उत्पाद क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में हर कोई बात देगा कि बाजार में बिक रहे आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएं आदि (वस्तु आदि) प्रत्येक को उत्पाद कहते हैं। किसी वस्तु को उत्पाद कहते हैं, यह तो ठीक है, किन्तु ‘वस्तु आदि’ को उत्पाद क्यों कहते हैं, इसका उत्तर दिया जाना चाहिए, इसकी चर्चा करेंगे।
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4.01 उत्पन्न करना
उत्पत्त करना एवं निर्माण करना भिन्न विषय हैं। कुम्हार मिट्टी के घड़े का निर्माण करता है जब कि किसान गेहूँ का निर्माण नहीं करता बल्कि वह गेहूँ उत्पन्न करता है, जैसे माता बच्चे को जन्म (उत्पन्न) देती है।
मिट्टी के घड़े का निर्माण कर रहे व्यक्ति को कुम्हार कहते हैं। कुम्हार मिट्टी लेकर उसे गूंथ कर चाक पर चलाकर आग में पकाकर घड़े के निर्माण तक वह श्रम करता है और घड़े के निर्माण की प्रक्रिया सम्पन्न होती है। प्रक्रियाएँ किस प्रकार और कैसे अथवा कितने समय के लिए या किस क्रम से सम्पन्न करायी जाए आदि कुम्हार पर निर्भर होकर घड़े का निर्माण होता है।
घड़े के निर्माण की प्रक्रिया का अनुपालन कुम्हार करता है और घड़े के निर्माण की प्रक्रिया सम्पन्न (समापन) होती है। कुम्हार घड़ा का निर्माता है और निर्माता होने से कुम्हार निर्मित उस घड़ा का स्वामी होता है। निर्माता ही निर्मित किसी वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का स्वामी होता है।
गेहूँ के निर्माण में किसान का वश नहीं चलता, इसलिए किसान गेहूँ का निर्माता नहीं है, किन्तु गेहूँ का निर्माता कोई न कोई होगा। चूँकि गेहूँ प्रकृति की देन है इसलिए प्रकृति को गेहूँ का निर्माता मान सकते हैं। प्रकृति गेहूँ का निर्माता है या नहीं अथया प्रकृति ने गेहूँ का निर्माण किस प्रकार किया है, इत्यादि के विवाद में नहीं पड़ कर चूँकि किसान गेहूँ का निर्माता नहीं है एवं अन्य कोई गेहूँ का निर्माता है. इसलिए प्रकृति को गेहूँ का निर्माता मानकर गेहूँ के निर्माण के प्रसंग में किसान और प्रकृति की भूमिका का विचार करेंगे।
प्रकृति जिसे गेहूँ का निर्माता कहा गया है वह (प्रकृति) बीजों को अंकुराता है, उसे पौधा बनाता है। प्रकृति ही उन पौधों को फूल-पत्तियों से लादकर, गेहूँ की फसल को तैयार करता है। समस्त प्रक्रिया प्रकृति के अधीन है। खेत जोतकर, बीज बोकर, पानी सींचकर, खर पतवार निकाल कर, कीड़े व पशु आदि से फसल को सुरक्षित कर, किसान प्रकृति (निर्माता) के साथ-साथ श्रम कर रहा होता है। गेहूँ के निर्माण में निर्माता (प्रकृति) के साथ श्रम किसान करे या न करे उतना भर के लिए ही किसान के इच्छा-अनिच्छा का स्थान है।
प्रकृति जो गेहूँ का निर्माता है उसने (अदृश्य) गेहूँ का निर्माण करने में अवश्य श्रम (अदृश्य) किया होगा, क्योंकि बिना श्रम का कोई निर्माण सम्भव नहीं है। गेहूँ का निर्माण प्रकृति ने किसान की मांग पर किसान के लिए प्रकृति ने किया है न कि प्रकृति ने अपने लिए किया है। किसान की मांग पर प्रकृति ने गेहूँ के निर्माण में श्रम किया है। किसान को उसके मांग (गेहूँ) की आपूर्ति होने से प्रकृति का श्रम उसकी (प्रकृति) सेवाएँ बनकर किसान को अदा होती हैं। सेवाएँ श्रम ही है सेवाएँ उस श्रम को कहते हैं जो श्रम किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई करता है।
