हमें याद रखना होगा कि लोगों के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जो बैंकनोटों का लेन-देन करते हों और लोगों के जीवनयापन (जीवित रहना) के अतिरिक्त बैंकनोटों के लेन-देन का अन्य उद्देश्य भी नहीं जब बैंकनोटों का लेन-देन होता हो। वस्तुतः जीवित रहने के लिए लोग बैंकनोटों का लेन-देन करते हैं।
बैंकनोटों को छापना, उन्हें लेन-देन के लिए जारी करना यह राज्य व्यवस्था (केन्द्र सरकार) के अधीन आता है, इसके लिए सरकार स्वयं गारंटर बनकर केन्द्रीय बैंक (रिज़र्व बैंक) को वह अधिकार देती है। बैंकनोटों के धारक को “मैं…..रुपए अदा करने का वचन देता हूं” लिखकर रिज़र्व बैंक लेन-देन के लिए बैंकनोटों को जारी करती है। ‘वचन निर्वाह’ का सन्दर्भ जहाँ दिए गए अथवा लिए गए रुपयों के माप से है वहीं बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान (वस्तु विनिमय) का सन्दर्भ दिए गए अथवा लिए गए ‘वस्तु आदि’ का मूल्य रुपयों से है, अस्तु रुपए के मूल्य निर्धारण से है।
लोगों के सेवाओं के माप की इकाई (रुपए) और उनके सेवाओं के माप के साधन (बैंकनोट) के सन्दर्भ में लोगों के सेवाओं के माप का मानक (आधार माप) वस्तुतः मुद्रा है। रुपए का मूल्य मुद्रा है।
‘वचन निर्वाह’ का सन्दर्भ, ‘वस्तु विनिमय’ का सन्दर्भ एवं ‘माप के मानक’ के सन्दर्भ की चर्चा करेंगे।
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1.12 ‘वचन निर्वाह’ का संदर्भ
बैंकनोटों को लीगल टेण्डर कहते हैं। ‘टेण्डर अंग्रेजी भाषा का शब्द है। अंग्रेजी भाषा में किसी शब्द का प्रयोग संदर्भ अनुसार अर्थ लिए होता है। बैंकनोटों को लीगल टेण्डर कहने के संदर्भ में ‘टेण्डर’ शब्द का प्रयोग औपचारिक प्रस्ताव के अर्थ में हुआ है।
“मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” यह राज्य का औपचारिक प्रस्ताव है। औपचारिक यह प्रस्ताव चूँकि राज्य का है. इसलिए यह विधान भी है। वैधानिक इस अधिकार के अन्तर्गत हर उस व्यक्ति को दण्डित करने का अधिकार राज्य को प्राप्त है जो कोई व्यक्ति किसी देनदारी को बैंकनोटों में लेने से अस्वीकार करता है।
बैंकनोटों पर मुद्रित मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ इस वचनखण्ड का अर्थ कोई व्यक्ति यह माने कि बैंकनोट लेकर रिज़र्व बैंक के सम्मुख प्रस्तुत होने पर बदले में उस माप के बैंकनोट देने के लिए रिज़र्व बैंक वचनबद्ध है तो वचनखण्ड़ का यह अर्थ व्यक्ति की कोरी भावुकता को ही दर्शाता है, क्योंकि रिज़र्व बैंक से बैंकनोटों के बदले बैंकनोट लेना यह किसी भी व्यक्ति के लिए सर्वथा अनावश्यक है।
बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड़ से निर्धारित राज्य की वचनबद्धता बैंकनोटों के लेन-देन में वस्तुतः राज्य (केन्द्र सरकार) को एक पक्ष बनाकर प्रस्तुत करता है। बैंकनोटों के लेन-देन में राज्य के पक्ष को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। उदाहरण ईश्वर के भक्त का है।
