लेखाचित्र का रेखांकन

बाजार में ‘वस्तु आदि’ के मांग के अनुपात में उनकी आपूर्ति को (Demand & Suplly) रेखांकित करते हुए ‘वस्तु आदि’ का मूल्य निर्धारण वर्तमान में किया जाता है। इस  रेखांकन (लेखाचित्र) के संदर्भ में हमें याद रखना होगा कि लोग रुपए व्यय न करें तो बाजार में ‘वस्तु आदि’ की मांग नहीं होगी और ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति करने पर लोगों को आय में रुपए प्राप्त न हों तो लोग ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन नहीं करेंगे।

इसलिए ‘वस्तु आदि’ के मांग-आपूर्ति के संगत लोगों की रुपयों में आय-व्यय को भी रेखांकित (लेखाचित्र) करते हुए ‘वस्तु आदि’ का मूल्य निर्धारण बाजार में किया जाना चाहिए।

विशेष इस प्रकार के लेखाचित्र रेखांकन का प्रसंग, विषय, उद्देश्य, पैमाना आदि की चर्चा यहां करेंगे।

लेखाचित्र को रेखांकित करना अलग विषय है, उसकी चर्चा आगे होगी

3.10 लेखाचित्र रेखांकन

बाजार का रेखांकन कहने का तात्पर्य ऐसे लेखाचित्र से है जो बाजार को दर्शाए। किसी लेखाचित्र को रेखांकित करने के लिए सम्बंधित माप और माप का पैमाना अवश्य चाहिए। बाजार एक घटनाक्रम है। किसी घटनाक्रम के माप नहीं होते। घटना घटित हो जाती है, घटना का कोई परिणाम होता है। बाजार के घटनाक्रम के परिणामस्वरूप लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, जिसका माप नहीं होता।

बाजार ‘वस्तु आदि’ के मांग-पूर्ति के संगत रुपयों के आय-व्यय का घटनाक्रम है। आय में प्राप्त रुपयों का माप होता है, रुपयों के व्यय का माप होता है, ‘वस्तु आदि’ के मूल्य रुपयों का माप होता है, किन्तु आय-व्यय के संगत मान को नहीं मापा जा सकता, मांग-पूर्ति के संगत मान को नहीं मापा जा सकता।

मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम बाजार है। बाजार के घटनाक्रम को नहीं माप सकते, किन्तु मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय को मापा जाना चाहिए, क्योंकि रुपयों में लोगों की आय, व्यय और ‘वस्तु आदि’ का मूल्य रुपए में माप के योग्य हैं। इस सम्बन्ध में विचार करते रहने पर ध्यान में आया कि –

बैंकनोटों पर लिखे “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूं” इस वचनखण्ड में किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग के संगत किसी व्यक्ति का रुपयों के व्यय का तथा सामान उसी ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति के संगत अन्य किसी व्यक्ति को होने वाले रुपयों की आय की अभिव्यक्ति हुई है।

‘धारक को…रुपए अदा करना’ मांग के संगत व्यय को दर्शाता है। ‘मैं…वचन देता हूँ’ आपूर्ति के संगत आय को दर्शाता है। ‘मांग के संगत व्यय’ के अन्तर्गत बैंकनोटों का ‘धारक’ बैंकनोट देता हुआ व्यक्ति ‘उपभोक्ता’ की भूमिका में ‘वस्तु आदि’ की मांग रखता है और उसके लिए बैंकनोट व्यय करता है। ‘आपूर्ति के संगत आय’ के अन्तर्गत बैंकनोटों पर लिखा ‘मैं अर्थात् बैंकनोट लेता हुआ अन्य व्यक्ति ‘ग्राहक’ की भूमिका में ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति करता है और उसे बैंकनोटों की आय होती है।

‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ के अन्तर्गत उपभोक्ता (धारक) और ग्राहक (मैं) की भूमिका में बाजार में व्यक्ति तथा अन्य व्यक्ति बैंकनोटों का लेन-देन करते हैं तथा ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन अथवा उपभोग से वह संलग्न (जुड़ते) होता हैं। ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ जो प्रकारान्तर से बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड में व्यक्त हुआ है, उस वचनखण्ड का लेखाचित्र बनाकर बाजार का रेखांकन किया जा सकता है। बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उस वचनखण्ड़ के लेखाचित्र रेखांकन की चर्चा हमने यहां की है।

3.11 वचनखण्ड का लेखाचित्र रेखांकन

बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को पचास रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड के पाँच भाग हैं

1) मैं…….बैंकनोट (रुपए) लेने वाला कोई व्यक्ति,

2) धारक…….. बैंकनोट देने वाला अन्य कोई व्यक्ति,

3) पचास रुपए…….रुपए की इकाई में बैंकनोटों का माप,

4) अदा करना : वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि अदा करना,

5) वचन देना…’वस्तु आदि’ की अदायगी (प्रदान करना) का वचन देना,

बैंकनोट जिस किसी व्यक्ति के पास हैं वही बैंकनोट दे सकता है। बैंकनोट जिस किसी व्यक्ति के पास हैं, वह व्यक्ति बैंकनोटों का ‘धारक’ हुआ। बैंकनोटों का धारक कोई व्यक्ति बैंकनोट देने वाला व्यक्ति है, वह बैंकनोटों व्यय करता है। बैंकनोट देने वाला व्यक्ति (धारक) दिए गए बैंकनोटों के अनुपात (संगत) में निर्धारित मूल्य (माप) के वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) की माँग अन्य व्यक्ति के सम्मुख रखता है, जिसकी अदायगी उसे रुपए अथवा बैंकनोटों के व्यय करने से होती है।

अतएव ‘धारक’ का सम्बन्ध रुपए अथवा बैंकनोटों के व्यय से है और ‘अदा करने’ का सम्बन्ध ‘वस्तु आदि’ के मांग से है। ‘धारक को अदा करना’ मांग के संगत (अनुपात) व्यय को दर्शाता है।

दिए गए बैंकनोट लेने वाला व्यक्ति ‘मैं’ है, उसे बैंकनोटों की आय होती है। बैंकनोट लेने वाला व्यक्ति (मैं) लिए गए बैंकनोटों के अनुपात में निर्धारित मूल्य (माप) के ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति अन्य व्यक्ति को करता है और बदले में उसे बैंकनोटों की आय होती है।

बैंकनोटों पर लिखा ‘मैं’ का सम्बन्ध बैंकनोटों के आय से है और ‘वचन देने’ का सम्बन्ध ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से है। ‘मैं… वचन देता हूँ’ आय के संगत (अनुपात) आपूर्ति को दर्शाता है। मांग के संगत व्यय (धारक को अदा करना) एवं आय के संगत आपूर्ति (मैं… वचन देता हूँ). अर्थात् ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ बैंकनोटों पर लिखा “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचनखण्ड़ में है।

रुपए अथवा बैंकनोट जिस माप में ‘कोई व्यक्ति’ व्यय करता है, वह ‘अन्य किसी व्यक्ति’ की आय होती है और किसी व्यक्ति की आय अन्य व्यक्ति के व्यय के कारण है।

रुपए अथवा बैंकनोटों के व्यय के संगत (अनुपात) जिस किसी ‘वस्तु आदि’ की मांग कोई व्यक्ति करता है, उस ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति अन्य कोई व्यक्ति उसे होने वाली रुपए अथवा बैंकनोटों की आय के अनुपात (संगत) में करता है। आवश्यक ‘वस्तु आदि’ जो किसी व्यक्ति की मांग है, उस ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति अन्य व्यक्ति करता है। अतएव मांग, आपूर्ति एवं आय तथा व्यय परस्पर सम्बन्धित विषय हैं।

‘वस्तु आदि’ के ‘मांग की आपूर्ति होने से व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और इसके लिए ही रुपए अथवा बैंकनोटों के ‘आय-व्यय’ से व्यक्ति संलग्न होता है। मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय से संलग्न व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनवरत प्रयत्न करता है, इसलिए मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय व्यापक अर्थ में व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति का आवर्ती (अन्तहीन) घटनाक्रम है।