गेहूँ के निर्माण में प्रकृति के साथ श्रम करने के क्रम में खेत जोतने से लेकर बीज बोने और फसल को सुरक्षित करने तक किसान का ‘श्रम’ उसकी सेवाएँ बनकर प्रकृति को प्रदान होती है।
किसान ने गेहूँ की मांग प्रकृति के सम्मुख रखा और मांग के समर्थन में किसान ने अपनी सेवाएँ प्रकृति को प्रदान की है। गेहूँ के निर्माण में प्रकृति ने ‘श्रम’ किया है। किसान को उसके मांग (गेहूँ) की आपूर्ति होने से प्रकृति की सेवाएँ (श्रम) किसान को अदा हुई हैं। प्रकृति और किसान के सेवाओं के आदान-प्रदान से गेहूँ का स्वामित्व उसके निर्माता प्रकृति से हस्तांतरित होकर किसान को उस गेहूँ का स्वामित्व हासिल हो जाता है, जिस गेहूँ का किसान ने निर्माण किया नहीं है।
प्रकृति को अपनी सेवाएँ प्रदान कर उन सेवाओं के बदले प्रकृति से गेहूँ का स्वामित्व हासिल करने वाला किसान गेहूँ को उत्पन्न किया है कहा जाएंगा। किसान खेतों में गेहूँ उत्पन्न करता है।
जन्म देना उत्पन्न करना ही है। किसी स्त्री के गर्भ (पेट) में पल रहे किसी बच्चे के विषय में भी वही बात लागू होती है जो खेतों में लगे गेहूँ के साथ लागू हुआ। बच्चे के निर्माण में प्रकृति के साथ-साथ श्रम करने के क्रम में स्त्री का ‘श्रम’ उसकी (माता) सेवाएँ बनकर प्रकृति को प्रदान होती हैं। माता ने बच्चे की मांग प्रकृति के सम्मुख रखा और अपनी मांग के समर्थन में स्त्री ने अपनी सेवाएँ प्रकृति को प्रदान की हैं। बच्चे के निर्माण में प्रकृति ने ‘श्रम’ किया है। माता (स्त्री) को उसके मांग (बच्चे) की आपूर्ति होने से प्रकृति की सेवाएँ (श्रम) माता को अदा हुई हैं।
वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का निर्माता तथा उसे उत्पन्न करने वाला भिन्न होंगे। ‘वस्तु आदि’ को उत्पन्न करने के अन्तर्गत ‘वस्तु आदि’ को उत्पन्न करने वाला व्यक्ति वह अपना तथा ‘वस्तु आदि’ के निर्माता (स्वामी) अन्य व्यक्ति के सेवाओं का आदान-प्रदान करेगा। सेवाओं के आदान-प्रदान से वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का स्वामित्व उनके निर्माता से अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित होकर ‘वस्तु आदि’ उत्पन्न करने की प्रक्रिया पूरी होगी।
‘वस्तु आदि’ का निर्माता कोई व्यक्ति स्वाभाविक रूप से ‘वस्तु आदि’ का स्वामी होता है और स्वामी की हैसियत से ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग करने के लिए वह स्वतः समर्थ होता है।
किसी ‘वस्तु आदि’ के निर्माण में एक से अधिक व्यक्ति संलग्न हों तो प्रत्येक व्यक्ति उस ‘वस्तु आदि’ के निर्माता की भूमिका में तो होगा, किन्तु ‘वस्तु आदि’ का स्वामी वह सब व्यक्ति नहीं होंगे बल्कि वह एक व्यक्ति उस ‘वस्तु आदि’ का स्वामी होगा जो व्यक्ति उस ‘वस्तु आदि’ के निर्माण में एक से अधिक उन व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रतिनिधि बना वह व्यक्ति कौन है इसका महत्व नहीं है, बल्कि प्रतिनिधि जो कोई व्यक्ति होगा वही ‘वस्तु आदि’ का स्वामी होगा एवं वह व्यक्ति ही स्वामी की हैसियत से अपने स्तर पर ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र होगा।
किसी ‘वस्तु आदि’ का निर्माण एक बार होगा और किसी व्यक्ति द्वारा होगा। किसी ‘वस्तु आदि’ को पुनः कितनी ही बार कितने ही व्यक्ति हर बार उत्पन्न कर सकते हैं।
