निर्माण कार्य करता हुआ इंजीनियर हमने देखे हैं। रोगों की चिकित्सा करते हुए चिकित्सक हमने देखे हैं। आर्थिक समस्याओं का समाधान करता हुआ अर्थशास्त्री न हमने देखे हैं और न ही हमने सुना है कि आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के लिए किसी अर्थशास्त्री को नियुक्त किया गया है।
किसी अर्थशास्त्री को आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के लिए नियुक्त नहीं किया जा सके तो अर्थशास्त्र के नाम पर विद्यार्थियों को जो कुछ पढ़ाया जा रहा है वह अर्थशास्त्र कितना युक्तिसंगत है, उस पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा।
रुपए के अर्थशास्त्र को व्यापक अर्थ में ‘अर्थशास्त्र’ फिलवक्त हम मान लें तो अर्थशास्त्र पढ़ा लिखा व्यक्ति ‘मानव संसाधन अर्थशास्त्री’ रुपए के अर्थशास्त्र को लागू कैसे करेंगे, इसकी चर्चा हम करेंगे।
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6.08 मानव संसाधन अर्थशास्त्री
‘मानव संसाधन’ से तात्पर्य व्यक्ति से है, विशेषकर रोजगार प्राप्त किसी व्यक्ति से है।
रोजगार प्राप्त व्यक्ति बैंकनोट लेकर, अपनी सेवाएँ प्रदान कर कोई कार्य सम्पन्न (समापन) करता है।
आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के लिए लोगों का मार्गदर्शन करना एक कार्य है। यह कार्य जो कोई व्यक्ति करेगा वह अर्थशास्त्री होगा और उसे अर्थशास्त्र का ज्ञान होगा।
अर्थशास्त्र का ज्ञान होना एक विषय है।
अर्थशास्त्र पढ़ लिख कर अर्थशास्त्र पढ़ाना दूसरा विषय है।
अर्थशास्त्र पढ़-लिख कर आर्थिक समस्याओं का समाधान करना तीसरा विषय है।
चिकित्साशास्त्र के अध्यापक चिकित्सक नहीं बल्कि सहज अध्यापक ही कहलाते हैं, उसी प्रकार अर्थशास्त्र के अध्यापकों को सहज अध्यापक कहना होगा।
अर्थशास्त्र पढ़ा लिखा व्यक्ति को अर्थशास्त्र का ज्ञान तो होगा,
किन्तु वैसे किसी भी व्यक्ति को अर्थशास्त्री कह देना उपयुक्त नहीं है।
अर्थशास्त्र पढ़ा लिखा व्यक्ति कोई लिपिक (क्लर्क) हो सकता है, श्रमिक व अधिकारी भी वह व्यक्ति हो सकता है। अर्थशास्त्र पढ़ा लिखा व्यक्ति कोई व्यवसायी अथवा व्यापारी या प्रशासक भी हो सकता है। क्लर्क, श्रमिक, अधिकारी, व्यवसायी, व्यापारी, प्रशासक आदि अर्थशास्त्री नहीं कहलाएँगे।
अर्थशास्त्री से तात्पर्य अर्थशास्त्र पढ़े लिखे उन व्यक्तियों से है, जिन्हें किन्हीं आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के अवसर प्राप्त हैं।
किसी नदी पर पुल बनाना हो तो सम्बन्धित अभियन्ता के मार्गदर्शन में सम्बन्धित शास्त्र सम्मत व्यवस्थाएँ लागू कर निर्माण किया जाता है।
बीमार किसी व्यक्ति के किसी रोग का इलाज कराना हो तो चिकित्सक के मार्गदर्शन में चिकित्साशास्त्र सम्मत व्यवस्थाएँ लागू कर इलाज किया जाता है।
आर्थिक व्यवस्थाएँ लागू करना हो तो पूँजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद आदि परस्पर विरोधी विचारधाराओं के मध्य विषय को उलझा कर सब कुछ राजनेताओं पर छोड़ दिया जाता है।
