शास्त्र अर्थशास्त्र

विद्यालय और विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले अर्थशास्त्र के पुस्तकों के पहले पेज पर यह लिखा हुआ आप पढ़ सकते हैं कि अर्थशास्त्र को परिभाषित नहीं किया जा सकता और साथ में विद्यार्थियों को यह बताया जाता है कि अर्थशास्त्र विज्ञान है। दोनों कथन विरोधाभासी हैं, क्योंकि जो विषय परिभाषित नहीं है, उस विषय को विज्ञान कैसे कहा जाए? अर्थशास्त्र को परिभाषित किया जाए, इसकी चर्चा करेंगे।

6.01 शास्त्र अर्थशास्त्र

अर्थशास्त्र में पढ़ाया जाता है कि विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने अलग-अलग तरीके से अर्थशास्त्र को परिभाषित करने की चेष्टा की और मतैक्य न होने के कारण अर्थशास्त्री किसी मान्य निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। विचारों की भिन्नता को लेकर बारबरा बूटन (Barbara Wootton) ने इतना तक कहा कि जब छह अर्थशास्त्री इकट्टे होते हैं वहाँ अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में सात मत हो जाते हैं।

कॉमटे तथा रिचार्ड जॉन्स जैसे प्राचीन अर्थशास्त्री तथा जैकब वाइनर, मॉरिश डाब, वॉन माइसेज, गुन्नर मिडल जैसे आधुनिक अर्थशास्त्री परिभाषा को आवश्यक ही नहीं मानते जब कि अर्थशास्त्र परिभाषित होना चाहिए क्योंकि अर्थशास्त्र विज्ञान है और विज्ञान में हर विषय परिभाषित होता है।

हमारे विचार से अर्थशास्त्र में रुपए अथवा बैंकनोटों के लेन-देन से सम्बन्धित विषय परिभाषित होना चाहिए क्योंकि हम अपने जीवन में रुपए (बैंकनोट) का लेन-देन अनिवार्य रूप से करते हैं।

अर्थशास्त्र को परिभाषित करने का विचार हमारे मन में अवश्य आया किन्तु आर्थिक विषय, आर्थिक व्यवस्थाएँ तथा आर्थिक गतिविधियाँ आज इतनी व्यापक हो गई हैं कि बहुआयामी अर्थशास्त्र का विचार चरणबद्ध तरीके से ही हो सकता है।

पहले चरण में रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों को जानना और जानकारी के आधार पर रुपए का लेन-देन कैसे किया जाए इस सम्बन्ध में विस्तार से हमने अपने स्तर पर विचार करना प्रारम्भ किया है।

रुपए का लेन-देन अर्थशास्त्र का विषय है, इसलिए रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषय (शास्त्र) को ‘रुपए का अर्थशास्त्र’ कह सकते हैं। रुपए के अर्थशास्त्र की चर्चा करने से पूर्व अर्थशास्त्र के प्रचलित परिभाषाओं की चर्चा कर लेना आवश्यक है।

अर्थशास्त्रियों ने देशकाल परिस्थिति अनुसार अर्थशास्त्र को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया।

विद्वान अरस्तु के अनुसार –

धन की प्राप्ति तथा इसके उचित उपयोग की व्यवस्था अर्थशास्त्र की विषय समाग्री है।

वॉन जुस्टो (Von Justy) के अनुसार –

राज्य एवं गृह दोनों ही प्रबन्धों का अन्तिम उद्देश्य साधनों को प्राप्त करना तथा उनका उचित उपयोग करना है। यह अर्थशास्त्र का विषय है।

सर जेम्स स्टीवर्ट (Sir James Stewart) के अनुसार –

समान्यतया अर्थशास्त्र मितव्ययिता तथा दूरदर्शिता के साथ परिवार के आवश्यकताओं की पूर्ति करने की कला है।

जैकब वाइनर ने अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में कहा है कि – अर्थशास्त्र वह है जो अर्थशास्त्री करते हैं।

आदम स्मिथ के अनुसार –

अर्थशास्त्र राष्ट्रों की सम्पत्ति की प्रकृति तथा उसके कारणों की खोज से सम्बन्धित विज्ञान है।

जे. वी. से (Say) के अनुसार –

अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो धन या सम्पत्ति की विवेचना करता है।

