रुपए का अर्थशास्त्र

रुपए का अर्थशास्त्र रुपए के लेन-देन का शास्त्र है। रुपए के लेन-देन के केन्द्र में चूँकि ‘रुपए’ है, इसलिए ‘रुपए’ की परिभाषा का आधार लेकर रुपए के अर्थशास्त्र को परिभाषित करना होगा।

‘रुपए’ को परिभाषित करने का अधिकार हमें नहीं है, रुपए के लेन-देन का शास्त्र क्या हो,

यह बताने का अधिकार भी हमारा नहीं है, वह अधिकार रिज़र्व बैंक अथवा भारत सरकार की है।

6.03 रुपए का अर्थशास्त्र

‘रुपए’ के सम्बन्ध में जानने, समझने के लिए हमने उनसे वर्षानुवर्ष सुदीर्घ पत्राचार किया एवं उनके केन्द्रीय कार्यालयों में उपस्थित होकर सम्बन्धित अधिकारियों से ‘रुपए’ के सम्बन्ध में जानकारी हमने मांगी, किन्तु वह अधिकारी ‘रुपए’ की परिभाषा से सम्बन्धित कोई जानकारी हमें नहीं दे सके।

रिज़र्व बैंक और केन्द्र सरकार से उत्तर न मिलने पर रुपए परिभाषित है भी कि नहीं, हमें संदेह हुआ, इसलिए ‘रुपए’ की परिभाषा के सम्बन्ध में जिन पुस्तकों व जिन विद्वानों से जानकारी मिल सकती थी उसके लिए भी हमने आवश्यक प्रयत्न किए।

‘रुपए’ के इतिहास का बखान सबने किया, अतीत में रुपए क्या था यह सबने बताया, किन्तु वर्तमान में ‘रुपए’ की परिभाषा क्या है, इस सम्बन्ध में सब मौन रहे, कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली।

थक हार कर अपने स्तर पर हमने रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में विचार करना प्रारम्भ किया। आधार हमने यही लिया कि परिभाषा प्राकृतिक सत्य होना चाहिए, अर्थात् जो स्वाभाविक रूप से लागू होगा और जिस सम्बन्ध में किसी के ‘मत’ का कोई स्थान नहीं होगा।

हमने इसी बात पर अपना ध्यान केन्द्रित किया कि रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में वह कौन से विषय हैं, जो स्वाभाविक रूप से लागू हैं।

पहला विषय है कि रुपए का लेन-देन सदैव कोई व्यक्ति करता है। व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो रुपए का लेन-देन करता हो। प्रकृति को हम रुपए नहीं देते हैं, प्राकृतिक संसाधन प्रकृति से हमें निःशुल्क प्राप्त होते हैं।

हम सेवाएँ (श्रम) प्रदान करते हैं, बदले में रुपए लेते हैं, रुपए देने से बदले में हमें सेवाएँ अदा होती हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के खनन,दोहन व परिवहन आदि के लिए अनेक व्यक्ति अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं। उन लोगों के सेवाओं के लिए उन्हें दिए गए रुपए से प्राकृतिक संसाधनों का मूल्य रुपए में निर्धारित होता है। इसके अतिरिक्त व्यवसायी, व्यापारी व अन्य अनेक व्यक्तियों को उनके सेवाओं के बदले दिए गए कुल रुपयों से किसी ‘वस्तु आदि’ का मूल्य रुपए की इकाई में निर्धारित होता है।

दूसरा विषय है कि भारत सरकार स्टेनलेस स्टील से बने रुपए के सिक्के लेन-देन के लिए जारी करती है। हमारे लिए स्टेनलेस स्टील से बने ‘रुपए’ के सिक्कों का धात्विक मूल्य (Metallic value) नहीं है।

भारतीय रिजर्व बैंक ‘रुपए’ माप अंकित बैंकनोट लेन-देन के लिए जारी करता है। बैंकनोटों का ‘धारक’ कोई व्यक्ति रिजर्व बैंक से उन बैंकनोटों का मूल्य यदि मांगे तो, बैंक व्यक्ति को बैंकनोटों का मूल्य नहीं देता है बल्कि बैंकनोटों के बदले पुनः बैंकनोट ही लौटाता है।