वह जो चाहे करते चले जाएँ और अर्थशास्त्री मूख-बधिर बने रहते हैं, अर्थशास्त्र सम्मत व्यवस्थाओं की या तो अनदेखी की जाती है अथवा अपने लिए अनुकूल व्यवस्थाओं की व्याख्या ‘अर्थशास्त्र’ में ढूँढ लिया जाता है अथवा उसे लिख कर अर्थशास्त्र (तथाकथित) कह दिया जाता है।
विद्यालय तथा विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को अर्थशास्त्र (तथाकथित) इसलिए पढ़ाया जाता है और विद्यार्थी भी अर्थशास्त्र इसलिए पढ़ते हैं कि वह अर्थशास्त्र पढ़ लिख कर रोजगार के अवसर पाएँ।
किन्तु वर्तमान में विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त अर्थशास्त्र के स्नातक लोगों के आर्थिक समस्याओं का समाधान करने से सम्बन्धित किसी कार्य को करने के लिए अपनी सेवाएँ प्रदान नहीं करते हैं।
अर्थशास्त्रियों को लोगों के आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के न अवसर प्राप्त हैं और न ही इसके लिए उन्हें रोजगार के अवसर प्राप्त हैं।
व्यक्ति चाहे कोई अर्थशास्त्री ही क्यों न हो उसे अपनी ग्रहस्थी चलानी है. इसके लिए वह रोजगार के अवसर चाहेगा एवं उन अवसरों पर वह अपनी सेवाएँ प्रदान करेगा।
आर्थिक समस्याओं का समाधान करना अर्थशास्त्रियों के लिए सम्भव हो और उन्हें उसका अवसर मिले तो अर्थशास्त्री निश्चित रूप से अपनी सेवाएँ प्रदान करेंगे और उन्हें रोजगार के अवसर प्राप्त होगा।
लोगों के आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के लिए अपनी सेवाएँ प्रदान नहीं करना अर्थशास्त्रियों का दोष नहीं है बल्कि कमी उस अर्थशास्त्र में है जिसे वर्तमान में पढ़ाया जा रहा है।
अर्थशास्त्र में क्या दोष है, इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के क्रम में प्रमुख दोष ध्यान में आया है कि बैंकनोटों पर लिखा ‘मैं धारक को … वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ से रिज़र्व बैंक और केन्द्र सरकार तथा बैंकनोट लेने वाले व्यक्तियों के लिए निर्धारित वचनबद्धता अर्थशास्त्र में परिभाषित नहीं है।
बैंकनोटों पर लिखा ‘केन्द्र सरकार द्वारा प्रत्याभूत’ इस वचनखण्ड़ का अर्थ अर्थशास्त्र में स्पष्ट नहीं है। अर्थशास्त्र में रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों को परिभाषित कर स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।
आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के लिए आवश्यक है कि आर्थिक समस्याओं का समाधान व्यावसायिक स्तर पर हो तथा व्यवसाय करने का ‘अधिकार पत्र’ अर्थशास्त्रियों को वैसा ही मिले जैसे चार्टड एकाउण्टेंट, डाक्टर, वकील आदि को दिया जाता है।
मान्यता प्राप्त अर्थशास्त्रियों की सेवाएँ लेना निरापद होने से लोग उनका मार्गदर्शन अपने आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए लेकर उन अर्थशास्त्रियों को सेवा के अवसर देकर उनके लिए रोजगार के अवसर बनाएँगे।
लोगों के आर्थिक समस्याओं के समाधान का मार्गदर्शन करने के अवसर अर्थशास्त्रियों को प्राप्त हों एवं इसके लिए अर्थशास्त्री अपनी सेवाएँ प्रदान करें और उन सेवाओं के बदले उन्हें रुपए (बैंकनोट) मिले तो उन अर्थशास्त्रियों को रोजगार के अवसर प्राप्त होकर वह ‘मानव संसाधन अर्थशास्त्री‘ कहलाएँगे।
