श्रम उर्जा है

उर्जा जो कुछ है और जैसा भी है वह अव्यक्त, अदृश्य तथा अविनाशी होगा। अव्यक्त, अदृश्य होने के कारण उर्जा को व्यक्ति न छू सकता है, न देख सकता है और न वह उसे पा सकता है, उर्जा को संचित भी नहीं किया सकता। अविनाशी होने के कारण उर्जा का न निर्माण होता है और न नाश होता है। श्रम उर्जा की यदि बात करें तो सेवाएँ, व्यवसाय, उद्योग, परिश्रम, साधना आदि भिन्न प्रकार से व्यक्ति श्रम करता है, यह श्रम उर्जा के भिन्न रूप हैं। भिन्न उन रूपों में व्यक्ति का श्रम रूपान्तरित होता है।

श्रम उर्जा अव्यक्त, अदृश्य होने से श्रम रूपान्तरण का हम अनुमान ही लगा सकते हैं, उसे प्रत्यक्ष सिद्ध नहीं कर सकते।  सेवाएँ, व्यवसाय, उद्योग, परिश्रम, साधना आदि भिन्न रूपों में व्यक्ति के श्रम का रूपान्तरण व्यक्ति के अन्दर होने वाला अन्तः  श्रम रूपान्तरण है। श्रम के अन्य रूप शीर्षक से सेवाएँ, व्यवसाय, उद्योग, परिश्रम, साधना आदि श्रम ऊर्जा के भिन्न रूपों का परिचय हमने दिया है।

‘श्रम’ व्यक्ति की उर्जा है, व्यक्ति के अन्दर (अन्तः) की उर्जा है तथा व्यक्ति के बाहर (बाहा) भी व्यक्ति का श्रम उर्जा है। श्रम रूपान्तरण की बाह्य संरचना ब्रह्माण्ड में व्यक्ति के अस्तित्व पर आधारित है।

समस्त उर्जा का अखण्ड, अजस्र, अक्षय स्त्रोत बह्माण्ड है। व्यक्ति के जन्म के साथ ब्रह्माण्ड की उर्जा का रूपान्तरण व्यक्ति के जीव उर्जा में होता है। व्यक्ति का शरीर व्यक्ति के जीव उर्जा से पृथक है। व्यक्ति के जीव उर्जा का प्रयोग व्यक्ति की पात्रता एवं उसके व्यक्तित्व गठन में होकर वह (जीव उर्जा) व्यक्ति के श्रम उर्जा में रूपान्तरित होता है। श्रम रूपान्तरण की बाह्य संरचना को 1) आवर्ती श्रम  2) पुनः पुनः श्रम  3) श्रम से श्रम  4) श्रम संस्कार-श्रम शीर्षक देकर आगे स्पष्ट किया गया है।

2.14 श्रम रूपान्तरण की अन्तः संरचना

श्रम रूपान्तरण की अन्तः संरचना पंच तत्व रचना पर आधारित है। ‘पंच तत्व रचना’ के सम्बन्ध में हमारा अनुमान यही है कि विस्तार पाने के लिए ‘एक’ विभाजित होकर ‘दो’ होता है और कुल ‘तीन’ व्यवस्थित होते हैं। वह ‘तीन’ व्यवस्थित होने के क्रम में उनमें से कोई ‘दो’ (पहला, दूसरा) पुनः एक होना चाहते हैं और अन्य दो (पहला, तीसरा) पुनः एक होना चाहते हैं, इससे ‘चौथा और पांचवा’ अस्तित्व में आता है। एक से पांच तत्वों की इस रचना को दर्शाने के लिए वृत्त का उदाहरण हमारे सामने है।

किसी वृत्त का केन्द्र एक होता है। तीन बिन्दु जो सरल रेखा में नहीं होते उनसे होकर एक और केवल एक वृत्त खींचा जा सकता है। उन तीन बिन्दुओं को वृत्त के केन्द्र ‘एक’ का विस्तार तीन में माना जा सकता है और वृत्त खींचने के क्रम में कोई दो (पहला, दूसरा) बिन्दुओं की मध्यगत लम्ब रेखा तथा अन्य दो (पहला, तीसरा) बिन्दुओं की मध्यगत लम्ब रेखा एक बिन्दु पर मिलते हैं और वृत्त का केन्द्र निर्धारित होकर उन तीन बिन्दुओं से गुजरता हुआ वृत्त खींचा जाता है। उस वृत्त की परिधि और क्षेत्र अन्य दो तत्व निर्धारित होते हैं। वृत्त बनने से ‘एक’ का विस्तार तीन में और यह विस्तार पांच (परिधि, क्षेत्र) तक होकर पंच तत्व रचना के अन्तर्गत सब कुछ व्यवस्थित हो जाता है। वृत्त अपने केन्द्र (एक) का विस्तार है।

अनेक सूर्य और उनके एक से अधिक ग्रह, उपग्रह आदि ब्रह्माण्ड में है, किन्तु ब्रह्माण्ड एक है और उसी प्रकार से प्रत्येक सूर्य व प्रत्येक ग्रह, उपग्रह आदि भी प्रत्येक एक-एक है। ब्रह्माण्ड में जितने भी व्यक्ति हैं वह सब भी एक-एक हैं। उन सब में पंच तत्व रचना पर आधारित व्यवस्था है।

क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा आदि पंच भूतों (तत्वों) से बना व्यक्ति का शरीर ‘पंच तत्व रचना’ है। व्यक्ति का ‘तन’ और उसका ‘मन’ तथा उसकी ‘बुद्धि एवं कोई ‘कार्य’ व उस कार्य को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति द्वारा ‘व्यतीत समय’ आदि ‘श्रम’ के आधारभूत पांच तत्व, इस पंच तत्व रचना के अन्तर्गत व्यवस्थित हैं और श्रम आकार (वृत्त) लेता है। साधना, व्यवसाय,, सेवाएँ, उद्योग, परिश्रम आदि भी ‘पंच तत्व रचना के अन्तर्गत व्यवस्थित हैं और उस व्यवस्था के अधीन श्रम उर्जा का रूपान्तरण होता है।

व्यक्ति के पंच तत्व और व्यक्ति के श्रम के पंच तत्व तथा श्रम उर्जा के पंच तत्वों का नाम देते हुए उन नामों का तुलनात्मक अध्ययन नीचे दिया गया है।


