बैंकनोट, मंदी का दुष्चक्र

बैंकनोट सजीव व्यक्ति के सेवाओं को मापने के सजीव साधन हैं। मीटर माप अंकित छड़ निर्जीव साधन है। निर्जीव और सजीव में मौलिक अन्तर है। निर्जीव पदार्थों की मात्र उपस्थिति दर्ज होती है, जब कि सजीव इकाईयों का निज अस्तित्व होता है। बैंकनोटों का निज अस्तित्व है। बैंकनोटों का अस्तित्व ‘मंदी के समय समझ में आता है, जब निर्धन व्यक्ति ही नहीं बल्कि धनवान व्यक्ति भी बैंकनोटों को पाने के लिए तरस जाते हैं और बैंकनोट उन्हें मिलें इसका बाट जोहते रहते हैं।

1.10 मंदी का दुष्चक्र 

अनेक व्यक्ति जिस किसी माप के बैंकनोटों का लेन-देन करते हैं उसमें कहीं कुछ भी निश्चित नहीं होता है कि बैंकनोट किस-किस व्यक्ति के हाथों हस्तांतरित हो रहे हैं। कौन किसे रुपए (बैंकनोटों) की कौन सी राशि दे रहा है अथवा कौन किससे बैंकनोटों (रुपए) की कौन सी राशि ले रहा है यह सब कुछ निश्चित नहीं होता है, मानों बैंकनोटों का कोई प्रवाह बना हुआ है।

प्रवाह में बने हुए बैंकनोटों में से प्रत्येक व्यक्ति बैंकनोट लेता है तथा बैंकनोट जो कुछ कोई व्यक्ति दे रहा है वह बैंकनोटों के प्रवाह को बनाता है। किसी नदी में प्रवाहित जल के उदाहरण से बैंकनोटों के प्रवाह का संदर्भ स्पष्ट होता है। नदी का जल खेतों में, घरों में आदि अनेक स्थानों पर पहुँचता है। अनेक स्त्रोतों से, घरों से, मैदानी और पर्वतीय इलाकों से जल आकर नदी के जल में मिलता है।

जलप्रवाह के संदर्भ में कहीं कुछ भी निश्चित नहीं होता है कि जलप्रवाह के किस भाग में कहाँ का जल है और कहाँ का जल कहाँ पहुँच रहा है। वैसा ही बैंकनोटों के प्रवाह के संदर्भ में समुदाय स्तर पर अनेक व्यक्ति के हाथों निरन्तर बैंकनोट (रुपए) दिए जा रहे हैं और लिए जा रहे हैं।

बैंकनोटों को लेने के क्रम में किसी वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) के उत्पादन से संलग्न (जुड़कर) होकर अन्य अनेक व्यक्तियों को अपनी सेवाएँ व्यक्ति प्रदान करता है। बैंकनोटों को देने के क्रम में व्यक्ति किसी वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के उपभोग से संलग्न होता है, फलस्वरूप उसे अन्य अनेक व्यक्तियों की सेवाएँ अदा होती हैं।

समुदाय स्तर पर अनेक व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन एवं उपभोग से संलग्न होकर बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से प्रत्येक व्यक्ति अन्य अनेक व्यक्ति के सेवाओं का आदान-प्रदान करता है।

सेवाओं के इस आदान-प्रदान में कहीं कुछ भी निश्चित नहीं होता है कि कौन सी सेवाएँ किसके द्वारा प्रदान की गई हैं अथवा किसकी सेवाएँ किसे अदा हो रही हैं, मानों बैंकनोटों के लेन-देन के प्रवाह से व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान का कोई प्रवाह बना हुआ है।

किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से संलग्न होकर कोई व्यक्ति व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं में से अपने लिए अन्य किन्हीं व्यक्तियों की सेवाएँ प्राप्त करता है एवं किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न होकर व्यक्ति जो कुछ सेवाएँ प्रदान कर रहा है वह व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं में मिलकर व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के प्रवाह को बनाता है।