आवर्ती (अन्तहीन) घटनाक्रम को दर्शाने वाला रुपए पर मुद्रित “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ“ इस वचनखण्ड़ से निर्धारित वचनबद्धता प्रत्येक व्यक्ति के लिए सदैव सब स्थानों पर देशकाल निरपेक्ष एक समान लागू रहने वाला आय-व्यय के आवर्ती (न रुकने वाला) घटनाक्रम को व्यक्त करता हुआ लेखाचित्र जो भी बनेगा वह अनन्त (अन्तहीन) वृत्ताकार चापों से रेखांकित होगा जिसे यहाँ दर्शाया गया है।

बैंकनोटों पर मुद्रित (लिखा) वचनखण्ड़ के लिए रेखांकित लेखाचित्र में मांग, आपूर्ति, आय. व्यय आदि चार अवयवों को साथ-साथ रेखांकित करना लेखाचित्र रेखांकन के स्थापित परम्पराओं में सम्भव नहीं है। मांग, आपूर्ति, आय, व्यय आदि में प्रत्येक का मान दूसरे व तीसरे के मान से प्रभावित होती है और उनके मान को प्रभावित भी करती है, अर्थात् वह सापेक्ष मान वाली राशियाँ हैं, इसलिए उनके मान को लेखाचित्र रेखांकन के स्थापित परम्पराओं से रेखांकित करना सम्भव नहीं है।

अतएव लेखाचित्र रेखांकन के स्थापित परम्पराओं से हटकर बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ के लेखाचित्र को रेखांकित करना होगा। दर्शाया गया लेखाचित्र स्थापित परम्पराओं से हटकर रेखांकित किया गया एक प्रयास है।

दिए गए लेखाचित्र के रेखांकन का वर्णन पढ़ते हुए लोग क्यों कैसे और किन्तु परन्तु में उलझ कर न रह जाएँ इसलिए इस लेखाचित्र के रेखांकन का विवरण देने से पहले लेखाचित्र रेखांकन का प्रसंग, विषय, उद्देश्य व पैमाना आदि को स्पष्ट करते हुए अनन्तर लेखाचित्र रेखांकन का विवरण आगे दिया गया है, जो सर्वथा एक अभिनव प्रयास है।

3.12 लेखाचित्र रेखांकन का प्रसंग

कुछ रेखाओं को सीधे अथवा आड़ा-तिरछा रेखांकित कर लेने मात्र से कोई लेखाचित्र नहीं बन जाता है बल्कि रेखांकन से पहले लेखाचित्र का विषय एवं उसका उद्देश्य निर्धारित करना होता है और उस विषय में उद्देश्य को दृष्टि में रखकर कोई पैमाना तय करना पड़ता है।

विषय, उद्देश्य एवं पैमाना की बात समझने के लिए किसी चित्र को बनाने के उदाहरण का विचार कर सकते हैं। चित्र बनाने से पूर्व किसका चित्र रेखांकित करेंगे उसकी मुद्रा क्या होगी और आयु अथवा परिवेश (चित्र कहां लगाना है) के अनुसार चित्र का आकार आदि तय किया जाता है।

किसका चित्र, कैसी मुद्रा और क्या आकार होगा आदि लेखाचित्र का विषय, उद्देश्य, पैमाना की भांति आवश्यक तीन विषय हैं जो किसी भी चित्र अथवा लेखाचित्र के रेखांकन से पहले तय करना होता है।

अतएव, बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का लेखाचित्र रेखांकित करने से पहले उसका विषय समझना होगा। लेखाचित्र रेखांकित करने का उद्देश्य जानना होगा। एक पैमाना भी तय करना होगा जिसके आधार पर लेखाचित्र का रेखांकन किया जाएगा।