व्यक्ति के पंचतत्वव्यक्ति के श्रम के पंचतत्वश्रम ऊर्जा के पंचतत्व
क्षिति (मिट्टी)तनसाधना
जल (नीर)मनव्यवसाय
समीर (हवा)बुद्धिसेवाएँ
पावक (अग्नि)कार्यउद्योग
गगन (आकाश)समयपरिश्रम

हमारी ‘साधना’ व्यवसाय में रूपान्तरित होकर और हमारा ‘व्यवसाय’ सेवाओं में रूपान्तरित होकर तथा हमारी ‘सेवाएँ’ उद्योग में रूपान्तरित होकर एवं हमारा ‘उद्योग’ परिश्रम बनकर हमें संस्कारित करता है।

संस्कारों का आधार लेकर हमारी साधना सम्पन्न (समापन) होती है। साधना, व्यवसाय, सेवाएँ, उद्योग, परिश्रम आदि रूपों में पंच तत्व रचना के अन्तर्गत श्रम का रूपान्तरण जारी रहता है, व्यक्ति का श्रम निरन्तर बना रहता है और इससे सिद्ध होता है कि श्रम अविनाशी है,अर्थात् व्यक्ति का श्रम उर्जा है।

2.15 आवर्ती श्रम

व्यक्ति का श्रम उर्जा है। श्रम उर्जा के रूपान्तरण के कारण व्यक्ति के श्रम का आवर्तन (Cycle) जारी रहता है, जिसे (श्रम) हमने आवर्ती श्रम कहा है। आवर्ती श्रम की चर्चा हम करें कि इससे पूर्व उर्जा के नामकरण से सम्बन्धित विषय की चर्चा हमें कर लेना चाहिए।

उर्जा अव्यक्त, अदृश्य, अविनाशी होता है। अव्यक्त व अदृश्य होने के कारण उर्जा किसी भी रूप में हमारे सम्मुख प्रत्यक्ष नहीं होता और जो प्रत्यक्ष नहीं है उसे नाम नहीं दिया जा सकता। उर्जा के प्रयोग से कोई कार्य हम सम्पन्न करते हैं, वह कार्य और सम्पन्न कार्य का परिणाम हमारे सम्मुख प्रत्यक्ष हैं और कार्य अथवा परिणाम को नाम दिया जा सकता है।

उर्जा के प्रयोग से सम्पन्न कार्य अथवा उस कार्य के परिणाम को दिए गए किसी नाम से उर्जा परिचित होकर वह नाम उर्जा का होता है। विद्युत उर्जा, ताप उर्जा, चुम्बकीय उर्जा आदि नाम उर्जा के प्रयोग से सम्पन्न कार्य के परिणाम का ही नाम है। भिन्न कार्यों के भिन्न परिणाम और उनके भिन्न नाम उर्जा को दिए जाने से उर्जा को दिए गए भिन्न नाम उर्जा के विविध रूपों को दर्शाते हैं।

2.16 समय उर्जा

ब्रह्माण्ड में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करती है तथा पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना, चन्द्रमा की पृथ्वी की परिक्रमा, पृथ्वी की सूर्य की परिक्रमा और अन्य ग्रह उपग्रहों की गतियाँ, यह सब ब्रह्माण्ड की गतियां हैं। ब्रह्माण्ड गतिमान है, उसमें गतिज उर्जा है। ब्रह्माण्ड के जिस गतिज उर्जा की चर्चा हमने यहाँ की है उसका कोई न कोई नाम होगा। ब्रह्माण्ड की उस गतिज उर्जा से सम्पन्न कार्य का परिणाम समय है।

‘समय’ नाम से ब्रह्माण्ड की उस गतिज उर्जा का परिचय देकर उसका वह नाम दिया जा सकता है। इस अर्थ में ‘समय’ उर्जा है, यह ब्रह्माण्ड की यह गतिज उर्जा है जिसके कारण दिन, मास और वर्ष आदि हैं। पृथ्वी की अपनी धुरी पर घूमने की गति का परिणाम (सम्पन्न कार्य) ‘दिन’ है। चन्द्रमा की पृथ्वी के परिक्रमा की गति का परिणाम (सम्पन्न कार्य) मास है। पृथ्वी की सूर्य के परिक्रमा की गति का परिणाम (सम्पन्न कार्य) वर्ष है। वर्ष, मास, दिन, घण्टा, मिनट, सेकेण्ड आदि ‘समय उर्जा’ के रूपों के नाम हैं।

व्यक्ति के जन्म (रचना) के मूल में यद्यपि किसी स्त्री-पुरुष का वीर्य बीज अवश्य होता है तथापि व्यक्ति का जन्म ब्रह्माण्ड की घटना है या ब्रह्माण्ड में घटित होने वाला कार्य (घटना) है। व्यक्ति को जन्म (रचना) देने वाले स्त्री-पुरुष तो ब्रह्माण्ड की उस घटना (व्यक्ति का जन्म) का माध्यम भर हैं।

व्यक्ति के श्रम उर्जा के संदर्भ में हम यह मान सकते हैं कि ब्रह्माण्ड में व्यक्ति का जन्म (कार्य) होकर ब्रह्माण्ड की गतिज उर्जा (समय) का रूपान्तरण व्यक्ति का जीव उर्जा बनकर प्रकट होता है। व्यक्ति को जन्म देने (कार्य) के लिए समय उर्जा का प्रयोग होकर वह समय उर्जा ही व्यक्ति के जीव उर्जा में रूपान्तरित होता है। व्यक्ति का शरीर व्यक्ति के जीव उर्जा से पृथक है।

2.17 जीव उर्जा

आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति श्रम करता है। श्रम उर्जा के संदर्भ में व्यक्ति के आवश्यकताओं का महत्व है। किन्तु आवश्यकताओं का सम्बन्ध व्यक्ति (शरीर) से नहीं बल्कि व्यक्ति में स्थित उसके जीव से है। भूख व्यक्ति के पेट को नहीं लगता बल्कि व्यक्ति का जीव अन्न-जल के लिए तड़पता है।

अन्न, जल की भांति अन्य जितनी भी आवश्यकताएँ व्यक्ति की हैं वह व्यक्ति में स्थित जीव के कारण हैं और उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति जितने कार्य करता है उन कार्यों को करने के लिए व्यक्ति के ‘जीव उर्जा’ का प्रयोग होकर व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित कार्य सम्पन्न होने से व्यक्ति के जीव उर्जा का रूपान्तरण व्यक्ति के ‘श्रम उर्जा’ में होता है।