अतः  स्टेनलेस स्टील से बने रुपए के सिक्के व रुपए माप अंकित बैंकनोटों का निज मूल्य नहीं है,

वस्तुतः उन पर अंकित माप का ही केवल महत्व है। इन तथ्यों के आधार पर हमने रुपए को परिभाषित किया है कि – रुपए व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है। मुद्रा व्यक्ति के सेवाओं के आदान-प्रदान के माप की इकाई है। बैंकनोट व्यक्ति के सेवाओं तथा सेवाओं के आदान-प्रदान को मापने के साधन हैं।

हमने जैसे ‘रुपए’ को परिभाषित किया और जिन शब्दों में परिभाषित किया है, वैसा ही रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित अन्य प्रमुख विषय जैसे श्रम, बाजार, उत्पाद व क्रयशक्ति और उनसे सम्बन्धित समस्त विषयों को रुपए के शब्दों में भिन्न अध्यायों में हमने परिभाषित किया है।

‘रुपए के अर्थशास्त्र’ को रुपए के शब्दों में हम यहाँ परिभाषित कर रहें हैं। परिभाषा जो स्वाभाविक रूप से लागू है तथा जिसके सम्बन्ध में किसी व्यक्ति, संस्था आदि के ‘मत’ सहमति अथवा असहमति का महत्व नहीं है, ‘रुपए के अर्थशास्त्र’ की उस परिभाषा की चर्चा हम यहाँ करेंगे।

6.04 रुपए के अर्थशास्त्र की परिभाषा

वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) व्यक्ति की आवश्यकताएँ हैं। आश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति समुदाय में रहता है और गांव, नगर, बस्तियों में रहता है। ग्राम पंचायत, नगरपालिकाएँ, राज्य अथवा केन्द्र सरकार जैसी एजेन्सियों की रचना करता है।

सामुदायिक जीवन जीते हुए व्यक्ति बैंकनोटों (रुपए) का लेन-देन करता है। अनेक अन्य व्यक्तियों के किसी आवश्यकता की पूर्ति व्यक्ति करता है और बदले मे अनेक व्यक्ति अनेक आवश्यकताएँ व्यक्ति की पूरा करते हैं।

अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करने से बदले में स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होना चाहिए और किसी व्यक्ति के किन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति होता हो तो बदले में उस व्यक्ति के कारण अनेक अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति होना भी चाहिए।

व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति सामुदायिक जीवन में रुपए के लेन-देन का विषय (शास्त्र) है।

अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए व्यक्ति को ‘श्रम’ करना होगा और अपने श्रम से अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकता के किसी वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का उत्पादन करना होगा।

व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होता हो तो निश्चय ही व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के ‘वस्तु आदि’ प्राप्त हुए होंगे, जिनके उत्पादन के लिए अन्य किन्हीं व्यक्तियों ने ‘श्रम’ किया होगा।

आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी व्यक्ति द्वारा किए गए ‘श्रम’ का इस प्रकार विचार करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि किसी व्यक्ति ने ‘श्रम’ किया हो और अन्य व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति किया हो तो बदले में अन्य किन्हीं व्यक्तियों के ‘श्रम’ की अदायगी होने से व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होगा।

इस विचार को कोई व्यक्ति अमान्य नहीं कर सके तो रुपए के अर्थशास्त्र के संदर्भ में यह विचार रुपए के अर्थशास्त्र की परिभाषा होगी। इसे परिभाषित करते हुए यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति के ‘श्रमसिद्ध अधिकार’ का शास्त्र रुपए का अर्थशास्त्र है।

व्यक्ति का ‘श्रमसिद्ध अधिकार’ उसके ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ की भांति उसका अधिकार है।