3.13 लेखाचित्र रेखांकन का विषय

बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का अर्थ लेखाचित्र रेखांकन का विषय है। उस अर्थ की विस्तार से चर्चा रुपए, बैंकनोट और मुद्रा  की विस्तार से चर्चा करते हुए हमने किया है। बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का अर्थ केवल इतना रह गया कि बैंकनोट देने के अवसर पर अन्य व्यक्ति जिसे बैंकनोट दिया गया है, लिए गए बैंकनोटों के बदले हमें MRP लिखा उस मूल्य के ‘वस्तु आदि’ अदा करने के लिए वह अन्य व्यक्ति वचनबद्ध है। जैसे 50 रुपए माप के बैंकनोट देने से बदले में 50 रुपए MRP मूल्य के ‘वस्तु आदि’ की अदायगी व्यक्ति को होना चाहिए।

बैंकनोटों (रुपए) को लेने के अवसर पर लिए गए बैंकनोटों के बदले निर्धारित मूल्य (रुपए) के ‘वस्तु आदि’ प्रदान करने के लिए हममें से प्रत्येक व्यक्ति वचनबद्ध है, यह वचनबद्धता बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का वर्तमान में अर्थ है।

हममें से प्रत्येक व्यक्ति वचनबद्धता का निर्वाह करें इसे सुनिश्चित करने का उत्तरदायित्व राज्य का है, यह अर्थ बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड के साथ सक्षम राज्याधिकारी के हस्ताक्षर का है।

बैंकनोटों पर मुद्रित राजमुद्रा ‘अशोक स्तम्भ’ से राज्य अपने लिए निर्धारित उत्तरदायित्व की पुष्टि करता है। बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ से राज्य के लिए निर्धारित उत्तरदायित्व (राज्य की वचनबद्धता) प्रत्येक व्यक्ति बैंकनोटों के लेन-देन में वचनबद्ध बना रहे इसे सुनिश्चित करना राज्य की वचनबद्धता है।

बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ से राज्य एवं व्यक्ति के लिए निर्धारित वचनबद्धता लेखाचित्र रेखांकन का विषय है।

3.14 लेखाचित्र रेखांकन का उद्देश्य

अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बैंकनोटों का ‘व्यय’ व्यक्ति करते हैं और अन्य अनेक व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति करने से ‘आय’ में बैंकनोट व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं। यह आय-व्यय का संदर्भ है जहाँ व्यक्ति बैंकनोटों का लेन-देन करते हैं।

आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की मांग व्यक्तियों की होती है और आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति भी व्यक्ति करते हैं। यह मांग-आपूर्ति का संदर्भ है जहाँ व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान करते हैं।

आय तथा व्यय और मांग एवं आपूर्ति के संदर्भ में जो भी विचार होगा व्यक्ति को केन्द्र में रखकर विचार करना होगा न कि ‘वस्तु आदि’ को केन्द्र में रखकर उनका विचार होगा।

‘वस्तु आदि’ की मांग बैंकनोटों के व्यय के कारण प्रस्तुत होता है, अर्थात् व्यय नहीं तो मांग भी नहीं होगा। बैंकनोटों के आय के लिए ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति की जाती है, अर्थात् आय नहीं तो आपूर्ति भी नहीं होगा। इसलिए आय-व्यय का पृथक विचार एवं मांग-पूर्ति का पृथक विचार हम नहीं कर सकते। मांग-पूर्ति और आय-व्यय का संयुक्त विचार हमें करना होगा, यही आदर्श अवस्था है।

मांग-पूर्ति और आय-व्यय के संयुक्त विचार के अन्तर्गत संदर्भ न ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान का होता है और न ही बैंकनोटों के लेन-देन का संदर्भ होता है, बल्कि व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति का संदर्भ होता है।

आवश्यकताओं की पूर्ति के संदर्भ में विचार का विषय यह होता है कि अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी व्यक्ति ने जिस माप की सेवाएँ प्रदान की है और उन सेवाओं से उसने जो कुछ ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन किया है अथवा ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति जिस अनुपात में व्यक्ति ने किया है उस अनुपात में स्वयं वह व्यक्ति अन्य अनेक व्यक्तियों से ‘वस्तु आदि’ की मांग किस अनुपात में करता है अथवा अन्य अनेक व्यक्तियों की सेवाएँ किस अनुपात में उस व्यक्ति को अदा होती हैं और किस अनुपात में स्वयं उस व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। यह मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के संयुक्त विचार का संदर्भ है।

