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2.22 श्रम से श्रम
कार्य सम्पन्न करता हुआ व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों के कॉट-छाँट से कार्य के सम्बन्ध में मन में ‘शब्दाकृति’ बनाता है। मन में कार्य के सम्बन्ध में शब्दाकृति बनाना व्यक्ति का ‘काम’ कहलाता है।
निर्धारित ‘काम के अनुरूप व्यक्ति कर्म (शरीर से क्रिया) करता है और काम और कर्म करने के लिए व्यक्ति समय व्यतीत करता है। ‘काम और कर्म करता हुआ व्यक्ति द्वारा कार्य सम्पन्न करने के लिए समय व्यतीत करने से उसका ‘श्रम’ प्रस्तुत होता है।
श्रम करने से ‘काम और कर्म करने की व्यक्ति की पात्रता बनती है। व्यक्ति जिस प्रकार से श्रम करता है उसकी पात्रता उस प्रकार की बनती है। पात्रता के अनुरूप समय व्यतीत कर कोई कार्य सम्पन्न करने से व्यक्ति की पात्रता सम्पन्न उस कार्य में उसका श्रम बनकर पुनः प्रस्तुत होता है।
श्रम करने से व्यक्ति संस्कारित होता है। संस्कारित होने से व्यक्ति की पात्रता का गठन होता है। पात्रता के अनुरूप समय व्यतीत कर कोई कार्य सम्पन्न करने से व्यक्ति की पात्रता सम्पन्न उस कार्य में उसका श्रम बनकर पुनः प्रस्तुत होता है।
2.23 श्रम से श्रम का प्रसंग
‘श्रम, पात्रता, संस्कार, पात्रता, श्रम’ के घटनाक्रम का प्रसंग अर्थात् ‘श्रम से श्रम’ का प्रसंग वैसा ही है जैसे विद्युत (उर्जा) प्रवाह से किसी विद्युत रासायनिक सेल (गेल्वनिक सेल) में विद्युत विच्छेदन होता है एवं विद्युत-विच्छेदन से विद्युत रासायनिक सेल में रासायनिक उर्जा का विद्युत उर्जा में रूपान्तरण होता है। रूपान्तरित यह विद्युत उर्जा रासायनिक सेल में प्रवाहित होकर सेल में विद्युत-विच्छेदन को जारी रखता है एवं विद्युत विच्छेदन से सेल में रासायनिक उर्जा का विद्युत उर्जा में रूपान्तरण जारी रहता है। विद्युत रासायनिक सेल में विद्युत विच्छेदन जारी रहने से एवं इसके कारण रासायनिक उर्जा का विद्युत उर्जा में रूपान्तरण से सेल में विद्युत (उर्जा) प्रवाह बनता है। विद्युत रासायनिक सेल में प्रारम्भिक स्तर पर विद्युत प्रवाह से सेल में विद्युत-विच्छेदन होकर रासायनिक उर्जा का रूपान्तरण विद्युत उर्जा में होकर सेल में विद्युत प्रवाह बनने से, प्रारम्भिक स्तर पर सेल में जो कुछ विद्युत प्रवाह बना है वह पुनः प्रस्तुत होकर सेल में विद्युत निरन्तर प्रवाहित होता रहता है। सेल में बने विद्युत के निरन्तर प्रवाह को सेल का विद्युत परिपथ कहते हैं।
विद्युत रासायनिक सेल की संरचना से ‘श्रम, पात्रता, संस्कार, पात्रता, श्रम के घटनाक्रम के तुलनात्मक अध्ययन के संदर्भ में व्यक्ति की तुलना विद्युत रासायनिक सेल से होगा। व्यक्ति के ‘श्रम’ की तुलना सेल में प्रवाहित विद्युत उर्जा से होगा। व्यक्ति के ‘संस्कार’ की तुलना सेल में विद्युत-विच्छेदन से होगा। व्यक्ति के पात्रता की तुलना सेल में रासायनिक उर्जा से होगा। व्यक्ति आजीवन पुनः पुनः श्रम करता है, यह व्यक्ति के जीवन में बना श्रम परिपथ है। व्यक्ति के जीवन में बना श्रम परिपथ विद्युत रासायनिक सेल में बने विद्युत परिपथ की भांति है। किसी विद्युत रासायनिक सेल में बना ‘विद्युत परिपथ’ भौतिक क्रिया है जिसका प्रत्यक्ष प्रयोग होता है एवं उसका प्रयोग होता हुआ हम देख सकते हैं, किन्तु किसी व्यक्ति के जीवन का ‘श्रम परिपथ’ अभौतिक क्रिया है जिसका प्रत्यक्ष प्रयोग होते हुए हम नहीं देख सकते हैं। विद्युत रासायनिक सेल की संरचना दर्शाना वाला चित्र नीचे दिया गया है एवं इस संदर्भ में सम्बन्धित तुलनात्मक अध्ययन अगले पेज में दिया गया है।
विद्युत परिपथ के संगत श्रम परिपथ
| तालिका 1 : विद्युत परिपथ एवं विद्युत रासायनिक सेल | तालिका 2 : श्रम, पात्रता, संस्कार एवं श्रम ऊर्जा |
| 01. सेल की संरचना | 01. व्यक्ति का व्यक्तित्व |
| 02. सेल में रासायनिक पदार्थ के अणु | 02. व्यक्ति को ज्ञात शब्द |
| 03. धन इलेक्ट्रोड (धनोद) | 03. व्यक्ति की इच्छाशक्ति |
| 04. ऋण इलेक्ट्रोड (ऋणोद) | 04. व्यक्ति का संकल्पबल |
| 05. धनोद की ओर आकर्षित धनायन | 05. ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन का संकल्प |
| 06. ऋणोद की ओर आकर्षित ऋणायन | 06. ‘वस्तु आदि’ के उपभोग का संकल्प |
| 07. धनोद का ऑक्सीकरण | 07. व्यक्ति का जीवनधारण |
| 08. ऋणोद का अवकरण | 08. व्यक्ति का जीवनयापन |
| 09. सेल में लवण-सेतु की भूमिका | 09. व्यक्ति का जीवनसंचय |
| 10. सेल में विद्युत-विच्छेदन | 10. व्यक्ति का संस्कारित होना |
| 11. आयनों का विस्थापन | 11. कार्य करने का व्यक्ति का संकल्प |
| 12. ऋणोद पर धातु की चढ़ी परत | 12. व्यक्ति के संस्कार |
| 13. सेल में रासायनिक उर्जा | 13. व्यक्ति की पात्रता |
| 14. सेल का विद्युत वाहक बल | 14. व्यक्ति के भरण-पोषण की व्यवस्था |
| 15. विद्युत परिपथ | 15. बाजार का घटनाक्रम |
| 16. परिपथ का चालक | 16. लेन-देन का साधन बैंकनोट (रुपए) |
| 17. चालक का अवरोध | 17. मुद्रा के मान का निर्धारण |
| 18. परिपथ में इलेक्ट्रॉन | 18. व्यक्ति के वचन अर्थात् कार्य का हेतु |
| 19. परिपथ में विद्युत धारा | 19. सेवाओं का आदान-प्रदान |
| 20. परिपथ में विद्युत उर्जा | 20. व्यक्ति का श्रम |
| 21. परिपथ में विद्युत शक्ति | 21. व्यक्ति की क्रयशक्ति |
| 22. परिपथ में ट्रांसफार्मर | 22. विविध सम्पन्न कार्य |
| 23. ट्रांसफार्मर का विद्युत वाहक बल | 23. व्यक्ति के रोजगार के अवसर |
| 24. सेल की रासायनिक उर्जा का विद्युत उर्जा में रूपान्तरण का संदर्भ | 24. आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सामुदायिक जीवन जीने का संदर्भ |
