक्ति स्वयं को श्रमिक नहीं कहेगा।

अन्य किसी व्यक्ति के किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए जब व्यक्ति श्रम करता है तो व्यक्ति के उस ‘श्रम’ को उस व्यक्ति की ‘सेवाएँ’ (श्रम) कह कर पुकारते हैं। अन्य व्यक्ति जिसे सेवाएँ प्रदान हुई हैं, वह अन्य व्यक्ति सेवाएँ प्रदान करने वाले उस व्यक्ति को श्रमिक कहता है। कोई व्यक्ति ‘श्रमिक’ अन्य व्यक्ति के लिए है. वह (श्रमिक) अन्य व्यक्ति को सेवाएँ प्रदान करता है।

अन्य व्यक्ति के किसी मांग के पूर्वानुमान के आधार पर बिना अन्य व्यक्ति के मांग के, स्वयं को अन्य व्यक्ति मान कर उस अन्य व्यक्ति के लिए (स्वयं के लिए नहीं) किसी व्यक्ति द्वारा किया गया श्रम उस व्यक्ति का व्यवसाय कहलाता है। व्यवसाय करने वाला व्यक्ति ‘व्यवसायी’ है।

व्यवसायी कोई व्यक्ति चूंकि अन्य व्यक्ति के लिए श्रम करता है, इसलिए व्यवसायी प्रत्येक व्यक्ति सेवाएँ प्रदान कर रहा होता है। उद्यमी अथवा उद्योगपति व्यवसायी हैं, क्योंकि वह वस्तु, संसाधन अथवा सेवाएँ आदि का उत्पादन कर एक से अधिक कुछ व्यक्तियों के श्रम का ही वह संचय करते हैं।

व्यवसायी प्रत्येक व्यक्ति आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का उत्पादन कर और ‘वस्तु आदि’ के संचय से व्यवसाय के अंतर्गत ‘संचित श्रम’ (संचित वस्तु आदि) वह प्रदान करते हैं।

व्यवसायी और श्रमिक इन शब्दों में परिभाषित होंगे –

श्रम संचित सेवाएँ प्रदान करने वाला व्यक्ति व्यवसायी है।

श्रम संचित किए बिना सेवाएँ प्रदान करने वाला व्यक्ति श्रमिक है।

2.11 व्यापार तथा व्यापारी

श्रम, व्यवसाय तथा सेवाओं के प्रसंग में वस्तुविशेष अथवा संसाधन विशेष या व्यक्तिविशेष का महत्व नहीं है अर्थात् कौन व्यक्ति किस वस्तु, संसाधन अथवा सेवाओं (वस्तु आदि) की मांग कर रहा है अथवा कौन व्यक्ति किस ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति कर रहा है उस व्यक्ति अथवा उन व्यक्तियों का अथवा उन ‘वस्तु आदि’ का कोई महत्व नहीं है।

किसी ‘वस्तु आदि की मांग से कोई भी व्यक्ति संलग्न हो सकता है एवं उस ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से अन्य कोई भी व्यक्ति संलग्न होगा। किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग से संलग्न किसी व्यक्ति को यदि ‘एक पक्ष’ कहें तो उस ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से संलग्न अन्य व्यक्ति को ‘दूसरा पक्ष’ कहेंगे।

किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं आपूर्ति के दोनों पक्षों से जो कोई व्यक्ति संलग्न होंगे दोनों भिन्न दो व्यक्ति (व्यक्तिसमुदाय) होंगे।

‘वस्तु आदि’ के मांग से संलग्न एक पक्ष में जो कोई व्यक्ति है उसे सेवाएँ अदा होती है। सेवाएँ अदा होने के अवसर वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) के उपभोग के अवसर हैं। ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से संलग्न दूसरे पक्ष में जो कोई व्यक्ति है वह सेवाएँ प्रदान करता है। सेवाएँ प्रदान करने के अवसर वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) के उत्पादन के अवसर हैं।

किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं उसकी आपूर्ति के संदर्भ में किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग से संलग्न व्यक्ति (एक पक्ष) एवं उस ‘वस्तु आदि की आपूर्ति से संलग्न व्यक्ति (दूसरा पक्ष) भिन्न व्यक्ति होंगे उनके दो पक्ष होंगे। ‘वस्तु आदि’ की मांग से संलग्न व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का उपभोग कर रहा होता है, जिसे (एक पक्ष) अन्य व्यक्ति (दूसरा पक्ष) की सेवाएँ अदा होती हैं। ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से संलग्न व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन कर रहा होता है, जो (दूसरा पक्ष) अन्य व्यक्ति (एक पक्ष) को सेवाएँ प्रदान करता है।

किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं उसकी आपूर्ति के संदर्भ में यह भी संभव है कि समान एक व्यक्ति उस ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं आपूर्ति से संलग्न (सम्बन्धित) है। इसे तीसरे पक्ष की संज्ञा दी जाए तो वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) ‘वस्तु आदि’ के मांग से संलग्न होते हुए भी उस ‘वस्तु आदि’ का उपभोग नहीं कर रहा होगा,

क्योंकि ‘वस्तु आदि’ का उपभोग कर लिया होता तो उस ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) संलग्न नहीं हो सकता, जब कि वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) उस ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं आपूर्ति से समान रूप से संलग्न (सम्बन्धित) है।

किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग से संलग्न व्यक्ति उस ‘वस्तु आदि’ का उपभोग नहीं करता हो तो तीसरे पक्ष में जो कोई व्यक्ति है उसे अन्य किन्हीं व्यक्तियों की सेवाएँ अदा नहीं होती हैं।

किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं उसकी आपूर्ति के संदर्भ में जब समान एक व्यक्ति उस ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं आपूर्ति से संलग्न (जुड़ा होना) है और उसे तीसरे पक्ष की संज्ञा दी जाए तो वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से संलग्न (सम्बन्धित) होते हुए भी उस ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन वह नहीं कर रहा होगा,

क्योंकि उस ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन उस व्यक्ति ने कर लिया होता तो उस ‘वस्तु आदि’ की मांग से वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) संलग्न नहीं होता, जब कि वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) उस ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं आपूर्ति से समान रूप से संलग्न (सम्बन्धित) है।

किसी ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से संलग्न व्यक्ति उस ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन नहीं करता हो तो तीसरे पक्ष में जो कोई व्यक्ति है वह अन्य किन्हीं व्यक्तियों को सेवाएँ प्रदान नहीं करेगा।

तीसरे पक्ष में जो कोई व्यक्ति है उसे अन्य किन्हीं व्यक्तियों की सेवाएँ अदा नहीं होती हैं और वह अन्य किन्हीं व्यक्तियों को सेवाएँ प्रदान भी नहीं करता है, जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है,

परन्तु वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) चूँकि किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं उसकी आपूर्ति से समान रूप से संलग्न (जुड़ा होना) है, इसलिए वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) सेवाओं के आदान-प्रदान से संलग्न (सम्बन्धित) होगा।

सेवाओं के आदान-प्रदान से संलग्न (सम्बन्धित) वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) जिसे न सेवाएँ अदा हो रही हैं और जो न सेवाएँ प्रदान कर रहा है वह व्यक्ति (तीसरा पक्ष) वस्तुतः सेवाओं के आदान-प्रदान का प्रायोजक (Promoter) होगा। सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रायोजन के अन्तर्गत वह वस्तुतः अदा हुई सेवाओं को प्रदान कर रहा होता है और प्रदत्त सेवाएँ उसे अदा हो रही होती हैं।

तीसरे पक्ष में जो कोई व्यक्ति है वह सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रायोजक की भूमिका में वस्तुतः अदा हुई सेवाओं को वह प्रदान करता है। यह सेवाओं के आदान-प्रदान का संयुक्त विचार है।

सेवाओं की अदायगी एक अवसर है जब ‘वस्तु आदि’ का उपभोग व्यक्ति (एक पक्ष) करता है। सेवाएँ प्रदान करना दूसरा अवसर है जब ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन व्यक्ति (दूसरा पक्ष) करता है।

सेवाओं के आदान-प्रदान का संयुक्त विचार तीसरा अवसर है जब व्यक्ति (तीसरा पक्ष) ‘वस्तु आदि’ के मांग एवं आपूर्ति से संलग्न दो पक्षों में उन व्यक्तियों के सेवाओं के आदान-प्रदान को प्रायोजित करता है।

सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रायोजन को व्यापार कहेंगे। दो से अधिक किन्हीं व्यक्तियों के सेवाओं के आदान-प्रदान को प्रायोजित करने वाले व्यक्ति (तीसरा पक्ष) को व्यापारी कहते हैं।

व्यापार तथा व्यापारी इन शब्दों में परिभाषित होगा

सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रायोजन (आयोजन) को ‘व्यापार’ कहते हैं।

सेवाओं के आदान-प्रदान को प्रायोजित करने वाला व्यक्ति ‘व्यापारी’ है।

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