रोजगार प्राप्त व्यक्ति अपना तथा अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति वह करते हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति होना अथवा करना रोजगार प्राप्त व्यक्ति का विषय है। इसलिए …

मांग पूर्ति और आय-व्यय के संयुक्त विचार के संदर्भ में ‘वस्तु आदि’ के मांग-पूर्ति में बदले में बैंकनोटों के आय-व्यय से अनेक व्यक्ति स्वयं अपने लिए एवं अन्य अनेक व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसर बनाते हैं। मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के इस घटनाक्रम से व्यक्ति के लिए बने रोजगार के अवसर दर्शाने के उद्देश्य से बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का लेखाचित्र रेखांकित करना होगा।

3.15 लेखाचित्र रेखांकन का पैमाना

लेखाचित्र को रेखांकित करने के लिए कोई माप और माप की कोई इकाई आवश्यक होगा जिसका सम्बन्ध व्यक्ति के रोजगार से होगा। व्यक्ति के रोजगार से सम्बन्धित तीन विषय हैं जिनका माप प्रस्तुत होता है। पहला कि रोजगार प्राप्त व्यक्ति ‘सेवाएँ’ प्रदान करता है। दूसरा कि सेवाओं के बदले व्यक्ति को बैंकनोट (रुपए) प्राप्त होने से अपनी आवश्यकता के वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि को क्रय करने की उसकी ‘क्रयशक्ति’ बनती है। तीसरा कि क्रयशक्ति बनने से व्यक्ति स्वयं अपना एवं उस पर निर्भर अन्य व्यक्तियों के ‘भरण-पोषण की व्यवस्था’ करने में वह समर्थ होता है।

अतः  रोजगार प्राप्त व्यक्ति की ‘सेवाएँ’ और उसकी ‘क्रयशक्ति’ एवं उसके ‘भरण-पोषण की व्यवस्था’ यह तीन विषय हैं जिनका सम्बन्ध व्यक्ति के रोजगार से है और जिनका माप प्रस्तुत होता है। इन मापों का आधार लेकर मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के लेखाचित्र को अर्थात् बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ के लेखाचित्र को रेखांकित करने का पैमाना निर्धारित करना होगा।

मुद्रा के मान का सम्बन्ध व्यक्ति के भरण-पोषण की व्यवस्था से है। व्यक्ति की सेवाएँ उसका श्रम है। श्रममाप, मुद्रा का मान एवं क्रयशक्ति माप आदि तीन मापों का आधार लेकर लेखाचित्र को रेखांकित करने का पैमाना निर्धारित होगा।

श्रममाप, मुद्रा का मान, क्रयशक्ति माप तीनों को रुपए के पदों (Terms) में व्यक्त कर और श्रममाप के पदों में मुद्रा के मान को व्यक्त कर तथा मुद्रा के मान के पदों में ‘क्रयशक्ति’ माप को व्यक्त करने से ‘रुपए’ के पदों में बने पैमाना का आधार लेकर बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड के लेखाचित्र का रेखांकन होगा।

एक मुद्रा अर्थात् ‘मुद्रा का मान’ बैंकनोटों का निर्धारित वह माप है जो किसी भी व्यक्ति को समान रूप से उसके प्रतिघण्टे के सेवाओं के लिए दिया जाना चाहिए जिससे कि वह व्यक्ति प्रतिमास औसत कम से कम दो सौ घण्टे की सेवाएँ प्रदान कर स्वयं अपना तथा उस पर निर्भर अन्य कम से तीन व्यक्तियों के किसी परिवार इकाई के भरण-पोषण की व्यवस्था के लिए आवश्यक प्रतिमास के लिए निर्धारित न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति वह कर सके।