व्यक्ति का मन सूक्ष्म (उर्जा) है, जिसका वासस्थान व्यक्ति के शरीर (स्थूल) का वीर्य है। यह ‘वीर्य’ व्यक्ति के जन्म का बीज है और व्यक्ति का जन्म ब्रह्माण्ड की घटना है। ब्रह्माण्ड की गतियों के कारण जो कुछ ध्वनियाँ हैं, उसे ब्रह्माण्ड की ‘शब्द उर्जा’ यदि कहें तो वह उर्जा व्यक्ति के जन्म के साथ उसे ‘ज्ञात शब्द’ हैं। व्यक्ति का ‘मन’ कार्यशाला है जहाँ व्यक्ति उसे ‘ज्ञात शब्दों’ के कॉट-छॉट से अपने विचार, बुद्धि, ज्ञान, विवेक.. आदि रचनाएँ बनाता है। किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए आवश्यक विचारों को व्यक्ति मन (कार्यशाला) में धारण करेगा। विचार करता हुआ व्यक्ति का मन ‘कर्ता’ की भूमिका में होता है। किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए उस कार्य के हेतु को मन में धारण करना, अर्थात् व्यक्ति द्वारा किसी कार्य को सम्पन्न करने का ‘वचन’ लेना व्यक्ति के मन की क्रिया है। वचन लेता हुआ व्यक्ति का मन ‘क्रिया’ कर रहा होता है। व्यक्ति का ‘कर्म’ उसके कर्ता मन की क्रिया का परिणाम (फल) है। फल भोग का विषय है, अतः किसी कार्य को सम्पन्न करने से सम्बन्धित व्यक्ति के कर्म का तात्पर्य हुआ व्यक्ति का ‘भोक्ता’ मन। किसी कार्य को सम्पन्न करने से सम्बन्धित विचारों को मन में धारण करना (कर्ता मन) और उन विचारों की बहुआयमी रचना बनाना (क्रिया मन), तदनुसार कार्य सम्पन्न करने के लिए तत्पर होना (भोक्ता मन) व्यक्ति का मनसा, वचसा, कर्मणा श्रम कहलाएगा। श्रम करता हुआ व्यक्ति मनसा (कर्ता मन), वचसा (क्रिया मन), कर्मणा (भोक्ता मन) किसी कार्य को सम्पन्न कर रहा होता है।
मनसा, वचसा, कर्मणा श्रम करने वाला व्यक्ति उससे संलग्न कार्य के सम्बन्ध में आवश्यक प्रत्येक विचार को मन में धारण करेगा एवं तदनुसार वचन लेकर अभीष्ट कर्म में प्रवृत्त होगा। इसके विपरीत मनसा, वचसा, कर्मणा श्रम न करने के प्रसंग में व्यक्ति से संलग्न कार्य कुछ होगा, वह विचार अन्य कार्य का करेगा एवं आधा अधूरा वचन लेकर अभीष्ट कर्मों से व्यक्ति विमुख रहेगा। मनसा, वचसा, कर्मणा व्यक्ति किस प्रकार का श्रम कर रहा है, यह व्यक्ति को ‘ज्ञात शब्दों’ पर निर्भर करता है, क्योंकि किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए निश्चित कुछ शब्दों का ज्ञान होने से उस कार्य को सम्पन्न करने के लिए आवश्यक विचार करने में व्यक्ति समर्थ होता है एवं कार्य सम्पन्न करते हुए व्यक्ति मनसा, वचसा, कर्मणा योग्य श्रम करता है। व्यक्ति को ज्ञात शब्द (शब्द उर्जा) उसके (व्यक्ति) संस्कारित होने के क्रम में व्यक्ति के श्रम में रूपान्तरित होता है। विद्युत रासायनिक सेल की संरचना से ‘श्रम उर्जा’ के तुलनात्मक अध्ययन में व्यक्ति को ‘ज्ञात शब्दों’ की तुलना विद्युत रासायनिक सेल के रासायनिक पदार्थ के अणुओं से की गई है।
2.24 सेल का धन एवं ऋण इलेक्ट्रोड और व्यक्ति का संकल्पबल तथा इच्छाशक्ति
कार्य सम्पन्न करने का व्यक्ति का निश्चय, कार्य से संलग्न होने के बाद व्यक्ति का संकल्प कहलाता है। कोई व्यक्ति किसी कार्य से संलग्न होकर उस कार्य को सम्पन्न करता है तो कार्य सम्पन्न करने का व्यक्ति के संकल्प की पुष्टि होती है। व्यक्ति के संकल्प में उसका निश्चय निहित है। संकल्प, निश्चय आदि व्यक्ति के मन में बनी भिन्न शब्दाकृतियाँ हैं। कार्य करने का संकल्प लेना एवं कार्य से व्यक्ति की संलग्नता कार्य सम्पन्न करने के लिए पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति पूरे मन से कार्य सम्पन्न करे यह आवश्यक है। अन्य शब्दों में व्यक्ति मन से बल लगाकर संलग्न कार्य को सम्पन्न करने का प्रयत्न करे यह आवश्यक है। संकल्प लेकर उस विषय में व्यक्ति द्वारा मनसा कार्य पर आरोपित बल को व्यक्ति का ‘संकल्पबल’ कहते हैं। व्यक्ति द्वारा कार्य पर आरोपित संकल्पबल का विशिष्ट अर्थ है।
व्यक्ति किसी कार्य को सम्पन्न करने का विचार अपने मन में लाता है। व्यक्ति के विचार को बीज तथा उसके मन को भूमि मान लें तो व्यक्ति का संकल्प उस पौधा समान है, जो उपजाऊ भूमि में बीज के विकसित होने से बनता है तथा उसी भूमि पर खड़ा होता है। व्यक्ति के संस्कार उसके मन (भूमि) की उर्वराशक्ति है। बीज (विचार) से पौधा (संकल्प) अंकुरित होने के क्रम में बीज पौधे में समा जाता है और उसका स्थानापन्न जड़ प्रकट होता है। पौधे का जड़ भूमि को जितना अधिक जकड़ेगा, पौधा भूमि पर उतनी ताकत से खड़ा होगा। कार्य सम्पन्न होने अथवा न होने के प्रति व्यक्ति के मन की वेदना जड़ समान है।
व्यक्ति का मन (भूमि) संस्कारित (उपजाऊ) है। व्यक्ति ने कार्य सम्पन्न करने का मन में विचार (बीज) किया और उसने कार्य सम्पन्न करने का संकल्प (पौधा) भी लिया है तथा कार्य सम्पन्न होने अथवा न होने की वेदना मन में धारण किया है, ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति का संकल्प बलवती होकर प्रस्तुत होता है। इसे व्यक्ति का ‘संकल्पबल’ कहा गया है। किसी कार्य का जो कुछ ‘हेतु’ व्यक्ति के जीवन में है, उस कार्य को सम्पन्न करने के पूर्व व्यक्ति उस हेतु को पाने का उसी प्रकार ‘वचन’ लेता है जिस प्रकार कार्य सम्पन्न करने का व्यक्ति ‘संकल्प’ लेता है। किसी कार्य के सम्बन्ध में व्यक्ति ने ‘वचन’ लिया इसका अभिप्राय है, कार्य का जो ‘हेतु’ व्यक्ति के जीवन में है उस ‘हेतु’ को व्यक्ति ने मन में धारण किया है।
व्यक्ति के ‘संकल्प’ में किसी कार्य को सम्पन्न करने का व्यक्ति का ‘निश्चय’ निहित है। व्यक्ति के ‘वचन’ में उस कार्य को सम्पन्न करने का व्यक्ति का ‘हेतु’ निहित है।