समुदाय स्तर पर अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति व्यक्ति द्वारा किए जाने से बदले में स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए व्यक्ति जो कार्य करता है उसे व्यक्ति के ‘जीवनयापन कार्य’ कहते हैं।

जीवनयापन कार्य सम्पन्न होने से आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन होकर व्यक्ति के ‘जीव उर्जा’ का रूपान्तरण व्यक्ति का ‘जीवनयापन श्रम’ (रूपान्तरित जीव उर्जा) बनकर प्रकट होता है। व्यक्ति का जीवनधारण किए रहना स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होने से सम्भव है। ‘जीवनधारण कार्य’ (निज आवश्यकताओं की पूर्ति) सम्पन्न होने से आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का उपभोग होकर व्यक्ति के ‘जीव उर्जा’ का रूपान्तरण व्यक्ति का ‘जीवनधारण श्रम’ (रूपान्तरित जीव उर्जा) बनकर प्रकट होता है।

निद्रा व विश्राम व्यक्ति की आवश्यकता है। निद्रा व विश्राम में व्यक्ति ऐसी उर्जा संचित करता है कि जिससे वह श्रम कर सके, मानों निद्रा व विश्राम में व्यक्ति ने श्रम का संचय किया हो। निद्रा व विश्राम के बाद व्यक्ति तरोताजा होकर श्रम करने की स्फूर्ति पाता है। इसके विपरीत व्यक्ति को निद्रा व विश्राम के अवसर न मिले तो वह श्रम करने में असमर्थ हो जाता है। निद्रा व विश्राम की आवश्यकता की पूर्ति के लिए व्यक्ति जो कार्य करता है उसे व्यक्ति का ‘जीवनसंचय’ कार्य हम कह सकते हैं। जीवनसंचय कार्य करने के लिए अर्थात् निद्रा व विश्राम करता हुआ व्यक्ति जीवनसंचय श्रम करता है।

जीवनसंचय श्रम करता हुआ व्यक्ति के ‘जीव सर्जा’ के प्रयोग से स्वयं व्यक्ति के अथवा अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति से विरमित होने का कार्य (निद्रा, विश्राम) सम्पन्न होते हैं और व्यक्ति के ‘जीव उर्जा’ का रूपान्तरण व्यक्ति का ‘जीवनसंचय श्रम’ (रूपान्तरित जीव उर्जा) बनकर प्रकट होता है।

अपना अथवा अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करना व्यक्ति का कार्य है। आवश्यकताओं की पूर्ति करने से विरमित होना भी व्यक्ति का कार्य है। उदाहरण के लिए मन में विचारों को स्थान देना (विचार करना) और मन को विचार शून्य बनाना (समाधि) दोनों ही यतार्थ स्थितियाँ हैं।

जीवनधारण, जीवनयापन, जीवनसंचय प्रत्येक व्यक्ति के कार्य है जिन्हें व्यक्ति श्रम उर्जा के प्रयोग से वह अपने जीवन में करता है। जीवनधारण श्रम, जीवनयापन श्रम, जीवनसंचय श्रम, व्यक्ति के श्रम उर्जा रूपान्तरण की बाह्य संरचना विविध रूप हैं।

व्यक्ति का जीव उर्जा निद्रा तथा विश्राम के कार्य में जीवनसंचय श्रम (श्रम उर्जा) में रूपान्तरित होता है। व्यक्ति का जीवनसंचय श्रम (रूपान्तरित जीव कर्जा) अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के कार्य में जीवनयापन श्रम (श्रम उर्जा) में रूपान्तरित होता है। जीवनयापन श्रम (रूपान्तरित जीव उर्जा) स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के कार्य में जीवनधारण श्रम (श्रम उर्जा) में रूपान्तरित होता है।

जीवनसंचय श्रम के अन्तर्गत व्यक्ति अपना तथा अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करने से स्वयं को विरमित करने का कार्य (निद्रा, विश्राम) करता है। जीवनधारण श्रम करता हुआ व्यक्ति आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की मांग अन्य व्यक्ति के सम्मुख प्रस्तुत करता है। जीवनयापन श्रम करता हुआ व्यक्ति आवश्यक ‘वस्तु आदि’ की अन्य किन्हीं व्यक्तियों के मांग की आपूर्ति करता है।

जीवनसंचय श्रम करता हुआ व्यक्ति अपना जीवनधारण श्रम व जीवनयापन श्रम करने के लिए ‘श्रमसंचय’ करता है। श्रमसंचय व्यक्ति इस उद्देश्य से करता है कि आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का उपभोग (मांग) अथवा उत्पादन (आपूर्ति) वह कर सके और उसके लिए वह श्रम कर सके।

जीवनधारण श्रम के अन्तर्गत जिन वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का उपभोग व्यक्ति करता है उनका उत्पादन अन्य अनेक व्यक्ति जीवनयापन श्रम के अन्तर्गत करते हैं। अतएव व्यक्ति का जीवनधारण श्रम स्वयं उसके जीवनयापन श्रम पर निर्भर नहीं है बल्कि अन्य अनेक व्यक्तियों के जीवनयापन श्रम पर निर्भर है।

जीवनयापन श्रम के अन्तर्गत जिन ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन व्यक्ति करता है उनका उपभोग अन्य अनेक व्यक्ति जीवनधारण श्रम के अन्तर्गत करते हैं। अतएव व्यक्ति का जीवनयापन श्रम स्वयं उसके जीवनधारण श्रम पर निर्भर नहीं है बल्कि अन्य अनेक व्यक्तियों के जीवनधारण श्रम पर निर्भर है।

जीवनसंचय श्रम के अन्तर्गत व्यक्ति जो ‘श्रमसंचय’ करता है उस संचितश्रम का प्रयोग व्यक्ति स्वयं के जीवनधारण श्रम तथा जीवनयापन श्रम के लिए करता है।

जीवनयापन कार्य करते हुए किसी व्यक्तिसमुदाय के कुल व्यक्ति, जिन ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन करते हैं, उन्हीं आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के उपभोग से उस व्यक्तिसमुदाय के कुल व्यक्ति जीवनधारण कार्यों को सम्पन्न करते हैं। अतएव समुदाय स्तर पर अन्य अनेक व्यक्ति जिस अनुपात में जीवनयापन श्रम करेंगे उस अनुपात में स्वयं व्यक्ति जीवनधारण श्रम कर सकेगा और अन्य अनेक व्यक्ति जिस अनुपात में जीवनधारण श्रम करेंगे उस अनुपात में स्वयं व्यक्ति जीवनयापन श्रम कर सकेगा।