मुद्रा का मान ’10 रुपए’ निर्धारित होने की अवस्था में किसी व्यक्ति को प्राप्त 1000 रुपए के बैंकनोट 100 मुद्रा निर्धारित होगा। मुद्रा का मान ’20 रुपए’ निर्धारित होने की अवस्था में उस अथवा अन्य व्यक्ति को प्राप्त 1000 रुपए के बैंकनोट 50 मुद्रा निर्धारित होगा। व्यक्ति को आय में प्राप्त बैंकनोटों में जितने मुद्रा निर्धारित होगा वह उसकी क्रयशक्ति होगी।

देशकाल परिस्थितियों में मुद्रा का मान जो कुछ निर्धारित हो, व्यक्ति स्वयं एवं उस पर निर्भर अन्य तीन व्यक्तियों के ‘इकाई परिवार’ के भरण-पोषण की व्यवस्था के लिए निर्धारित प्रतिमास के न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति को एक समान 200 मुद्रा के लिए निर्धारित बैंकनोट आवश्यक होंगे तथा व्यक्ति प्रतिमास कम से कम 200 घण्टे की सेवाएँ इसके लिए सब परिस्थितियों में प्रदान कर सकेगा। ‘200 मुद्रा’ के लिए निर्धारित बैंकनोटों का माप व्यक्ति के क्रयशक्ति का इकाई माप है।

इस प्रसंग में व्यक्ति का ‘श्रम’, ‘श्रममाप’ और ‘श्रमक्षेत्र’ की जानकारी हमारे लिए आवश्यक है।

3.16 श्रममाप

श्रम की चर्चा विस्तार से हमने किया है। भरण-पोषण की व्यवस्था के लिए किसी व्यक्ति द्वारा किया गया श्रम उसका परिश्रम कहलाता है। श्रममाप कहने का अर्थ व्यक्ति के परिश्रम माप से है, इसकी विस्तार से चर्चा हमने किया है। परिश्रम माप की चर्चा करते हुए हमने स्पष्ट किया है कि अक्षर, शब्द, वचन आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए ‘अक्षरमाप, शब्दमाप, वचनमाप’ से व्यक्ति के ‘श्रममाप’ को व्यक्त कर सकते हैं।

कार्य विशेष किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए आवश्यक न्यूनतम समय यदि निर्धारित कर लिया जाए तो नियत न्यूनतम समय व्यतीत कर व्यक्ति जब किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करता है तो यह व्यक्ति के श्रम की आदर्श अवस्था होती है। ‘श्रम’ के आदर्श अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति एक कार्यघण्टा (एक घण्टा) का समय व्यतीत कर 100 अक्षरमाप ‘श्रम’ करेगा। एक कार्यदिवस (8 कार्यघण्टे) का समय व्यतीत कर एक शब्दमाप ‘श्रम’ करेगा। एक कार्यमास (25 कार्यदिवस) का समय व्यतीत कर एक वचनमाप ‘श्रम’ करेगा।

एक वचनमाप श्रम 25 शब्दमाप श्रम के बराबर होगा।

एक शब्दमाप श्रम 1000 अक्षरमाप श्रम के बराबर होगा।

एक वचनमाप श्रम 25000 शब्दाक्षरमाप श्रम के बराबर होगा।

किसी व्यक्ति ने किसी मास यदि 25000 शब्दाक्षरमाप श्रम किया हो तो अवकाश आदि के अतिरिक्त 25 कार्यदिवस प्रति कार्यदिवस 8घण्टे अर्थात् कुल 200 घण्टे का समय कार्य सम्पन्न करने के लिए उस व्यक्ति ने उस मास व्यतीत किया होगा।

उस व्यक्ति ने यदि 1825 शब्दाक्षरमाप श्रम किया हो तो 1000 अक्षरमाप श्रम करने के लिए व्यक्ति एक कार्यदिवस अर्थात् 8घण्टे का समय व्यतीत करेगा एवं शेष 825 अक्षरमाप श्रम करने के लिए व्यक्ति 6 घण्टे 36 मिनट का समय व्यतीत करेगा।