कोई ‘वस्तु आदि‘ जितनी बार उत्पन्न की जाती है उतनी बार उसका स्वामित्व उसे उत्पन्न करने वाले व्यक्ति को हस्तांतरित हो जाता है। उत्पन्न होने से निर्मित ‘वस्तु आदि’ वही बना रहता है। जितनी बार किसी ‘वस्तु आदि’ को उत्पन्न किया जाएगा ‘वस्तु आदि’ वही बना रहेगा।
निर्मित एवं उत्पन्न ‘वस्तु आदि’ में अन्तर ‘वस्तु आदि’ का नहीं बल्कि ‘वस्तु आदि’ के स्वामित्व में अन्तर होता है। ‘वस्तु आदि’ का निर्माता कोई व्यक्ति स्वाभाविक रूप से ‘वस्तु आदि’ का स्वामी होता है।
‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व व्यक्ति को प्राप्त हो यह किसी व्यक्ति के लिए उतना ही आवश्यक है जितनी आवश्यकता उस व्यक्ति को उस ‘वस्तु आदि’ की है, क्योंकि ‘वस्तु आदि’ का प्रयोग कोई व्यक्ति तभी कर सकता है जब वह ‘वस्तु आदि’ का स्वामी होता है।
किसी ‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व हासिल करने के सम्बन्ध में व्यक्ति के सामने दो ही विकल्प हैं या तो व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का निर्माण करे अथवा व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ को उत्पन्न करे।
वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) को उत्पन्न करने का तात्पर्य है व्यक्ति ने ‘वस्तु आदि’ का निर्माण किए बिना किसी ‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व अपने लिए हासिल किया है।
उत्पन्न करना इन शब्दों में परिभाषित होगा
‘वस्तु आदि’ के स्वामित्व हस्तांतरण की प्रक्रिया को उत्पन्न करना कहते हैं।
‘वस्तु आदि’ उत्पन्न करने वाला व्यक्ति अपना तथा अन्य किसी व्यक्ति के सेवाओं का वह आदान-प्रदान करता है।
4.02 उत्पाद
मान लिया कोई कुम्हार किसी किसान को घड़ा देकर बदले में किसान से गेहूँ लेता है। कुम्हार ने घड़ा बनाने (निर्माण) के लिए श्रम किया और गेहूँ पैदा करने (फसल) के लिए किसान ने श्रम किया। किसान को कुम्हार द्वारा बनाया गया घड़ा मिलने से कुम्हार की सेवाएँ किसान को अदा होती हैं। कुम्हार को किसान द्वारा बनाया गया गेहूँ मिलने से किसान की सेवाएँ कुम्हार को अदा होती हैं। अन्य व्यक्ति के लिए किसी व्यक्ति द्वारा किया गया श्रम अन्य व्यक्ति को प्रदान होने वाली व्यक्ति की सेवाएँ हैं। घड़ा और गेहूँ के आदान-प्रदान में कुम्हार और किसान के सेवाओं का आदान-प्रदान एक चरण में सम्पन्न हो जाता है। कुम्हार का उत्पाद गेहूँ होगा और किसान का उत्पाद घड़ा होगा।
जिस ‘वस्तु आदि’ को व्यक्ति उत्पन्न करता है, उस ‘वस्तु आदि’ को वह व्यक्ति ‘उत्पाद’ कहता है।
‘रुपए’ व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है और रुपए माप अंकित बैंकनोट व्यक्ति के सेवाओं को मापने का साधन हैं। बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट देने वाला व्यक्ति एवं बैंकनोट लेने वाले अन्य व्यक्ति के मध्य उनके सेवाओं का आदान-प्रदान होता है। इस लेन-देन व आदान-प्रदान से ‘वस्तु आदि’ उत्पन्न होते हैं।
बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट देने वाला व्यक्ति ‘वस्तु आदि की मांग उस अन्य व्यक्ति के सम्मुख रखता है जो दिए गए बैंकनोट ले रहा है। बैंकनोट लेने वाला अन्य व्यक्ति मांग की ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति करता है एवं बैंकनोट देने वाले व्यक्ति को ‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व हस्तांतरित करता है।