ईश्वर की सत्ता सर्वव्यापी है, सर्वव्यापक ईश्वर की सत्ता को स्वीकार कर कोई व्यक्ति ईश्वर का भक्त बनता है। ईश्वर का ‘भक्त’ बना कोई व्यक्ति ईश्वर की सर्वव्यापक सत्ता को स्वीकार कर ईश्वर को सम्बोधित कर वह ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति को व्यक्त करता है।
वह व्यक्ति स्वयं एक ओर एवं दूसरी ओर ‘ईश्वर’ उन दोनों का अदृश्य संवाद जारी रहता है। जानकर भी कि जाने ईश्वर उसकी बात सुन रहा है अथवा नहीं सुन रहा है, वह (भक्त) ईश्वर से संवाद जारी रखता है मानों ईश्वर उसकी बात सुन रहा हो।
‘भक्त अपने प्रत्येक व्यवहार में ईश्वर को साक्षी मानकर व्यवहार करता है एवं सदैव इसका ध्यान रखता है कि वह जो भी व्यवहार कर रहा है वह ‘ईश्वर’ को मान्य है अथवा मान्य नहीं है। ‘ईश्वर’ को साक्षी मानकर भक्त व्यवहार करता है, यही ईश्वर के प्रति उसकी भक्ति है जिसका वह (भक्त) प्रमाण भी देता है।
भक्त ईश्वर के समक्ष ‘प्रसाद’ स्वरूप जो कुछ समर्पित करता है, उस प्रसाद को ईश्वर का प्रसाद मानकर ग्रहण करता है और अन्य अनेक व्यक्तियों में वितरित करता है। किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए ईश्वर के ‘प्रसाद’ को भी भक्त ईश्वर का प्रसाद मानकर ग्रहण करता है न कि अन्य व्यक्ति द्वारा दिया गया वह मानता है, जब कि ईश्वर का प्रसाद मानकर व्यक्ति जो कुछ ग्रहण कर रहा है उसे ईश्वर ने तो दिया नहीं है वह यह भलीभांति जानता है। अन्य व्यक्ति ने जो कुछ ईश्वर के समक्ष ईश्वर के लिए प्रस्तुत किया वह ईश्वर का प्रसाद बनकर अन्य अनेक व्यक्तियों में बंट जाता है।
ईश्वर अपने लिए कुछ भी नहीं रखता क्योंकि ईश्वर तो अदृश्य ‘सत्ता’ भर है जो सर्वव्यापक है। राज्यसत्ता भी ईश्वर की सत्ता की भांति सर्वव्यापक है। राज्य भर में राज्य का प्रत्येक व्यक्ति राज्य सत्ता को स्वीकार करता है। व्यक्ति बैंकनोटों की जो कुछ राशि व्यय करता है वह राज्य को साक्षी बनाकर व्यय करता है क्योंकि राज्य द्वारा जारी बैंकनोटों का ही वह लेन-देन करता है।
राज्य को साक्षी बनाकर व्यक्ति रुपए (बैंकनोटों) की जो कुछ राशि व्यय करता है, वह राज्य की भेंट चढ़ जाता है और राज्य का हो जाता है। राज्य को साक्षी बनाकर व्यय किए गए बैंकनोट राज्य का प्रसाद बनकर अन्य व्यक्तियों में वितरित हो जाता है, जिसे अन्य उन व्यक्तियों की आय कहते हैं।
ईश्वर और उसके भक्त का व्यवहार तथा प्रसाद आदि का उदाहरण देकर बैंकनोटों के लेन-देन के प्रमुख दो संदर्भों को स्पष्ट करने का प्रयास हमने यहाँ किया है जहां बैंकनोटों पर मुद्रित वचनखण्ड से निर्धारित वचनबद्धता के कारण राज्य (केन्द्र सरकार) बैंकनोटों के लेन-देन का एक पक्ष होता है और बैंकनोटों को देने वाला व्यक्ति तथा दिए गए बैंकनोटों को लेने वाला अन्य व्यक्ति उस लेन-देन के अन्य दो पक्ष होते हैं।
1.13 ‘वस्तु विनिमय’ का संदर्भ
वस्तु,संसाधन,सेवाएं आदि (वस्तु आदि) लोगों की आवश्यकताएं हैं। ‘वस्तु आदि’ प्रदान कर लोग अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, जब कि ‘वस्तु आदि’ की अदायगी से (अदा होने से) लोगों के स्वयं के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान वस्तु विनिमय का संदर्भ है।
लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति वस्तु विनिमय का उद्देश्य है। इसके लिए लोग समुदाय में रहते हैं। समुदाय स्तर पर अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करने के बाद भी स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति न होता हो तो ‘वस्तु विनिमय’ का उद्देश्य पूरा न होगा।
सामुदायिक जीवन में अपने आवश्यकताओं की पूर्ति व्यक्ति कर ले किन्तु बदले में वह अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर रहा होता है तो भी ‘वस्तु विनिमय’ का उद्देश्य पूरा न होगा।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति ने प्रारम्भ में ‘वस्तु विनिमय’ की जटिल किसी प्रक्रिया (बार्टर) को अपनाया। उसे सरल बनाने के लिए अगले चरण में समुदाय स्तर पर सोना, चांदी के रुपए के सिक्कों के लेन-देन को व्यक्ति ने अपनाया। सिक्के बनाने में मूल्यवान धातु का प्रयोग होने से ‘वस्तु विनिमय’ की वह प्रक्रिया कालक्रम में सुरक्षित व संरक्षित नहीं रह सकी।
असुरक्षित प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए व्यक्ति ने अगले चरण में बैंकनोटों के लेन-देन को अपनाया, जहाँ बैंकनोट अतीत में ‘रुपए’ (सोना, चांदी के सिक्के) के समतुल्य थे। मूल्यवान ‘रुपए’ के सिक्कों के संचित कोष (Reserves) के एवज में ‘बैंकनोटों’ को जारी करने की बाध्यता बैंकों की थी इसलिए बैंकनोटों को जारी करने की सीमाएँ बनी जिससे ‘वस्तु विनिमय’ की सीमाएँ बनीं और बैंकनोटों के लेन-देन में ‘वस्तु विनिमय’ व्यापक रूप से नहीं किया जा सका।
‘वस्तु विनिमय’ के इस चरण की प्रक्रिया में बने सीमाओं को लांघकर व्यापक स्तर पर ‘वस्तु विनिमय’ के लिए व्यक्ति ने अगले चरण में मूल्यवान रुपए के सिक्कों के संचित कोष के एवज में बैंकनोटों को जारी करने की बैंकों की बाध्यता को समाप्त किया इससे ‘वस्तु विनिमय’ व्यापक स्तर पर हुआ अवश्य किन्तु ‘वस्तु विनिमय अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। जिस उद्देश्य से व्यक्ति ने ‘वस्तु विनिमय’ की प्रक्रिया को अपनाया था और भिन्न चरणों में उसने उस प्रक्रिया का उत्तरोत्तर विकास भी किया था, अन्ततः ‘वस्तु विनिमय’ अपने मूल उद्देश्य से हटकर हो रहा है।
अन्य व्यक्तियों की आवश्यकता के ‘वस्तु आदि’ उन्हें प्रदान करने से बदले में स्वयं व्यक्ति के ‘वस्तु आदि’ आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, यह वस्तु विनिमय’ के किसी भी प्रक्रिया का उद्देश्य है, चाहे ‘वस्तु विनिमय’ सोना चाँदी से बने रुपए के सिक्कों के लेन-देन से सम्पन्न होता हो अथवा कागज पर छपे रुपयों (बैंकनोट) के लेन-देन से होता हो।