अन्य शब्दों में व्यक्ति का जीवनधारण श्रम अन्य अनेक व्यक्तियों के जीवनयापन श्रम से प्रभावित होता है और व्यक्ति का जीवनयापन श्रम अन्य अनेक व्यक्तियों के जीवनधारण श्रम से प्रभावित होता है।

व्यक्ति का जीवनधारण श्रम तथा उसका जीवनयापन श्रम सम्बन्धित नहीं होते, किन्तु समुदाय स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति का जीवनयापन श्रम तथा सम्बन्धित अन्य व्यक्तियों का जीवनधारण श्रम एक दूसरे को प्रभावित करते हुए तथा एक दूसरे से प्रभावित होते हुए प्रत्येक व्यक्ति का जीवनयापन श्रम अन्य अनेक व्यक्तियों के जीवनधारण श्रम से सम्बन्धित होते हैं एवं प्रत्येक व्यक्ति का जीवनधारण श्रम अन्य अनेक व्यक्तियों के जीवनयापन श्रम से सम्बन्धित होते हैं।

जीवनसंचय श्रम के अन्तर्गत ‘संचितश्रम’ का प्रयोग व्यक्ति अपने जीवनधारण श्रम तथा जीवनयापन श्रम के लिए करता है, अतः व्यक्ति का जीवनसंचय श्रम स्वयं उस व्यक्ति के जीवनधारण श्रम तथा उस व्यक्ति के जीवनयापन श्रम से सम्बन्धित होता है। अन्य किसी व्यक्ति के जीवनसंचय श्रम से किसी व्यक्ति का जीवनसंचय श्रम न प्रभावित होता है और न अन्य किसी व्यक्ति के जीवनसंचय श्रम को प्रभावित करता है।

व्यक्तिसमुदाय के प्रत्येक व्यक्ति का जीवनसंचय श्रम पृथक होते हैं। अन्य अनेक व्यक्तियों पर प्रत्येक व्यक्ति अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्भर है और व्यक्ति के जीवनसंचय श्रम का सम्बन्ध उसके जीवनधारण श्रम तथा जीवनयापन श्रम से है इसलिए व्यक्ति के जीवनसंचय श्रम का सम्बन्ध किसी न किसी प्रकार से अनेकानेक व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति से है. इसलिए व्यक्तिसमुदाय के प्रत्येक व्यक्ति का जीवनसंचय श्रम एक दूसरे से पृथक होते हुए भी कहीं न कहीं एक दूसरे से सम्बन्धित होंगे।

व्यक्तिसमुदाय के प्रत्येक व्यक्ति का जीवनसंचय श्रम वस्तुतः समय उर्जा (ब्रह्माण्ड की गतिज उर्जा) से समान रूप से सम्बन्धित हैं। समय उर्जा से उनका सम्बन्ध ही व्यक्तिसमुदाय के प्रत्येक व्यक्ति के जीवनसंचय श्रम को एक दूसरे से सम्बन्धित करता है। साधारण अर्थ में जीवनसंचय श्रम के स्तर पर व्यक्ति निद्रा व विश्राम करता हुआ वह अपना तथा अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करने से वंछित रहता है।

जीवनसंचय स्तर पर व्यक्ति न अपने आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहा होता है और न ही वह अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहा होता है। व्यक्ति निद्रा व विश्राम करता हुआ भी न हो किन्तु वह अपने व अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर रहा हो तो व्यापक अर्थ में व्यक्ति जीवनसंचय श्रम के स्तर पर है, यह कह सकते हैं।

व्यक्ति प्रतिदिन कुछ घण्टे जीवनसंचय श्रम करता है, कुछ घण्टे जीवनधारण श्रम करता है और कुछ घण्टे जीवनयापन श्रम करता है। आजीवन व्यक्ति के जीव उर्जा का प्रयोग व्यक्ति द्वारा जीवन धारण, जीवनयापन, जीवनसंचय से सम्बन्धित कार्यों में होता रहता है और जीवित व्यक्ति की आयु घटते हुए उसके जीवन का अन्त हो जाता है, मानों जीवित व्यक्ति की जीव उर्जा शेष (शून्य) हो गई हो।

जीव उर्जा शेष (समाप्त) होते ही व्यक्ति के जीवन (समय) का अन्त (मृत्यु) हो जाता है और वह स्वयं अपना तथा अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति से वंछित होकर महानिद्रा व गहन विश्राम में चला जाता है। जहाँ व्यक्ति की जीव उर्जा ब्रह्माण्ड़ की उर्जा ‘समय उर्जा’ में विलीन हो जाती है। ‘समय’ उर्जा है और यह ब्रह्माण्ड की गतिज उर्जा को दिया गया नाम है।

ब्रह्माण्ड की गतियाँ जब तक हैं किसी व्यक्ति का जन्म लेते ही मानों ब्रह्माण्ड के समय उर्जा का रूपान्तरण व्यक्ति के जीव उर्जा में होता है। एक के बाद एक व्यक्तियों का जन्म और जन्म लेते ही उन व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेकानेक उन व्यक्तियों का सामुदायिक जीवन एवं समुदाय स्तर पर उनका जीवनधारण श्रम, जीवनयापन श्रम, जीवनसंचय श्रम यह व्यक्ति के श्रम के आवर्तन (Cycle) के आधार में है। व्यक्ति निरन्तर जन्म लेंगे, श्रम करने के लिए व्यक्ति निरन्तर उपलब्ध होंगे। आवश्यकताएँ व्यक्ति की बनी रहेंगी। व्यक्ति को पुनः पुनः श्रम के अवसर मिलते रहेंगे, जिसे ‘आवर्ती श्रम‘ कहा गया है।

श्रम उर्जा है, यह निर्विवाद सत्य है। विवाद इसमें नहीं है कि श्रम उर्जा है अथवा नहीं है बल्कि विवाद इसके लिए हो सकता है कि वह कौन से कारण हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि श्रम उर्जा है। उन कारणों के विस्तार में जाते हुए ‘आवर्ती श्रम’ शीर्षक से यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्माण्ड की गजित उर्जा व्यक्ति के जन्म के साथ व्यक्ति का जीव उर्जा बनकर प्रकट होता है।

व्यक्ति में स्थित जीव के कारण व्यक्ति की आवश्यकताएं हैं और उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति का जीव तत्पर (प्रयत्न) रहता है तथा जीव उर्जा का प्रयोग अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति करता जाता है, व्यक्ति का जीव उर्जा व्यक्ति के श्रम उर्जा में रूपान्तरित होता जाता है।