कार्य को सम्पन्न करने के सम्बन्ध में ‘वचन’ लेकर व्यक्ति जिस अनुपात में अपने ज्ञानेन्द्रियों (मन) को व्यवसायरत रखता है, उस परिमाण में व्यक्ति की कार्य करने की ‘इच्छा’ बनती है। कार्य को सम्पन्न करने के सम्बन्ध में ‘वचन’ लेकर जिस अनुपात में व्यक्ति अपने कर्मेन्द्रियों (तन) को व्यवसायरत रखता है उस परिमाण में व्यक्ति की कार्य करने की ‘शक्ति’ बनती है। किसी कार्य को सम्पन्न करने की व्यक्ति की इच्छा एवं शक्ति का संयुक्त परिणाम उसकी ‘इच्छाशक्ति’ बनकर प्रकट होती है। कार्य के सम्बन्ध में वचन लेने से, कार्य का हेतु व्यक्ति के सम्मुख स्पष्ट होने से, कार्य करने की व्यक्ति की ‘इच्छाशक्ति’ बनती है। व्यक्ति के इच्छाशक्ति के मूल में उसके वचन हैं। व्यक्ति के संकल्पबल के मूल में उसके संकल्प हैं।
कार्य का हेतु व्यक्ति के लिए जो हो उसके कारण व्यक्ति के किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति होती है, अतः व्यक्ति के ‘वचन’ का सम्बन्ध उसके आवश्यकताओं की पूर्ति से है। आवश्यकताओं की पूर्ति का वचन लेकर व्यक्ति किन्हीं वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का उपभोग करता है, इससे व्यक्ति का ‘वचन’ पूर्ण होता है। संकल्प लेकर कार्य सम्पन्न कर व्यक्ति किन्हीं ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन करता है. इससे व्यक्ति का ‘संकल्प’ पूर्ण होता है। संकल्प लेने तथा वचन लेने के अवसरों पर भिन्न ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन होकर व ‘वस्तु आदि’ का उपभोग होकर आवश्यकताओं की पूर्ति होने से व्यक्ति के भरण-पोषण की व्यवस्था होती है। भरण-पोषण की व्यवस्था के अन्तर्गत किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन का संकल्प लेना व्यक्ति के ‘संकल्पबल’ को दर्शाता है। भरण-पोषण की व्यवस्था के अन्तर्गत किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उपभोग का वचन लेना व्यक्ति के ‘इच्छाशक्ति’ को दर्शाता है। भर इच्छाशक्ति व्यक्ति कार्य सम्पन्न करता है, अर्थात् व्यक्ति किसी कार्य को उस सीमा तक सम्पन्न करता है जिस सीमा तक कार्य सम्पन्न करने की उसकी ‘इच्छाशक्ति’ बनती है। कार्य करने के संदर्भ में व्यक्ति का संकल्पबल चूँकि केन्द्रीय विषय है, इसलिए संकल्पबल के आधार पर इच्छाशक्ति की सीमा तक व्यक्ति कार्य सम्पन्न करता है।
2.25 सेल में जारी विद्युत-विच्छेदन और व्यक्ति के संस्कारित होने का विषय
अकारण कुछ नहीं होता है, प्रत्येक कार्य का निश्चित एक कारण अवश्य होता है. इस संदर्भको ‘कार्यकारण विषय’ यदि कहें तो कार्यकारण विषय के संदर्भ में ‘कार्यकारण’ कहने का तात्पर्य उन सब कार्यों से है जिन्हें व्यक्ति किसी न किसी कारण सम्पन्न करता है। ‘श्रम’ प्रसंग में वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) की मांग वह निश्चित कारण होता है जिसके कारण व्यक्ति किन्हीं कार्यों को सम्पन्न करता है एवं उन कार्यों को सम्पन्न करने के लिए वह श्रम करता है। कार्यकारण (कार्य) के मूल में स्थित कारण को कार्य से संलग्न व्यक्ति की ‘जवाबदेही’ कहते हैं।
किसी कार्य को सम्पन्न करता हुआ किसी व्यक्ति की जवाबदेही कार्य से पृथक कोई विषय नहीं है, बल्कि कार्य के मूल में स्थित कारण ही व्यक्ति के सदर्भ में उसकी ‘जवाबदेही’ कहलाती है, जिसे कार्य के संदर्भ में ‘कारण’ कहा गया है। कार्य सम्पन्न होने से कार्य के मूल में स्थित कारण लुप्त हो जाता है तथा कार्य से संलग्न व्यक्ति का ‘कर्तव्य’ पूर्ण होता है। कार्य से संलग्न व्यक्ति की जवाबदेही तथा उस व्यक्ति का कर्तव्य समान विषय होते हुए भी भिन्न भावों को अभिव्यक्त करते हैं। कार्यकारण विषय का संदर्भ उनका उभयनिष्ट तत्व है। कार्यकारण विषय के संदर्भ को कोई रेखाखण्ड मान लें एवं उस रेखाखण्ड़ के दो सिरों में से एक सिरे को व्यक्ति तथा दूसरे सिरे को कार्य मान लें तो, व्यक्ति सिरे के निकटस्थ कार्यकारण विषय (रेखाखण्ड़) व्यक्ति का कर्तव्य कहलाएगा, तथा कार्य सिरे के निकटस्थ कार्यकारण विषय (रेखाखण्ड) व्यक्ति की जवाबदेही कहलाएगा।
संकल्पबल के कारण चूँकि व्यक्ति श्रम करता है तथा कार्य सम्पन्न करता है, इसलिए ‘कार्यकारण विषय’ जो कार्य के मूल में स्थित कारण है, उस कार्यकारण विषय को दर्शाने वाले रेखाखण्ड़ का ‘मध्यबिन्दु’ व्यक्ति के संकल्पबल को दर्शाएगा। इस मध्यबिन्दु का रेखाखण्ड़ के दोनों सिरों तक विस्तार (जिससे रेखा बनता है) व्यक्ति के संकल्पबल से कार्यसम्पन्न होना दर्शाता है। व्यक्ति के कर्तव्य निर्वाह को व्यक्ति का ‘कर्तव्यबोध’ कहते हैं। व्यक्ति द्वार प्रकट जवाबदेही को व्यक्ति की ‘कार्यदक्षता’ कहते हैं। कार्यदक्षता से कार्य पर व्यक्ति की सिद्धता (तन सम्बन्धित) बनती है। कर्तव्यबोध कार्य के प्रति व्यक्ति की आसक्ति (मन सम्बन्धित) दर्शाता है। कार्यदक्षता व कर्तव्यबोध की आदर्श स्थिति में कार्य से संलग्न होने के प्रथम क्षण ही व्यक्ति कार्य के मूल में स्थित कारण को जीवनतुल्य मानकर अर्थात् अपने जीवन का सर्वस्व मानकर व्यक्ति कार्य करने का संकल्प लेगा।
इससे व्यक्ति का संकल्पबल आदर्श स्थिति में होगा। अन्य शब्दों में व्यक्ति का संकल्पबल, कार्यदक्षता तथा कर्तव्यबोध समान माप (आदर्श स्थिति) में प्रस्तुत होंगे। किन्हीं कारणों से कोई एक अर्थात् ‘कार्यदक्षता अथवा कर्तव्यबोध या संकल्पबल’ अधिकमाप या कममाप में प्रस्तुत हो तो वह अन्य दो को प्रभावित कर तथा उनसे प्रभावित होकर अन्ततः तीनों सममाप में प्रस्तुत होंगे। व्यक्ति के संस्कारों के मूल में व्यक्ति को ज्ञात शब्द हैं जिसके दो विभाग हैं-विद्या और शिक्षा। भौतिक व्यावहारों का ‘विधितत्व’ विद्या है। मानवीय व्यवहारों का विधितत्व शिक्षा है। हिन्दी भाषा में जिस तकनीक शब्द का प्रयोग होता है वह व्यापक अर्थ में वस्तुतः विधितत्व है अर्थात् वह तत्व जिससे कोई विधि प्रभावित होती है। विद्या और शिक्षा के संर्दर्भ में व्यवहार कहने का तात्पर्य व्यक्ति के नानाविध उन अनुभूतियों से है जिन्हें श्रम