जन्म लेते ही ‘स्वतंत्र हमारा जीवन’ आरम्भ हो जाता है। स्वतंत्र जीने का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। श्रम करने से बदले में आवश्यकता के वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि पाने का अधिकार व्यक्ति को है, यह उसका ‘श्रमसिद्ध अधिकार’ है।

व्यक्ति को उसका ‘श्रमसिद्ध अधिकार’ श्रम करने से उसे प्राप्त होता है।

उदाहरण के लिए कोई मजदूर किसी खेत अथवा उद्योग में श्रम करता है, बदले में निर्धारित किसी माप में बैंकनोट प्राप्त करता है। निर्धारित किसी माप में बैंकनोट किसी अध्यापक को देकर, कोई मजदूर उस अध्यापक के श्रम की मांग करने का अधिकारी बन जाता है।

कोई अध्यापक, मजदूर के बच्चे को पढ़ाने के लिए श्रम करके बदले में निर्धारित किसी माप के बैंकनोट लेगा, वह बैंकनोट वह अध्यापक किसी वस्त्र व्यापारी को देकर उस व्यापारी के श्रम की मांग करने का अधिकारी हो जाता है कि वह (व्यापारी) उसे (अध्यापक) वस्त्र उपलब्ध करावे।

अध्यापक यदि श्रम करना नहीं चाहे तो मजदूर उसे (अध्यापक) श्रम करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है, किन्तु अध्यापक जिसने श्रम किया नहीं है उसे व्यापारी का श्रम पाने का अधिकार नहीं मिलेगा क्योंकि श्रम नहीं करने से अध्यापक को बैंकनोटों की आय नहीं होने से वह अध्यापक, व्यापारी को न बैंकनोट दे सकेगा और न व्यापारी से उसके (व्यापारी) श्रम की मांग कर सकेगा कि वह उसे वस्त्र उपलब्ध करावे।

व्यक्ति की सेवाएँ उसका ‘श्रम’ है जो वह अन्य किन्हीं व्यक्तियों के लिए करता है। व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई ‘रुपए’ है तथा बैंकनोट व्यक्ति के सेवाओं के माप का साधन हैं।

कोई व्यक्ति अपने किन्हीं सेवाओं के बदले अन्य किसी व्यक्ति से जिस माप में बैंकनोट (साधन) लेता है अथवा वह अन्य व्यक्ति उस व्यक्ति को उसके उन सेवाओं के लिए जिस माप में बैंकनोट (रुपए) देता है, वह माप उस व्यक्ति के उन सेवाओं का माप रुपए की इकाई में निर्धारित होता है।

किसी व्यक्ति ने अपने किन्हीं सेवाओं के बदले अन्य व्यक्ति से ’40 रुपए’ माप के बैंकनोट लिया हो तो यह ’40 रुपए’ उस व्यक्ति के उन सेवाओं का माप है। सेवाओं का यह माप ’40 रुपए’ में शब्द ‘रुपए’ माप की इकाई है तथा अंक ’40’ व्यक्ति के सेवाओं के निर्धारित माप को दर्शाता है।

अपनी सेवाओं (श्रम) के लिए निर्धारित किसी माप में बैंकनोट प्राप्त कर वह बैंकनोट देने से निर्धारित मूल्य की कोई वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि किसी व्यक्ति को प्राप्त होने के अवसर पर उस व्यक्ति को वस्तुतः  व्यापक अर्थ में अन्य किन्हीं व्यक्तियों की सेवाएँ (श्रम) प्राप्त होती हैं।

अध्यापक द्वारा वस्त्र व्यापारी को निर्धारित किसी माप में बैंकनोट दिए जाने से निर्धारित मूल्य का वस्त्र वह व्यापारी उस अध्यापक को उपलब्ध कराता है। वस्त्र उपलब्ध कराने में वह व्यापारी वस्त्र का निर्धारित मूल्य किसी माप में बैंकनोट लेकर अध्यापक को स्वयं अपना तथा अन्य उन व्यक्तियों की सेवाएँ (श्रम) उपलब्ध कराता है जो व्यक्ति वस्त्र के उत्पादन-वितरण में अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं।