6.09 रुपए का अर्थशास्त्र लागू करना
रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में जो भी जानकारी हमारी होगी उसके आधार पर रुपए का लेन-देन हम जिस प्रकार भी करते हैं, उसे हमने ‘रुपए का अर्थशास्त्र’ कहा है। इसकी हम चर्चा करें कि इससे पूर्व रुपए के सम्बन्ध में कुछ मिथ्या धारणाएँ हैं, उनका उल्लेख हम यहाँ कर रहे हैं।
मिथ्या धारणा :
रिज़र्व बैंक द्वारा जारी बैंकनोट (रुपए) धन है, यह मिथ्या धारणा है। साधन (सधन) सम्पन्न व्यक्ति के पास धन अवश्य होगा, इसलिए धन साधन (स’धन) का अभिन्न तत्व है। धन से सम्बन्धित यह विषय रुपए (बैंकनोटों) के साथ लागू नहीं होता।
बैंकनोट व्यक्ति के पास होने मात्र से यदि व्यक्ति साधन सम्पन्न हो जाए तो किसी भी सरकार के लिए यह अति सहज कार्य है कि वह सरकार रुपए (बैंकनोट) छाप-छाप कर अपनी जनता में वितरित कर दे,
किन्तु ऐसा करके जनता को साधन सम्पन्न कर उनके अभावों को सरकार दूर नहीं कर सकती, इसलिए रुपए धन नहीं है। रुपए धन है, इसके होने मात्र से हम साधन सम्पन्न होंगे यह मिथ्या धारणा है।
मिथ्या धारणा :
सबसे बड़ा रुपैय्या, रुपए के सम्बन्ध में यह भी मिथ्या धारणा प्रचलित है। प्रातः स्मरणीय महात्मा गाँधी अथवा स्वामी विवेकानंद या पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम अथवा धीरूभाई अम्बानी जैसे लोग रुपए के बल पर बड़ा (महान) नहीं कहलाए।
रुपए के बल पर व्यक्ति अमीर हो सकता है, किन्तु अमीर व्यक्ति रुपए के बल पर बड़ा नहीं होता, बल्कि व्यक्ति चाहे अमीर हो अथवा गरीब हो वह अपने सत्कर्मों (व्यक्ति द्वारा किए गए श्रम) के बल पर बड़ा होता है। महामना मदन मोहन मालवीय निर्धन थे, किन्तु उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना कर डाली। रुपए से बड़ा मदन मोहन मालवीय थे, वह व्यक्ति थे।
सबसे बड़ा रुपैय्या नहीं बल्कि व्यक्ति है और व्यक्ति का श्रम है। रुपए का महत्व है, किन्तु वह व्यक्ति के श्रम से छोटा है। व्यक्ति का श्रम रुपए से बड़ा है,सबसे बड़ा रुपैय्या की धारणा मिथ्या (झूठ) है।
मिथ्या धारणा :
रुपए अथवा बैंकनोटों को लेन-देन का ‘माध्यम’ हम कह देते हैं। ‘रुपए’ लेन-देन का माध्यम है, यह रुपए के सम्बन्ध में अन्य मिथ्या धारणा है। हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि माध्यम जो कुछ भी होगा वह किसी ठोस, द्रव अथवा गैस के रूप में कोई पदार्थ अवश्य होगा।
सन् 1540 ईस्वीं से द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व तक के कालखण्ड में 400 वर्षों तक भारतवर्ष में एक तोला चाँदी से बना सिक्का रुपए कहलाता था और एक तोला सोना से बना सिक्का मुहर कहलाता था, जिसके बदले में चाँदी से बने सोलह रुपए के सिक्कों का लेन-देन होता था।
