बाजार का घटनाक्रम

आवश्यकताओं की पूर्ति बाजार में होती है। आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लोग सामुदायिक जीवन जीते हैं और लोग बैंकनोटों का लेन-देन करते हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति का विषय तथा सामुदायिक जीवन एवं बैंकनोटों के लेन-देन के अवसर आदि की चर्चा करेंगे।

‘वस्तु आदि’ के मांग-आपूर्ति के संगत रुपए अथवा बैंकनोटों के आय-व्यय के घटनाक्रम के अधीन लोग रुपए व्यय करने के लिए वह बाजार में  रुपयों की आय करते हैं। आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के उपभोग के लिए लोग बाजार में  ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन करते हैं। बाजार का घटनाक्रम और उसके अधीन लोगों का रुपयों की आय-व्यय और ‘वस्तु आदि’ की मांग-आपूर्ति आदि की चर्चा भी आगे करेंगे।

बाजार का घटनाक्रम ही वस्तुतः  बाजार है और बाजार की परिभाषा है, उसकी चर्चा भी होगी।

3.01 आवश्यकताओं की पूर्ति

वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) हमारी आवश्यकताएँ हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-अपनी हैं। आवश्यकताएँ साझा नहीं होतीं, आवश्यकताओं की दृष्टि से प्रत्येक ‘व्यक्ति’ स्वयं इकाई है। किसी ‘परिवार’ अथवा किसी ‘उद्योग’ व किसी ‘संस्था’ आदि के आवश्यकताओं का विचार किया जाए तो उनके आवश्यकताओं की पूर्ति के संदर्भ में वह भी ‘व्यक्ति’ के भांति ही प्रत्येक स्वयं इकाई हैं। प्रत्येक उन इकाईयों की अपनी-अपनी आवश्यकताएँ हैं।

किसी भी व्यक्ति अथवा किसी परिवार या किसी भी उद्योग अथवा किसी संस्था आदि के लिए कभी सम्भव नहीं कि वह अपने लिए आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का निर्माण अथवा उत्पादन वह स्वयं कर ले, इसलिए वह सामूहिक रूप से अपना तथा अन्य अनेक व्यक्तियों की आवश्यकता के ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन करते हैं जिनके आदान-प्रदान से व्यक्ति, परिवार, उद्योग, संस्था आदि अपनी ‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और यही बाजार का विषय है।

बाजार के केन्द्र में व्यक्ति और उसकी आवश्यकताएँ हैं और उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति जो कुछ करता है वह सब कुछ बाजार का विषय है। वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि व्यक्ति की आवश्यकताएँ हैं, इसलिए बाजार में ‘वस्तु आदि’ का विचार होता है।

 व्यक्ति की आवश्यकताएँ ‘वस्तु आदि’ न होकर कुछ और हों तो ‘वस्तु आदि’ बाजार का विषय नहीं होगा। ‘वस्तु आदि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उनके आदान-प्रदान में व्यक्ति बैंकनोटों का लेन-देन करता है, इसलिए बैंकनोटों का लेन-देन बाजार का विषय है। आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य किसी व्यवस्था को व्यक्ति यदि अपनाए तो बैंकनोटों का लेन-देन भी बाजार का विषय नहीं होगा।

आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सर्व सामान्य रूप से हम यही करते हैं कि बैंकनोट (रुपए) देकर अवश्यक ‘वस्तु आदि’ प्राप्त कर हम अपने आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेते हैं। बैंकनोट देने मात्र से ‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति हो गया, इतना सरल विषय यह नहीं है।

इतना ही सरल विषय यह होता तो सरकारें बैंकनोट छाप-छाप कर लोगों को देते जाते और लोग उन बैंकनोटों को देकर अपने आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेते। किन्तु यह सम्भव नहीं है, वस्तुतः  बैंकनोटों के बदले में आवश्यकताओं की पूर्ति पेचीदा विषय है और उसके कई पेंच (Intricacy) हैं।

पेंच – आवश्यकताओं की पूर्ति के संदर्भ में आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का आदान-प्रदान करते रहना जहाँ व्यक्ति के लिए आवश्यक है, वही इसके लिए ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन तथा उनका उपभोग होते रहना भी आवश्यक है। ‘वस्तु आदि’ का उपभोग होने से उनकी मांग बनती है और ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन होने से उनकी आपूर्ति होती है।

इसलिए, आवश्यकताओं की पूर्ति के संदर्भ में ‘वस्तु आदि’ की मांग (उपभोग) तथा उनकी आपूर्ति (उत्पादन) होता रहे इसको सुनिश्चित करना अवश्यक होगा।

पेंच – ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति करता हुआ व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ प्रदान कर जहाँ वह बैंकनोट लेता है, वहीं बैंकनोट देकर (व्यय) व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ की मांग रखता है और उसे ‘वस्तु आदि’ की अदायगी होती है। बैंकनोट लेने से व्यक्ति को बैंकनोटों (रुपए) की आय होती है और बैंकनोट देना अन्य शब्दों में व्यक्ति द्वारा किया गया बैंकनोटों का व्यय है।

इसलिए आवश्यकताओं की पूर्ति के संदर्भ में ‘वस्तु आदि की मांग तथा आपूर्ति से संलग्न व्यक्तियों के बैंकनोटों की आय तथा व्यय  जारी रहे इसको सुनिश्चित करना अवश्यक होगा।

‘वस्तु आदि की आपूर्ति के संगत व्यक्ति को होने वाली बैंकनोटों की आय तथा ‘वस्तु आति की मांग के संगत व्यक्ति द्वारा किया गया बैंकनोटों का व्यय जारी रहने से, जिसे संक्षेप में ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ यदि कहें तो यह एक घटनाक्रम बन जाता है। इस घटनाक्रम के अधीन बैंकनोटो के लेन-देन (आय-व्यय) में बदले में ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान (मांग-पूर्ति) होकर अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

यही व्यक्ति का सामुदायिक जीवन है जो व्यापक अर्थ में ‘बाजार’ कहलाता है। यह ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ का घटनाक्रम है। आप इसे बाजार की परिभाषा कह सकते हैं। जो कुछ हमारे जीवन में है, लोगों की प्रकृति है, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता, जो सर्वमान्य है, वह विषय की परिभाषा कहलाती है।

‘वस्तु आदि’ के मांग और आपूर्ति के सम्बन्ध में तथा रुपए अथवा बैंकनोटों की लोगों की आय और व्यय के सम्बन्ध में जिन बातों को अमान्य नहीं कर सकते, सर्वमान्य वह विषय जिस कारण मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के घटनाक्रम के अधीन लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, यह बाजार की परिभाषा है।

मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय जो कुछ हमारे जीवन में है और लोगों की प्रकृति में है,उसकी चर्चा यहां करेंगे।

