रुपए अथवा बैंकनोटों के लेन-देन में, रुपए देने के क्रम में दूसरों को रुपए कम देने की इच्छा या कहें उनसे अपील व्यक्ति करता है जब कि दूसरों से रुपए लेने के क्रम में अधिक रुपए देने का निवेदन वही व्यक्ति उनसे करता है। यह मानव प्रकृति है, यह आर्थिक प्रतिद्वंदिता है, इसे गलत नहीं माना जाता।
खेल के मैदान में प्रतिद्वंदी स्वयं विजयी होने के लिए दूसरे को पराजित करने के लिए खेलते हैं, इसे गलत नहीं कह सकते। गुरुत्वाकर्षण के कारण हमारे पांव पृथ्वी पर पड़ते हैं, परन्तु उसी गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध अपने कदम उठाकर हम आगे बढ़ते हैं। यह सब कुछ प्रकृति है, इसे गलत नहीं कह सकते।
दोस्ताना माहौल में खेलना जैसे आवश्यक है वैसा ही आवश्यकता है आर्थिक प्रतिद्वंदिता दोस्ताना हो, इस सन्दर्भ में रुपए अथवा बैंकनोटों के लेन-देन में मध्यस्थ पंच (अंपायर, रेफरी) की आवश्यकता है।
जब बात मध्यस्थ पंच की हो तो आर्थिक व्यवस्थाओं की समझ हमें (अंपायर,रेफरी) होनी चाहिए,
आर्थिक व्यवस्थाओं की चर्चा करते हुए आर्थिक प्रतिद्वंदिता की चर्चा करेंगे।
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6.06 आर्थिक व्यवस्थाएँ
श्रमसिद्ध अधिकार का शास्त्र रुपए का अर्थशास्त्र है।
श्रमसिद्ध अधिकार के अन्तर्गत ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन में व्यक्ति श्रम करता है और श्रम का मूल्य बैंकनोटों (रुपए) में लेता है, जिस कारण ‘वस्तु आदि’ का मूल्य रुपए में निर्धारित होकर,
श्रम के बदले लिए गए बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में व्यक्ति निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान अन्य अनेक व्यक्तियों के साथ करता है।
श्रमसिद्ध अधिकार के अन्तर्गत रुपए अथवा बैंकनोटों के इस लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में अनेक उन व्यक्तियों का ‘श्रम’ एक दूसरे के लिए प्रस्तुत होकर उन अनेक व्यक्तियों के ‘श्रम’ का ताना-बाना बुनता चला जाता है, जिसे व्यापक अर्थ में ‘आर्थिक व्यवस्थाएँ’ कह सकते हैं।
इस संदर्भ को समझने के लिए मकड़ा द्वारा बनाए जाने वाले मकड़जाल का उदाहरण हमारे सामने है।
मकड़ा में जीव है, जीने की व्यवस्था करता है, इसके लिए वह मकड़जाल बनाता है। मकड़ा जिस किसी पदार्थ से मकड़जाल बनाता है वह पदार्थ मकड़ा बाहर से नहीं जुटाता बल्कि निज विसर्जित करता है।
मकड़ा जाल इसलिए बुनता है कि उड़ते हुए मच्छड़, कीट आदि उड़ान के क्रम में मकड़े के जाल के चपेट में आकर उसमें फंस जाँए और मकड़े के जीने के लिए आहार की व्यवस्था होता रहे। कीट आदि मकड़जाल में फंसने के क्रम में तथा मकड़े द्वारा उनका शिकार करने के क्रम में मकड़जाल में आई टूट-फूट को निज विसर्जित उसी प्रदार्थ से मकड़ा तुरत-फुरत मकड़जाल को दुरुस्त भी कर लेता है।