रुपए कहने का अर्थ जब तक सोना व चाँदी से बने मूल्यवान सिक्कों से था तब तक ‘रुपए’ लेन-देन का माध्यम बना रहा, क्योंकि सोना व चाँदी के मूल्य को ‘रुपए’ कहा गया और चूँकि ‘रुपए’ से मूल्य अभिव्यक्ति पाता है, इसलिए ‘रुपए’ कहने का अभिप्राय सोना व चाँदी से था जो स्वयं पदार्थ हैं।
सोना, चाँदी के रुपए के सिक्कों के एवज में सन् 1770 ईस्वीं से भारतवर्ष में कुछ निजी बैंकों द्वारा बैंकनोट जारी किए गए। वह बैंक सोना, चाँदी के रुपए के सिक्के बैंकनोटों के धारकों को बैंकनोटों के बदले दिया करते थे।
बैंकनोटों के बदले सोना, चांदी के सिक्के जब तक लोगों को दिया जाता रहा, तब तक ‘बैंकनोट’ लेन-देन का माध्यम कहलाए क्योंकि ‘बैंकनोट’ सोना व चाँदी के मूल्यवान रुपए के सिक्कों के समतुल्य थे।
स्टेनलेस स्टील से बने ‘रुपए के सिक्के लेन-देन के लिए जारी किए जाते हैं. उन सिक्कों में स्टेनलेस स्टील का धात्विक मूल्य हमारे लिए नहीं है, अर्थात् हमारे लिए स्टेनलेस स्टील के सिक्के मूल्यहीन हैं। मूल्यहीन कहने का अभिप्राय हुआ कि रुपए के सिक्के मूल्यवान किसी पदार्थ से नहीं बने हैं।
‘रुपए’ से चूँकि मूल्य अभिव्यक्ति पाता है और स्टेनलेस स्टील हमारे लिए मूल्यहीन है, इसलिए रुपए के स्टेनलेस स्टील के सिक्कों को लेन-देन का माध्यम नहीं कह सकते।
रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया एक्ट में किए गए संसोधनों के अनुसार यदि रुपए के सिक्के रिज़र्व बैंक के पास नहीं हैं तो किसी व्यक्ति को बैंकनोटों के बदले रुपए के सिक्के न देने की रिज़र्व बैंक को छूट है,
बैंकनोटों के बदले रुपए के सिक्के देने के लिए रिज़र्व बैंक वचनबद्ध नहीं है। इस कारण रिज़र्व बैंक से बैंकनोटों के बदले ‘रुपए’ मांगने का अधिकार बैंकनोटों के धारक किसी व्यक्ति को नहीं है।
रिज़र्व बैंक द्वारा जारी बैंकनोट जो स्वयं रुपए नहीं हैं और जिनके बदले ‘रुपए’ मांगने का अधिकार बैंकनोटों के धारक किसी व्यक्ति को नहीं है, वह बैंकनोट कोरा कागज से अधिक कुछ नहीं हैं,
अतः रिज़र्व बैंक द्वारा जारी ‘बैंकनोट’ भी लेन-देन का माध्यम नहीं हैं।
लेन-देन का ‘साधन’ बैंकनोट
रुपए अथवा बैंकनोटों को लेन-देन का माध्यम नहीं भी कहें तो उन्हें लेन-देन का ‘साधन’ कम से कम कहना ही होगा, क्योंकि रुपए के सिक्के और बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का आदान-प्रदान हम करते हैं।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रारम्भिक वर्षों में जो कुछ ‘वस्तु आदि’ व्यक्ति के पास हुआ करता था उसे ही व्यक्ति ने साधन मानकर ‘वस्तु आदि’ के विनिमय (Barter System) से अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करता हुआ व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति किया करता था।
कालान्तर में बहुमूल्य पदार्थ, सोना, चांदी आदि का प्रयोग (लेन-देन) साधन बना और इनके लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होने लगा।
दूरस्थ प्रदेशों तक सोना, चांदी आदि के आवागमन में जोखिम को देखते हुए हुण्डी का प्रयोग (लेन-देन) साधन बना। रुपए अथवा बैंकनोट हुण्डी का ही उन्नत रूप है, यह (बैंकनोट) हुण्डी जैसा ही साधन है, जिसका प्रयोग व्यक्ति करता है। बैंकनोट लेन-देन का माध्यम नहीं है, बल्कि लेन-देन का साधन भर है।