3.02 सामुदायिक जीवन

आय-व्यय के अन्तर्गत बैंकनोटों का लेन-देन व्यक्ति करता है। बैंकनोटों के लेन-देन में बदले ‘वस्तु आदि’ का ‘आदान-प्रदान’ भी व्यक्ति करता है। ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में बदले में बैंकनोट के लेन-देन से ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ के घटनाक्रम के अधीन व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। आय. व्यय, मांग, आपूर्ति, के केन्द्र में व्यक्ति और उसकी आवश्यकताएँ हैं।

आवश्यकताओं की पूर्ति लोगों का प्राथमिक विषय है। ‘वस्तु आदि’ प्रदान कर बदले में लोग बैंकनोट लेते हैं और बैंकनोट देने पर ‘वस्तु आदि’ की अदायगी उन्हें होती है। ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में ‘वस्तु आदि’ प्रदान करने से या बैंकनोट देने से बदले में ‘वस्तु आदि’ व्यक्ति को अदा नहीं होती हो तो उसके आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होगी। ‘वस्तु आदि’ प्रदान कर व्यक्ति बैंकनोट इसलिए लेता है, क्योंकि लिए गए वह बैंकनोट देने से व्यक्ति को आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की अदायगी होगी।

‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान बदले में बैंकनोटों के लेन-देन में ‘वस्तु आदि’ की अदायगी का महत्व है।

बैंकनोट देने से बदले में ‘वस्तु आदि’ की अदायगी के प्रसंग में 50 रुपए का बैंकनोट देने से बदले में निर्धारित 50 रुपए मूल्य (माप) के ‘वस्तु आदि’ की अदायगी व्यक्ति को होनी चाहिए, इसके लिए हममें से प्रत्येक व्यक्ति वचनबद्ध है। हमारी वचनबद्धता बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को पचास रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड से निर्धारित होती है।

50 रुपए (बैंकनोट) देने से बदले में 50 रुपए के ‘वस्तु आदि की अदायगी को हम सम माप (सममाप) में अदायगी कह सकते हैं। व्यक्ति का सामुदायिक जीवन वस्तुतः ‘सम अदायगी’ का जीवन है जहाँ ‘वस्तु आदि’ की अदायगी ‘सम्माप’ में व्यक्ति को हो यह महत्वपूर्ण है। 

सामुदायिक (सम अदायगी) जीवन में बैंकनोटों के लेन-देन के प्रसंग में बैंकनोटों के आय-व्यय के लिए अनेकानेक व्यक्ति एक दूसरे पर निर्भर होते हैं, क्योंकि कोई अन्य व्यक्ति यदि बैंकनोट व्यय करता है तो व्यक्ति को बैंकनोट आय में प्राप्त होते हैं। आय में प्राप्त बैंकनोटों से व्यक्ति बैंकनोट व्यय करता है। अतएव बैंकनोटों के व्यय के लिए कोई व्यक्ति जहाँ वह अन्य किन्हीं व्यक्तियों के बैंकनोटों के व्यय पर निर्भर है, वहीं वह व्यक्ति बैंकनोटों के व्यय के लिए स्वयं बैंकनोटों की अपनी आय पर भी निर्भर है।

अन्य किन्हीं व्यक्तियों के बैंकनोटों का व्यय चूँकि अन्य उन व्यक्तियों के आय पर निर्भर है, इसलिए व्यक्ति की आय न केवल अन्य व्यक्ति के व्यय पर निर्भर है बल्कि उस अन्य व्यक्ति के बैंकनोटों की आय पर भी निर्भर है। व्यापक अर्थ में समुदाय स्तर पर अनेकानेक व्यक्ति के बैंकनोटों का आय तथा व्यय परस्पर निर्भर होने से वह व्यक्ति बैंकनोटों का लेन-देन पुनः पुनः करते हैं।

सामुदायिक (सम अदायगी) जीवन में किसी व्यक्ति के ‘वस्तु आदि’ के किसी ‘मांग’ का सम्बन्ध जहाँ व्यक्ति के बैंकनोटों के ‘व्यय’ से है उसके मांग का सम्बन्ध बैंकनोटों में उसकी ‘आय’ से भी है एवं अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए बैंकनोटों के ‘व्यय’ से भी है। इसे संक्षेप में ‘मांग के संगत व्यय’ कह सकते हैं।

अपनी आवश्यकता के ‘वस्तु आदि’ के लिए कोई व्यक्ति जिस अनुपात में बैंकनोट ‘व्यय’ करता है, उस अनुपात में उस व्यक्ति की ‘वस्तु आदि’ की ‘मांग’ अन्य व्यक्ति के सम्मुख प्रस्तुत होती है। इसे संक्षेप में ‘व्यय के संगत मांग’ कह सकते हैं।

व्यक्ति द्वारा की गई ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति का सम्बन्ध न केवल बैंकनोटों की उसकी ‘आय’ से है बल्कि बैंकनोटों की अन्य किन्हीं व्यक्तियों की ‘आय’ से भी है जिसके व्यय के कारण व्यक्ति को बैंकनोटों की आय होती है। इसे संक्षेप में ‘आपूर्ति के संगत आय’ कह सकते हैं।

बैंकनोटों की ‘आय’ के लिए कोई व्यक्ति किसी ‘वस्तु आदि’ की ‘आपूर्ति’ करता है और जिस अनुपात में व्यक्ति को बैंकनोटों की ‘आय’ होती है, व्यक्ति उसी अनुपात में ‘वस्तु आदि’ की ‘आपूर्ति’ करता है। इसे संक्षेप में ‘आय के संगत आपूर्ति’ कह सकते हैं।

सामुदायिक (सम अदायगी) जीवन में ‘वस्तु आदि’ मांग के संगत व्यय और व्यय के संगत ‘वस्तु आदि’ की मांग तथा ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति के संगत आय एवं आय के संगत ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति से सम्बन्धित विषय में उनके परस्पर सम्बन्धों के कारण ‘वस्तु आदि’ की मांग और उन मांगों की आपूर्ति (मांग के संगत आपूर्ति) एवं ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति के बाद उन ‘वस्तु आदि’ की मांग (आपूर्ति के संगत मांग) पुनः पुनः प्रस्तुत होती है।

सामुदायिक (सम अदायगी के) जीवन में 50 रुपए माप के बैंकनोट देने से बदले में 50 रुपए मूल्य के ‘वस्तु आदि’ की अदायगी के क्रम में बैंकनोटों का लेन-देन पुनः पुनः होकर बदले में ‘वस्तु आदि की मांग-पूर्ति पुनः पुनः प्रस्तुत होने से ही हम अपना तथा अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकेंगे। समअदायगी वह मौलिक (Basic Intricacy) पेंच है जिसके कारण व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होगी, इसे समझने की आवश्यकता है।