स्वयं अपना तथा अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति के जीव उर्जा का प्रयोग तो होता है, किन्तु यह प्रयोग किसी अन्य उर्जा जैसे ताप अथवा विद्युत उर्जा के प्रयोग की भांति नहीं होता है। व्यक्ति के जीव उर्जा का प्रयोग व्यक्ति की पात्रता एवं उसके व्यक्तित्व गठन में होकर वह (जीव उर्जा) व्यक्ति के श्रम उर्जा में रूपान्तरित होता है। इस विषय की चर्चा ‘पुनः  पुनः  श्रम’ शीर्षक से आगे की गई है।

2.18 पुनः  पुनः  श्रम

आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति श्रम करता है। विविध वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) की आवश्यकता चूँकि व्यक्ति को पुनः  पुनः  होती है, इसलिए ‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति पुनः  पुनः  श्रम करता है।

श्रम करने से व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति तो होगा, किन्तु किस परिमाण में एवं उसके किन आवश्यकताओं की पूर्ति उसके श्रम से होगा यह स्वयं व्यक्ति की पात्रता पर निर्भर करता है।

व्यक्ति की पात्रता एवं उसके व्यक्तित्व के अनुरूप वह अपने श्रम से स्वयं अपना अथवा अन्य किन्हीं व्यक्तियों के किन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति वह कर सकेगा। व्यक्ति की पात्रता एवं उसके व्यक्तित्व का स्पष्ट अर्थ है।

2.19 व्यक्ति की पात्रता

व्यक्ति का ‘मन’ व्यापक अर्थ में कार्यशाला है, जहाँ व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों के कॉट-छॉट से अपने विचार, बुद्धि, विवेक, ज्ञान आदि रचनाएँ वह बनाता है। किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति उस कार्य के सम्बन्ध में अपने मन में जो शब्दाकृति (शब्दों के कॉट-छॉट’ से बनी रचना) बनाता है उसे व्यापक अर्थ में व्यक्ति द्वारा किया गया ‘काम’ कहते हैं।

‘काम’ निर्धारित हो जाने के बाद व्यक्ति निर्धारित ‘काम’ के अनुरूप शरीर को जिस प्रकार क्रियाशील रखता है उसे व्यापक अर्थ में व्यक्ति का ‘कर्म’ कहते हैं। व्यक्ति अपनी आयु के सम्पूर्ण कालखण्ड़ में वह ‘काम और कर्म’ करता रहता है। निश्चित कोई कालखण्ड़ में अर्थात् समय के किसी अवधि में व्यक्ति द्वारा किया गया कोई ‘काम एवं कर्म’ के परिणामस्वरूप कोई एक कार्य सम्पन्न होता है।

किसी व्यक्ति द्वारा सम्पन्न कोई कार्य उस व्यक्ति द्वारा सम्पन्न अन्य कार्य से केवल इसलिए भिन्न है क्योंकि भिन्न समयावधियों में व्यक्ति उन्हें सम्पन्न करता है। भिन्न कार्यों को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति के ‘काम और कर्म’ एक जैसे हो सकते हैं. किन्तु भिन्न कार्यों को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति द्वारा व्यतीत समय की अवधियाँ अवश्य भिन्न होंगे।

किसी व्यक्ति द्वारा व्यतीत समय के किसी अवधि को उस व्यक्ति द्वारा व्यतीत समय की अन्य अवधि से विलग करना वस्तुतः संभव नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में समय अबाध व्यतीत होते जाता है। इस संदर्भ में हम इतना ही कह सकते हैं कि कार्य करने के लिए व्यक्ति द्वारा व्यतीत समय की कोई अवधि किसी ‘पात्र’ के समान है।

उदाहरण के लिए सामूहिक भोज (होटल या पार्टी) के अवसर पर एक जैसा ही भोजन सब व्यक्ति कर रहे होते हैं। अन्तर प्रत्येक व्यक्ति के भोजन में नहीं बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भोजन पात्र पृथक होते हैं।

किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए व्यक्ति जितना समय व्यतीत करता है, समय की उस अवधि को ‘पात्र’ मान लिया जाए तो कार्य सम्पन्न करने के लिए व्यतीत समय में व्यक्ति जिस प्रकार से ‘काम और कर्म’ करता है उसे व्यक्ति की पात्रता कहते हैं।

किसी व्यक्ति की पात्रता चाहे जैसा व जितनी भी हो किन्तु किसी भी व्यक्ति के लिए सम्मव नहीं कि वह अपनी आवश्यकता के प्रत्येक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का निर्माण स्वयं कर ले।

व्यक्ति के लिए सम्भव यही है कि वह अनेक अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करे और बदले में अनेक अन्य व्यक्ति उसके आवश्यकताओं की पूर्ति करें। व्यक्ति के श्रम से अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति होगा, किन्तु अन्य किन व्यक्तियों के कैसे आवश्यकताओं की पूर्ति व्यक्ति के श्रम से होगा यह स्वयं व्यक्ति के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है।

व्यक्ति के व्यक्तित्व के अनुरूप वह अपने श्रम से अन्य किन्हीं व्यक्तियों के किन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकेगा।

2.20 व्यक्ति का व्यक्तित्व

व्यक्ति नाम से जो कुछ हम देखते हैं कि हाड़, मांस, रक्तादि से बना व्यक्ति का शरीर है और उस शरीर में व्यक्ति का मन है। व्यक्ति के शरीर गठन में प्रोटीन, वसा, लवण… आदि अनेक तत्वों की भूमिका है, यह व्यक्ति के ‘शरीर तत्व’ हैं। व्यक्ति के मन के गठन में शब्द, संस्कार, संकल्प…. आदि अनेक तत्वों की भूमिका है, यह व्यक्ति के ‘मनस तत्व हैं।

व्यक्ति के शरीर के ‘शरीर तत्व’ और उसके मन के ‘मनस तत्व की भांति व्यक्ति के ‘व्यक्ति तत्व भी हैं। व्यक्ति का व्यक्तित्व कहने का अभिप्राय व्यक्ति के ‘व्यक्ति तत्वों’ से है।

‘व्यक्ति तत्वों’ से व्यक्ति का गठन, व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन कहलाता है। व्यक्ति के शरीर का गठन व्यक्ति के मन के गठन से भिन्न प्रकार से होता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन व्यक्ति के शरीर के गठन अथवा व्यक्ति के मन के गठन से भिन्न प्रकार से होता है।