मिथ्या धारणा :
मूल्य नहीं माप है ‘रुपए’। ‘रुपए’ से कोई मूल्य व्यक्त होगा यह मिथ्या धारणा है। अतीत में एक तोला चाँदी से बने सिक्के को ‘रुपए’ (एक) कहते थे। सिक्के में चाँदी का मूल्य ही ‘रुपए’ कहलाया और उनका लेन-देन जब हम कर रहे थे तब किसी मूल्य को ‘रुपए’ कहा जाना उचित था।
कालान्तर में औद्योगिक क्रांति से मूल्यवान धातुओं की मांग बड़ी और सिक्कों व बैंकनोटों का प्रसार भी अधिक हुआ. इस कारण सोना, चाँदी व तांबा, पीतल जैसे मूल्यवान धातुओं के बने सिक्कों को जारी करना तथा उनके समतुल्य मूल्य के बैंकनोटों को जारी करना सम्भव नहीं रहा।
संयोग ऐसा कि वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आगाज हुआ। जनादेश लेकर बहुमत से निर्णय लेना लोकतांत्रिक प्रक्रिया कहलाया। इस प्रक्रिया से संसद में कानून बने और मूल्यहीन सिक्के और बैंकनोट जारी करना कानून सम्मत हो गया।
कानून बनाकर मूल्यहीन सिक्के और बैंकनोट जारी किए जाने से किसी मूल्य को ‘रुपए’ कहने का अधिकार हमने स्वतः खो दिया है, इसलिए ‘रुपए’ को मूल्य कहना गलत है। मूल्य को ‘रुपए’ में व्यक्त करना हो तो मूल्यवान रुपए के सिक्के और बैंकनोटों को जारी करना होगा, जो अब सम्भव नहीं है।
रुपए अथवा बैंकनोटों को कोई व्यक्ति मूल्यवान मानता हो और उनके मूल्य के सम्बन्ध में आप यदि रिज़र्व बैंक से पूछें तो बैंक आपको कोई जानकारी नहीं देगा, क्योंकि हमें भी नहीं दिया है।
अर्थशास्त्री भी कुछ नहीं बताएँगे और अर्थशास्त्र के पुस्तकों में भी रुपए अथवा बैंकनोटों के मूल्य के सम्बन्ध में कुछ लिखा हुआ नहीं है। केन्द्र सरकार या रिज़र्व बैंक तथा अर्थशास्त्री जब रुपए अथवा बैंकनोटों का मूल्य न बतावें तो रुपए मूल्यवान कैसा हुआ?
‘रुपए’ के नाम से जिन सिक्कों अथवा बैंकनोटों का लेन-देन हम कर रहें हैं वह मूल्यवान नहीं होने से ‘रुपए कहने से कोई मूल्य नहीं बल्कि कोरा कोई माप व्यक्त होगा।
जैसे मीटर, लीटर व किलो आदि से कोई माप व्यक्त होता है। मीटर इकाई में किसी वस्तु के लम्बाई को मापा जाता है और लम्बाई के माप की इकाई ‘फीट’ भी है, वैसा ही ‘रुपए इकाई में भारतवर्ष में किसी व्यक्ति के किन्हीं सेवाओं को मापा जाता है।
अन्य देशों में व्यक्ति के सेवाओं को डालर, रूबल, येन, पौंड़ आदि अन्य अनेक इकाईयों में भी मापा जाता है। रुपए कहने से कोई मूल्य नहीं बल्कि कोई माप व्यक्त होगा।
रुपए का अर्थशास्त्र लागू करना
रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में हम जितना जानते हैं, तदनुसार रुपए का लेन-देन हम कर रहे हों तो रुपए देने से बदले में हमें मिलने वाले लाभ से हम वंचित नहीं होंगे।
इसके विपरीत रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में जानकारी के अभाव में रुपए का लेन-देन करने से रुपए का लेन-देन तो हम कर रहे होंगे, किन्तु जानकारी के अभाव में रुपए के लेन-देन का वांचित लाभ शायद हमें न मिले।
रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में उपलब्ध जानकारी के आधार पर सब व्यक्ति और संस्थाएँ रुपए का लेन-देन जब करने लगेंगे तो रुपए का लेन-देन निश्चित एक विधि से होने लगेगा।
इसके विपरीत रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में किसी जानकारी के अभाव में जब हम रुपए का लेन-देन करेंगे तो हममें से प्रत्येक व्यक्ति और संस्था अपने-अपने लाभ व हानि को ध्यान में रखते हुए जैसा मन में आए वैसा भिन्न-भिन्न प्रकार से रुपए का लेन-देन हम करेंगे और इस कारण रुपए के लेन-देन की निश्चित कोई विधि नहीं होगी।
अनिश्चित विधि से रुपए का लेन-देन होता रहे यह कोई व्यक्ति नहीं चाहेगा, क्योंकि लाभ-हानि की चिंता सबकी समान है। प्रत्येक व्यक्ति रुपए के लेन-देन का वांचित लाभ भी निश्चित रूप से चाहता है।
इसलिए रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों को जानते हुए रुपए का लेन-देन हम करें तो रुपए का लेन-देन निश्चित विधि से होकर, वांचित लाभ मिलने से रुपए के लेन-देन का प्रयोजन पूरा हो सकेगा।
अर्थिक समस्याएँ न हों अथवा आर्थिक समस्याओं का समाधान होता रहे यह रुपए के लेन-देन का आवश्यक तत्व है और इसके लिए आवश्यक है हममें से प्रत्येक व्यक्ति रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों को जानकर रुपए का लेन-देन करें।
रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों को जानकर रुपए का लेन-देन करने से रुपए के लेन-देन का वांचित लाभ हमें मिलने से और रुपए के लेन-देन के क्रम में हमारे आर्थिक समस्याओं का समाधान होता रहने से ‘रुपए का अर्थशास्त्र’ लागू हुआ कहा जाएगा।
रुपए के अर्थशास्त्र को लागू करने का तात्पर्य रुपए के लेन-देन के नवीन किसी व्यवस्था को स्थापित करना नहीं है और न ही रुपए के लेन-देन की अनजान सी किसी व्यवस्था को कायम करना है। रुपए के लेन-देन की वर्तमान व्यवस्था को नया नाम देकर पेश करना भी यह नहीं है।
अर्थशास्त्र को स्पष्ट अर्थ देकर अर्थशास्त्र सम्मत व्यवस्थाओं का आधार लेकर एवं रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों को जानकर रुपए का लेन-देन जैसा भी हो रहा हो उसे ही रुपए का अर्थशास्त्र लागू हुआ कहा जाएगा।
रुपए के लेन-देन का स्त्रोत चूँकि रिज़र्व बैंक है और रिज़र्व बैंक ही बैंकनोटों को जारी करता है, इसलिए ‘रुपए के अर्थशास्त्र’ को लागू करने की पहल रिज़र्व बैंक को करनी होगी। इस सम्बन्ध में रिज़र्व बैंक की भूमिका बहुत स्पष्ट है। रिजर्व बैंक ‘रुपए का आधार मूल्य’ बतावे।
उस आधार पर रुपए का लेन-देन होकर ‘रुपए का अर्थशास्त्र’ लागू हो सकेगा। बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ से रिज़र्व बैंक के लिए निर्धारित वचनबद्धता ‘रुपए का आधार मूल्य’ है। जिन सरकारी प्रतिभूतियों के एवज में रिज़र्व बैंक बैंकनोट जारी करता है उन प्रतिभूतियों का इकाई माप रुपए का आधार मूल्य है। हम बैंकनोटों के धारक हैं, हमने बैंकनोट रिजर्व बैंक को सुपुर्द (Surrender) किया हो तो हमारे बैंकनोटों के बदले हमें ‘रुपए’ देने के लिए रिजर्व बैंक वचनबद्ध है। बैंकनोटों के बदले रिज़र्व बैंक ‘रुपए’ के नाम पर हमें जो कुछ देना चाहता है वही ‘रुपए का आधार मूल्य है।