किसी ‘वस्तु आदि का मूल्य 50 रुपए निर्धारित हुआ हो और उस पर विक्रय मूल्य (MRP) 60 रुपए लिखकर यदि 60 रुपए देने से बदले में निर्धारित 50 रुपए मूल्य की उस ‘वस्तु आदि’ की अदायगी किसी व्यक्ति को होती हो तो बैंकनोटों (60 रुपए) के लेन-देन में निर्धारित माप से कममाप (कममूल्य) 50 रुपए के ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से व्यक्ति को ‘वस्तु आदि की अदायगी कममाप में होने से, जिस अनुपात में आदान-प्रदान कममाप में होगा उस अनुपात में ‘मांग के संगत व्यय’ और ‘व्यय के संगत मांग’ तथा ‘आपूर्ति के संगत आय’ एवं ‘आय के संगत आपूर्ति कम होगी। फलस्वरूप ‘वस्तु आदि की हमारी मांग एवं आपूर्ति तथा हमें होने वाली बैंकनोटों का आय तथा व्यय क्रमशः क्षीण होकर वह पुनः पुनः प्रस्तुत नहीं होंगे और हम अपने आवश्यकताओं की पूर्ति पुनः पुनः नहीं कर सकेंगे।

इसके विपरीत किसी ‘वस्तु आदि का मूल्य 50 रुपए निर्धारित हुआ हो और उस पर विक्रय मूल्य (MRP) 50 रुपए लिखकर यदि 50 रुपए देने से बदले में निर्धारित 50 रुपए मूल्य की उस ‘वस्तु आदि’ की अदायगी किसी व्यक्ति को होती हो तो बैंकनोटों (50 रुपए) के लेन-देन में समान मूल्य (50 रुपए) के ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से व्यक्ति को ‘वस्तु आदि’ की अदायगी सममाप में होने से, ‘मांग के संगत व्यय और व्यय के संगत मांग’ तथा ‘आपूर्ति के संगत आय एवं आय के संगत आपूर्ति सुनिश्चित होकर ‘वस्तु आदि’ की हमारी मांग एवं आपूर्ति तथा हमें होने वाली बैंकनोटों का आय तथा व्यय पुनः पुनः प्रस्तुत होंगे और हम अपना तथा अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति पुनः पुनः कर सकेंगे।

सम अदायगी का तात्पर्य है कि 50 रुपए (माप) का बैंकनोट देने से बदले में निर्धारित 50 रुपए मूल्य (माप) के ‘वस्तु आदि’ बैंकनोट देने वाले व्यक्ति को अदा होनी चाहिए। इस संदर्भ में ‘वस्तु आदि’ का मूल्य निर्धारण कैसे हो यह जानना महत्वपूर्ण है।

इस सम्बन्ध में वर्तमान नीति वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) के मांग तथा आपूर्ति पर आधारित है। ‘वस्तु आदि को केन्द्र में रखकर उसके मांग तथा आपूर्ति (Demand & Supply) के एकांगी विचार से किसी ‘वस्तु आदि’ का मूल्य जैसे-तैसे निर्धारित कर लिया जाता है। मूल्य निर्धारण की वर्तमान नीति को हम युक्तिसंगत नहीं मानते, क्योंकि इसके केन्द्र में व्यक्ति नहीं बल्कि ‘वस्तु आदि’ हैं।

हमें याद रखना होगा कि प्राकृतिक संसाधन प्रकृति से हमें निःशुल्क प्राप्त होते हैं, उनके बदले प्रकृति को हम रुपए अथवा बैंकनोट नहीं देते। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, शोधन, परिवहन आदि से जुड़े हुए लोगों को उनके सेवाओं के बदले दिए गए रुपए अथवा बैंकनोटों से प्राकृतिक संसाधनों का मूल्य निर्धारित होता है। यह मूल्य किसी ‘वस्तु आदि’ का मौलिक मूल्य अर्थात् Price at Source (PS) होगा।

निर्धारित मूल्य के प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग करते हुए किसी ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन के भिन्न चरणों में कार्यरत लोगों को दिए गए रुपए अथवा बैंकनोटों से किसी ‘वस्तु आदि’ का प्रारंभिक मूल्य अर्थात् किसी उत्पाद का मूल्य निर्धारित होता है। उत्पाद के व्यापारिक खर्चे, व्यापारियों के लाभ आदि को जोड़कर किसी ‘वस्तु आदि’ का बाजार मूल्य निर्धारित होता है।

मौलिक मूल्य, उत्पाद मूल्य, बाजार मूल्य इन तीन स्तरों पर लोगों को उनके सेवाओं के लिए दिए गए रुपए अथवा बैंकनोटों की भूमिका स्पष्ट है। किसी ‘वस्तु आदि’ पर लगे राज्य कर (Tax) और अन्य लगत जिन्हें पूंजीगत खर्च कह लें तो अतिरिक्त इन दो स्तरों पर दिए गए रुपए अथवा बैंकनोटों से किसी ‘वस्तु आदि’ के विक्रय मूल्य (MRP) का निर्धारण समझ में आने वाला विषय है, जो व्यक्ति (लोग) को केन्द्र में रख कर  ‘वस्तु आदि’ का मूल्य निर्धारण का विषय है।

हमें याद रखना होगा कि रुपए अथवा बैंकनोट जब भी दिए जाते हैं या लिए जाते हैं, किसी न किसी व्यक्ति को दिया जाता है या किसी न किसी व्यक्ति से लिया जाता है, व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो रुपयों अथवा बैंकनोटों का लेन-देन करते हों।

हमें याद रखना होगा कि जब तक कोई व्यक्ति बैंकनोट व्यय नहीं करता है तब तक किसी ‘वस्तु आदि’ की मांग नहीं बनती है और जब तक किसी व्यक्ति को बैंकनोट की आय नहीं होती है तब तक किसी ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति वह व्यक्ति नहीं करता है।

अतएव जब कभी किसी ‘वस्तु आदि’ के मांग अथवा उसकी आपूर्ति का विचार हम करें तब उस मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का विचार व्यक्ति को केन्द्र में रखकर हमें करना होगा। इसकी चर्चा हम करें कि इससे पूर्व बैंकनोटों के लेन-देन के अवसरों की चर्चा कर लेना आवश्यक है।

3.03 बैंकनोटों के लेन-देन के अवसर

लेन-देन के अतिरिक्त बैंकनोटों का अन्य प्रयोग नहीं है और व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो बैंकनोटों का लेन-देन करता हो अथवा कर सकता हो। बैंकनोटों का प्रत्येक लेन-देन सदैव बिना किसी अपवाद के किन्हीं दो व्यक्तियों के मध्य होता है। एक व्यक्ति बैंकनोट देता है और दिए गए बैंकनोट अन्य व्यक्ति लेता है।