करते हुए व्यक्ति आत्मसात् करता है। व्यक्ति की विद्या एवं शिक्षा का आधार लेकर व्यक्ति की कार्यदक्षता तथा व्यक्ति का कर्तव्यबोध एवं व्यक्ति का संकल्पबल एक दूसरे को प्रभावित कर तथा तीसरे, चौथे से प्रभावित होकर अन्ततः सममाप में प्रस्तुत होते हैं। इसका ज्यामितीय निरूपण वृत्त की रचना से रेखांकित किया गया है। वृत्त बनने मात्र से उसका परिधि तथा क्षेत्र निर्धारित हो जाते हैं और उसमें चाप लेने मात्र से उसकी जीवा आदि अन्य विषय निर्धारित हो जाते हैं, अर्थात् प्रत्येक दूसरे को प्रभावित करता है एवं प्रत्येक दूसरे से प्रभावित भी होता है। उसी प्रकार से व्यक्ति की कार्यदक्षता, कर्तव्यबोध, संकल्पबल, विद्या और शिक्षा आदि प्रत्येक दूसरे को प्रभावित करता है एवं प्रत्येक दूसरे से प्रभावित भी होता है फलस्वरूप वह सममाप में प्रस्तुत होते हैं और यही वह प्रसंग है जब व्यक्ति संस्कारित होता है।
| वृत्त की रचना | व्यक्ति का संस्कारित होना |
| केन्द्र : क | कार्यरत व्यक्ति |
| त्रिज्या : क, ल | कार्यरत व्यक्ति की बैंकनोटों की आय |
| परिधि : म | कार्य जिसे व्यक्ति सम्पन्न करता है |
| क्षेत्र : न | मनसा, वचसा, कर्मणा व्यक्ति का श्रम |
| जीवा : ख, ग | कार्यकारण विषय |
| चाप : ख, ल, ग | व्यक्ति का संकल्पबलसंकल्पबल के आदर्श अवस्था में यह चाप अनंत त्रिज्या के किसी वृत्त का होगा। |
| रेखाखण्ड : ख,अ | व्यक्ति की कार्यदक्षताकार्यदक्षता की आदर्श अवस्था में यह वृत्त का अर्धव्यास होगा। |
| रेखाखण्ड : ग, ब | व्यक्ति का कर्तव्यबोधकर्तव्यबोध की आदर्श अवस्था में यह वृत का अर्धव्यास होगा। |
| रेखाखण्ड : क, स | बैंकनोटों में व्यक्ति का कुल व्यय तथा उसके कुल आय में अंतर। यदि आय, व्यय से अधिक हो तो उनका अन्तर रेखाखण्ड ‘स.क’ से व्यक्त होगा उन परिस्थितियों में वृत्त केन्द्र ‘स’ होगा जो कार्यरत व्यक्ति को दर्शाता है। |
| रेखाखण्ड : अ,ल | कार्य से सम्बन्धित ‘शिक्षा’ का ज्ञान किस अनुपात में व्यक्ति की कम है। |
| रेखाखण्ड : ब,ल | कार्य से सम्बन्धित ‘विद्या’ का ज्ञान किस अनुपात में व्यक्ति को कम है। |
| रेखाखण्ड : अ,ब | आय-व्यय में किस अनुपात में व्यक्ति निर्धारित माप से कममाप में सेवाओं का आदान-प्रदान किया है। |
जीवनधारण का उद्देश्य व्यक्ति के विविध कार्यों के मूल में सदैव स्वाभाविक रूप से विद्यमान होता है, अतः जीवनधारण विषयों में व्यक्ति नियमित रूप से बैंकनोटों की कोई राशि व्यय करता है उससे उसका ‘कार्यकारण विषय’ निर्धारित होता है। जीवनधारण के लिए व्यक्ति बैंकनोटों की जितनी राशि ‘व्यय’ करता है उस राशि को वह जीवनयापन के अन्तर्गत ‘आय’ में प्राप्त करता है। बैंकनोटों की किसी राशि की ‘आय’ के लिए निर्धारित वह राशि लेकर बदले में व्यक्ति किसी वस्तु आदि का उत्पादन करता है एवं अन्य किसी व्यक्ति को अपनी सेवाएँ प्रदान करता है। बैंकनोटों (रुपए) की किसी राशि के ‘व्यय’ के अन्तर्गत निर्धारित वह राशि देकर बदले में व्यक्ति किसी ‘वस्तु आदि’ का उपभोग करता है एवं उसे अन्य व्यक्ति की सेवाएँ अदा होती हैं। सेवाएँ अदा होने से आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की व्यक्ति की मांग बनती है। सेवाएँ प्रदान करने से किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के व्यक्ति के मांगों की आपूर्ति होती है। सेवाओं के आदान-प्रदान के अनुपात में मांग-पूर्ति के अवसर बनने से व्यक्ति के ‘व्यवहार’ प्रस्तुत होते हैं। व्यक्ति का व्यवहार कहने का अभिप्राय व्यक्ति के सेवाओं के आदान-प्रदान के संयुक्त विचार से है, जहाँ ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन एवं उपभोग दोनों का ही विचार होगा। जीवनयापन तथा जीवनधारण के अन्तर्गत किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के मांग-पूर्ति के अवसरों पर निर्धारित सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान से व्यक्ति के अधिकतम व्यवहार प्रस्तुत होंगे। कार्य सम्पन्न करने में व्यक्ति के अधिकतम व्यवहार प्रस्तुत होने से निम्नलिखित बातों का विशेष महत्व होगा। पिछले पेज में दिए गए वृत्त का चित्र देखें।
1) बिन्दु ‘ल. अ. ब’ बिन्दु ‘स’ के स्थान पर होंगे, अर्थात् व्यक्ति का संकल्पबल, उसकी कार्यदक्षता एवं कर्तव्यबोध सममाप में प्रस्तुत होंगे।
2) बिन्दु ‘स’ बिन्दु ‘क’ के स्थान पर होगा, अर्थात् व्यक्ति बैंकनोटों (रुपए) की जो कुछ राशि आय में प्राप्त करेगा, बैंकनोटों (रुपए) की वह राशि व्यक्ति व्यय कर देगा।
3) रेखाखाण्ड ‘अल, बल, कल’ समरेखीय होंगे, व्यक्ति को जीवनधारण तथा जीवनयापन विषय का पूर्ण ज्ञान होगा एवं उन विषयों में वह विद्यावान व शिक्षित भी होगा।
बैंकनोटों के आय-व्यय में बदले में ‘वस्तु आदि के उत्पादन एवं उपभोग में व्यतीत समय में निर्धारित सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान से व्यक्ति के अधिकतम व्यवहार निर्धारित होते हैं। व्यक्ति के व्यवहार (अधिकतम व्यवहार) प्रस्तुत होने से व्यक्ति का संकल्पबल, कार्यदक्षता व कर्तव्यबोध सममाप में प्रस्तुत होकर व्यक्ति संस्कारित होता है। किसी विद्युत रासायनिक सेल की संरचना से व्यक्ति के ‘श्रम, पात्रता, संस्कार, पात्रता, श्रम के घटनाक्रम के तुलनात्मक अध्ययन में व्यक्ति के संस्कारित होने की तुलना सेल में हो रहे विद्युत विच्छेदन से की गई है। सेल में विद्युत विच्छेदन जब तक जारी रहता है, सेल के विद्युत परिपथ में तब तक विद्युत उर्जा का प्रवाह बना रहता है। उसी प्रकार से व्यक्ति जब तक संस्कारित होता रहता है तब तक व्यक्ति की आवश्यकताएँ बनी रहती हैं एवं उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह भरण-पोषण की व्यवस्था के अन्तर्गत समुदाय स्तर पर ‘वस्तु आदि के मांग-पूर्ति और उनके संगत बैंकनोटों (रुपए) की भिन्न राशियों के आय-व्यय के घटनाक्रम (बाजार) से संलग्न रहता है। व्यक्ति पुनः पुनः ‘श्रम’ करता रहता है मानों व्यक्ति के जीवन में ‘श्रम का प्रवाह’ बना रहता है। मृत्यु ही वह पड़ाव है जहाँ व्यक्ति संस्कारशून्य होकर अपने आवश्यकताओं से विरत होकर उसके ‘श्रम को विराम’ मिलता है।