बैंकनोट देने वाले व्यक्ति को ‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व प्राप्त हो जाने से बैंकनोट देने वाले व्यक्ति ने उस ‘वस्तु आदि’ को उत्पन्न किया है कहा जाता है एवं वह ‘वस्तु आदि’ उस व्यक्ति का उत्पाद कहलाता है।
बैंकनोटों का लेन-देन एवं उस लेन-देन में बदले में सेवाओं का आदान-प्रदान कोई व्यक्ति ही करता है, व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो बैंकनोटों का लेन-देन कर सके, इसलिए कोई व्यक्ति ही किसी उत्पाद को उत्पन्न करता है।
कुम्हार और किसान द्वारा निर्मित घड़ा और गेहूँ का आदान-प्रदान बैंकनोटों के लेन-देन में हो रहा हो तो कुम्हार घड़ा का मूल्य बैंकनोटों की कोई राशि निर्धारित करेगा तथा किसान गेहूँ का मूल्य बैंकनोटों की कोई राशि निर्धारित करेगा। कुम्हार किसान से बैंकनोटों की निर्धारित राशि लेकर बदले में उसे घड़ा देगा। किसान कुम्हार से बैंकनोटों की निर्धारित राशि लेकर बदले में उसे गेहूँ देगा।
कुम्हार और किसान के सेवाओं का आदान-प्रदान कम से कम तीन चरणों में सम्पन्न होगा।
किसान को बैंकनोट देने से पहले कुम्हार ने अन्य किसी व्यक्ति को घड़ा देकर बैंकनोट लिया होगा, जो अन्य अवसर पर वह किसान को देता है। मान लिया वह अन्य व्यक्ति कोई शिक्षक है जिसे कुम्हार घड़ा देकर उससे बैंकनोट ले रहा है। शिक्षक से लिए गए बैंकनोट कुम्हार ने किसान को दिया है जिसके बदले में कुम्हार ने किसान से गेहूँ लिया है।
किसान गेहूँ देकर कुम्हार से बैंकनोट इसलिए लेता है कि बैंकनोट देने से किसान को किसी अन्य व्यक्ति की सेवाएँ अदा होती हैं। बैंकनोट देने से किसान को किसी अन्य व्यक्ति की सेवाएँ यदि अदा नहीं होती हों तो किसान गेहूँ के बदले में कुम्हार से बैंकनोट लेना स्वीकार नहीं करेगा।
मान लिया कि वह अन्य व्यक्ति कोई श्रमिक है जिसके सेवाओं की अदायगी बैंकनोट के बदले किसान चाहता है। किसान ने गेहूँ देकर कुम्हार से बैंकनोट लिया होगा एवं बैंकनोट किसी श्रमिक को देकर बदले में किसान ने उसकी (श्रमिक) सेवाएँ लिया होगा।
बैंकनोटों (रुपए) के लेन-देन में बदले में गेहूँ तथा घड़ा के आदान-प्रदान में किसान और कुम्हार के बीच उनके सेवाओं का आदान-प्रदान तो होता ही है, इसके अतिरिक्त कम से कम अन्य दो चरणों में अर्थात् कुम्हार और शिक्षक के बीच तथा ‘किसान और श्रमिक’ के बीच उनके सेवाओं का आदान-प्रदान अवश्य होता है।
बैंकनोटों के लेन-देन में सेवाओं के आदान-प्रदान में यह भी हो सकता है कि कुम्हार किसान से गेहूँ नहीं ले रहा है और न ही किसान कुम्हार से घड़ा ले रहा है बल्कि कुम्हार और किसान दोनों किसी शिक्षक को बैंकनोट देकर बदले में उस शिक्षक की सेवाएँ दोनों प्राप्त कर रहे हों।
उस अवस्था में मान लिया कुम्हार किसी बुनकर को घड़ा देकर उससे बैंकनोट ले रहा हो तथा किसान किसी चर्मकार को गेहूँ देकर उससे बैंकनोट ले रहा हो। कुम्हार बैंकनोट शिक्षक को देता है तथा किसान भी बैंकनोट शिक्षक को देता है।
शिक्षक अपनी सेवाएँ प्रदान कर बैंकनोट कुम्हार तथा किसान से प्राप्त करता है, उसमें से बैंकनोट वह शिक्षक किसी श्रमिक को देकर उसकी सेवाएँ लेता है। एक से अधिक चरणों में सेवाओं का आदान-प्रदान बैंकनोटों की भिन्न राशियाँ के लेन-देन में होने से भिन्न उत्पाद घड़ा, गेहूँ, सेवाएँ (शिक्षक व श्रमिक की सेवाएँ) आदि ‘उत्पाद’ उत्पन्न होते हैं।