समुदाय स्तर पर रुपए अथवा बैंकनोटों के लेन-देन को व्यक्ति ने इसीलिए अपनाया था क्योंकि उसे अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करनी थी। अपने आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करना होगा, इसे मान भी लें तो स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति न होता हो तो ‘वस्तु विनिमय’ का मूल उद्देश्य पूरा न होगा।
क्योंकि अनेक अवसरों पर अन्य व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करने के बाद भी स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती है। ऐसे भी अवसर बनते हैं जब लोग अपने आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेते हैं, किन्तु वह अन्य व्यक्तियों आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर रहे होते हैं।
अन्य किन्हीं व्यक्तियों के ‘वस्तु आदि‘ आवश्यकताओं की पूर्ति करने से बदले में स्वयं व्यक्ति के ‘वस्तु आदि‘ आवश्यकताओं की पूर्ति होना और बदले में अन्य व्यक्तियों के वस्तु आदि आवश्यकताओं की पूर्ति होना, यही वस्तु विनिमय का संदर्भ और उद्देश्य है।
1.14 ‘माप के मानक’ का संदर्भ
किसी माप को मापने के प्रसंग में माप की कोई इकाई और उस इकाई में मापने का ‘साधन’ तथा माप का कोई ‘मानक’ अवश्य होगा, जिसका (माप का मानक) आधार लेकर वह माप प्रस्तुत होगा। उदाहरण के लिए माप, तौल के अन्तरर्राष्ट्रीय मानक संस्थान में रखे गए एक छड़ की लम्बाई ‘एक मीटर’ सर्वमान्य है। यह लम्बाई का इकाई माप है और इसे लम्बाई के ‘मीटर’ माप का ‘मानक’ कहा जाता है।
मानक कहने का तात्पर्य आधार माप से है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य किसी छड़ की लम्बाई का माप ‘एक मीटर’ को आधार माप मानकर उस लम्बाई की तुलना में अन्य किसी वस्तु की लम्बाई, चौडाई अथवा उँचाई आदि को मीटर इकाई में मापा जाता है।
‘एक’ मीटर को सहज ही ‘मीटर’ कह कर लम्बाई के इकाई (एक) को ‘मीटर’ कहा जाता है। लम्बाई के माप का मानक बदल दिया जाए तो माप भी बदलेगा। मीटर माप के मानक का आधार लेकर माप प्रस्तुत करने पर किसी वस्तु की लम्बाई ‘3मीटर’ हो तो माप के अन्य मानक ‘फीट’ माप के मानक का आधार लेकर माप प्रस्तुत करने पर समान उसी वस्तु की लम्बाई ‘9फीट’ से अधिक होगा जिसकी लम्बाई मात्र ‘3 मीटर’ है।
वस्तु समान है, मापी गई लम्बाई समान है, किन्तु लम्बाई के माप भिन्न हैं (जैसे 3 मीटर व 9 फीट), क्योंकि मीटर माप का मानक और फीट माप के मानक में अन्तर है। ‘रुपए’ व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है,‘बैंकनोट’ व्यक्ति के सेवाओं को मापने का साधन हैं। सेवाओं के माप के प्रसंग में व्यक्ति के सेवाओं के माप का मानक अवश्य होगा जिसके आधार पर व्यक्ति के सेवाओं को मापा जा सकेगा।
व्यक्ति के सेवाओं के माप का मानक कहने का तात्पर्य है, व्यक्ति के इकाई सेवाओं को निर्धारित कर, उन सेवाओं के लिए सबको समान रूप से न्यूनतम जिस किसी माप में बैंकनोट दिया जाना निर्धारित होगा, बैंकनोटों का निर्धारित वह माप व्यक्ति के सेवाओं के माप का मानक कहलाएगा।