2.26 सेल के रासायनिक पदार्थ का आयनीकरण और व्यक्ति का संकल्पक्षेत्र
संकल्प लेकर व्यक्ति कार्य सम्पन्न करता है, वह इच्छाशक्ति की सीमा तक कार्य सम्पन्न करता है। सम्पन्न किसी कार्य में व्यक्ति का ‘संकल्पबल एवं उसकी इच्छाशक्ति’ एक दूसरे से पोषित होते हैं। इस क्रम में सम्पन्न किसी कार्य में व्यक्ति की ‘कार्यदक्षता तथा कर्तव्यबोध’ प्रकट होते हैं। सम्पन्न किसी कार्य में व्यक्ति की शिक्षा एवं उसकी कार्यदक्षता’ एक दूसरे से पोषित होते हैं। व्यक्ति की ‘विद्या एवं उसका कर्तव्यबोध’ एक दूसरे से पोषित होते हैं। व्यक्ति की शिक्षा, कार्यदक्षता तथा उसकी विद्या, कर्तव्यबोध आदि प्रत्येक, व्यक्ति के संकल्पबल से सम्बन्धित हैं, मानों व्यक्ति की शिक्षा, कार्यदक्षता, विद्या, कर्तव्यबोध आदि प्रत्येक व्यक्ति के संकल्पबल में विलीन हो जाते हैं और विलीन होकर व्यापक अर्थ में व्यक्ति का संकल्पक्षेत्र बन जाता है। व्यक्ति का संकल्पक्षेत्र व्यक्ति की समस्त वह शक्तियाँ हैं जो शक्तियों किसी कार्य को सम्पन्न करने के क्रम में व्यक्ति में प्रकट होती हैं एवं जिनका प्रयोग व्यक्ति किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए करता है।
व्यक्ति के संकल्पक्षेत्र का रेखांकन
युद्धक्षेत्र में योद्धा लड़ते हैं और युद्ध लड़ने के लिए राज्य की समस्त शक्तियाँ ‘युद्धक्षेत्र में झोंक दी जाती हैं। किसी कार्य को सम्पन्न करना किसी व्यक्ति के लिए किसी युद्ध से कम नहीं है। कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति अपने समस्त शक्तियों को वैसा ही झोंक देता है, जैसे युद्धक्षेत्र में राज्य की समस्त शक्तियों को झोंक दिया जाता है। व्यक्ति का संकल्पक्षेत्र वह युद्धक्षेत्र है जहाँ व्यक्ति अपने समस्त शक्तियों को झोंक देता है अर्थात् विलीन कर देता है और किसी कार्य को सम्पन्न करता है, मानों व्यक्ति ने कोई युद्ध जीत लिया हो। किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति प्रमुख रूप से संकल्पबल, इच्छाशक्ति, कर्तव्यबोध, विद्या, शिक्षा आदि शक्तियों को अपने संकल्पक्षेत्र में झोंकता है अर्थात् विलीन करता है। व्यक्ति का संकल्पक्षेत्र ही व्यक्ति का संस्कार क्षेत्र है, जिसे व्यक्ति का मनःक्षेत्र कह सकते हैं। व्यक्ति का संकल्पक्षेत्र अर्थात् व्यक्ति का संस्कार क्षेत्र अर्थात् व्यक्ति का मनक्षेत्र अर्थात् व्यक्ति के शरीर में स्थित ‘वीर्य क्षेत्र व्यक्ति के श्रम का उद्गम क्षेत्र है।
श्रम का उद्गम व्यक्ति के वीर्य क्षेत्र अथवा मनःक्षेत्र को मानने के प्रसंग में चूंकि इस वीर्य बीज से व्यक्ति अन्य व्यक्ति के कोख से निरन्तर जन्म लेकर जन्म जन्मान्तर तक बना रहता है एवं अन्य व्यक्तियों की आवश्यकताएँ भी शाश्वत हैं इसलिए व्यक्ति के श्रम का नाश नहीं होता है। व्यक्ति के श्रम का सृजन भी नहीं होता है. क्योकि श्रम से व्यक्ति संस्कारित होता है एवं संस्कारित होने से व्यक्ति श्रम करता है एवं श्रम तथा संस्कारों का ‘चक्रीय क्रम’ व्यक्ति के जीवन में मृत्युपर्यन्त जारी रहता है। चक्रीय क्रम से अभिप्राय पूर्णता से है जहाँ केवल लेना ही लेना अथवा देना ही देना नहीं है बल्कि लेना है और देना भी है एवं ‘दिया हुआ लेना’ तथा ‘लिया हुआ देना’ है। श्रम तथा संस्कारों के चक्रीय क्रम के प्रसंग में दिया हुआ (श्रम) ही व्यक्ति लेता (संस्कार) है अथवा लिया हुआ (श्रम) ही व्यक्ति देता (संस्कार) है। इसे ‘श्रम संस्कार-श्रम’ शीर्षक से आगे और अधिक स्पष्ट किया गया है। इन पंक्तियों में ‘श्रम से श्रम’ कहने का अभिप्राय उस अनवरत श्रम से है जो इस व्यक्ति अथवा उस व्यक्ति के करने से निरन्तर जारी है।
2.27 श्रम-संस्कार-श्रम
व्यक्ति का श्रम उर्जा है। व्यक्ति की ‘साधना उर्जा, जीव उर्जा, संस्कार उर्जा प्रयोग के बाद व्यक्ति के ‘श्रम उर्जा’ में रूपान्तरित होता है। उर्जा रूपान्तरण निम्न प्रकार से होता है।
संस्कार उर्जा का आधार लेकर, व्यक्ति के ‘जीव उर्जा का रूपान्तरण ‘शब्द उर्जा’ में होता है।
एवं-
साधना उर्जा का आधार लेकर, व्यक्ति के ‘शब्द उर्जा’ का रूपान्तरण ‘श्रम उर्जा’ में होता है।
उपरोक्त उर्जा रूपान्तरण को समझने के लिए जेनेरेटर से विद्युत उत्पादन की चर्चा यहाँ उदाहरण स्वरूप की गई है। साधारण बोलचाल में जिसे विद्युत उत्पादन कहते हैं वह वस्तुतः ‘विद्युत प्रजनन’ है।
उत्पादन के लिए अंग्रेजी भाषा में शब्द प्रोडक्शन (Production) है, जब कि अग्रेजी भाषा में अन्य शब्द जेनरेशन (Generation) का प्रयोग विद्युत उर्जा के संदर्भ में किया जाता है। विद्युत प्रोड्यूस (Produce) नहीं बल्कि जेनरेट (Generate) किया जाता है। अतएव विद्युत का उत्पादन (Production) नहीं बल्कि जेनरेशन (Generation) होता है।
विद्युत उत्पादन को विद्युत प्रोडक्शन कहना तो उचित है, किन्तु चूँकि विद्युत का प्रोडक्शन (Production) नहीं बल्कि विद्युत का जेनरेशन (Generation) होता है जिसे विद्युत उत्पादन कहना उचित नहीं होगा, उसे ‘विद्युत प्रजनन’ कहना उचित होगा, प्रजनन से तात्पर्य जेनरेशन से है।
2.28 विद्युत उर्जा के प्रजनन का प्रसंग
विद्युत उर्जा का प्रजनन यंत्र ‘जेनरेटर’ है। रोटर जेनरेटर का प्रमुख अवयव है। अंग्रेजी भाषा में रोटेशन (Rotation) एक शब्द है, इस शब्द का अर्थ घूर्णन है। घूर्णन करता अवयव ‘रोटर’ कहलाया जो जेनरेटर में घूर्णन करता हुआ उसमें स्थित है।