मकड़े द्वारा जीने की व्यवस्था के लिए मकड़जाल बनाना और वह भी निज विसर्जित पदार्थ से बनाना तथा उसमें आई टूट फूट को तुरन्त पुनः दुरुस्त निज विसर्जित उसी पदार्थ से कर लेना, इस प्रसंग की तुलना व्यक्ति द्वारा अपने श्रम से आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आर्थिक व्यवस्थाएँ बनाना और उन व्यवस्थाओं को बिखरने से बचाते हुए आर्थिक समस्याओं का समाधान कर लेना इससे की जा सकती है। आर्थिक व्यवस्थाओं की तुलना मकड़जाल से और व्यक्ति की तुलना मकड़े से की जा सकती है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति श्रम करता है। अपने श्रम के बदले बैंकनोट लेकर और बैंकनोट देने से बदले में ‘वस्तु आदि’ की अदायगी होने के अवसरों पर श्रम के अवसर (रोजगार) व्यक्ति के लिए बनने से व्यक्ति पुनः पुनः श्रम करते हुए पुनः पुनः बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से वह आर्थिक व्यवस्थाओं का ताना-बाना उसी प्रकार बुनता है, जैसे मकड़ा निज विसर्जित पदार्थ से मकड़जाल बुनता है। व्यक्ति के श्रम की तुलना मकड़े द्वारा विसर्जित पदार्थ से की जा सकती है।
समुदाय स्तर पर ‘श्रम’ करते हुए लोगों द्वारा बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान करना आर्थिक व्यवस्थाओं की रचना करना है जो मकड़जाल बनाना है।
निज श्रम के बदले बैंकनोट लेकर (आय) लिए गए बैंकनोट देने (व्यय) से बदले में ‘वस्तु आदि’ की अदायगी (मांग) के लिए ‘वस्तु आदि’ प्रदान (आपूर्ति) करने से बने मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के घटनाक्रम में व्यक्ति के लिए श्रम के अवसर (रोजगार) बनना आर्थिक समस्याओं का समाधान करना है, अर्थात् मकड़जाल को दुरुस्त करना है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति द्वारा किया गया श्रम एवं अन्य अनेक व्यक्तियों से निर्धारित माप में बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान, यह सब कुछ व्यक्ति के श्रम से उसका तथा अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति होना स्पष्ट कोई कार्य है।
कार्य सम्पन्न करना क्रिया है, इसलिए आर्थिक व्यवस्थाओं का ताना-बाना बुनते हुए अथवा उसे दुरुस्त करते हुए व्यक्ति क्रिया कर रहे होते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है. यह प्रकृति का शाश्वत सिद्धान्त है।
प्रतिक्रिया क्रिया के समान माप में और क्रिया के विपरीत दिशा में होगा यह अकाट्य नियम है।
बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से बुने गए आर्थिक व्यवस्थाओं के ताना-बाना में बैंकनोट लेकर बदले में ‘वस्तु आदि’ प्रदान करना क्रिया समान है तथा बैंकनोट देने से बदले में ‘वस्तु आदि’ की अदाएगी होना उस क्रिया की प्रतिक्रिया समान है।
निर्धारित माप में बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान क्रिया के समान माप में प्रतिक्रिया प्रस्तुत होना है।
क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया का ‘आधार’ आर्थिक व्यवस्थाओं के प्रसंग में बैंकनोटों पर मुद्रित “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचनखण्ड़ से निर्धारित ‘वचन निर्वाह’ है।
बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ द्वय से निर्धारित वचनबद्धता का आधार लेकर जब आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का मूल्य बैंकनोटों का कोई माप निर्धारित होगा और प्रत्येक व्यक्ति …..