विद्वान वाकर (Walker) के अनुसार

अर्थशास्त्र ज्ञान की वह शाखा है जो धन से सम्बन्धित है।

विलियम सीनियर (Nassau William Senior) के अनुसार –

राजनीतिक अर्थशास्त्र द्वारा वर्णित विषय सामग्री सुख नहीं वरन् धन है, उसकी मान्यताएँ कुछ सामान्य प्रस्थापनों पर आधारित होती हैं, जो उनके अवलोकन अथवा ज्ञान का परिणाम है और जिनके लिए किसी प्रमाण अथवा औपचारिक कथन की आवश्यकता नहीं पड़ती और उसके निष्कर्ष इतने सामान्य तथा यदि तर्क ठीक है तो इतने निश्चित होते हैं जितनी निश्चित की उसकी मान्यताएँ।

प्रो. मार्शल (Marshall) के अनुसार –

अर्थशास्त्र मानव के साधारण व्यावसायिक जीवन सम्बन्धी क्रियाओं का अध्ययन है। यह व्यक्तिगत तथा सामाजिक कार्यों के उस भाग का परीक्षण करता है जिसका कल्याण के भौतिक साधनों की प्राप्ति एवं उपयोग से घनिष्ठतम सम्बन्ध है।

विद्वान कैनन (Cannan) के अनुसार –

राजनीतिक अर्थशास्त्र का उद्देश्य उन सामान्य कारणों की विवेचना करना है जिन पर मानव का भौतिक कल्याण निर्भर करता है।

प्रो. पीगु (Pigou) के अनुसार –

हमारी जाँच का क्षेत्र सामाजिक कल्याण के उस भाग तक सीमित रहता है जिसका प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से मुद्रा रूपी मापदण्ड से सम्बन्ध स्थापित किया जा सके।

प्रो. रॉबिन्स (Robbins) के अनुसार –

अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो मानव आचरण का अध्ययन सीमित साधनों (जिनके वैकल्पिक प्रयोग हो सकते हैं) तथा लक्ष्यों के सम्बन्ध के रूप में करता है।

अतीत में विद्वानों ने क्या कुछ कहा उनके मत को गलत कहने का अधिकार हमें नहीं है।

वस्तुतः भिन्न देशों में भिन्न कालों में अवश्य भिन्न परिस्थितियाँ रहीं होंगी और काल विशेष में राज्य अथवा समाज की अपेक्षाएँ अथवा आवश्यकताएँ भी भिन्न रहे होंगे। उस कारण से अथवा अन्य किन्हीं कारणों से व जिन कारणों की हमें जानकारी भी नहीं है, वैसे किन्हीं कारणों से समय-समय पर विद्वानों ने जो कुछ अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में कहा वह उस देशकाल परिस्थिति के लिए आवश्यक रहा होगा, हमें ऐसा ही कहना चाहिए और ऐसा ही मान लेना चाहिए।

किन्तु अर्थशास्त्र के सम्बन्ध विद्वानों के प्रत्येक मत को अर्थशास्त्र की परिभाषा कहना उचित नहीं होगा। परिभाषा क्या है, इसका विचार कर लेना यहाँ आवश्यक है।

6.02 परिभाषा है क्या?

किसी विषय में प्रथम कोई व्यक्ति सोचता है, जो उसका ‘विचार’ कहलाता है। व्यक्ति ने जितना कुछ विचार किया है उस विचार पर स्वयं उसका विश्वास हो जाने पर व्यक्ति का विश्वस्त वह विचार उसका ‘दृष्टिकोण’ कहलाता है।

व्यक्ति का दृष्टिकोण स्वयं उस तक सीमित होता है। अनेक अन्य लोग उस विषय में उस व्यक्ति के दृष्टिकोण पर विश्वास करने लग जाएँ विषय के सम्बन्ध में व्यक्ति का दृष्टिकोण उसका ‘मत’ कहलाता है।

किसी विषय में किन्हीं व्यक्तियों का दृष्टिकोण किसी व्यक्ति का मत होता है। इस प्रकार कोई ‘विचार’ ही व्यापक अर्थ में कोई दृष्टिकोण’ और वह ‘दृष्टिकोण’ ही व्यापक अर्थ में ‘मत’ कहलाया।