जेनरेटर में रोटर के घूर्णन को बनाने के लिए यांत्रिक उर्जा का प्रयोग आवश्यक है। जेनरेटर में प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र भी होता है। कोयला अथवा अन्य ईंधन को जलाने से जिस ‘ताप उर्जा’ का प्रजनन होता है, उस ताप उर्जा के प्रयोग से जलवाष्प का उच्चदाब बनाकर उससे टरबाइन चलाए जाते हैं।
गतिमान टरबाइन से जिस ‘यांत्रिक उर्जा’ का प्रजनन (Generation) होता है, उस यांत्रिक उर्जा के प्रयोग से जेनरेटर में रोटर का घूर्णन बनाया जाता है। जेनरेटर के चुम्बकीय क्षेत्र की उर्जा अर्थात् चुम्बकीय उर्जा जेनरेटर के रोटर के घूर्णन का अवरोध है। उर्जा अवरोध में रोटर के घूर्णन को बनाए रखने के लिए जिस यांत्रिक उर्जा का प्रयोग किया जाता है,उस यांत्रिक उर्जा’ का रूपान्तरण विद्युत उर्जा में होकर जेनरेटर में ‘विद्युत उर्जा का प्रजनन होता है।
जेनरेटर में रोटर के घूर्णन को बनाने के लिए जिस यांत्रिक उर्जा का प्रयोग होता है, उस यांत्रिक उर्जा के प्रयोग का विचार दो भागों में किया जा सकता है। विचाराधीन उस यांत्रिक उर्जा के एक भाग का प्रयोग जेनरेटर में रोटर के घूर्णन को बनाने के लिए सहज ही किया जाता है एवं दूसरे भाग में प्रयोग की जाने वाली वह यांत्रिक उर्जा है जो जेनरेटर में ‘चुम्बकीय (उर्जा) क्षेत्र के अवरोध के आह्वान (Demand) के कारण जेनरेटर में रोटर के घूर्णन को बनाने के लिए प्रस्तुत (Supply) होता है।
विचाराधीन यांत्रिक उर्जा के पहले भाग का सम्बन्ध जेनेरेटर में रोटर के घूर्णन को सहज ही बनाए रखने से है। जेनरेटर में चुम्बकीय (उर्जा) क्षेत्र के अवरोध के आह्वान के कारण जेनरेटर में रोटर के घूर्णन को बनाए रखने के लिए आवश्यक यांत्रिक उर्जा का सम्बन्ध विचाराधीन यांत्रिक उर्जा के दूसरे भाग से है।
जेनरेटर का चुम्बकीय क्षेत्र जितना प्रबल होगा, चुम्बकीय उर्जा जेनरेटर के रोटर के घूर्णन में उस अनुपात में अवरोध बनेगा और इस ‘उर्जा अवरोध’ में रोटर के घूर्णन को बनाए रखने के लिए उसी अनुपात में यांत्रिक उर्जा का प्रयोग करना पड़ेगा।
जिस अनुपात में जेनरेटर के रोटर के घूर्णन को बनाए रखने के लिए यांत्रिक उर्जा का प्रयोग करना पड़ेगा, उस अनुपात में जेनरेटर में E.M.F Induce होगा और जेनरेटर से यांत्रिक उर्जा का रूपान्तरण विद्युत उर्जा में प्रस्तुत होगा और विद्युत उर्जा का प्रजनन (Generation) भी उसी अनुपात में होगा।
विद्युत उर्जा के ‘प्रजनन’ के आधार में ताप उर्जा है, जो कोयला या किसी ईंधन को जलाने से प्राप्त हुआ है। ताप उर्जा का रूपान्तरण यांत्रिक उर्जा में एवं यांत्रिक उर्जा का रूपान्तरण विद्युत उर्जा में होता है।
यांत्रिक उर्जा का विद्युत उर्जा में ‘रूपान्तरण’ के आधार में चुम्बकीय उर्जा व चुम्बकीय क्षेत्र है, जो अवरोध बनकर प्रकारान्तर से E.M.F Induce होकर यांत्रिक उर्जा का विद्युत उर्जा में रूपान्तरण को सम्भव करता है। इस उर्जा रूपान्तरण के घटनाक्रम का विलक्षण साम्य व्यक्ति के ‘श्रम उर्जा के संदर्भ से है। विलक्षण साम्य कहने का तात्पर्य उस समानता से है जिसकी कल्पना करना स्वयं में आश्चर्यजनक है एवं अविश्वसनीय लगता है।
व्यक्ति के श्रम उर्जा और विद्युत उर्जा में साम्य है। व्यक्ति का मन और जेनरेटर के रोटर में साम्य है। व्यक्ति का जीव उर्जा और चुम्बकीय उर्जा में साम्य है। जेनरेटर में यांत्रिक उर्जा बनाने के लिए प्रयोग किया गया ताप उर्जा और व्यक्ति के साधना उर्जा में साम्य है, व्यक्ति की साधना को उसका तप भी कहा जाता है।
जेनरेटर में रोटर के घूर्णन को बनाने के जिए जिस यांत्रिक उर्जा का प्रयोग आवश्यक है उसका विचार दो भागो में किया जाए तो. विचाराधीन यांत्रिक उर्जा के एक भाग और व्यक्ति के शब्द उर्जा में साम्य है। विचाराधीन यांत्रिक उर्जा के दूसरे भाग और व्यक्ति के संस्कार उर्जा में साम्य है। जेनरेटर में चुम्बकीय उर्जा अवरोध में Induced E.M.F संस्कार उर्जा को दर्शाता है।
2.29 उर्जा रूपान्तरण का श्रम संदर्भ
शब्द उर्जा
शब्द कहने का अभिप्राय स्पष्ट किसी ‘अर्थ’ से है, जो अक्षरों के मेल से बने किसी पद अथवा पाठ का होता है। पद (Terms) अथवा पाठ (Lesson) का आकार छोटा या बड़ा हो तो सकता है, किन्तु पद अथवा पाठ का ‘अर्थ’ छोटा या बड़ा नहीं होता बल्कि बिन्दु समान होता है, जो उसके नाम में व्यक्त होता है। जैसे ‘रामायण’ एक शब्द है, इस शब्द से सम्पूर्ण रामकथा का बोध होता है।
‘विकसित भारत’ और ‘विकासशील भारत’ इन शब्दों से दो ‘भारत’ अभिव्यक्ति पाते हैं। किसी पद अथवा पाठ के निज अर्थ को जो उसके नाम में व्यक्त होता है, उसे इन पंक्तियों में ‘शब्द’ कहा गया है और यह अर्थ (शब्द) उर्जा है, क्योंकि अर्थ जानने मात्र से व्यक्ति कोई कार्य करने में समर्थ होता है।
उदाहरण के लिए पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम आजाद ने ‘विकसित भारत’ शब्द का प्रयोग करते हुए अपने प्रवास और प्रयासों से देश के जन-जन में उर्जा का संचार उन्होंने किया। व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों के कॉट-छॉट से अपने मन में भिन्न ‘शब्दाकृतियों’ की रचना करता है। शब्दाकृतियों की रचना करने के लिए व्यक्ति ‘शब्द उर्जा’ का प्रयोग करता है। व्यक्ति को ज्ञात शब्दव्यक्ति की ‘शब्द उर्जा’ है।
साधना उर्जा
व्यक्ति की साधना उर्जा उसकी विद्या और शिक्षा है, जो प्रकारान्तर से विधितत्व (तकनीक) हैं और जिसका अनुसरण कर व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों के कॉट छॉट से अपने विचार, बुद्धि आदि भिन्न शब्द रचनाएँ (उपादान) बनाता है। व्यक्ति के मन में बनीं भिन्न शब्दाकृतियाँ मात्र उपकरण (Tools) हैं,