निर्धारित माप में बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में निर्धारित मूल्य (माप) के ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से संलग्न (जुड़ेगा) होगा तो इस प्रकार बनी आर्थिक व्यवस्थाओं के अन्तर्गत आर्थिक व्यवस्थाओं का ताना-बाना बुनना अथवा उन्हें दुरुस्त करना सहज सम्भव होगा।
6.07 आर्थिक प्रतिद्वन्दिता
आर्थिक व्यवस्थाओं में एक विसंगति है। अवश्यक ‘वस्तु आदि’ प्रदान करने के अवसरों पर हम अन्य व्यक्ति से अधिक माप में रुपए अथवा बैंकनोट लेना चाहते हैं, किन्तु आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के अदायगी के अवसरों पर हम अन्य व्यक्ति को कम माप में रुपए अथवा बैंकनोट देना चाहते हैं।
यह उसी प्रकार की विसंगति है जैसे हम अपनी यात्रा गुरुत्वाकर्षण बल के कारण कर पाते हैं, किन्तु गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध हम हवाई उड़ान भरते हैं।
बैंकनोटों के लेन-देन के इस प्रसंग में जिसे विसंगति कहा गया है, वह वस्तुतः हमारा ‘विरुद्ध व्यवहार’ है। पक्ष विपक्ष दो पक्षों का परस्पर ‘विरुद्ध व्यवहार’ युद्ध कहलाता है। युद्ध जब एक-एक के मध्य होता है, उसे ‘द्वन्द’ कहते हैं और उन दो लोगों को ‘प्रतिद्वन्दी’ कहा जाता है जो ‘द्वन्द’ (युद्ध रत) कर रहे होते हैं।
बैंकनोटों का लेन-देन सदैव किन्हीं दो व्यक्तियों के मध्य होता है। एक बैंकनोट देने वाला व्यक्ति (पक्ष) है तो दूसरा बैंकनोट लेने वाला व्यक्ति (विपक्ष) होगा। आर्थिक व्यवस्थाओं के संदर्भ में ‘वस्तु आदि’ देकर अधिक माप में बैंकनोट लेने की चाहत एवं ‘वस्तु आदि’ लेकर कम माप में बैंकनोट देने की चाहत किन्हीं प्रतिद्वन्दियों (देने वाला, लेने वाला)के मध्य होने वाली आर्थिक प्रतिद्वन्दिता ‘आर्थिक युद्ध’ ही है।
युद्ध जब कभी होता है पांच तत्व अवश्य होते हैं :
1 ) पक्ष विपक्ष विरोधी दो पक्षों में युद्ध होगा।
2) समान ध्येय पाने के लिए दोनों पक्ष युद्धरत होंगे।
3) युद्धक्षेत्र दोनों पक्षों का समान होगा।
4) दोनों पक्षों की सेना, साधन, युद्ध के तौर, तरीके अपने होंगे।
5) दोनों पक्षों की सेना के ‘सेनानायक’ होंगे जो अपनी सेना का नेतृत्व करेंगे और अपने पक्ष के विजय के लिए आमने, सामने एक दूसरे के विरुद्ध तब तक लड़ेंगे जब तक अपने पक्ष को विजयश्री न दिला दें।
दिया गया उदाहरण ‘प्रत्यक्ष रणक्षेत्र’ का है। रणक्षेत्र से हटकर भी उदाहरण हैं जहाँ युद्ध जैसा विरुद्ध व्यवहार देखने को मिलता है। भारत का ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ प्रत्यक्ष रणक्षेत्र में लड़ा गया युद्ध नहीं था, किन्तु उसमें वह पांच तत्व थे जो किसी युद्ध के लिए आवश्यक होते हैं।
स्वतंत्रता आन्दोलन (अप्रत्यक्ष युद्ध) के पांच तत्व :
1) भारत और ब्रिटेन की जनता पक्ष-विपक्ष में युद्धरत थे।
2) भारत पर शासन करना दोनों पक्षों का समान ध्येय था।