1825 शब्दाक्षरमाप श्रम करने के लिए व्यक्ति कुल 14 घण्टे 36 मिनट का समय व्यतीत करेगा। ‘शब्दाक्षरमाप श्रम’ में व्यक्ति के श्रम का माप प्रस्तुत करने का उद्देश्य यही है कि यह निर्धारित किया जा सके कि कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति ने कितना समय व्यतीत किया है।

3.17 श्रमक्षेत्र

किसी मजदूर को उसके सेवाओं के बदले दिया जाने वाले बैंकनोटों को उसका पगार भी कहते हैं। रोज-रोज अर्थात् प्रतिदिन व्यक्ति को सेवाएँ प्रदान करने के अवसर प्रात होकर उसे पगार (बैंकनोट) प्राप्त होना उसका ‘रोजगार’ कहलाया।

किसी व्यक्ति को रोजगार चाहिए इसका सहज अर्थ है, व्यक्ति को सेवाएँ प्रदान करने के अवसर रोज-रोज अर्थात् प्रतिदिन चाहिए एवं उन अवसरों पर व्यक्ति को उन सेवाओं के बदले ‘बैंकनोट’ अर्थात् पगार भी चाहिए। व्यक्ति को रोजगार मिला अर्थात् उसे रोज-रोज (प्रतिदिन) का पगार मिला।

रोजगार जिसका सहज अर्थ है, सेवाएँ प्रदान करने के अवसर एवं बदले में बैंकनोट (पगार) पाना, यह आम अमरूद जैसा कोई फल नहीं कि व्यक्ति कहीं जाकर ‘रोजगार’ को तोड़ लावे। यह गेहूँ-चावल जैसा कोई अन्न नहीं कि व्यक्ति रोजगार की खेती कर लावे। यह सोना-चाँदी जैसी कोई धातु भी नहीं कि व्यक्ति ‘रोजगार’ का निष्कर्षण कर लावे।

रोजगार 5 रुपए, 50 रुपए…. आदि रुपए माप अंकित बैंकनोट अथवा धातु के सिक्के भी नहीं कि जिसे छाप-छाप कर लोगों को उपलब्ध करा दिया जाए और लोगों के लिए ‘रोजगार’ की व्यवस्था हो जावे। रोजगार अन्न वस्त्रादि आवश्यक वस्तु भी नहीं कि लोगों में उसका वितरण कर दिया जाए एवं लोगों के लिए ‘रोजगार’ की व्यवस्था हो जाए।

उद्योग लग जाँए तो अनेक व्यक्ति को रोजगार मिल जाएगा यह रोजगार देने की विधि नहीं है, क्योंकि उद्योगों की स्थापना के लिए ‘धन’ चाहिए ओर उद्योगों के उत्पादन की बिक्री भी चाहिए, अतः रोजगार का सम्बन्ध केवल उद्योगों से नहीं है, बल्कि उस ‘धन’ से भी है जो उद्योगों की स्थापना के लिए चाहिए।

रोजगार का सम्बन्ध उन अनेक लोगों से भी है जो उद्योगों का उत्पादन खरीदते हैं, यह खरीददार चूँकि रोजगार प्राप्त व्यक्ति होते हैं, इसलिए रोजगार का सम्बन्ध उद्योगों से अथवा उद्योगों के उत्पादन या पूँजी (धन) से न होकर रोजगार प्राप्त अन्य उन व्यक्तियों से है जो उद्योगों की स्थापना के लिए धन (पूँजी) जुटाते हैं और रोजगार प्राप्त उन व्यक्तियों से भी है जो उद्योगों का उत्पादन खरीदते हैं।

रोजगार प्राप्त ‘व्यक्ति’ ही अन्य किन्हीं व्यक्तियों को रोजगार प्रदान करते हैं, यह ऐसा सत्य है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। कोई कृषक अन्न पैदा करता है, रोजगार नहीं देता है। रोजगार देने के लिए बैंकनोट चाहिए। कृषक बैंकनोट नहीं दे सकता है। कृषि पैदावार बाजार में बेचकर बदले में बैंकनोट मिलने से कोई कृषक किन्हीं व्यक्तियों को रोजगार के अवसर प्रदान करता है।