किसी संस्था की ओर से या बहुसंख्य किन्हीं व्यक्तियों की ओर से बैंकनोटों का लेन-देन हो रहा हो तो भी उस संस्था या बहुसंख्य उन लोगों की ओर से एक व्यक्ति जो उस संस्था या बहुसंख्य उन व्यक्तियों का प्रतिनिधि बनकर उस एक व्यक्ति या उस जैसा ही अन्य किसी एक व्यक्ति के हाथों बैंकनोटों का लेन-देन होता है।

मान लिया 50 रुपए के बैंकनोट के लेन-देन के किसी अवसर पर कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को 50 रुपए का बैंकनोट दे रहा है एवं बदले में निर्धारित 50 रुपए मूल्य की कोई ‘वस्तु आदि’ वह व्यक्ति उस अन्य व्यक्ति से ले रहा है। इस लेन-देन को एक रेखाखण्ड़ से दर्शाया गया है। रेखाखण्ड के एक सिरे पर वह ‘व्यक्ति’ होगा जो बैंकनोट दे रहा है तथा रेखाखण्ड़ के दूसरे सिरे पर वह ‘अन्य व्यक्ति’ होगा जो बैंकनोट ले रहा है।

‘वस्तु आदि’ केन्द्रीय तत्व है उसके बदले कोई व्यक्ति 50 रुपए का बैंकनोट देता है और उस ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन में अन्य व्यक्ति 50 रुपए माप में सेवाएँ प्रदान करता हैं। 50 रुपए का बैंकनोट देना जहाँ व्यक्ति का विषय है वहीं 50 रुपए माप की सेवाएँ प्रदान करना अन्य व्यक्ति का विषय है। सेवाओं की अदायगी व्यक्ति को होती है तथा बैंकनोट अन्य व्यक्ति लेता है।

बैंकनोटों के लेन-देन के एक अवसर पर कुल पांच तत्व हैं-

1) व्यक्ति

2) व्यक्ति द्वारा दिए गए बैंकनोट

3) अन्य व्यक्ति

4) अन्य व्यक्ति द्वारा प्रदत्त सेवाएँ

5) वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि)

प्राकृतिक संसाधनों के लिए व्यक्ति प्रकृति को चूँकि बैंकनोट नहीं देता है. इसलिए प्राकृतिक संसाधन प्रकृति से व्यक्ति को निःशुल्क प्राप्त होते हैं। किसी ‘वस्तु आदि’ के निर्माण अथवा उत्पादन में जितने प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग होगा वह प्रकृति से निःशुल्क प्राप्त होंगे और उनके दोहन, परिवहन अथवा सरकारी या गैर सरकारी जो भी शुल्क प्राकृतिक संसाधनों के लिए देय होंगे वह किन्हीं व्यक्तिओं को उनके सेवाओं के लिए दिए गए रुपए (बैंकनोट) ही होंगे। अतः किसी ‘वस्तु आदि’ का जो कुछ मूल्य निर्धारित होगा वह मूल्य अप्रत्यक्ष रूप में किन्हीं व्यक्तिओं के सेवाओं का माप (मूल्य) ही दर्शाएगा।

‘अन्य व्यक्ति’ से तात्पर्य अनेक उन व्यक्तियों के प्रतिनिधि से है जिनकी सेवाएँ प्रदान होने से कोई ‘वस्तु आदि’ निर्मित या उत्पादित हुआ है। बैंकनोट (50 रुपए) लेकर बदले में ‘अन्य व्यक्ति’ अनेक उन व्यक्तियों की सेवाएँ ही किसी ‘व्यक्ति’ को प्रदान करता है। ‘अन्य व्यक्ति’ को दिए गए बैंकनोट (50 रुपए) अनेक उन व्यक्तियों में वितरित हो जाता है जिनका प्रतिनिधि बनकर ‘अन्य व्यक्ति’ किसी व्यक्ति से बैंकनोट ले रहा है।

‘अन्य व्यक्ति’ ने अनेक अन्य व्यक्तियों की सेवाएँ प्रदान कर किसी ‘वस्तु आदि’ का निर्माण अथवा उसका उत्पादन किया होगा। ‘वस्तु आदि’ के निर्माण अथवा उसके उत्पादन के लिए प्रदत्त सेवाओं के बदले अन्य व्यक्ति को प्राप्त ’50 रुपए’ के बैंकनोट से उन सेवाओं का मूल्य ’50 रुपए’ निर्धारित होगा। इसे संक्षेप में सेवाओं का मापनिर्धारण कह सकते हैं। यह बैंकनोटों के लेन-देन का पहला चरण है, जिसका सम्बन्ध ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से है।

अन्य कुछ व्यक्तियों की सेवाओं से जो कुछ ‘वस्तु आदि’ निर्मित अथवा उत्पादित हुआ उन सेवाओं के मूल्य स्वरूप ’50 रुपए’ का बैंकनोट ‘अन्य व्यक्ति’ को देने से उस ‘वस्तु आदि का मूल्य ’50 रुपए’ निर्धारित होगा। 50 रुपए का बैंकनोट लेकर वह उत्पाद व निर्मित उस ‘वस्तु आदि’ को ‘अन्य व्यक्ति’ ने किसी व्यक्ति को दिया होगा। इसे संक्षेप में ‘वस्तु आदि’ का मूल्यनिर्धारण कह सकते हैं। यह बैंकनोटों के लेन-देन का दूसरा चरण है, जिसका सम्बन्ध ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से है।

‘सेवाओं के मापनिर्धारण’ के चरण में बैंकनोट ले रहा ‘अन्य व्यक्ति’ सेवाएँ प्रदान कर रहा होता है एवं बैंकनोट दे रहा ‘व्यक्ति’ उन सेवाओं का माप (मूल्य) निर्धारित कर रहा होता है।

‘वस्तु आदि के मूल्यनिर्धारण’ के चरण में बैंकनोट ले रहा ‘अन्य व्यक्ति’ ‘वस्तु आदि’ प्रदान कर रहा होता है एवं बैंकनोट दे रहा ‘व्यक्ति’ उस ‘वस्तु आदि’ का मूल्य (माप) निर्धारित कर रहा होता है।

बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट लेने वाला ‘अन्य व्यक्ति’ एक चरण में सेवाओं के मापनिर्धारण से संलग्न होकर क्रमागत अन्य चरण में वह निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ प्रदान करता है।

बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट देने वाला ‘व्यक्ति’ एक चरण में ‘वस्तु आदि’ के मूल्य निर्धारण से संलग्न होकर क्रमागत अन्य चरण में वह ‘अन्य व्यक्ति’ को उसके सेवाओं के बदले बैंकनोट देता है।