व्यक्ति के शरीर का गठन हो गया अथवा व्यक्ति के मन का गठन हो गया तो व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन हो गया ऐसा नहीं कहा जा सकता है। व्यक्ति के शरीर अथवा मन के गठन से व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन भिन्न होने से व्यक्ति के ‘व्यक्ति तत्व’ व्यक्ति के ‘शरीर तत्व’ प्रोटीन, वसा, लवण…..आदि अथवा व्यक्ति के ‘मनस तत्व’ शब्द, संस्कार, संकल्प…..आदि से भिन्न होते हैं।

व्यक्ति के ‘व्यक्ति तत्वों’ को नीचे रेखांकित कर रेखांकन का परिचय भी यहाँ दिया गया है।

व्यक्ति-स्वत्व-मन

व्यक्ति का महत्व ही उसका स्वत्व है।

व्यक्ति व उसके ‘मन’ (काम) के मध्य उसका ‘स्वत्व है।

भिन्न व्यक्तियों का मिन्न महत्व उनके ‘स्वत्व’ में अन्तर के कारण है।

मन का तात्पर्य मन में किसी कार्य के सम्बन्ध में बनी शब्दाकृति से है, जिसे काम कहते हैं।

मन-वचन-कर्म

व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों में ‘वचन लेता है।

व्यक्ति के मन (काम) व कर्म के मध्य उसका वचन है।

भिन्न व्यक्तियों का भिन्न ज्ञान उनके ‘वचन’ में अन्तर के कारण है।

कार्य करने के लिए व्यक्ति का तन और मन साथ-साथ सक्रिय होते हैं। कार्य करता हुआ व्यक्ति के तन की सक्रियता को ‘कर्म’ कहा गया है।

कार्य करता हुआ व्यक्ति के मन की सक्रियता को उसका ‘काम’ कहा गया है।

कर्म-व्यवहार-कार्य

व्यक्ति के कर्म व कार्य के मध्य उसका ‘व्यवहार है।

अदा हुई सेवाओं (श्रम) को प्रदान करना व्यक्ति का व्यवहार है।

व्यवहारों का आधार लेकर व्यक्ति के कर्म फलित होते हैं।

कर्म फल का तात्पर्य कार्य के परिणाम से है. जिसे यहाँ कार्य कहा गया है।

भिन्न व्यक्तियों के समान कर्म के भिन्न फल उनके ‘व्यवहार’ में अन्तर के कारण है।

कार्य-जीविका-अन्य व्यक्ति

जीविका का तात्पर्य व्यक्ति की आजीविका (रोजगार) से है।

व्यक्ति के कार्य व अन्य व्यक्ति के मध्य उसकी आजीविका है।

व्यक्ति की आजीविका उसके द्वारा सम्पन्न कार्य के परिणाम पर निर्भर है।

आजीविका में अन्तर से व्यक्ति तथा अन्य व्यक्ति का जीवनयापन भिन्न प्रकार से होता है।

स्वत्व-वचन-नेतृत्व

व्यक्ति के स्वत्व व वचन का संयुक्त फल उसमें ‘नेतृत्व’ गुण को स्थापित करता है।

‘नेतृत्व’ गुण के कारण व्यक्ति सक्रिय रहता है।

वचन-व्यवहार-कर्तृत्व

व्यक्ति के वचन व व्यवहार का संयुक्त फल उसमें ‘कर्तृत्व’ गुण को स्थापित करता है।

‘कर्तृत्व’ गुण के कारण व्यक्ति कर्ता बनता है।

व्यवहार-जीविका-अमृतत्व

व्यक्ति के व्यवहार व जीविका का संयुक्त फल उसमें ‘अमृतत्व’ गुण को स्थापित करता है।

अमृतत्व गुण के कारण व्यक्ति बैंकनोटों की आय से संलग्न होता है।

व्यक्ति की क्रयशक्ति (बैंकनोटों में) अमृत है।

नेतृत्व-कर्तृत्व-अमृतत्व

कर्तृत्व के कारण व्यक्ति में स्थित जीव कर्ता बनता है।

नेतृत्व के कारण व्यक्ति में स्थित जीव (कर्ता) क्रिया करता है। अमृतत्व के कारण व्यक्ति में स्थित जीव (कर्ता) क्रिया का फल भोगता है।

नेतृत्व, कर्तृत्व, अमृतत्व…. आदि व्यक्ति तत्वों का व्यक्ति के व्यक्तित्व में शीर्ष महत्व हैं। व्यक्ति का वचन, व्यवहार, कर्म आदि से व्यक्ति का ‘कर्तृत्व’ फलित होता है। व्यक्ति में स्थित जीव अर्थात् व्यक्ति की आवश्यकताएँ तथा व्यक्ति का मन एवं उसका स्वत्व आदि से व्यक्ति का ‘नेतृत्व फलित होता है। अन्य व्यक्ति में स्थित जीव अर्थात् अन्य व्यक्ति की आवश्यकताएँ तथा व्यक्ति का कार्य एवं उसकी जीविका आदि से व्यक्ति का ‘अमृतत्व’ फलित होता है। व्यक्ति के नेतृत्व, कर्तृत्व, अमृतत्व आदि फलित होने का प्रतिफल (परिणाम) व्यक्ति का ‘व्यक्तित्व’ है।

व्यक्ति-जीव-अन्य व्यक्ति

भूख व्यक्ति में स्थित जीव को लगता है।

भोजन करने के लिए व्यक्ति का जीव तड़पता है।

भोजन करने से व्यक्ति में स्थित यह ‘जीव’ तृप्त होता है।

व्यक्ति व अन्य व्यक्ति का तात्पर्य उन व्यक्तियों में स्थित उनके जीव से है।

भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा आदि अनेक आवश्यकताएँ व्यक्ति में स्थित ‘जीव’ के कारण हैं।

जीवित प्रत्येक व्यक्ति को एक जैसा भूख लगती है, उन्हें भोजन चाहिए।

प्रत्येक व्यक्ति को रहने के लिए आवास चाहिए, पहनने के लिए वस्त्र चाहिए।

प्रत्येक व्यक्ति की शिक्षा, यातायात और सब प्रकार की आवश्यकताएँ सबकी हैं। प्रत्येक व्यक्ति एक जैसे बीमार होते हैं तथा उनके व्याधियों का निदान भी एक जैसा है। व्यक्ति और अन्य प्रत्येक व्यक्ति में समान ‘जीव’ है, इसलिए उनकी आवश्यकताएँ समान हैं।