किन्हीं व्यक्तियों को रोजगार के अवसर उन व्यक्तियों के कारण उपलब्ध हुआ जिन व्यक्तियों ने कृषि पैदावार को बाजार में खरीदा है, जो निश्चय ही रोजगार प्राप्त व्यक्ति हैं। रोजगार प्राप्त ‘व्यक्ति ही अन्य किन्हीं व्यक्तियों को रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं, यही सार्वकालिक सार्वदेशिक सत्य है।

सरकारी व गैर सरकारी अथवा शैक्षिक, सामाजिक व राजनैतिक सब संस्थाएँ जितने बैंकनोट व्यय करती हैं और जिसके कारण अन्य अनेक व्यक्ति को रोजगार के अवसर प्रदान होते हैं, उन संस्थाओं को बैंकनोट रोजगार प्राप्त व्यक्तियों से ‘राज्य कर अथवा शुल्क या दानस्वरूप’ प्राप्त होता है।

संस्थाओं के कारण लोगों को रोजगार के अवसर नहीं मिला बल्कि राज्य कर अथवा शुल्क या दानस्वरूप बैंकनोट उन संस्थाओं को देने वाले रोजगार प्राप्त किन्हीं व्यक्तियों के कारण अन्य अनेक व्यक्ति को रोजगार के अवसर प्रदान होते हैं। व्यापक अर्थ में रोजगार प्राप्त प्रत्येक व्यक्ति बाजार में अन्य किन्हीं व्यक्तियों को रोजगार के अवसर प्रदान करता है।

रोजगार के अवसरों का सृजन व्यक्ति बैंकनोटों के लेन-देन में सेवाओं के आदान-प्रदान से करते हैं और रोजगार के अवसर जब कभी बनते हैं, व्यक्तिसमुदाय के लिए बनते हैं।

व्यक्तिसमुदाय के लिए बने रोजगार के अवसरों में से व्यक्तिविशेष अपनी योग्यता के आधार पर अपने लिए रोजगार के अवसर जुटाता है। कोई व्यक्ति अपने लिए रोजगार के अवसर जितने जुटाता है वह उसके लिए शाश्वत नहीं है, अर्थात् सदा उस व्यक्ति के लिए बने नहीं रहते किन्तु व्यक्तिसमुदाय के लिए बने रोजगार के अवसर शाश्वत होते हैं और अनेकानेक व्यक्ति के लिए सदा बने रहते हैं, जो इस अथवा उस व्यक्ति के लिए रोजगार के अवसर बनते हैं।

व्यक्तिसमुदाय के लिए रोजगार के जितने अवसरों का सृजन होता है, उसे व्यापक अर्थ में ‘श्रम के अवसर’ कहेंगे। श्रम के बने अवसरों का सम्बन्ध व्यक्तिसमुदाय से होता है।

किसी व्यक्ति के लिए श्रम के अवसर नहीं बनते हैं, श्रम के अवसर सदैव व्यक्तिसमुदाय के लिए बनते हैं। व्यक्तिसमुदाय के लिए बने श्रम के अवसरों में से व्यक्तिविशेष अपने लिए जितने रोजगार के अवसर जुटाता है, उसे व्यापक अर्थ में व्यक्ति को प्राप्त रोजगार के अवसर कहेंगे।

व्यक्तिसमुदाय के लिए बने श्रम के अवसर तथा व्यक्ति के लिए बने रोजगार के अवसर दोनों भिन्न अर्थ वाले अवसर नहीं हैं। समान अर्थ में दोनों को सम्मिलित रूप से ‘श्रम क्षेत्र’ कहा गया है।

‘श्रम क्षेत्र’ दर्शाने के उद्देश्य से बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का लेखाचित्र रेखांकित करना होगा।

Scroll to Top