क्रयशक्ति का गठन

क्रयशक्ति बनने की प्रक्रिया सतत् जारी रहने वाली प्रक्रिया है और यह निराली भी है, क्योंकि कोई व्यक्ति चाहे या कुछ लोग चाहें कि उनकी क्रयशक्ति बन जाए, यह कतई सम्भव नहीं है।

लोगों की क्रयशक्ति बनेगी तो सबकी बनेगी और न बने तो किसी की नहीं बनेगी,

विशेष बात यह भी है कि क्रयशक्ति सतत् न बने तो लोगों की क्रयशक्ति कम से कमतर होती जाएगी।

इन विषयों की चर्चा करेंगे।

5.04 क्रयशक्ति का गठन

गांठ बनाना ‘गठन’ है। वस्त्र आदि का गांठ बनाते हुए उन्हें मिलाकर बांध देते हैं। मिलाकर बांधना मिलन को दर्शाता है। गठन व्यापक अर्थ में मिलन है।

वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) व्यक्ति की आवश्यकताएँ हैं। जिस अनुपात में व्यक्ति के ‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, उस अनुपात में व्यक्ति की क्रयशक्ति बनती है।

क्रयशक्ति बनाने के लिए व्यक्ति जितने भी प्रयत्न करता है, ऐसे सारे प्रयत्न व्यक्ति वस्तुतः ‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है।

आवश्यकताएँ प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-अपनी हैं। अतएव क्रयशक्ति प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-अपनी है। प्रत्येक व्यक्ति की क्रयशक्ति का स्वयं उसके लिए महत्व है। दो या दो से अधिक किन्हीं व्यक्तियों की क्रयशक्ति का संयुक्त अथवा साझा महत्व जैसा कोई विषय क्रयशक्ति के प्रसंग में नहीं है।

‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेकानेक व्यक्ति मिलजुल (मिलन) कर सह जीवन जीते हैं। निज आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति व्यक्ति करता है व उन व्यक्तियों की क्रयशक्ति बनाता है और बदले में स्वयं उसकी क्रयशक्ति बनती है।

जिसे क्रयशक्ति बनना कहा गया है वह वस्तुतः व्यक्तियों के क्रयशक्ति का मिलन है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति की क्रयशक्ति अन्य व्यक्तियों के क्रयशक्ति पर आधारित होकर भी अन्य उन व्यक्तियों के साथ मिलजुल कर जीने (सह जीवन) से प्रत्येक उन व्यक्तियों की अपनी क्रयशक्ति बनती है, जिसे व्यापक अर्थ में क्रयशक्ति का गठन (मिलन) कहा गया है।

क्रयशक्ति में वृद्धि के लिए अपने सेवाओं का मूल्य (रुपए) बैंकनोटों की अधिक राशि व्यक्ति लेने लगें तो ‘वस्तु आदि’ का मूल्य (रुपए) अधिक निर्धारित होकर ‘मुद्रा का मान’ बैंकनोटों की अधिक राशि निर्धारित होकर प्रत्येक व्यक्ति के क्रयशक्ति में कमी आएगी।

दूसरी ओर ‘मुद्रा का मान’ बैंकनोटों की कम राशि निर्धारित करने के लिए अपने सेवाओं का मूल्य (रुपए) बैंकनोटों की कम राशि यदि व्यक्ति लेने लगें तो उन्हें बैंकनोटों (रुपए) की कम आय होने से उनकी क्रयशक्ति कम होगी।

सेवाओं का अधिक मूल्य ‘लेना या देना’ अथवा सेवाओं का कम मूल्य ‘लेना या देना’ दोनों ही स्थितियों में क्रयशक्ति में वृद्धि न होकर उसमें कमी आती है।

व्यक्ति के क्रयशक्ति का गठन एक पेचिदा (Intricate) विषय है, उस पेचीदगी को सुलक्षाने के बजाय क्रयशक्ति में वृद्धि के लिए व्यक्ति बैंकनोटों की आय में वृद्धि करना चाहता है और इसके लिए वह सेवाओं का अधिक मूल्य लेता है।

दूसरी ओर मुद्रा के मान को बनाए रखने के नाम पर राज्य (सरकार) सेवाओं में कटौती करता है या कम मूल्य की सेवाएँ देना चाहता है। दोनों उपायों का क्रयशक्ति बनाने से कोई लेना-देना नहीं है।

व्यक्ति की क्रयशक्ति वस्तुतः इस बात पर निर्भर करती है कि उत्पादकता की उपलब्धियाँ प्राप्त कर व्यक्ति ‘मुद्रा के मान’ को कितना अर्जित करता है, अर्थात् मुद्रा का मान’ बैंकनोटों (रुपए) की जो कुछ राशि निर्धारित होता है, वह किसी लम्बी अवधि तक एक समान बना रहे या कम होता जाए एवं श्रम करने के जिन अवसरों (रोजगार) का सृजन हुआ उसमें कमी न आए।

इस विषय को व्यापक अर्थ में यदि ‘मुद्रा के मान’ को नियमित करना कहें, तो मुद्रा के मान को नियमित करना, यह व्यक्ति अथवा संस्था आदि के वश में नहीं है और न ही कोई रीति-नीति अथवा विधि-विधान निर्धारित कर मुद्रा के मान को नियमित किया जा सकेगा।

मुद्रा का मान जो व्यक्ति के क्रयशक्ति के मूल में है, उस मान को नियमित करने की सम्पूर्ण एक प्रक्रिया है व प्रकृतिस्थ कुछ व्यवस्थाएँ हैं, जिनके आधार पर मुद्रा के मान को नियमित किया जा सकता है एवं क्रयशक्ति के गठन की सम्भावनाओं को तलाशा जा सकता है। वह प्रक्रिया तथा उन व्यवस्थाओं का स्पष्ट चित्र ‘समुद्र मन्थन’ की प्राचीन कथा में वर्णित है।

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