व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रवाह से तात्पर्य है, समुदाय स्तर पर अनेकानेक व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन एवं उपभोग निरन्तर कर रहे हैं। सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रवाह को बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि समुदाय स्तर पर अनेक व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का न केवल उपभोग करें बल्कि वह ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से भी अवश्य संलग्न हों एवं उसी प्रकार से अनेक वह व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ का न केवल उत्पादन करें बल्कि वह ‘वस्तु आदि’ का उपभोग भी अवश्य करें।

‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से संलग्न होकर व्यक्ति अन्य अनेक व्यक्ति को सेवाएँ प्रदान करते हैं और वह बैंकनोट लेते हैं। ‘वस्तु आदि’ के उपभोग में व्यक्ति को अन्य अनेक व्यक्तियों की सेवाएँ अदा होती हैं और वह बैंकनोट देते हैं। बैंकनोटों के लेन-देन का प्रवाह एवं व्यक्ति अथवा व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान का प्रवाह एक दूसरे से सम्बन्धित विषय हैं।

बैंकनोटों के लेन-देन के विचार के साथ व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान का विचार स्वतः  प्रस्तुत हो जाएगा एवं व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान के विचार के साथ बैंकनोटों के लेन-देन का विचार स्वतः  प्रस्तुत हो जाएगा।

बैंकनोटों के लेन-देन का प्रवाह एवं व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान का प्रवाह न केवल एक दूसरे से सम्बन्धित हैं बल्कि एक दूसरे को प्रभावित करते हैं एवं एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। बैंकनोटों के लेन-देन का प्रवाह जिस अनुपात में बाधित होगा, उस अनुपात में अनेक व्यक्ति के सेवाओं के आदान-प्रदान का प्रवाह भी बाधित होगा।

समुदाय स्तर पर अनेक व्यक्ति के सेवाओं के आदान-प्रदान का प्रवाह जिस अनुपात में बाधित होगा उस अनुपात में बैंकनोटों के लेन-देन का प्रवाह भी बाधित होगा। बैंकनोटों के लेन-देन के प्रवाह में अथवा व्यक्तिसमुदाय के सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रवाह में बाधा अर्थात् अवरोध जिस अनुपात में बनेंगे बैंकनोट के लेन-देन का प्रवाह मंद होता जाएगा एवं अनेक व्यक्ति के सेवाओं के आदान-प्रदान का प्रवाह भी मंद होता जाएगा, जहाँ व्यक्ति के लिए रोजगार (सेवाएँ प्रदान करने के अवसर) के अवसर कम होंगे।

फलस्वरूप आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का उत्पादन तथा उनका उपभोग मंद (कम) होता जाएगा। वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि के उत्पादन तथा उपभोग में आयी कमी एवं इसके कारण बने बैंकनोटों के लेन-देन का मंद प्रवाह एवं रोजगार के अवसरों की कमी को ‘मंदी’ कहते हैं।

मंदी के शिकार अनेक व्यक्ति को सेवाएँ प्रदान करने के अवसर (रोजगार) प्राप्त नहीं होते हैं अर्थात् उन्हें ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन के अवसर प्राप्त नहीं होते हैं और बैंकनोट लेने से वह व्यक्ति वंछित रह जाते हैं, परिणामस्वरूप वह व्यक्ति बैंकनोट देने से भी वंछित हो जाते हैं जिसके कारण वह व्यक्ति ‘वस्तु आदि’ के उपभोग से भी वंछित हो जाते हैं।

किन्हीं ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से कोई व्यक्ति उसी अनुपात में संलग्न होते है जिस अनुपात में उन ‘वस्तु आदि’ का उपभोग अन्य कोई व्यक्ति करते हैं। उपभोग के लिए कोई ‘वस्तु आदि’ किन्ही व्यक्तियों को उसी अनुपात में उपलब्ध होते हैं, जिस अनुपात में उस ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन से अन्य कोई व्यक्ति संलग्न होते हैं।

वस्तु संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) के उत्पादन तथा उपभोग के स्तर पर अन्य अनेक व्यक्तियों के साथ व्यक्ति के सम्बन्धों के कारण समुदाय स्तर पर कुछ व्यक्ति यदि मंदी का शिकार होते हैं तो अनेक उन व्यक्तियों में भी मंदी व्याप्त होने लगती है जो मंदी के शिकार नहीं हुए थे।