3) भारत भूमि (युद्धक्षेत्र) पर दोनों पक्ष लड़ रहे थे।
4) भारत के पक्ष में क्रांतिकारी और सत्याग्रही अपने साधन और अपने तौर, तरीके से लड़ रहे थे। ब्रिटेन के पक्ष में उनकी सेना अपने साधन और तौर तरीकों से लड़ रही थी।
5) महात्मा गाँधी, भगत सिंह जैसे नायकों के नेतृत्व में सत्याग्रही और क्रांतिकारी भारत के पक्ष में लड़ रहे थे। वायसराय, गवर्नर, जमींदार जैसे नायकों के नेतृत्व में अंग्रेज सेना ब्रिटेन के पक्ष में लड़ रही थी।
आर्थिक व्यवस्थाओं के जिस विसंगति अर्थात् विरुद्ध व्यवहार की यहाँ चर्चा की गई है वह युद्ध जैसा व्यवहार है, उसके (आर्थिक युद्ध) के पांच तत्व इस प्रकार हैं –
1) बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट देने वाले व्यक्ति एक पक्ष में और बैंकनोटों को लेने वाले व्यक्ति दूसरे पक्ष में होते हैं।
2) दोनों पक्षों का समान ध्येय अपनी ‘क्रयशक्ति’ निर्धारित करना है। बैंकनोट लेने वाला पक्ष ‘क्रयशक्ति’ निर्धारित करने के लिए अपने उत्पादनों (वस्तु आदि) का अधिक मूल्य निर्धारित करता है. बैंकनोट देने वाला पक्ष अपनी ‘क्रयशक्ति’ निर्धारित करने के लिए निर्धारित कम मूल्य में ‘वस्तु आदि’ का उपभोग करना चाहता है।
3) ‘बाजार’ वह क्षेत्र है जहाँ ‘आर्थिक युद्ध’ लड़ी जा रही है।
4) बैंकनोटों को लेने वाले व्यक्ति के पक्ष में केन्द्र, राज्य व स्थानीय प्रशासन के वित्त विभागों में कार्यरत लोग हैं। बैंकनोटों को देने वाले व्यक्ति आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए अपनी सेवाएँ देने वाले अर्थशास्त्री हैं।
5) नायक का नेतृत्व – केन्द्र व राज्य सरकारों के वित्त मंत्रालयों के अधिकारी बैंकनोटों को लेने वाले व्यक्ति के पक्ष में लड़ रही सेना का नेतृत्व करते हैं। अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले अध्यापक, प्राचार्य एवं अर्थशास्त्र की समझ रखने वाले विद्वान आदि बैंकनोटों को देने वाले लोगों के नायक हैं।
आम जनता से कोई भी व्यक्ति हम और आप बैंकनोट देते हुए आर्थिक लड़ाई के किसी एक पक्ष में होते अवश्य हैं, किन्तु उस पक्ष की लड़ाई को लड़ने वाली सेना का नायक आम जनता नहीं होती। नायक ‘मानव संसाधन अर्थशास्त्री’ होंगे, उनके सम्बन्ध में आगे हमने विस्तार से लिखा है।
आर्थिक युद्ध को लड़ने का तात्पर्य क्रयशक्ति निर्धारित करने से है और यह बाजार में बैंकनोट लेने से स्वाभाविक रूप से निर्धारित होती है। बैंकनोट लेने वाले व्यक्ति के पक्ष में लड़ रहे सैनिक (व्यवसायी, व्यापारी) और नायक (वित्त मंत्रालय के अधिकारी) सहज परिस्थितियों में आर्थिक लड़ाई लड़ते हैं, वहीं बैंकनोट देने वाले व्यक्ति के पक्ष में लड़ रहे सैनिक (मानव संसाधन अर्थशास्त्री) और नायक (मानव संसाधन विकास से जुड़े अधिकारी, अध्यापक, प्राचार्य) आर्थिक युद्ध विपरीत परिस्थितियों में लड़ते हैं।