‘रुपए का आधार मूल्य’ बताकर ‘रुपए के अर्थशास्त्र’ को लागू करने की पहल रिज़र्व बैंक को करनी होगी। रिज़र्व बैंक ‘रुपए का अर्थशास्त्र लागू करे इसका तात्पर्य भी स्पष्ट है कि –
विभिन्न वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का मूल्य तथा बिजली, पानी, टेलीफोन, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, यातायात व अन्य सरकारी अथवा गैर सरकारी सेवाओं का शुल्क एवं प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष टेक्स और सरचार्ज आदि …
जिनकी वसूली केन्द्र सरकार करती है अथवा राज्य सरकारें करती हैं या स्थानीय निकाय करते हैं और उद्योगपति या व्यापारी भी जिसे वसूल करते हैं, वह सभी प्रकार के टेक्स और शुल्क या मूल्य आदि जो कुछ व जितना कुछ तय होते हैं, उसे रिज़र्व बैंक सत्यापित करे,
अर्थात् उद्योगपति, व्यापारी व सरकारों ने वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का जो कुछ मूल्य, शुल्क, टेक्स आदि उन्होंने तय किया है, उसे रिज़र्व बैंक सत्यापित करे कि वह मूल्य, शुल्क, टेक्स आदि रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किए गए बैंकनोटों पर लिखा हुआ ‘रुपए के आधार मूल्य’ को आधार मानकर ‘वस्तु आदि का मूल्य या सेवाओं का शुल्क अथवा सरकारी टेक्स आदि सब कुछ तय हुआ है।
रुपए का लेन-देन हम सब व्यक्ति अनिवार्य रूप से करते हैं, इसलिए ‘रुपए का अर्थशास्त्र लागू करने की जिम्मेदारी न केवल रिज़र्व बैंक अथवा केन्द्र या राज्य सरकारों की है, बल्कि हमारी भी जिम्मेदारी है। हमारी जिम्मेदारी बस इतनी है कि रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों को जानकर हम रुपए का लन-देन करें और इसके लिए आवश्यक हुआ तो अर्थशास्त्रियों का मार्गदर्शन भी हमें लेना चाहिए।
उन अर्थशास्त्रियों को हमने ‘नगरसखा’ कहा है जिनके मार्गदर्शन में जनसाधारण रुपए के अर्थशास्त्र को लागू कर सकेंगे। आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए लोगों का मार्गदर्शन करना ‘नगरसखा’ किसी अर्थशास्त्री का व्यवसाय होगा।
आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए चूँकि ‘रुपए के अर्थशास्त्र’ को लागू करना आवश्यक है, इसलिए नगरसखा लोगों को जो भी जानकारी (मार्गदर्शन) देगा वह ‘रुपए के अर्थशास्त्र’ को लागू करने से सम्बन्धित होगा और आवश्यक हुआ तो ‘रुपए के अर्थशास्त्र’ को लागू करने के लिए नगरसखा’ लोगों के सहायक की भूमिका में होगा।
रुपए के अर्थशास्त्र को लागू करना नगरसखा किसी अर्थशास्त्री का व्यवसाय होगा। अर्थशास्त्रियों को ‘नगरसखा’ नाम से प्रायोजित कर और उन्हें रोजगार के अवसर देकर बदले में नगरसखा की सेवाएँ लेकर रुपए के अर्थशास्त्र को लागू कर लोगों के आर्थिक समस्याओं का समाधान व्यावसायिक स्तर पर करने के लिए ‘नगरसखा उद्योग’ नाम से एक प्रकल्प (Project) पर हम काम कर रहे हैं।