जिनका प्रयोग व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए करता है। व्यक्ति के मन में बनी शब्दाकृतियाँ प्रत्यक्ष कार्य है जिसे व्यक्ति करना चाहता है। शब्दाकृतियों से बनी शब्द रचनाएँ मेज, कुर्सी जैसे उपादान हैं जिन्हें बनाने के लिए व्यक्ति शब्दाकृतियाँ रूपी उपकरणों का सहारा लेता है।
शब्दाकृतियाँ बनाने के लिए व्यक्ति ‘शब्द उर्जा’ का प्रयोग करता हैं, जब कि शब्द रचनाएँ बनाने के लिए व्यक्ति ‘साधना उर्जा’ का प्रयोग करता है।
संस्कार उर्जा
निश्चित कुछ शब्द ज्ञात होना और निश्चित एक प्रकार से उन शब्दों का प्रयोग करने में व्यक्ति की क्षमता उसके संस्कारो के कारण है, यह व्यक्ति की ‘संस्कार उर्जा’ है। संस्कार उर्जा व्यक्ति के शब्द उर्जा और साधना उर्जा से भिन्न उर्जा का अन्य रूप है।
जीव उर्जा
जीने के लिए व्यक्ति जितना कुछ अथवा जो कुछ करता है वह व्यक्ति के जीव उर्जा को दर्शाता है। जीने के लिए व्यक्ति आवश्यकताओं की पूर्ति में लगा रहता है। व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ‘जीव उर्जा’ का प्रयोग करता है।
श्रम उर्जा
कार्य सम्पन्न करने के लिए कार्य पर उपस्थित व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त बुद्धि व व्यतीत समय का फलितांश व्यक्ति का श्रम है। श्रम करता हुआ व्यक्ति का मन चलायमान रहता है और शब्दों का कॉट-छॉट करता रहता है। चलायमान व्यक्ति का मन अनुकूल परिस्थितियों में एक प्रकार से व्यवहार करता है और प्रतिकूल परिस्थितियों में दूसरे प्रकार से व्यवहार करता है।
सुविधाजनक परिस्थितियों में कार्य करते रहना मनोनकुल परस्थितियों में व्यक्ति द्वारा किया गया श्रम है। परिस्थितियाँ असुविधाजनक होने से भी कार्य करने से पीछे न हटना मन विरुद्ध परिस्थितियों में व्यक्ति द्वारा किया गया श्रम है। सुविधाजनक परिस्थितियों में व्यक्ति जितना कुछ श्रम करता है उसके लिए वह ‘शब्द उर्जा’ का प्रयोग करता है। असुविधाजनक परिस्थितियों में व्यक्ति जितना कुछ श्रम करता है उसके लिए वह ‘संस्कार उर्जा का प्रयोग करता है।
अन्य शब्दों मे कह सकते हैं,असुविधाजनक परिस्थितियों में किए गए श्रम से व्यक्ति संस्कारित होता है।
व्यक्ति का संस्कार उर्जा, शब्द उर्जा, साधना उर्जा, श्रम उर्जा और जीव उर्जा कहने का अभिप्राय बहुत स्पष्ट है। सम्बन्धित विषय को इन पंक्तियों में स्पष्ट किया गया है। उर्जा के भिन्न इन रूपों के रूपान्तरण के विषय को भी विद्युत प्रजनन के प्रसंग का उदाहरण देकर इन पंक्तियों में स्पष्ट किया गया है।
परमाणु अथवा नाभिक्रीय उर्जा या संचित जल की स्थितिज उर्जा या पेट्रोल, डीजल आदि किसी इंधन की उर्जा या कोयले को जलाने से प्राप्त ताप अथवा उष्मा उर्जा का विद्युत उर्जा में रूपान्तरण का जेनेरेटर का संदर्भ एवं विद्या और शिक्षा अर्थात् साधना उर्जा का श्रम उर्जा में रूपान्तरण का व्यक्ति का संदर्भ, यह दोनों तुलनात्मक रूप से उर्जा रूपान्तरण के समान संदर्भ हैं।
2.30 उर्जा रूपान्तरण का व्यक्ति संदर्भ
जेनरेटर का संदर्भ
E.M.F Induce हो इसके लिए जेनरेटर में, चुम्बकीय (उर्जा) क्षेत्र के अवरोध पर ‘यांत्रिक उर्जा आरोपित किया जाता है। एवं – ताप उर्जा का आधार लेकर जेनरेटर में, आरोपित ‘यांत्रिक उर्जा’ का रूपान्तरण ‘विद्युत उर्जा’ में होता है।
व्यक्ति का संदर्भ
संस्कार उर्जा का आधार लेकर, व्यक्ति के ‘जीव उर्जा’ का रूपान्तरण ‘शब्द उर्जा में होता है।
एवं – साधना उर्जा का आधार लेकर, व्यक्ति के ‘शब्द उर्जा’ का रूपान्तरण ‘श्रम उर्जा में होता है।
व्यक्ति संस्कारित है इसका तात्पर्य है, व्यक्ति को निश्चित कुछ शब्द ज्ञात हैं और वह ज्ञात शब्दों का निश्चित एक प्रकार से प्रयोग कर सकता है। व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों के कॉट-छॉट से कार्य के सम्बन्ध में मन में ‘शब्दाकृति’ बनाता है, जिसे व्यक्ति का ‘काम’ कहते हैं।
‘काम’ शब्द से ही ‘कामना’ शब्द बना है। व्यक्ति की ‘कामना कोई शब्दकृति ही है। निर्धारित ‘काम’ के अनुरूप व्यक्ति कर्म अर्थात् शरीर से क्रिया करता है ‘काम और कर्म करने के लिए व्यक्ति समय व्यतीत करता है। काम और कर्म करता हुआ व्यक्ति द्वारा कार्य सम्पन्न करने के लिए समय व्यतीत करने से व्यक्ति का ‘श्रम’ प्रस्तुत होता है।
व्यक्ति जिस प्रकार से श्रम करता है उसकी पात्रता उसी प्रकार की बनती है। पात्रता के अनुरूप समय व्यतीत कर कोई कार्य सम्पन्न करने से व्यक्ति की पात्रता सम्पन्न उस कार्य में उसका श्रम बनकर पुनः प्रस्तुत होता है। पुनः पुनः श्रम करने से व्यक्ति संस्कारित होता है। संस्कारित होने से व्यक्ति की पात्रता समृद्ध होती है। ‘श्रम, पात्रता, संस्कार, पात्रता, श्रम’ का घटनाक्रम व्यक्ति के जीवन में प्रस्तुत होने से व्यक्ति विद्या और शिक्षा प्राप्त करता है तथा इस क्रम में वह संस्कारित होता है।
विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि जिन्हें संक्षेप में ‘विद्यालय आदि’ कहें तो विद्यालय आदि व्यक्ति को विद्यावान और शिक्षित करते हैं या अन्य शब्दों में व्यक्ति को संस्कारित करते हैं।
व्यक्ति को संस्कारित करने की प्रक्रिया है, जिसे ‘श्रम से श्रम’ शीर्षक से स्पष्ट किया गया है।
व्यक्ति के संस्कार और संस्कारित होने के प्रसंग की तुलना विद्युत रासायनिक सेल में हो रहे विद्युत-विच्छेदन से करते हुए ‘श्रम से श्रम’ शीर्षक पंक्तियों में इसे स्पष्ट किया गया है कि ऋणोद पर धातु की परत चढ़ने की भांति ही व्यक्ति को संस्कारित करने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है।
एलेक्ट्रोप्लेटिंग उद्योगों में ‘उत्पादन’ विद्युत विच्छेदन पर आधारित होता है और निकेल, कॉपर आदि किन्हीं धातुओं की परत चढ़ाकर भिन्न उत्पाद उत्पन्न किए जाते हैं। व्यक्ति के संस्कार और संस्कारित होने का प्रसंग एलेक्ट्रोप्लेटिंग उद्योगों में ‘उत्पाद’ उत्पन्न किए जाने जैसा ही प्रसंग है।