व्यक्तित्व गठन का सम्बन्ध व्यक्ति व अन्य प्रत्येक व्यक्तियों में स्थित समान जीव का विषय है। व्यक्तित्व के आधार में व्यक्ति की आवश्यकताएँ तथा अन्य अनेक व्यक्ति की आवश्यकताएँ हैं। अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बदले में अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति जिस सीमा तक जाएगा उस सीमा तक व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन होगा।

व्यक्ति, मन, कर्म, कार्य तथा अन्य व्यक्ति

व्यक्तित्व गठन की प्रक्रिया के पहले स्तर पर व्यक्ति सर्व प्रथम निज मन में अन्य व्यक्ति से सम्बन्धित विषय धारणा (काम) करता है, उसके बाद उन विषयों में शरीर से संलग्न (कर्म) होता है। व्यक्ति के काम (मन) और कर्म से कोई कार्य सम्पन्न होता है। सम्पन्न कार्य का फल अन्य व्यक्ति के लिए होता है। व्यक्ति स्वयं के लिए कोई कार्य करता है तो वह स्वयं के लिए अन्य व्यक्ति हो जाता है। अन्य व्यक्ति के लिए कार्य करता हुआ व्यक्ति सेवारत होता है तथा स्वयं के लिए अन्य व्यक्ति होकर कार्य करता हुआ व्यक्ति व्यवसायरत होता है। व्यक्ति कभी व्यवसायरत होकर तो कभी सेवारत होकर निरन्तर कार्य करता है।

स्वत्व, वचन, व्यवहार तथा जीविका

व्यक्तित्व गठन की प्रक्रिया के दूसरे स्तर पर व्यक्ति ‘स्वत्व’ से परिचित होता है। व्यक्ति का महत्व ही उसका ‘स्वत्व है। भिन्न व्यक्तियों का भिन्न महत्व उनके ‘स्वत्व’ में अन्तर के कारण है। व्यक्ति का ‘स्वत्व’ उसके मन (काम) का आधार है। इस आधार पर ही व्यक्ति (तन) स्वयं उसके मन (काम) से जुड़ा होता है, इसके लिए व्यक्ति उसे ज्ञात शब्दों में ‘वचन’ लेता है। व्यक्ति के ‘वचन’ उसके मन (काम) को उसके कर्म (तन) से जोड़ता है।

व्यक्ति के कर्म व उसके कार्य को जोड़ने वाला विषय उसका ‘व्यवहार’ है। व्यवहार से तात्पर्य अदा हुई सेवाओं को प्रदान करने से है। सेवाओं के आदान-प्रदान का संयुक्त विचार अन्य शब्दों में व्यवहार कहलाया। व्यवहार करता हुआ व्यक्ति न केवल ‘वस्तु आदि’ का उपभोग (सेवाएँ अदा होना) करेगा बल्कि ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन (सेवाएँ प्रदान करना) भी करेगा। अपने ‘व्यवहार’ के कारण व्यक्ति के कर्म फलित (परिणाम) होते (देते) हैं और भिन्न व्यक्तियों के समान कर्म के भिन्न फल उनके ‘व्यवहार’ में अन्तर के कारण है।

स्वत्व, वचन और व्यवहार संयुक्त रूप में व्यक्ति की आजीविका है। व्यक्ति के कार्य व अन्य व्यक्ति के मध्य उसकी ‘जीविका’ (आजीविका या रोजगार) है, जो उसके द्वारा सम्पन्न कार्यों पर निर्भर है। प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन समान श्रम करते हैं, किन्तु उनका जीवनयापन भिन्न प्रकार से होता है। यह उनके ‘आजीविका’ अर्थात् उनके स्वत्व, वचन और व्यवहार का समान रीति से संयुक्त न होने के कारण है।

नेतृत्व, कर्तृत्व तथा अमृतत्व

व्यक्तित्व गठन की प्रक्रिया के तीसरे स्तर पर व्यक्ति ‘नेतृत्व, कर्तृत्व, अमृतत्व’ मौलिक तीन गुणों को तराशता है। व्यक्ति के ‘स्वत्व व वचन’ का संयुक्त फल उसमें ‘नेतृत्व’ गुण को स्थापित करता है। इसके कारण व्यक्ति सक्रिय रहता है। व्यक्ति के ‘वचन व व्यवहार’ का संयुक्त फल उसमें ‘अमृतत्व’ गुण को स्थापित करता है, रुपए अमृत है। अमृतत्व के कारण व्यक्ति बैंकनोटों (रुपए) की आय से संलग्न होता है। कर्तृत्व के कारण व्यक्ति में स्थित ‘जीव’ कर्ता बनता है। नेतृत्व के कारण व्यक्ति में स्थित जीव (कर्ता) क्रिया करता है। अमृतत्व के कारण व्यक्ति में स्थित जीव (कर्ता) क्रिया का फल भोगता है।

व्यक्ति तथा अन्य व्यक्ति

व्यक्तित्व गठन की प्रक्रिया के चौथे स्तर पर व्यक्ति ‘पात्रता’ का विस्तार करता है, इसके लिए वह सामुदायिक जीवन को अपने व्यक्तिगत जीवन से वरीयता प्रदान करता है। अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करता हुआ व्यक्ति सामुदायिक जीवन जीता है। स्वयं अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करता हुआ व्यक्ति व्यक्तिगत जीवन भी जीता है। किसी व्यक्ति का जीवन कहने का अभिप्राय उसके व्यक्तिगत जीवन से है एवं उसके सामुदायिक जीवन से भी है,

क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति व्यक्तिगत जीवन तथा सामुदायिक जीवन साथ-साथ जीता है। व्यक्ति का सामुदायिक जीवन उसके व्यक्तिगत जीवन से भिन्न दूसरा जीवन नहीं है।

व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन की आधारशिला व्यक्ति की पात्रता है, अर्थात् व्यक्ति अपने पात्रता के अनुरूप ही वह अपने आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकेगा। व्यक्ति के सामुदायिक जीवन की आधारशिला व्यक्ति का व्यक्तित्व है, अर्थात् व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही जीवन में अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकेगा।

व्यक्ति का सामुदायिक जीवन और उसका व्यक्तिगत जीवन जैसे एक दूसरे से भिन्न नहीं है वैसा ही व्यक्ति की पात्रता और उसका व्यक्तित्व भी एक दूसरे से भिन्न नहीं है।