कोई व्यक्ति निर्धारित किसी माप में अपनी सेवाएँ (श्रम) प्रदान कर किन्हीं वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के उत्पादन से संलग्न होता है एवं बदले में निर्धारित उस माप में बैंकनोट (रुपए) वह उस अन्य व्यक्ति से प्राप्त करता है जिसे व्यक्ति ने अपनी सेवाएँ प्रदान किया है।

सेवाएँ प्रदान करना बदले में बैंकनोट लेना और वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का उत्पादन करना और उत्त्पादन का मूल्य बैंकनोटों के उस माप में निर्धारित होना, यह बैंकनोटों के लेन-देन का एक चरण है।

बैंकनोटों के लेन-देन के अगले चरण में व्यक्ति ने जिन बैंकनोटों को लिया है, उन बैंकनोटों को वह देता है। बैंकनोटों को देने के क्रम में बदले में निर्धारित मूल्य के वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि अदा होने से उस व्यक्ति को अन्य किन्हीं व्यक्तियों की सेवाएँ (श्रम) अदा होती हैं।

सेवाएँ अदा होना बदले में बैंकनोट देना और निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ का उपभोग करना, यह बैंकनोटों के लेन-देन का अन्य चरण है। व्यक्ति तथा अन्य व्यक्ति एक के बाद दूसरे चरण में बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन और उपभोग से वह व्यक्ति स्वयं अपना तथा अन्य अनेक व्यक्तियों के सेवाओं का आदान-प्रदान करते हैं बदले में बैंकनोटों का लेन-देन करते हैं।

बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट देने से बदले में निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ अदा होने से, जहाँ व्यक्ति को उसके श्रम के बदले अन्य किन्हीं व्यक्तियों का श्रम प्राप्त होता है, वहीं ‘वस्तु आदि’ की अदायगी होने से ‘वस्तु आदि’ का उपभोग कर भरण-पोषण की व्यवस्था करने में व्यक्ति समर्थ होता है।

व्यक्ति को उसे श्रम के बदले अन्य किन्हीं व्यक्तियों का श्रम पाने का अधिकार न केवल उसका एक अधिकार है बल्कि व्यक्ति के भरण-पोषण की व्यवस्था का आधार भी है।

बैंकनोटों के लेन-देन में व्यक्ति को उसका ‘श्रमसिद्ध अधिकार’ प्राप्त न हो तथा उसके व उसके परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था व्यक्ति यदि नहीं कर सके तो समुदाय स्तर पर ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में बैंकनोटों के लेन-देन की उपयोगिता सिद्ध नहीं होगी।

बैंकनोटों को लेन-देन के लिए सरकार जारी करता है, इसलिए बैंकनोटों के लेन-देन की उपयोगिता को सुनिश्चित करने की जवाबदेही भी सरकार की ही है। इस जवाबदेही को निर्धारित करते हुए बैंकनोटों पर “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” यह वचनखण्ड सरकार ही  मुद्रित करता है।

बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ से प्राथमिक रूप से बैंकनोटों का माप निर्धारित होता है और माप निर्धारण के अतिरिक्त बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोटों देने वाले व्यक्ति के प्रति बैंकनोट लेने वाले व्यक्ति की वचनबद्धता एवं बैंकनोटों देने वाले व्यक्ति के प्रति बैंकनोट जारी करने वाले राज्य की वचनबद्धता निर्धारित होती है।

रिज़र्व बैंक के गवर्नर का हस्ताक्षर बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड के साथ पढ़कर कोई व्यक्ति वचनखण्ड़ का अर्थ यदि यह मानता है कि रुपए के किसी माप के बैंकनोट यदि हम बैंक को सुपुर्द करें तो बदले में बैंक हमें रुपए के उस माप के बैंकनोट देने के लिए वचनबद्ध है, यह अर्थ बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड का नहीं हो सकता।

‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ बैंकनोट पर मुद्रित इस वचनखण्ड़ के पांच भाग हैं।

(1) 50रुपए ….. निर्धारित कोई माप।  (2) मैं ….. कोई व्यक्ति।  (3) धारक ….. अन्य कोई व्यक्ति। 

(4) बैंकनटों के धारक को ‘वस्तु आदि’ की अदायगी।  (5) ‘वस्तु आदि’ प्रदान करने की मैं (अर्थात् दिए गए बैंकनोट लेने वाला अन्य व्यक्ति) की वचनबद्धता।

बैंकनोट देने के अवसर पर अन्य व्यक्ति जिसे बैंकनोट दिया गया है, लिए गए बैंकनोटों के बदले वह अन्य व्यक्ति हमें निर्धारित मूल्य के वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि अदा करने के लिए वचनबद्ध है।

बैंकनोट लेने के अवसर पर लिए गए बैंकनोटों के बदले निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ प्रदान करने के लिए हममें से प्रत्येक व्यक्ति वचनबद्ध है।

बैंकनोटों के लेन-देन में व्यक्ति वचनबद्ध बना रहें इसे सुनिश्चित करना सरकार तथा रिज़र्व बैंक की वचनबद्धता (जवाबदेही) है।

सरकार एवं रिज़र्व बैंक तथा व्यक्ति की वचनबद्धता के कारण बैंकनोट देने के अवसरों पर हमें बैंकनोटों के बदले वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि की आपूर्ति होने से स्वयं हमारी क्रयशक्ति बनती है।

बैंकनोट लेने के अवसर पर बदले में ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति करने से हम अन्य व्यक्ति की क्रयशक्ति बनाते हैं। श्रम करने से नहीं बल्कि क्रयशक्ति बनने से आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ होते हैं।

बैंकनोटों पर लिखा वचनखण्ड़ से निर्धारित वचनबद्धता के कारण हममें से प्रत्येक व्यक्ति की क्रयशक्ति बनने से बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ ‘मैं धारक को … वचन देता हूँ’ का व्यापक महत्व हो जाता है।

बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोटों पर लिखा ‘मैं ….. वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ से निर्धारित ‘वचन निर्वाह’ से, निर्धारित मूल्य (माप) के ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में निर्धारित उसी माप में सेवाओं के आदान-प्रदान से व्यक्ति को अपने सेवाओं (श्रम) के बदले अन्य किन्हीं व्यक्तियों की सेवाएँ (श्रम) पाने का अधिकार मिल जाता है, जिसे अन्य शब्दों में व्यक्ति का श्रमसिद्ध अधिकार हमने कहा है।

इसके विपरीत बैंकनोटों के लेन-देन में ‘वचन निर्वाह’ नहीं होने से निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ के अदान-प्रदान में निर्धारित माप से कममाप में सेवाओं का आदान-प्रदान होने से, व्यक्ति को अपने सेवाओं (श्रम) के बदले अन्य किन्हीं व्यक्तियों की सेवाएँ (श्रम) कममाप में मिलने से व्यक्ति का श्रमसिद्ध अधिकार उसे नहीं मिलता है।

बैंकनोट देने वाला व्यक्ति (धारक) तथा दिए गए बैंकनोटों को लेने वाले अन्य व्यक्ति (मैं) के ‘वचन निर्वाह’ से समुदाय स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति के ‘श्रमसिद्ध अधिकार’ का निर्धारण होता है।

स्वतंत्रता के अधिकार के प्रति व्यक्ति यदि लापरवाह होता है अथवा अन्य किन्हीं कारणों से व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार को ग्रहण लगता है तो भी व्यक्ति के स्वतंत्रता का उसका जन्मसिद्ध अधिकार यथावत् बना रहता है।

स्वतंत्रता के अधिकार के प्रति व्यक्ति की जागरुकता के कारण अथवा स्वतंत्रता के अधिकार पर लगा ग्रहण दूर होते ही व्यक्ति को स्वतंत्रता का उसका जन्मसिद्ध अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाता है, अन्य कोई उसे उसका स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान नहीं करता है।