कुम्हार घड़ा का निर्माण करता है। कोई बुनकर कुम्हार को बैंकनोट देकर बदले में कुम्हार से घड़े का स्वामित्व प्राप्त कर वह बुनकर घड़े को उत्पन्न करता है। घड़ा उस बुनकर के लिए उत्पाद है जिसने घड़े का स्वामित्व हासिल करने के लिए कुम्हार को बैंकनोट दिया है।
घड़ा कुम्हार के लिए उत्पाद नहीं है, क्योंकि कुम्हार ने घड़ा को उत्पन्न नहीं किया है बल्कि कुम्हार ने घड़े का निर्माण किया है। कुम्हार और किसान का उत्पाद शिक्षक की सेवाएँ हैं। शिक्षक का उत्पाद श्रमिक की सेवाएँ हैं। चर्मकार बैंकनोट देकर बदले में गेहूँ का स्वामित्व हासिल कर वह गेहूँ उत्पन्न करता है। चर्मकार का उत्पाद गेहूँ है।
उत्पन्न ‘वस्तु आदि’ चाहे जो हो वह ‘उत्पाद’ के नाम से जानी जाती है। ‘उत्पाद’ किसी ‘वस्तु आदि’ का नाम नहीं बल्कि ‘वस्तु आदि’ के किसी वर्ग विशेष का नाम है। पुरुष अथवा स्त्री कहने मात्र से किसी व्यक्ति विशेष का बोध नहीं होता है, बल्कि वर्ग विशेष किसी व्यक्ति का बोध होता है।
पुरुष वर्ग में जो भी व्यक्ति है, वह स्त्री वर्ग में नहीं आते हैं। उसी प्रकार से ‘वस्तु आदि’ के वर्ग विशेष का नाम उत्पाद है। ‘वस्तु आदि’ के वर्ग विशेष के सम्बन्ध में उदाहरण चावल और चूड़ा का है। ‘वस्तु आदि’ के जिस वर्ग विशेष में चावल है उस वर्ग विशेष का नाम ‘उपज’ है। चूड़ा उपज नहीं है अर्थात् ‘वस्तु आदि’ का वह वर्ग विशेष जिसे ‘उपज’ कहते हैं, चूड़ा उस वर्ग विशेष में नहीं आता है।
वर्ग विशेष उत्पाद नाम से जो भी ‘वस्तु आदि’ है, वह उत्पन्न किए जाते हैं और उत्पाद कहलाते हैं।
जिस किसी ‘वस्तु आदि’ का व्यक्ति निर्माण करता है उस ‘वस्तु आदि’ को वह व्यक्ति उत्पाद नहीं कहेगा। निर्मित वह ‘वस्तु आदि’ जो उस ‘वस्तु आदि’ के निर्माता किसी व्यक्ति के लिए ‘उत्पाद’ नहीं है। निर्मित वह ‘वस्तु आदि’ किसी अन्य व्यक्ति के लिए ‘उत्पाद’ हो सकता है, यदि उस ‘वस्तु आदि’ का स्वामित्व ‘वस्तु आदि’ के निर्माता से उस अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित होता है।
‘उत्पाद’ न कोई वस्तु है और न ही कोई संसाधन या सेवाएँ आदि है। जिसे हम इस्पात कहते हैं, वह इस्पात है। जिसे हम कोयला कहते हैं, वह कोयला है। जिसे हम उत्पाद कहते हैं वह केवल उत्पाद है, वह न इस्पात है और न ही वह कोयला है।
उत्पाद इन शब्दों में परिभाषित होगा:
उत्पन्न कोई वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि उत्पाद है।
बाजार में बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में भिन्न वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का आदान-प्रदान हम बारम्बार करते हैं। ‘वस्तु आदि’ चाहे जो हो और व्यक्ति भी जो कोई हो प्रत्येक के लिए प्रत्येक अवसर पर लेन-देन व आदान-प्रदान की विधि सदैव समान होती है।
समान विधि से किए जा रहे लेन-देन व आदान-प्रदान के बाद भिन्न वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि भिन्न नामों से नहीं बल्कि समान नाम ‘उत्पाद’ नाम से भिन्न वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि को जाना जाता है।
बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान के बाद ‘वस्तु आदि’ को दिया गया नाम ‘उत्पाद’ है। उत्पाद किसी ‘वस्तु आदि’ को दिया गया नाम है। ‘वस्तु आदि’ का नाम इस्पात या कोयला आदि हो सकता है, उत्पाद उन्हें दिया गया अन्य नाम है।