रणक्षेत्र का ‘प्रत्यक्ष युद्ध’ अथवा स्वतंत्रता आंदोलन जैसा ‘अप्रत्यक्ष युद्ध’ दोनों में ‘विरुद्ध व्यवहार’ (युद्ध) निर्णायक होते हैं। युद्ध का निर्णय आ जाने पर युद्ध (विरुद्ध व्यवहार) स्थगित हो जाता है।
आर्थिक व्यवस्थाओं के संदर्भ में युद्ध जिसे यहाँ विसंगति कहा गया है वह निर्णायक नहीं होता है,
आर्थिक युद्ध जिसे हममें से प्रत्येक अपनी क्रयशक्ति बनाने के लिए लड़ रहा है वह स्थगित नहीं होता है वह निरन्तर जारी रहता है। निर्णायक युद्ध तथा आर्थिक युद्ध दोनों युद्धों में अन्तर है।
निर्णायक युद्ध में पक्ष-विपक्ष एक दूसरे से पृथक दो पक्ष एक दूसरे के विरुद्ध लड़ रहे होते हैं। आर्थिक युद्ध में पक्ष-विपक्ष हम स्वयं होते हैं, लड़ाई के पक्ष में और लड़ाई के विपक्ष में हम स्वयं लड़ रहे होते हैं।
निर्णायक युद्ध में पक्ष-विपक्ष पृथक होने से लड़ाई का ध्येय तथा क्षेत्र किसी एक पक्ष में रहते हैं।
आर्थिक युद्ध में चूँकि हम कभी पक्ष में तथा कभी विपक्ष में लड़ते हैं. इसलिए लड़ाई का ध्येय तथा क्षेत्र किसी एक का अथवा किसी एक पक्ष का होकर नहीं रहते हैं।
आर्थिक युद्ध आर्थिक व्यवस्थाओं का स्वभाविक पक्ष है, क्योंकि आर्थिक व्यवस्थाओं में जिस विसंगति की चर्चा की गई है, वह तो बना रहने वाला है। आवश्यकता आर्थिक युद्ध को दोस्ताना बनाने की है।
आर्थिक युद्ध को मित्रों के बीच होने वाला युद्ध बनाना होगा। इसके लिए ऐसे कानून बनाने होंगे जिससे रुपए अथवा बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में व्यक्तियों की पारस्परिक निर्भरता अधिकाधिक हो, क्योंकि एक दूसरे पर निर्भर होना ही मित्र बनना है।
बैंकनोटों के लेन-देन में निर्धारित सममाप में सेवाओं का आदान-प्रदान करने से बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को…वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड से निर्धारित वचनबद्धता का निर्वाह होकर बैंकनोटों का लेन-देन दोस्ताना माहौल में होकर लेन-देन से संलग्न व्यक्तियों की पारस्परिक निर्भरता सुनिश्चित होती है।
सम्भव है वचन निर्वाह में कुछ अपवाद हों, अर्थात् ऐसा भी होता हो कि लेन-देन में निर्धारित माप से कममाप में सेवाओं का आदान-प्रदान होता हो, तब भी यथायोग्य व्यवस्थाएँ बनाकर …..
आर्थिक विसंगति (आर्थिक युद्ध) को दूर करने से ही समुदाय स्तर पर बैंकनोटों के लेन-देन में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान की सहज परिस्थितियों बनेंगी, जिससे दोस्ताना माहौल में …..
आर्थिक युद्ध लड़ना संभव होने से आर्थिक युद्ध ‘आर्थिक प्रतिद्वन्दिता’ का वह रूप लेगा जो हमारे ‘आर्थिक विकास’ का आधार बनेगा। आर्थिक विकास हमारे भरण-पोषण के व्यवस्थाओं का आधार है।
भरण-पोषण की व्यवस्थाओं के आधार में व्यक्ति का ‘श्रमसिद्ध अधिकार’ है। व्यक्ति के श्रमसिद्ध अधिकार का शास्त्र ‘रुपए का अर्थशास्त्र’ है, जो व्यापक अर्थ में अर्थशास्त्र है।