बैंकनोटों के लेन-देन के प्रत्येक अवसर पर कोई दो व्यक्ति ‘सेवाओं का मापनिर्धारण’ एवं ‘वस्तु आदि का मूल्यनिर्धारण’ क्रमागत इन दो चरणों में बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में जिस किसी बैंकनोट का लेन-देन करते हैं और जिस किसी ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान करते हैं, वह एक समान 50 रुपए का बैंकनोट तथा एक समान 50 रुपए मूल्य का ‘वस्तु आदि’ होते हैं।

बैंकनोटो के लेन-देन (आय-व्यय) में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान (मांग-पूर्ति) के विशेष इस परिस्थिति में मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के घटनाक्रम के अधीन अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। लोगों के सामुदायिक जीवन का यह घटनाक्रम वस्तुतः  बाजार का घटनाक्रम है।

3.04 रुपयों की आय तथा व्यय

बैंकनोट देने को बैंकनोटों का ‘व्यय’ कहते हैं। व्यय शब्द ‘व्यतीत’ जैसा ही शब्द है। व्यक्ति पल दर पल समय ‘व्यतीत’ करता जाता है और जितना समय वह ‘व्यतीत’ करता जाता है उतना ही समय पल दर पल उसे उपलब्ध होता जाता है। बैंकनोटों के लेन-देन के क्रम में व्यक्ति बैंकनोट अन्य व्यक्तियों को देते जाता है एवं वह अनेकानेक व्यक्तियों से बैंकनोट लेते भी जाता है। ‘व्यतीत’ शब्द से समय की निरन्तरता का बोध होता है और उसी भांति निरन्तर बैंकनोट देन को ‘व्यय’ की संज्ञा देकर उसके संगत ‘आय’ शब्द से व्यक्ति द्वारा निरन्तर बैंकनोट लेने को व्यक्ति की ‘आय’ कहा जाता है।

आय-व्यय के अन्तर्गत व्यक्ति बैंकनोटों का लेन-देन निरन्तर जारी रखता है, यह निरन्तरता ही व्यक्ति के आय-व्यय का आधार है। बैंकनोट व्यय करता हुआ व्यक्ति के लिए बैंकनोटों के आय के अवसर बने और बैंकनोटों की आय करता हुआ व्यक्ति बैंकनोट व्यय भी कर रहा हो तो बैंकनोटों के लेन-देन की निरन्तरता बनेगी। यह तभी संभव है जब व्यक्ति किसी ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन के बदले आवश्यक किसी ‘वस्तु आदि’ के उपभोग के अवसर वह पाए तथा आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के उपभोग के बदले उस व्यक्ति के लिए अन्य किसी ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन के अवसर बने।

सेवाएँ प्रदान कर बदले में बैंकनोट लेता हुआ व्यक्ति जब किसी ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न (जुड़ता) होता है तो उसके सेवाओं का मापनिर्धारण होता है। ‘वस्तु आदि’ का उपभोग करने के लिए जब व्यक्ति बैंकनोट देता है तो वह किसी ‘वस्तु आदि’ का मूल्यनिर्धारण करता है।

व्यक्ति जब ‘सेवाओं का मापनिर्धारण’ एवं ‘वस्तु आदि का मूल्यनिर्धारण’ इन दो चरणों में सम्पन्न (समापन) करता है एवं बैंकनोटों के लेन-देन को पूर्ण करता है, तभी व्यक्ति बैंकनोटों के आय-व्यय से संलग्न है कहा जाएगा।

उत्पादन से संलग्न व्यक्ति के ‘सेवाओं का मापनिर्धारण’ होता है। उपभोग से संलग्न व्यक्ति ‘वस्तु आदि का मूल्यनिर्धारण’ करता है। कोई व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न हो सकता है और नहीं भी हो सकता है, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से अनिवार्य रूप से संलग्न होता है क्योंकि ‘वस्तु आदि’ का उपभोग व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से संलग्न व्यक्ति जो ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न नहीं है, उनके बैंकनोटों के लेन-देन को उनकी आय-व्यय नहीं कहेंगे। इसके विपरीत कोई व्यक्ति किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न है तथा वह व्यक्ति किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से भी संलग्न है तो वह व्यक्ति बैंकनोटों के आय-व्यय से संलग्न है कहा जाएगा।

बैंकनोटों के आय-व्यय से संलग्न व्यक्ति किसी वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि के उत्पादन के बदले आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का उपभोग करता है एवं किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उपभोग के साथ-साथ अन्य किसी ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन वह अवश्य करता है।

दान, चंदा, व्याज, किराया आदि में बैंकनोट देना बैंकनोटों का व्यक्ति का व्यय नहीं बल्कि सहज बैंकनोट देना है, क्योंकि बैंकनोट देते हुए न किसी ‘वस्तु आदि’ का मूल्य निर्धारण वह कर रहा होता है और न ही बैंकनोट लेने वाले किसी व्यक्ति के सेवाओं का मापनिर्धारण वह कर रहा होता है। किसी विद्यार्थी द्वारा अभिभावक से बैंकनोट लेना उसकी बैंकनोटों की आय नहीं बल्कि सहज बैंकनोट लेना है। यह अवस्था तब बनती है जब विद्यार्थी अपने अभिभावकों से बैंकनोट लेकर उसका वह लेन-देन करता है। यदि विद्यार्थी स्वयं किसी वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के उत्पादन से संलग्न है एवं इसके लिए वह अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहा है जिसके बदले में उसे प्राप्त बैंकनोटों का लेन-देन यदि विद्यार्थी कर रहा है एवं ‘वस्तु आदि’ की अपने अवश्यकताओं की पूर्ति वह कर रहा है तो विद्यार्थी द्वारा किया गया बैंकनोटों का लेन-देन उसके आय-व्यय के अन्तर्गत होगा।

राज्य व्यापक अर्थ में एक व्यवस्था है एवं व्यवस्थाजन्य ‘शक्ति’ है, इसलिए राज्य को अन्य शब्दों में ‘राज्यसत्ता’ भी कहते हैं, सत्ता कहने का अभिप्राय शक्ति से है। राज्यसत्ता, व्यवस्था में निहित शक्ति है, जब कि राज्याधिकारी कोई व्यक्ति होता है। राज्यसत्ता ‘शक्ति’ केन्द्र है, राज्यसत्ता (राज्य) बैंकनोटों के लेन-देन से संलग्न नहीं होता है, राज्याधिकारी कोई व्यक्ति ही बैंकनोटों के लेन-देन से संलग्न होता है। राज्याधिकारी कोई व्यक्ति ही ‘कर संग्रह’ से प्राप्त बैंकनोट लेते हैं। राज्यधिकारी अन्य कोई व्यक्ति ‘कर संग्रह’ से प्राप्त बैंकनोट देते भी हैं। राज्य कर संग्रह करता हुआ बैंकनोट लेता हुआ राज्याधिकारी कोई व्यक्ति उस विद्यार्थी की मांति व्यवहार कर रहा होता है जो अभिभावक से बैंकनोट लेता है और जिसे उसकी आय नही कहते हैं।