किसी विषय में किसी व्यक्ति के ‘दृष्टिकोण’ को यदि अन्य कोई व्यक्ति अमान्य करता हो तो अन्य व्यक्ति उस विषय में अपना ‘दृष्टिकोण’ रख सकता है। अन्य व्यक्ति के दृष्टिकोण पर व्यापक सहमति बनने से उस विषय में भिन्न एक ‘मत’ प्रस्तुत होता है।

किसी विषय में लोगों के एक से अधिक ‘मत’ हो सकते हैं, अर्थात् अनेक लोग उस विषय में किसी व्यक्ति के दृष्टिकोण पर विश्वास करते होंगे और अनेक अन्य लोग उस विषय में किसी दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण पर विश्वास करते होंगे तथा अनेक अन्य लोग उस विषय में किसी तीसरे अथवा चौथे व्यक्ति के किसी दृष्टिकोण पर विश्वास करते होंगे।

विचार, दृष्टिकोण अथवा मत लोगों (किन्हीं व्यक्तियों) द्वारा प्रतिपादित किए जाते हैं।

प्रकृति में जो कुछ है वह किसी व्यक्ति को ज्ञात हुआ और उसने इस सम्बन्ध में अपने विचारों से हमें अवगत कराया हो तो यह व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं हुआ, क्योंकि यह तो प्रकृति में विद्यमान है, प्रकृति के सच को व्यक्ति ने मात्र कहा है। व्यक्ति के उन विचारों को व्यक्ति का ‘दृष्टिकोण’ या कोई ‘मत’ न कहकर उसे व्यक्ति के ‘उत्पन्न विचार’ कहेंगे और उत्पन्न वह विचार ‘व्युत्पत्ति’ कहलाता है।

गति के नियम, उत्प्लावन का नियम आदि भौतिक शास्त्र में व्युत्पत्तियां हैं। यह नियम शास्त्रज्ञ किसी व्यक्ति ने नहीं बनाए हैं, बल्कि उसने प्रकृति में खोजे हैं। नियम प्रकृति में हैं, नियम का विचार मात्र ही उस व्यक्ति ने किया है जिसे ‘व्युत्पत्ति’ कहा गया है।

उदाहरण के लिए अर्कमिडीज नाम के व्यक्ति ने जल में डुबकी लगाकार स्नान करते हुए यह अनुभव किया कि जल में जितना अधिक वह डूबता है उतना अधिक वह स्वयं को हल्का महसूस करता है। अपने इस अनुभव का उसने विचार किया और उत्पन्न वह विचार ही ‘उत्‌लावन का नियम’ (व्युत्पत्ति) है। नाव, जलयान आदि की बनावट इस नियम पर आधारित हैं। मत और परिभाषा में मौलिक अन्तर है।

मत (Opinion) किसी ‘व्यक्ति’ का होता है, मत के सम्बन्ध में ‘व्यक्ति विशेष’ को महत्व प्राप्त है। परिभाषा (Definition) विषय की होती है, व्यक्ति विशेष विषय को केवल परिभाषित करता है।

प्रतिपादित ‘मत’ के सम्बन्ध में ‘व्यक्ति’ कह सकता है कि इस सत्य को उसने जाना है। विषय परिभाषित कर प्रकृति के उन नियमों की बात व्यक्ति करता है जो उसने खोजे हैं।

किसी ‘मत’ को प्रतिपादित कर ‘व्यक्ति’ लोगों को उसका मत मानने के लिए कह सकता है। परिभाषित विषय प्रकृति है, इसलिए उसे मानने अथवा न मानने का प्रश्न उपस्थित नहीं होता।

किसी ‘व्यक्ति’ के मत को अन्य व्यक्ति अमान्य कर सकता है अथवा उसका भिन्न मत होगा।

विषय की परिभाषा को कोई व्यक्ति अमान्य नहीं कर सकता, इसलिए परिभाषा सर्वमान्य होती है।

व्यक्ति के उत्पन्न विचार जिसे हमने ‘व्युत्पत्ति’ कहा है, प्रत्येक व्युत्पत्ति प्रकृति में विद्यमान है। व्यक्ति के उत्पन्न विचारों का प्रमाण प्रकृति में प्रत्यक्ष होने से उसका हम अनुभव करते हैं, उसे अमान्य नहीं किया जा सकता। किसी विषय में कोई व्युत्पत्ति सर्वमान्य होकर वह सर्वमान्य विचार उस विषय की परिभाषा कहलाती है।

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