उसी प्रकार श्रम करता हुआ व्यक्ति को भी अन्य कोई उसका श्रमसिद्ध अधिकार प्रदान नहीं करता है, बल्कि व्यक्ति को श्रमसिद्ध अधिकार ‘श्रम’ करने मात्र से उसे स्वतः प्राप्त होता है।

श्रमसिद्ध अधिकार की उपादेयता व्यक्ति और उसके परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था में है। भरण-पोषण की व्यवस्था होने से व्यक्ति जीवित रहता है। जीवित व्यक्ति ही व्यक्ति के अर्थ में जाना जाता है, क्योंकि मृत किसी व्यक्ति को ‘लाश’ अथवा ‘शव’ का सम्बोधन प्राप्त है, अतएव ‘व्यक्ति को व्यक्ति का अर्थ’ प्रदान करने के मूल में व्यक्ति को प्राप्त उसका श्रमसिद्ध अधिकार है।

व्यक्ति को उसका श्रमसिद्ध अधिकार मिलने से उसे चूँकि ‘व्यक्ति का अर्थ’ प्रदान होता है जो व्यक्ति के लिए उसके ‘श्रम’ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए श्रमसिद्ध अधिकार का शास्त्र ‘श्रमशास्त्र’ नहीं बल्कि ‘अर्थशास्त्र’ कहलाएगा।

व्यक्ति का श्रमसिद्ध अधिकार रुपए (बैंकनोट) के लेन-देन से सम्बन्धित विषय है, इसलिए व्यक्ति के श्रमसिद्ध अधिकार का शास्त्र रुपए का अर्थशास्त्र कहलाएगा। व्यापक अर्थ में इसे हम ‘अर्थशास्त्र’ कह सकते हैं, क्योंकि व्यक्ति को उसका श्रमसिद्ध अधिकार मिलने से उसे ‘व्यक्ति का अर्थ’ प्रदान होता है। 

बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ द्वय से केन्द्र सरकार तथा रिजर्व बैंक एवं बैंकनोट लेने वाले व्यक्ति के लिए निर्धारित वचनबद्धता के निर्वाह से हमें श्रमसिद्ध अधिकार मिलता है, किन्तु यह जटिल प्रक्रिया है।

इस सम्बन्ध में सरल उपाय यही है कि रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में जानकरी के आधार पर हम रुपए (बैंकनोटों) का लेन-देन करें, ऐसा करने से अन्ततोगत्वा बैंकनोटों पर मुद्रित (लिखा)  ‘मैं ….. वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ का निर्वाह होकर श्रमसिद्ध अधिकार हमें मिलेगा।

रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में जो भी जानकारी हम सबों की होगी और उस जानकारी के आधार पर रुपए का लेन-देन हम जिस प्रकार भी करते हैं, उसे हमने ‘रुपए का अर्थशास्त्र’ कहा है।

रुपए का अर्थशास्त्र व्यापक अर्थ में अर्थशास्त्र है व्यक्ति को व्यक्ति का अर्थ प्रदान करने वाला शास्त्र है।

6.05 रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय

रिज़र्व बैंक द्वारा जारी बैंकनोटों को ‘रुपए’ कहते हैं उन बैंकनोटों को ‘मुद्रा’ भी कहते हैं। बैंकनोट और मुद्रा रुपए से सम्बन्धित विषय हैं। व्यक्ति को उसके सेवाओं के बदले ‘रुपए’ दिए जाते हैं और व्यक्ति की सेवाएँ उसका श्रम ही है, इसलिए व्यक्ति का ‘श्रम’ रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय है।

सेवाएँ, व्यवसाय, उद्योग, परिश्रम, साधना आदि व्यक्ति के श्रम के विविध रूप हैं। साधक, व्यवसायी, व्यापारी, उद्योगपति व श्रमिक आदि भिन्न नामों से भिन्न इन रूपों में व्यक्ति ‘श्रम’ करता है। व्यक्ति के श्रम से सम्बन्धित समस्त विषय रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय हैं।