राज्य कर संग्रह से प्राप्त बैंकनोट देता हुआ राज्याधिकारी कोई व्यक्ति उस व्यक्ति की भांति व्यवहार कर रहा होता है जो ‘दान अथवा चंदा’ में बैंकनोट देता है, जिसे व्यक्ति का व्यय नहीं कहते हैं।

राज्याधिकारी कोई व्यक्ति जब भी बैंकनोटों के लेन-देन से संलग्न होता है वह ‘सेवाओं के मापनिर्धारण’ के चरण से अथवा ‘वस्तु आदि के मूल्यनिर्धारण’ के चरण से, इनमें से किसी एक चरण के बैंकनोटों के लेन-देन से संलग्न होता है एवं कोई राज्याधिकारी ‘राज्य कर’ को लेने अथवा देने में न उसे बैंकनोटों की आय होती है और न ही बैंकनोट वह व्यय कर रहा होता है।

बैंकनोटों का वह लेन-देन जब व्यक्ति केवल ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न हो अथवा वह केवल ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से संलग्न हो तो बैंकनोटों का लेन-देन व्यक्ति की बैंकनोटों का आय-व्यय नहीं कहलाएगा, बल्कि बैंकनोटों का सहज लेन-देन कहलाएगा। बैंकनोटों के ‘आय-व्यय’ के अन्तर्गत व्यक्ति बैंकनोटों की जिस किसी राशि का ‘लेन-देन’ करता है, वह बैंकनोटों को लेने के क्रम के ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न होकर बैंकनोट देने के क्रम में ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से संलग्न होता है। किसी ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन के बदले अन्य ‘वस्तु आदि’ का उपभोग अथवा किसी ‘वस्तु आदि’ उपभोग के बदले अन्य ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन किसी भी व्यक्ति के ‘आय-व्यय’ का अधारभूत तत्व है।

3.05 ‘वस्तु आदि’ की मांग एवं आपूर्ति

आय-व्यय का संदर्भ बैंकनोटों के लेन-देन का है। बैंकनोटों का व्यय व्यक्ति करते हैं और आय में बैंकनोट व्यक्ति को ही प्राप्त होता है। मांग-पूर्ति का संदर्भ वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि (वस्तु आदि) के आदान-प्रदान का है। ‘वस्तु आदि’ की मांग किसी व्यक्तिं की होती है और उनकी आपूर्ति भी व्यक्ति करते हैं। ‘वस्तु आदि’ की मांग बैंकनोटों के व्यय के कारण प्रस्तुत होता है और बैंकनोटों के आय के लिए ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति व्यक्ति करते हैं। इसलिए मांग-पूर्ति का विचार बिना आय-व्यय के विचार के संभव नहीं है तथा आय-व्यय का विचार भी मांग-पूर्ति के विचार के बिना सम्भव नहीं है।

अतएव, मांग-पूर्ति का एकांगी विचार अथवा आय-व्यय का एकांगी विचार व्यावहारिक नहीं है। मांग-पूर्ति और आय-व्यय का संयुक्त विचार ही आदर्श अवस्था है।

‘वस्तु आदि’ के मांग एवं अपूर्ति के आधार में अनेकानेक व्यक्तियों की आवश्यकताएँ हैं और वह व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही बैंकनोटों के आय-व्यय से संलग्न होते हैं। अतः मांग-पूर्ति और आय-व्यय के संयुक्त विचार के अन्तर्गत अनेकानेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति का संदर्भ होता है। हमारा अनुभव इस सम्बन्ध में यही है कि वर्तमान में मांग-पूर्ति का विचार और आय-व्यय का विचार पृथक-पृथक किया जाता है। मांग-पूर्ति का सिद्धान्त गढ़कर ‘वस्तु आदि’ का मूल्य जैसे-तैसे निर्धारित कर लिया जाता है। आय-व्यय का सिद्धान्त गढ़कर जिस तिस प्रकार से बैंकनोट दिए अथवा लिए जाते हैं। जैसे-तैसे मूल्य के ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान बैंकनोटों के लेन-देन में अनेक व्यक्ति अन्य अनेकों व्यक्तियों से जिस-तिस प्रकार से कर लेते हैं। मांग-पूर्ति और आय-व्यय के संयुक्त विचार के आदर्श अवस्था में अनेकानेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति को केन्द्र में रखकर जब हम विचार करेंगे तो उन व्यक्तियों का रोजगार, मांग-पूर्ति और आय-व्यय के केन्द्र में होगा, क्योंकि रोजगार प्राप्त व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

मांग-पूर्ति और आय-व्यय के केन्द्र में जहाँ व्यक्ति है और उसकी आवश्यकताएँ हैं वहीं उस केन्द्र का विस्तार व्यक्ति के लिए रोजगार के अवसरों का सृजन है। रोजगार के अवसरों के सृजन के संदर्भ में व्यक्ति जो कुछ करता है, वह यही है कि समुदाय स्तर पर वह अन्य व्यक्तियों से आय-व्यय के अन्तर्गत बैंकनोटों का लेन-देन करता है एवं वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि की मांग व उनकी आपूर्ति (मांग-पूर्ति) के अन्तर्गत अन्य व्यक्तियों से वह सेवाओं का आदान-प्रदान करता है।

व्यक्ति को प्राप्त रोजगार के अवसर ही वस्तुतः मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय को जारी रखने की उर्जा है। रोजगार प्राप्त किसी व्यक्ति ने जो भी सेवाएँ प्रदान की है और उन सेवाओं से उसने जो भी ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन किया है अथवा ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति जिस अनुपात में उस व्यक्ति ने किया है उस अनुपात में स्वयं वह व्यक्ति अन्य अनेक व्यक्तियों से ‘वस्तु आदि’ की मांग करता है और उसका उपभोग करता है, जिससे स्वयं उस व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति भी होती है। आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके इसके लिए व्यक्ति को रोजगार के अवसर चाहिए। रोजगार के अवसर जब कभी बनते हैं, व्यक्तिसमुदाय के लिए बनते हैं। व्यक्तिसमुदाय के लिए बने रोजगार के अवसरों में से व्यक्तिविशेष अपनी योग्यता अथवा क्षमता के आधार पर अपने लिए रोजगार के अवसर जुटाता है।