लम्बाई माप के प्रसंग में माप की इकाई का नाम मीटर है और माप के ‘मानक’ का नाम भी मीटर है, क्योंकि माप का मानक (एक मीटर) ही इकाई माप (एक मीटर) होता है। सेवाओं के माप के प्रसंग में व्यक्ति के इकाई सेवाओं के लिए एक रुपए देय नहीं होगा, इसलिए व्यक्ति के सेवाओं का इकाई माप एक रुपए नहीं होगा, अतः व्यक्ति के सेवाओं के माप के मानक का नाम रुपए नहीं होगा, बल्कि रुपए से भिन्न कोई नाम होगा और यह भिन्न नाम ‘मुद्रा’ है।
मुद्रा व्यक्ति के सेवाओं के माप का मानक है, अर्थात् व्यक्ति के इकाई सेवाओं को निर्धारित कर उन सेवाओं के लिए सबको समान रूप से उनके प्रतिघंटे की सेवाओं के लिए कम से कम एक ‘मुद्रा’ दिया जाना आवश्यक होगा।
व्यक्ति को उसके सेवाओं के लिए चूँकि बैंकनोट दिए जाते हैं, इसलिए ‘मुद्रा’ बैंकनोटों का निर्धारित कोई माप होगा जिसे व्यक्ति के इकाई सेवाओं के लिए दिया जाना निर्धारित होगा। बैंकनोटों का निर्धारित जो माप एक ‘मुद्रा’ होगी उसे ‘मुद्रा का मान’ कहेंगे।
‘मुद्रा का मान’ 10 रुपए, 20 रुपए या अन्य कोई मान हो सकता है, अर्थात् व्यक्ति के इकाई सेवाओं के लिए 10 रुपए, 20 रुपए या अन्य किसी माप में बैंकनोटों का दिया जाना निर्धारित हो सकता है।
मुद्रा का मान रुपए की इकाई में बैंकनोटों का निर्धारित कोई माप है, इसलिए मुद्रा के लेन-देन में रुपए की इकाइयों में बैंकनोटों का ही लेन-देन होता है।
माप की इकाई मीटर तथा माप का साधन मीटर माप ‘छड़’ के प्रसंग में माप का मानक देशकाल परिस्थिति निरपेक्ष होता है। किसी वस्तु की लम्बाई आज मापा जाए अथवा अन्य किसी काल में (वर्षों बाद) मापा जाए, वस्तु की लम्बाई का माप अपरिवर्तित रहेगा।
किसी वस्तु की लम्बाई भारतवर्ष में मापा जाए अथवा अन्य किसी देश जैसे अमेरिका में मापा जाए, वस्तु की लम्बाई का माप अपरिवर्तित रहेगा। अतएव किसी वस्तु के लम्बाई के माप का मानक जो कुछ होगा वह देशकाल परिस्थिति निरपेक्ष होता है।
किसी व्यक्ति को उसके किन्हीं सेवाओं के लिए जिस माप में बैंकनोट आज दी जाएगी, कालान्तर में उस व्यक्ति को उसके उन्हीं सेवाओं के लिए अन्य किसी माप में बैंकनोट दिए जा सकते हैं।
किसी व्यक्ति को उसके किन्हीं सेवाओं के लिए भारतवर्ष में जिस माप में बैंकनोट देय होगा अन्य किसी देश में उस व्यक्ति के उन्हीं सेवाओं के लिए रुपए अथवा डालर आदि इकाइयों में अन्य किसी माप में बैंकनोट देय होगा।
डालर आदि भी रुपए की भांति व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई मात्र है। अतएव व्यक्ति के सेंवाओं के माप का मानक ‘मुद्रा’ जो कुछ होगा वह देशकाल परिस्थिति सापेक्ष होता है।
मीटर माप देशकाल परिस्थिति निरपेक्ष होने से मीटर माप के प्रसंग में माप के मानक का चयन अथवा मापने के साधनों की प्रयोगविधि अत्यंत सहज है।
इसके विपरीत व्यक्ति के सेंवाओं का माप देशकाल परिस्थिति सापेक्ष होने से व्यक्ति के सेंवाओं के माप के प्रसंग में सेवाओं के माप के मानक ‘मुद्रा के मान’ का निर्धारण तथा निर्धारित उस माप के बैंकनोटों के लेन-देन का विषय सहज नहीं है, असहज उसी विषय (मुद्रा का मान) की चर्चा हम आगे कर रहे हैं।