हमारी क्रयशक्ति बनने की निश्चित एक प्रक्रिया है,
उस प्रक्रिया को समझने और समझाने के लिए यहां एक दृष्टांत की चर्चा हम करेंगे।
देवासुर संग्राम देवताओं और असुरों के बीच हुआ एक पौराणिक युद्ध है, जो तीनों लोकों पर प्रभुत्व पाने के लिए लड़ा गया था।
इस युद्ध को दैवी और आसुरी शक्तियों के बीच निरन्तर चलने वाले संघर्ष के रूप में देखा जाता है, जो किसी न किसी रूप में भूतकाल हो, या वर्तमान काल, या भविष्य में भी जारी रहने की बात की जाती है।
युद्धरत देवताओं (सुर) तथा असुरों ने मिलकर अमृत (अमरत्व) पाने के लिए समुद्र मंथन किया था।
क्रयशक्ति लोगों के लिए अमृत समान है। क्रयशक्ति बनाने की प्रक्रिया कुछ-कुछ समुद्र मंथन जैसी ही प्रक्रिया है। दोनों के तुलनात्मक अध्ययन से लोगों के क्रयशक्ति बनने की प्रक्रिया की चर्चा करेंगे।
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5.05 समुद्र मन्थन की कथा और व्यक्ति की क्रयशक्ति
समुद्र मन्थन’ की प्राचीन कथा संक्षेप में इस प्रकार है। समुद्र को मथने के लिए समुद्री जीव कछुआ के कठोर पीठ पर विशाल एक पर्वत को रखकर उसे दीर्घाकार एक सर्प से लपेटे देकर एक ओर से सुर तथा दूसरी ओर से असुरों ने मिलकर सम्मिलित बल का प्रयोग कर समुद्र का मन्धन किया था।
समुद्र मन्थन से अमृत, विष व बारह अन्य रत्न प्राप्त हुए थे। विविध रत्नों का भोग सुर तथा असुरों ने मिलकर किया था। अमृतपान के लिए सुर तथा असुरों के मध्य संघर्ष हुआ था।
देवताओं ने जहाँ अमृतपान कर लिया वहीं अमृतपान से असुर वंचित रह गए थे। विषपान के लिए कोई राजी नहीं था। अकेले भगवान शिव ने विषपान किया।
शिव के चरित्र वर्णन में उनका नीलकंठ, और जटा तथा गले में सर्प का श्रृंगार, उनका ताण्डव नृत्य व इस नृत्य मुद्रा में अनीति व असत्य के प्रति उनका क्षोभ आदि का वर्णन आता है।
व्यक्ति के क्रयशक्ति के प्रसंग में क्रयशक्ति का गठन संग्राम से कम नही है। संग्राम दो पक्षों में होता है, क्रयशक्ति के प्रसंग में भी दो पक्ष होते हैं।
किन्हीं वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि (वस्तु आदि) के उत्पादन-वितरण से संलग्न अनेकानेक व्यक्ति एक पक्ष में होते हैं। उन वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि के उपयोग-उपभोग से संलग्न अनेकानेक अन्य व्यक्ति दूसरे पक्ष में होते हैं।
‘वस्तु आदि’ के उत्पादन-वितरण से संलग्न पक्ष के अनेकानेक व्यक्ति अपनी क्रयशक्ति के गठन के लिए रुपयों के अधिक राशि की आय के लिए प्रयत्न करते हैं. इससे ‘वस्तु आदि’ के उपयोग-उपभोग से संलग्न दूसरे पक्ष के अनेक अन्य व्यक्तियों की क्रयशक्ति कम होती है क्योंकि ‘वस्तु आदि’ का मूल्य रुपयों की अधिक राशि निर्धारित होकर उन्हें रुपयों के किसी राशि के व्यय से ‘वस्तु आदि’ कम प्राप्त होते हैं।
वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के उपयोग-उपभोग से संलग्न पक्ष अपनी क्रयशक्ति के गठन के लिए आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का मूल्य रुपयों की कम राशि निर्धारित करना चाहता है, इससे ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन-वितरण से संलग्न दूसरे पक्ष की क्रयशक्ति कम होती है।