साधारण बोलचाल में जिसे मंदी कहते हैं यह अन्तहीन दुष्चक्र है, जिसके कारण आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का उपभोग कम होता है, फलस्वरूप उनकी मांग कम होने से उनका उत्पादन कम होकर परिणामस्वरूप बैंकनोटों की आय लोगों की कम होती है और उस अनुपात में लोग बैंकनोट कम व्यय करते हैं।

लोगों के आय-व्यय में कमी के कारण बैंकनोटों का लेन-देन कम होकर लोगों को बैंकनोट नहीं मिलते हैं और न मिलने से बैंकनोटों की साख गिरती है फलस्वरूप बैंकनोटों की अस्तित्व का संकट गहराने लगता है। बैंकनोटों का अस्तित्व बैंकनोटों का सजीव होने का बोध कराता है। इसीलिए बैंकनोटों को व्यक्ति के सेवाओं के माप का सजीव साधन हमने कहा है।

1.11 मंदी से बाहर निकलना

मंदी से बाहर निकलने का तात्पर्य मंदी के दुष्चक्र को तोड़ना है। मंदी की पहचान बहुत स्पष्ट है। मंदी होने पर लोगों को बैंकनोटों की आय नहीं होती है, क्योंकि आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि (वस्तु आदि) का उत्पादन घटता है। लोगों की बैंकनोटों की आय कम होने से वह बैंकनोट कम व्यय करते हैं और इस कारण आवश्यक वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का उपभोग घटता है।

आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का उपभोग कम होने से उनका उत्पादन कम होना एवं लोगों को बैंकनाटों की आय कम होने से उनके द्वारा बैंकनोट कम व्यय किया जाना स्वाभाविक रूप से घटित होते जाता है। लोगों द्वारा बैंकनाटों का व्यय कम किए जाने से आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का उपभोग कम होना, यही है मंदी का दुष्चक्र जिसे तोड़ने से हम मंदी से बाहर निकल सकते हैं।

मंदी के दुश्चक्र को कैसे तोड़ा जाए, यह अबूझ पहेली है। मंदी के हालात बनने के बाद लोगों की बैंकनोटों की आय हम बढ़ा नहीं पाते, इसलिए लोग बैंकनोटों का व्यय नहीं कर पाते और न ही आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का उपभोग अथवा उनका उत्पादन बढ़ेगा।

मंदी के दुष्चक्र से निकलने का एक ही उपाय है कि मंदी के हालात बनने ही नहीं दिए जाएँ।

अतः  मंदी के हालात क्यों बने इसके मूल में हमें जाना होगा।

मंदी के दुष्चक्र से निकलने का उपाय बैंकनोटों पर है। बैंकनोटों पर छपा “में धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” यही है वह नोट (Note) है जिसे बैंक लिख कर जारी करता है और जारी किए गए कागज की पर्चियां बैंकनोट कहलाते हैं। इस नोट के अनुसार बैंकनोटों के धारक को बैंकनोटों के बदले में रुपए के सिक्के देने के लिए बैंक वचनबद्ध है, किन्तु स्टेनलेस स्टील के रुपए के सिक्कों में विद्यमान स्टील (लोहा) हमारे लिए मूल्यहीन होने से बैंकनोटों के बदले बैंक से मूल्यहीन रुपए के सिक्के लेने का कोई अर्थ (बैंक के वचन का अर्थ) नहीं रह गया है।

अन्य अर्थ में बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं… वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड से निर्धारित वचनबद्धता राज्य (केन्द्र सरकार) को और रिज़र्व बैंक को बैंकनोटों के लेन-देन का पक्ष बनाकर प्रस्तुत करता है। राज्य न तो बैंकनोट दे रहा होता है और न ही ले रहा होता है, इसलिए बैंकनोटों के लेन-देन में राज्य का पक्ष वस्तुतः  राज्य को मध्यस्थ की भूमिका में खड़ा करता है। राज्य मध्यस्थ की भूमिका में वस्तुतः  बैंकनोटों के लेन-देन का साक्षी होता है। साक्षी बनकर राज्य (केन्द्र सरकार) की भूमिका बैंकनोटों के लेन-देन में क्या हो सकती है इसका विचार हमें करना होगा।