2.21 पात्रता-श्रम-व्यक्तित्व

अपना तथा अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति जितना कुछ श्रम करता है उसके कारण व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन का विस्तार व्यक्ति का सामुदायिक जीवन में होता है और व्यक्ति के पात्रता का विस्तार व्यक्ति के व्यक्तित्व में होता है। इस क्रम में व्यक्ति के ‘श्रम’ के साथ उसकी पात्रता एवं व्यक्तित्व का तिकोण बनता है।

यह तिकोण अर्थात् पात्रता-श्रम-व्यक्तित्व का तिकोण बारम्बार विभाजित होता है एवं एकाकार होता है, जिससे व्यक्ति का ‘श्रम’ पुनः पुनः प्रस्तुत होता है। तिकोण बनना और बारम्बार विभाजित अथवा एकाकार होकर पुनः  पुनः  श्रम प्रस्तुत होना, सम्बन्धित इस विषय को नीचे रेखांकित किया गया है।

तिकोण बनना और उस तिकोण का विभाजन एवं उसका एकाकार होना माता, पिता व उनके सन्तान से बने तिकोण के उदाहरण से समझ सकते हैं। माता व पिता अपने सन्तान में एकाकार होते हैं और सन्तान माता व पिता की भूमिका में विभाजित हो जाता है। इस प्रकार विभाजित और एकाकार होने से स्त्री, पुरुष का बारम्बार जन्म होता है।

व्यक्ति की पात्रता एवं व्यक्तित्व उसके ‘श्रम’ में एकाकार होता है। व्यक्ति का ‘श्रम’ उसकी पात्रता एवं व्यक्तित्व में विभाजित होता है। इस विभाजन एवं एकीकरण से व्यक्ति का ‘श्रम’ पुनः  पुनः  प्रस्तुत होता है। पुनः  पुनः  प्रस्तुत होने वाला व्यक्ति का श्रम नवीनता लिए होता है।

श्रम, पात्रता, व्यक्तित्व, पात्रता, व्यक्तित्व, श्रम  का चौखट बनना बार-बार होना दर्शाता है।

ध्यान रहे पूर्व में किए गए अपने श्रम को व्यक्ति पुनः पुनः प्रस्तुत नहीं करता है। व्यक्ति जब-जब श्रम करता है, प्रत्येक अवसर पर व्यक्ति नवीन श्रम करता है। पुनः  पुनः  प्रस्तुत होने वाला व्यक्ति का नवीन श्रम कुछ उसी प्रकार का है जैसे वृक्ष से बीज ओर बीज से वृक्ष का आवर्तन होता है। वृक्ष से बीज में वृक्ष का तात्पर्य पुराने वृक्ष से है। बीज से वृक्ष में वृक्ष का तात्पर्य नवीन वृक्ष से है।

किसी अवसर पर व्यक्ति जो कुछ श्रम करता है उसे पुराना वृक्ष यदि कहें तो उस श्रम के रूपान्तरण से जो नवीन श्रम व्यक्ति करता है वह अन्य अवसर पर होता है और उस अन्य अवसर पर व्यक्ति जो कुछ श्रम करता है वह नवीन श्रम नया वृक्ष समान है।

वृक्ष से बीज व बीज से वृक्ष का बनना एक स्वभाविक प्रक्रिया है. इसे सम्पन्न करने में न वृक्ष की ओर से कोई पहल होती है और न ही बीज की ओर से कोई पहल होती है, इसलिए इसे वृक्ष से बीज और बीज से वृक्ष का आवर्तन (रूपान्तरण नहीं) कहा गया है।

व्यक्ति के श्रम से कोई कार्य सम्पन्न होना, सम्पन्न उस कार्य से व्यक्ति की पात्रता एवं उसके व्यक्तित्व का गठन होना, पात्रता एवं व्यक्तित्व के अनुरूप व्यक्ति द्वारा श्रम करना। व्यक्ति के श्रम से पुनः कोई कार्य सम्पन्न होना, सम्पन्न उस कार्य से पुनः व्यक्ति की पात्रता एवं उसके व्यक्तित्व का गठन होना, पात्रता एवं व्यक्तित्व के अनुरूप पुनः  व्यक्ति द्वारा श्रम करना। व्यक्ति के श्रम से पुनः  पुनः  कोई कार्य सम्पन्न होना, सम्पन्न उस कार्य से पुनः  पुनः  व्यक्ति की पात्रता व व्यक्तित्व का गठन होना, पात्रता एवं व्यक्तित्व के अनुरूप पुनः  पुनः  व्यक्ति द्वारा श्रम करना।

व्यक्ति के श्रम प्रसंग में पुनः पुनः व्यक्ति द्वारा श्रम करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। पुनः पुनः श्रम करने के लिए व्यक्ति कोई पहल नहीं करता है। निज आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति पहल करता है। अन्य अनेक व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति पहल करता है। अन्य अनेक व्यक्तियों के साथ सामुदायिक जीवन जीने के लिए व्यक्ति पहल करता है।

व्यक्ति अपना तथा अन्य अनेक व्यक्तियों के लिए आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के मांग-पूर्ति के संगत बैंकनोटों के उनकी आय-व्यय के अधीन स्वाभाविक रूप से अनेक अन्य व्यक्तियों के साथ व्यक्ति समुदाय स्तर पर आजीवन ‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति से संलग्न रहता है और आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन तथा उपभोग से पुनः  पुनः  संलग्न होकर वह पुनः  पुनः  श्रम करता है।

‘आवर्ती श्रम’ और ‘पुनः पुनः श्रम’ शीर्षक से हमने यहाँ स्पष्ट किया है कि ब्रह्माण्ड की गतिज उर्जा (समय उर्जा) का रूपान्तरण व्यक्ति के जीव उर्जा में और उस जीव उर्जा का रूपान्तरण व्यक्ति के श्रम उर्जा में होता है। व्यक्ति का श्रम चूँकि उर्जा है, इसलिए ‘श्रम उर्जा’ का रूपान्तरण आगे भी जारी रहता है।

श्रम से व्यक्ति संस्कारित होता है, संस्कारों के अधीन व्यक्ति श्रम करता है। व्यक्ति को ज्ञात शब्द उसके संस्कार हैं जो ब्रह्माण्ड के ‘शब्द उर्जा के साथ लय बनाकर व्यक्ति के श्रम को अविनाशी बनाए रखता है। इस विषय की विस्तार से चर्चा ‘श्रम से श्रम’ और ‘श्रम-संस्कार-श्रम’ शीर्षक से आगे हमने की है।

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