क्योंकि ‘वस्तु आदि’ के बदले उन्हें रुपयों की कम राशि मिलने से उनकी आय कम होती है। जिस पक्ष की क्रयशक्ति बनती है, व्यक्ति यदि उस पक्ष में होता है तो वह पक्ष अथवा उस व्यक्ति के लिए जीवन निर्वाह की अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं, मानो वह रत्नों का भोग करते हैं। क्रयशक्ति के प्रसंग में ‘मुद्रा का मान’ रुपयों की कम राशि निर्धारित होना व्यक्ति के लिए ‘अमृत’ समान है।
व्यक्ति का सामुदायिक जीवन ‘पृथ्वी’ तुल्य है। निम्न आय वर्ग का व्यक्तिसमुदाय उस पृथ्वी पर स्थित ‘समुद्र’ तुल्य है। समुद्र तल पृथ्वी का निम्न तल है। निम्न आय वर्ग के व्यक्तिसमुदाय के प्रतिमास के न्यूनतम आवश्यकताओं के मूल्यस्वरूप रुपयों की जो कुछ राशि निर्धारित होती है उससे ही ‘मुद्रा का मान’ बैंकनोटों की कोई राशि निर्धारित होकर व्यक्ति के क्रयशक्ति का गठन होता है।
मुद्रा का मान जिसकी तुलना ‘अमृत’ से की गई है, उसे पाने के लिए ‘समुद्र मन्थन’ करना होगा और इसका अभिप्राय है कि निम्न आय वर्ग के व्यक्तिसमुदाय के प्रतिमास के न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्धारित रुपयों की न्यूनतम राशि की आय निम्न आय वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति व उसके परिवार के लिए सुनिश्चित करना होगा।
व्यक्ति की सदाचार वृत्तियाँ ‘सुर’ तथा दुराचार वृत्तियाँ ‘असुर’ हैं। सदाचारी और दुराचारी दोनों प्रकार की वृत्तियाँ व्यक्ति में साथ-साथ विद्यमान हैं, जिस प्रकार सुर तथा असुर समुद्र मन्थन में सम्मिलित थे।
सज्जनों के लिए आवश्यक जीने की परिस्थितियाँ दुर्जनों के अनुकूल नहीं होती, अर्थात् दोनों पक्ष-विपक्ष में रहते हैं। सज्जन तथा दुर्जन दोनों प्रकार के व्यक्ति अपनी क्रयशक्ति बनाने के लिए सब परिस्थितियों में प्रयत्न करते हैं।
सदाचारी व दुराचारी दोनों प्रकार के व्यक्ति अपने जीवन में सुख शिक्षा, यातायात आदि विषयों (रत्नों) का भोग करते हैं। दुराचारी व्यक्ति दण्ड़ के भय से सदा छिप-छिप कर जीवन निर्वाह करता है, अर्थात
दुराचारी व्यक्ति के लिए जीने की परिस्थितियाँ (अमृतपान) दुर्लभ हैं। सदाचारी व्यक्ति सहज जीवन निर्वाह करते हैं, अर्थात् सदाचारी व्यक्ति के लिए जीने की परिस्थितियों (अमृतपान) सुलभ हैं।
व्यक्तिसमुदाय की आवश्यकताएँ विशाल ‘पर्वत’ समान हैं। उद्योग आदि संस्थाएँ जो विविध वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का उत्पादन वितरण करती है, समुद्री जीव ‘कछुआ’ समान है।
आवश्यकताओं की पूर्ति उद्योग इकाईयों से होती है, अर्थात् पर्वत कछुआ पर आधारित है।
उत्पादकता की उपलब्धियों से उद्योग इकाईयों का लाभ सुनिश्चित होने से व्यक्ति की आवश्यकता के वस्तु,संसाधन,सेवाएँ आदि की नियमित आपूर्ति संभव होती है, इसलिए उद्योग इकाईयों में उत्पादकता की उपलब्धियाँ कछुआ की ‘पीठ’ है जिस पर व्यक्ति की पर्वताकार आवश्यकताएँ आधारित हैं।
उत्पादकता उपलब्धियों की अवहेलना उद्योगों में नहीं की जा सकती, इसका अभिप्राय है. कछुआ की ‘पीठ’ कठोरतम है।
व्यक्ति अपने वृत्तियों के अधीन ‘श्रम’ करता है एवं श्रम से वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का उत्पादन-वितरण करता है एवं आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