व्यक्ति की स्वभावगत दुर्बलता है कि वह आवश्यक ‘वस्तु आदि’ अन्य व्यक्ति को महंगा देकर आवश्यक ‘वस्तु आदि’ को अन्य व्यक्तियों से वह सस्ता खरीदना चाहता है। उदाहरण के लिए वह अपनी मजदूरी अधिकाधिक लेना चाहेगा किन्तु अन्य किन्हीं व्यक्तियों को कम मजदूरी देना चाहेगा।

जैसे वस्त्र विक्रेता कोई व्यक्ति वस्त्रों के विक्रय पर अधिकाधिक लाभ लेना चाहेगा, किन्तु वही वस्त्र विक्रेता कम मजदूरी देकर कर्मचारियों की नियुक्ति करेगा और बाजार में ‘वस्तु आदि’ सस्ता लेना चाहेगा। मध्यस्थ की भूमिका में राज्य का पक्ष यही है कि वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि का मूल्य (माप) जो कुछ भी हो उसे राज्य सत्यापित (मूल्य निर्धारण नहीं) करे और उससे न कम न अधिक बल्कि उस मूल्य पर वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि (वस्तु आदि) के आदान-प्रदान को बैंकनोटों के लेन-देन में सुनिश्चित करना राज्य की जवाबदेही (भूमिका) होगी।

अतएव बैंकनोटों पर मुद्रित ‘मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ‘ इस वचनखण्ड़ का अर्थ हमें समझ में आना चाहिए कि बैंकनोटों के लेन-देन में रिज़र्व बैंक द्वारा सत्यापित मूल्य के वस्तु, संसाधन, सेवाओं आदि (वस्तु आदि) का आदान-प्रदान होना चाहिए।

वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का मूल्य राज्य अथवा रिज़र्व बैंक द्वारा सत्यापित या प्रमाणित नहीं होने से और उस मूल्य के ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान बैंकनोटों के लेन-देन में नहीं होने से, अर्थात् वचनखण्ड़ से निर्धारित वचनबद्धता का निर्वाह नहीं होने से ही मंदी के हालात बनते हैं।

मंदी के हालात नहीं बने इसके लिए बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान में मध्यस्थ की भूमिका का निर्वाह करने के लिए राज्य को उत्तरदायी बनाना होगा, राज्य की यह भूमिका बैंकनोटों पर मुद्रित ‘केन्द्र सरकार द्वारा प्रत्याभूत’ इस वचनखण्ड में व्यक्त हुआ है। मध्यस्थ की भूमिका में राज्य बैंकनोटों के लेन-देन में सत्यापित मूल्य के ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान सुनिश्चित करने लगे तो मंदी के हालात नहीं बनेंगे।

मंदी से बाहर निकलने का उपाय यही है कि बैंकनोटों पर मुद्रित ‘केन्द्र सरकार द्वारा प्रत्याभूत’ और ‘रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इन दोनों वचनखण्डों से रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार के लिए निर्धारित वचनबद्धता का निर्वाह सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार के लिए निर्धारित वचनबद्धता के अनुरूप विभिन्न वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि का मूल्य सत्यापित व प्रमाणित होकर एवं बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में सत्यापित उस मूल्य के ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान सुनिश्चित होने मात्र से ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन व उपभोग के अवसर लोगों के लिए बनने से ‘मंदी’ दूर होकर बैंकनोटों का निजी अस्तित्व बनता है, जो बैंकनोटों का सजीव होने का बोध कराता है।

बैंकनोटों पर मुद्रित ‘केन्द्र सरकार द्वारा प्रत्याभूत’ एवं मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ’ इस वचनखण्ड़ द्वय से रिज़र्व बैंक और केन्द्र सरकार तथा रुपए (बैंकनोट) के लेन-देन से संलग्न व्यक्तियों के लिए निर्धारित वचनबद्धता का आधार लेकर, रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों को परिभाषित कर, तदनुसार बैंकनोटों (रुपए) का लेन-देन होने से सजीव (मूल्यवान) साधन की भांति बैंकनोटों का प्रयोग होने लगेगा और मंदी के हालात नहीं बनेंगे, फलस्वरूप मंदी से बाहर निकला जा सकेगा।

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