रोजगार प्राप्त व्यक्ति वस्तुतः श्रम करता है, श्रम के अवसर ही व्यक्ति को प्राप्त रोजगार के अवसर हैं। व्यक्तिसमुदाय के लिए बने रोजगार के अवसरों का सृजन व्यक्ति समुदाय स्तर पर सेवाओं (श्रम) के आदान-प्रदान से करते हैं और रोजगार के जितने अवसरों का सृजन व्यक्ति करते हैं, उसे व्यापक अर्थ में ‘श्रम के अवसर’ कहेंगे। श्रम के बने अवसरों का सम्बन्ध व्यक्ति समुदाय से होता है। किसी व्यक्ति के लिए श्रम के अवसर नहीं बनते हैं, श्रम के अवसर व्यक्तिसमुदाय के लिए बनते हैं। व्यक्तिसमुदाय के लिए बने श्रम के अवसरों में से व्यक्तिविशेष अपने लिए जितने रोजगार के अवसर जुटाता है, उसे व्यापक अर्थ में व्यक्ति को प्राप्त रोजगार के अवसर कहेंगे। व्यक्तिसमुदाय के लिए बने श्रम के अवसर तथा व्यक्ति के लिए बने रोजगार के अवसर दोनों समान अवसर हैं। व्यक्ति के संदर्भ में जिसे हम रोजगार के अवसर कहेंगे, व्यक्तिसमुदाय के संदर्भ में उसे ही हम श्रम के अवसर कहेंगे।

हम केवल ‘श्रम’ करते हैं, शेष सब कुछ प्रकृति ने दिया हुआ है, इस व्यापक अर्थ में हम आपूर्ति केवल ‘श्रम’ की करते हैं, इसलिए मांग केवल ‘श्रम’ की होगी शेष प्रकृति प्रदत्त है। आय-व्यय के अन्तर्गत बैंकनोटों को लेने (आय) के क्रम में ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से व्यक्ति संलग्न होता है एवं बैंकनोट देने (व्यय) के क्रम में ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से व्यक्ति संलग्न होता है। बैंकनोटों के व्यय से ‘वस्तु आदि’ की मांग बनती है। ‘वस्तु आदि’ के मांग के आधार में ‘वस्तु आदि’ का उपभोग है। ‘वस्तु आदि’ का उपभोग होने से व्यक्तिसमुदाय के लिए श्रम के अवसर (रोजगार) बनते हैं। इसलिए, मांग का अर्थ ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से बने श्रम के अवसर हैं और श्रम के अवसर बनाने के लिए दिए गए बैंकनोट व्यक्ति द्वारा किया गया ‘व्यय’ है।

‘वस्तु आदि’ का उत्पादन होने से उनकी आपूर्ति सम्भव है। ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति करने से व्यक्ति को बैंकनोटों की आय होती है। ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन (आय) से संलग्न व्यक्ति के लिए रोजगार (श्रम) के अवसर बनते हैं, इसलिए, आपूर्ति का अर्थ ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन में श्रम के बने अवसर (रोजगार) हैं और रोजगार के अवसरों पर लिए गए बैंकनोट व्यक्ति को होने वाली ‘आय’ है।

उत्पादन (वस्तु आदि की आपूर्ति) के बदले उपभोग (वस्तु आदि की मांग) अथवा उपभोग के बदले उत्पादन को बैंकनोटों के आय-व्यय का अधारभूत तत्व मानते हुए मांग-पूर्ति और आय-व्यय का संयुक्त विचार करने से मांग, आपूर्ति, आय, व्यय इन शब्दों में परिभाषित होगा –

मांग : ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से बने श्रम के अवसर ‘वस्तु आदि’ की मांग है।

आपूर्ति : ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन में बने रोजगार के अवसर ‘वस्तु आदि’ की आपूर्ति है।

आय : ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन के अवसरों पर लिए गए बैंकनोट व्यक्ति को होने वाली आय है।

व्यय : ‘वस्तु आदि’ के उपभोग के अवसरों पर दिए गए बैंकनोट व्यक्ति द्वारा किया गया व्यय है।

3.06 बाजार का घटनाक्रम

बैंकनोटों पर मुद्रित “मैं धारक को पचास रुपए अदा करने का वचन देता हैं” यह वचनखण्ड बैंकनोटों का माप दर्शाता है और उसका व्यापक अर्थ भी है। वचनखण्ड में ‘मैं’ और ‘धारक’ से किन्हीं दो व्यक्तियों का बोध होता है। वचनखण्ड का ‘धारक’ कोई व्यक्ति बैंकनोट देने वाला व्यक्ति है। बैंकनोट देकर बदले में ‘वस्तु आदि’ लेकर वह व्यक्ति (धारक) ‘वस्तु आदि’ का उपभोग करता है एवं बैंकनोटों का ‘धारक’ वह व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

वचनखण्ड़ का ‘मैं’ कोई व्यक्ति बैंकनोट लेने (ग्रहण) वाला व्यक्ति है। बैंकनोट लेकर वह व्यक्ति (मैं) निर्धारित मूल्य (माप) के ‘वस्तु आदि’ देकर, बैंकनोटों का ‘मैं’ वह व्यक्ति अन्य किसी व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) व्यक्ति की आवश्यकताएँ हैं जो उसकी मांग बनकर प्रस्तुत होती हैं एवं कोई व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ की (मूल्य) अपनी मांग के अनुरूप माप में बैंकनोट व्यय करता है। यह अन्य शब्दों में ‘मांग के संगत व्यय’ कहलाएगा और बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का अंश ‘धारक को पचास रुपए अदा करना’ यह ‘मांग के संगत व्यय’ को दर्शाता है।

अन्य व्यक्ति के किसी मांग की आपूर्ति करता हुआ व्यक्ति को बदले में निर्धारित माप में बैंकनोटों की ‘आय’ होती है व्यक्ति के आय का निर्धारण उसके द्वारा की गई ‘वस्तु आदि’ की (मूल्य) आपूर्ति के अनुरूप होता है। यह अन्य शब्दों में ‘आपूर्ति के संगत आय’ कहलाएगा। बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ का अंश मैं….. वचन देता हूँ’ यह ‘आपूर्ति के संगत आय’ को दर्शाता है।

बैंकनोटों का ‘धारक’ कोई व्यक्ति जितना कुछ व्यय करता है, व्यय किए गए वही बैंकनोट अन्य किसी व्यक्ति (मैं) की आय बनकर प्रस्तुत होता है। किसी व्यक्ति (धारक) के ‘वस्तु आदि’ के मांग की ही आपूर्ति अन्य कोई व्यक्ति (मैं) करता है। अतएव किसी व्यक्ति (धारक) के ‘मांग के संगत व्यय’ एवं अन्य व्यक्ति (मैं) के ‘आपूर्ति के संगत आय’ पृथक न होकर सम्बन्धित विषय हैं। सम्बन्धित उस विषय को जो बैंकनोटों पर मुद्रित “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचनखण्ड में व्यक्त हुआ है, उसे ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ संक्षेप में कह सकते हैं।

‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ का यह विषय जो बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड में व्यक्त हुआ है, यही वह व्यवस्था है जो समुदाय स्तर पर अनेकानेक व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के घटना के मूल में है। ‘घटना’ शब्द का प्रयोग प्रत्येक उस संदर्भ के लिए होता है जहाँ कर्ता का अपने किए पर वश नहीं होता है और किसी व्यवस्था के अधीन वह सब कुछ ‘घटित’ हो जाता है जिसे कर्ता ने किया ही नहीं है। उदाहरण के लिए सड़क पर घटित किसी दुर्घटना के संदर्भ में यही सब कुछ होता है। दुर्घटनाग्रस्त वाहन चालक ने दुर्घटना के लिए कुछ नहीं किया और जो कुछ घटित हुआ उस पर उसका वश नहीं चलता और वह सब कुछ घटित हो जाता है जिसे दुर्घटना कहा गया है।

अन्य व्यक्तियों द्वारा प्रदत्त सेवाओं पर व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति निर्भर है एवं किसी अन्य व्यक्ति के किए पर चूँकि किसी व्यक्ति का वश नहीं चलता है इसलिए अन्य व्यक्तियों की सेवाएँ प्रदान होने से व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होने को ‘घटना’ कहना उपयुक्त होगा। 50 रुपए माप के बैंकनोट देने से बदले में निर्धारित पचास रुपए मूल्य (माप) के ‘वस्तु आदि की अदायगी एवं उतने मूल्य की ‘वस्तु आदि’ देकर से बदले में पचास रुपए का बैंकनोट लिया जाना यह बाजार में व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के घटना को मूल में है और यही विषय बैंकनोटों पर मुद्रित “मैं धारक को पचास रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ में व्यक्त हुआ है। बैंकनोटों के लेन-देन के किसी अवसर पर ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ की कोई घटना घटित होती है एवं समुदाय स्तर पर व्यक्ति एवं अनेकानेक अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

व्यक्ति की आवश्यकताएँ प्रतिदिन प्रस्तुत होती हैं तथा उस काल तक अनवरत प्रस्तुत होती रहेंगी जब तक व्यक्तिसमुदाय में अनेकानेक व्यक्ति जीवित होंगे। आवश्यकताओं की पूर्ति में कोई व्यक्ति बैंकनोटों की जिन राशियों का लेन-देन करता है, समान उन्हीं राशियों का लेन-देन व्यक्तिसमुदाय के अनेकानेक अन्य व्यक्ति भी करते हैं। बैंकनोटों के लेन-देन के उन सब अवसरों पर मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय’ की घटनाएँ पुनः पुनः क्रमवार प्रस्तुत होती जाती हैं जो अनवरत जारी रहता है। अतएव जिसे ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय की घटना’ कहा गया है वह व्यापक अर्थ में ‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम’ है।

समुदाय स्तर पर बैंकनोटों के लेन-देन में बदलें में निर्धारित मूल्य के वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के उत्पादन एवं उपभोग से सम्बन्धित इस पूरे विषय को ‘माँग पूर्ति के संगत आय-व्यय’ का घटनाक्रम या बोलचाल में इसे ‘बाजार’ कहा जाता है। बाजार नाम के इस घटनाक्रम में घटनावश व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

व्यक्तिसमुदाय के अनेकानेक व्यक्तियों में पुनः पुनः बैंकनोटों का लेन-देन एवं उस लेन-देन में पुनः पुनः ‘वस्तु, आदि’ की मांग व उन मांगों की आपूर्ति का जो आवर्तन समुदाय स्तर पर प्रस्तुत होता है उसके हर आवर्तन में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की व्यक्तियों की ‘मांग’ एवं व्यक्तियों द्वारा की गई आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की ‘आपूर्ति’ तथा उन व्यक्तियों का बैंकनोटों का ‘व्यय’ एवं व्यक्तियों की बैंकनोटों की ‘आय’ वह नहीं होता जो पहले वाले आवर्तन में था। इसलिए मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का आवर्ती घटनाक्रम किसी बन्द वृत्त की भांति नहीं होगा बल्कि शंख के घेरे के सदृश होगा, क्योंकि शंख का प्रत्येक घेरा वृत्ताकार होते हुए भी बन्द वृत्त नहीं होता है बल्कि अनंत वृत्त होता है, उसका न आदि है न अंत और न ही वह बंद है।

‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के अनादि अनंत घटनाक्रम’ में बैंकनोटों की ‘आय’ से संलग्न व्यक्ति निर्धारित मूल्य के ‘वस्तु आदि की आपूर्ति’ करता है और इसके अन्तर्गत वह व्यक्ति अन्य व्यक्ति से लिए गए बैंकनोटों के माप में उस अन्य व्यक्ति को व्यक्ति स्वयं अपना तथा ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न अनेक अन्य व्यक्तियों की सेवाएँ वह व्यक्ति प्रदान करता है। प्राकृतिक संसाधन प्रकृति से व्यक्ति को निःशुल्क प्राप्त होते हैं और किसी ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन में व्यक्ति जो कुछ करता है वह ‘श्रम’ के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है, जो (श्रम) व्यक्ति की सेवाएँ बनकर अन्य व्यक्ति को प्रदान होती हैं।

बैंकनोटों के ‘व्यय’ से संलग्न व्यक्ति को निर्धारित मूल्य के आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की उसके मांग की अदायगी होती है और इसके अन्तर्गत अन्य व्यक्ति को दिए गए बैंकनोटों के माप में उसे ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न अनेक अन्य व्यक्तियों की सेवाएँ अदा होती हैं। सेवाओं के आदान-प्रदान के इस प्रसंग में बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ से निर्धारित वचनबद्धता का निर्वाह यदि व्यक्ति करता है तो यह सेवाओं के आदान-प्रदान की आदर्श अवस्था है।

बैंकनोटों के लेन-देन के प्रत्येक अवसर पर बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ से निर्धारित वचनबद्धता के निर्वाह से अर्थात् निर्धारित सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान से व्यक्ति की ‘वस्तु आदि की मांग’ तथा उसका बैंकनोटों का ‘व्यय’ एक दूसरे का पर्याय बन जाते हैं एवं व्यक्ति द्वारा की गई ‘वस्तु आदि की आपूर्ति’ तथा उसका बैंकनोटों की ‘आय’ एक दूसरे का पर्याय बन जाते हैं। परिणामस्वरूप मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम सतत् जारी रहता है और व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहती है।

‘मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम’ यह व्यक्ति के सामुदायिक (सम अदायगी) जीवन में व्यक्ति के सेवाओं के आदान-प्रदान का घटनाक्रम है तथा आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन एवं उनके उपभोग से व्यक्तियों के आवश्यकताओं के पूर्ति का घटनाक्रम है। मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय के इस घटनाक्रम को बोलचाल में ‘बाजार’ कहा जाता है। बाजार इन शब्दों में परिभाषित होगा :

बाजार की परिभाषा : मांग-पूर्ति के संगत आय-व्यय का घटनाक्रम बाजार है।

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