विद्युत रासायनिक सेल में प्रारम्भिक स्तर पर विद्युत प्रवाह से सेल में विद्युत विच्छेदन होकर फलस्वरूप सेल में विद्युत प्रवाह बनने से विद्युत-विच्छेदन जारी रहते हुए ऋणोद पर धातु की परत चढ़ना जारी रहता है।
विद्युत रासायनिक सेल में प्रारम्भिक स्तर पर विद्युत प्रवाह से सेल में विद्युत-विच्छेदन होकर फलस्वरूप सेल में विद्युत प्रवाह बनने से सेल में विद्युत विच्छेदन जारी रहते हुए ऋणोद पर धातु की परत चढ़ना जारी रहता है।
प्रारम्भिक स्तर पर बने विद्युत प्रवाह की तुलना व्यक्ति के जन्मजात संस्कारों से की जा सकती है। दमा, तपेदिक आदि गम्भीर किसी बीमारी के इलाज के लिए जब कोई व्यक्ति किसी चिकित्सक के पास जाता है तो चिकित्सक उस व्यक्ति से पूछता है कि वह बीमारी उसके माता व पिता अथवा उनके परिवार के अन्य किसी सदस्य को कभी थी या नहीं।
उसी भांति व्यक्ति को मिला उसका कद, रंग, नाक-नक्श आदि भी पूर्वज किसी व्यक्ति अथवा किन्हीं व्यक्तियों से मिलते हैं। शरीर और उसके रोग अथवा उसके बनावट आदि की भांति व्यक्ति को अपने पूर्वजों के या पूर्व जन्म के संस्कार भी मिलते हैं, यही व्यक्ति के जन्मजात संस्कार हैं। जन्मजात संस्कारों के कारण ही व्यक्ति अपनी मातृभाषा सहज सीख लेता है और अपने आदर्श सहज गढ़ लेता है।
जन्म से व्यक्ति का शरीर उर्जावान होता है, यह जन्मजात उर्जा ही व्यक्ति के जन्मजात संस्कार हैं। संस्कारित होना शरीर का उर्जावान होना है। पंच तत्वों से बना शरीर धारण करना व्यक्ति का जन्म लेना है। शरीर उर्जावान होना व्यक्ति का संस्कारित होना है। जन्म लेना व्यक्ति के जीवन की एक घटना है।
संस्कारित होना जन्म लेने से पृथक व्यक्ति के जीवन की अन्य घटना है। व्यक्ति के शरीर का अन्तिम संस्कार, अर्थात् मृत शरीर जला देना अथवा मृत शरीर को जमीन में दफन कर देना व्यक्ति के जीवन की एक घटना है।
व्यक्ति की मृत्यु व्यक्ति के मृत शरीर के अन्तिम संस्कार से पृथक व्यक्ति के जीवन की अन्य घटना है। मृत्यु से तात्पर्य व्यक्ति का शरीर उर्जाहीन होने से है. मृत शरीर के अन्तिम संस्कार से तात्पर्य उस मृत शरीर को जलाने या दफनाने से है।
व्यक्ति का जन्म लेने और उसका संस्कारित होने में अन्तर यही है कि व्यक्ति अपने जीवन में एक बार जन्म लेता है जब कि व्यक्ति अपने जीवन में बार-बार संस्कारित होता है। जन्म लेना निर्माण की भांति व्यक्ति के जीवन में एक बार घटित होता है और संस्कारित होना उत्पन्न होने की भांति व्यक्ति के जीवन में हर उस बार अर्थात् बार-बार घटित होता है, जब जब व्यक्ति ‘श्रम’ करता है।
श्रम से व्यक्ति संस्कारित होता है, अर्थात् उसे निश्चित कुछ शब्द ज्ञात होते हैं और वह निश्चित एक प्रकार से उसे ज्ञात शब्दों का प्रयोग करता है।
संस्कारित होकर और उन संस्कारो का आधार लेकर व्यक्ति पुनः पुनः श्रम करता है और वह पुनः पुनः संस्कारित होता है। विद्युत विच्छेदन जैसा ही व्यक्ति के ‘श्रम संस्कार-श्रम का यह प्रसंग है।
श्रम जो कोई व्यक्ति करे, इस अथवा उस व्यक्ति के श्रम में भेद नहीं होता है, किन्तु भिन्न व्यक्ति जो कुछ श्रम करते हैं और उससे जो कार्य सम्पन्न करते हैं उसमें (कार्य) अन्तर होता है। कार्य में अन्तर से ‘श्रम’ में अन्तर नहीं होने से भी श्रम से संस्कारित होने में अन्तर आ जाता है, अर्थात् एक प्रकार के कार्य से व्यक्ति को जो संस्कार मिलते हैं, दूसरे प्रकार के कार्य से व्यक्ति को अन्य संस्कार मिलते हैं। भिन्न कार्यों को करते हुए व्यक्ति भिन्न नामों से जाने जाते हैं। व्यक्ति भिन्न नाम से जो श्रम करेगा वह भिन्न कार्य करने के लिए करेगा और उसके संस्कार भिन्न होंगे।
साधना, व्यवसाय, सेवाएँ, उद्योग, परिश्रम आदि पांच प्रकार के ‘श्रम’ से व्यक्ति भिन्न पांच प्रकार से संस्कारित होता है। विद्यार्थी श्रम (साधना) करता है कि वह इस योग्य बने कि वह ‘श्रम’ (रोजगार) कर सके व अन्य शब्दों में विद्यार्थी ‘श्रम’ करने के लिए भी ‘श्रम करता है। विद्यावान और शिक्षित होने के लिए विद्यार्थी जितना कुछ श्रम करता है, वह ‘श्रम संस्कार-श्रम का प्रसंग है, जिसकी तुलना विद्युत-विच्छेदन के प्रसंग से की जा सकती है और उस तुलना के आधार पर कहा जा सकता है कि विद्यावान और शिक्षित होकर विद्यार्थी संस्कारित होता है। व्यक्ति (विद्यार्थी) जो कुछ संस्कार पाता है वह विद्यावान और शिक्षित होने की (सीखने) की प्रक्रिया है। विद्यार्थी, श्रमिक, व्यवसायी, व्यापारी, उद्यमी की भूमिका में सीखने के क्रम में आजीवन प्रत्येक व्यक्ति ‘श्रम संस्कार-श्रम’ के चक्रीय क्रम में संस्कारित होता रहता है। ‘संस्कार उर्जा’ का आधार लेकर व्यक्ति के ‘जीव उर्जा’ का रूपान्तरण ‘शब्द उर्जा’ में होता है एवं ‘साधना उर्जा’ का आधार लेकर व्यक्ति के ‘शब्द उर्जा’ का रूपान्तरण ‘श्रम उर्जा’ में होता है।
व्यक्ति का जन्म ब्रह्माण्ड की घटना है। व्यक्ति के जन्म के साथ ब्रह्माण्ड की उर्जा व्यक्ति के जीव उर्जा में रूपान्तरित होता है। आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति जीव उर्जा का प्रयोग करता है। व्यक्ति तब तक संस्कारित होता रहता है जब तक व्यक्ति की आवश्यकताएँ बनी रहती हैं। मृत्यु ही वह पड़ाव है जहाँ व्यक्ति संस्कारशून्य होकर अपने आवश्यकताओं से विरत होकर उसके ‘श्रम को विराम’ मिलता है। जन्म से मृत्यु तक की समय सीमा में व्यक्ति जो श्रम करता है उसका (श्रम) रूपान्तरण व्यक्ति के बाहर (बाह्य) घटित होता है। आवर्ती श्रम, पुनः पुनः श्रम, श्रम से श्रम तथा श्रम-संस्कार-श्रम आदि शीर्षक देकर एवं विद्युत रासायनिक सेल व जेनरेटर आदि का उदाहरण देकर श्रम रूपान्तरण की बाह्य संरचना को हमने विस्तार से स्पष्ट किया है।