वृत्तियों के अधीन व्यक्ति का ‘श्रम’ पर्वत पर लग रहा बल समान है जिससे ‘समुद्र मन्थन’ क्रिया होती है।
व्यक्ति को उसके सेवाओं (श्रम) के बदले दिए जाने वाले ‘बैंकनोट’ सर्प समान हैं।
आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रत्येक अवसर पर व्यक्ति बैंकनोटों का प्रयोग करता है, जो पर्वत को सर्प से लपेटें देने के तुल्य है।
सामुदायिक जीवन में बैंकनोटों में व्यक्ति की आय तथा आय में प्राप्त बैंकनोटों का व्यय, इससे व्यक्तिसमुदाय के अन्य अनेक व्यक्ति की बैंकनोटों में आय तथा उसका व्यय, व्यक्ति के सामुदायिक जीवन में पुनः पुनः प्रस्तुत होना समुद्र को ‘मथने’ की किया तुल्य है।
बैंकनोटों के आय-व्यय के क्रम में व्यक्ति पर आरोपित विविध राज्य कर विष तुल्य है। राज्य कर पाने वाला शासक वर्ग ‘शिव’ समान है। नीले आकाश के नीचे उसका एक छत्र राज्य चलता है। अपने अधिकार बल से अनीति व असत्य का दमन करता है।
शासक वर्ग (राज्य) लेन-देन के लिए बैंकनोटों को जारी करता है एवं उसके लेन-देन को सुनिश्चित करता है, मानों शिव के गला, जटा आदि सर्वत्र सर्प (बैंकनोट) हैं।
प्रत्येक व्यक्ति प्रतिमास अपने भरण-पोषण की व्यवस्था के लिए अपने क्रयशक्ति का गठन अवश्य करता है अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में मास-दर-मास ‘समुद्र मन्थन’ करता है।
समुद्र मन्थन की कथा का वर्णन कर व्यक्ति के जीवन में उसके क्रयशक्ति के गठन की प्रक्रिया में निहित व्यवस्थाओं का प्रतिनिधि चित्रण करने का प्रयत्न किया गया है।
कथा और क्रयशक्ति की यह तुलना यद्यपि पूर्णतः काल्पनिक है तथापि उनमें साम्य है एवं ‘अमृतपान’ की समस्त परिस्थितियाँ क्रयशक्ति गठन की प्रक्रिया से मेल खाती हैं।
‘अमृत’ प्राप्ति के बाद जैसे समुद्र मन्धन विरमित होता है, वैसा ही निम्न आय वर्ग के व्यक्तिसमुदाय के प्रतिमास के न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्धारित बैंकनोटों की राशि की आय निम्न आय वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति व उसके परिवार के लिए सुनिश्चित होते ही ‘मुद्रा का मान’ बैंकनोटों की न्यूनतम राशि में निर्धारित होकर व्यक्ति के क्रयशक्ति के गठन की प्रक्रिया सम्पन्न (विरमित) होती है।
सबमें समान जीव है, सबकी आवश्यकताएँ भी समान हैं। समाज के अन्तिम व्यक्ति से लेकर शीर्ष सम्पन्न (धनी) सब व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सामुदायिक जीवन जीते हैं।
क्रयशक्ति में वृद्धि जब भी होगी समुदाय स्तर पर सबकी होगी, किन्तु आवश्यकताएँ व्यक्ति की अपनी अपनी हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति की अपनी पृथक क्रयशक्ति भी होगी।
क्रयशक्ति में वृद्धि सबकी किन्तु क्रयशक्ति अपनी-अपनी, इस समीकरण के कारण कुछ एक व्यक्तियों की क्रयशक्ति में वृद्धि होती है तो समुदाय स्तर पर अनेक अन्य व्यक्तियों की क्रयशक्ति में भी वृद्धि होगी।
समाज के अन्तिम व्यक्ति की क्रयशक्ति में वृद्धि (अन्त्योदय की संकल्पना) की जाए तो समुदाय स्तर पर सबकी क्रयशक्ति में वृद्धि होगा।