रुपए का लेन-देन हम बाजार में करते हैं इसलिए बाजार से सम्बन्धित समस्त विषय जैसे उपभोक्ता, ग्राहक, मांग, आपूर्ति, आय, व्यय आदि रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय हैं।

बाजार में रुपए के लेन-देन में बदले में भिन्न उत्पादों का हम आदान-प्रदान करते हैं, इसलिए उत्पाद और उससे सम्बन्धित विषय जैसे उत्पादन, उत्पादक, उत्पादकता आदि भी रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय हैं।

व्यक्ति की क्रयशक्ति रुपए में आंकी जाती है, क्रयशक्ति भी रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय है।

रुपए का लेन-देन अर्थशास्त्र का विषय है, अर्थशास्त्र और आर्थिक समस्याएँ तथा उन समस्याओं का समाधान करता हुआ अर्थशास्त्री की भूमिका आदि रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय हैं।

रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित प्रमुख जिन कुछ विषयों की चर्चा हमने उपर की है, उनके सम्बन्ध में जितना आप जानते हैं अथवा जितना हम जानते हैं तथा अन्य कोई व्यक्ति या संस्था जो कुछ भी जानते हैं, वह भिन्न हो सकते हैं किन्तु हम सबों की जानकारियों में विरोधाभास नहीं हो सकता, क्योंकि एक जैसे रुपए का लेन-देन हम सभी एक जैसा ही सदैव करते हैं।

यह सम्भव है कि रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय में हम सबों की जानकारी कम अथवा अधिक हो। रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय में जितना और जो कुछ भी जानकारी हम सबों की होगी उसे हमने ‘रुपए का अर्थशास्त्र’ कहा है, जो व्यापक अर्थ में अर्थशास्त्र है। व्यक्ति को व्यक्ति का अर्थ प्रदान करने वाला शास्त्र अर्थात् अर्थशास्त्र है।

यह मानकर कि रुपए का लेन-देन हम कर रहें हैं तो रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय हम जानते होंगे। अर्थशास्त्र के विद्वान भी रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय जानते होंगे। न केवल हम बल्कि रिज़र्व बैंक और केन्द्र सरकार भी रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय जानते होंगे।

रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में जानकारी के लिए हमने मित्रों से पूछा और विद्वानों से पूछा तथा सम्बन्धित पुस्तकें पढ़ा। जानकर आश्चर्य होगा कि विद्वानों ने तथा रिज़र्व बैंक और केन्द्र सरकार ने रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में उत्तर नहीं दिया है और पुस्तकों में भी यह विषय अनुत्तरित है।

रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय अनुत्तरित हैं और रिज़र्व बैंक अथवा केन्द्र सरकार रुपए से सम्बन्धित विषय में मौन हैं, यह कहना पर्याप्त नहीं है। रुपए हमारे जीवनयापन का आधार है, रुपए के इर्द गिर्द ही हम जीते हैं, मानों रुपए हमारे जीवन की धुरी है, अतएव रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित प्रमुख विषयों को परिभाषित करने का हमने प्रयास किया है।

रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में अपने स्तर पर हमने जितना कुछ विचार किया उसे हमने विभिन्न अध्यायों में स्पष्ट किया है। दी गई उस जानकारी में जो कुछ सत्य है, उसे स्वीकार करें और यदि कुछ गलत है तो उस सम्बन्ध में सत्य का अन्वेषण करें, यह हमारी आपसे प्रार्थना है।

रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में जो भी जानकारी हम सबों की होगी और उस जानकारी के आधार पर रुपए का लेन-देन हम जिस प्रकार भी करते हैं, उसे हमने ‘रुपए का अर्थशास्त्र’ कहा है, जो व्यापक अर्थ में अर्थशास्त्र है। व्यक्ति को व्यक्ति का अर्थ प्रदान करने वाला शास्त्र अर्थात् अर्थशास्त्र है।

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