रुपए क्या है? न जानते हुए रुपयों का लेन-देन लोग कर रहे हैं, यह दोषपूर्ण रुपए का लेन-देन है।
रुपए के लेन-देन को सुधारो कहने का तात्पर्य है, रुपए क्या है जानते हुए रुपयों का लेन-देन लोग करें।
रुपए के लेन-देन को सुधारो, यही मुद्रामंत्र है, इससे …
व्यक्ति सुधरेगा, संस्थाएं सुधरेंगी, समाज सुधरेगा और सरकारें सुधरेंगे,
रुपयों के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होने से लोगों के समस्याओं का समाधान होगा।
मुद्रामंत्र का विचार कब, क्यों और कैसे आया उसकी चर्चा हम कर रहे हैं।
मुद्रामंत्र का विचार सन् 1985 से 2000 ईस्वी के मध्य 15 वर्षों के कालखंड में टाटा समूह के टिनप्लेट उद्योग में सेवारत रहने के दौरान मुद्रामंत्र का विचार बीज रूप में हमारे मन-मस्तिष्क में बस गया।
3 दिसम्बर सन् 1984 ईस्वी को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल शहर में एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई। यूनियन कार्बाइड कारखाने से विषैले गैस के रिसाव के कारण लाखों लोग मरे, लाखों लोग अपाहिज हुए। भविष्य में ऐसे किसी उद्योग अथवा कारखाने में दुर्घटना से विषैले गैस के रिसाव के खतरे से कम से कम जानमाल का नुकसान देश में हो इसके लिए केन्द्र सरकार ने आबादी वाले इलाकों में उद्योग में दुर्घटना से विषैले गैस के रिसाव की संभावना वाले उद्योगों को प्रतिबन्धित किया।
उन दिनों मैं जमशेदपुर (टाटानगर) में टाटा समूह के टिनप्लेट उद्योग में Sulphuric Acid Plant में कार्यरत था। इस Plant में दुर्घटना से विषैला गैस SO2 के रिसाव की गुंजाइश थी, इसलिए उसे बंद कर दिया गया, अन्य विभागों में कर्मचारियों को नियोजित करने की प्रक्रिया में देर-सबेर क्वालिटी विभाग में मुझे नियोजित किया गया।
नियोजन में भेदभाव और विभाग में अनपेक्षित कार्य का दबाव जिनका सम्बन्ध उत्पादकता से था, उन घटनाओं ने हमारी संवेदना को झकझोर कर रख दिया और हमने महसूस किया कि “रुपए के कारण” और “रुपए के लिए” व्यक्ति बनता और बिगड़ता है।
व्यक्ति के बनने में रुपए की भूमिका समझ में आती है, किन्तु व्यक्ति के बिगड़ने में रुपए की भूमिका रुपए के किसी दोष को प्रकट करता है, जिसे समझना आवश्यक है, यह विचार हमारे मन-मस्तिष्क में घर कर गया। इस सम्बन्ध में सन् 1986-1999 ईस्वी तक 12 वर्षों में 191 पत्रों का पत्राचार उद्योग प्रबन्धन से किया, जिनमें कुछ पत्र अन्य विभाग में मेरे नियोजन से सम्बन्धित थे।
प्रबन्धन से पत्राचार में अधिकांश पत्र उत्पादकता से सम्बन्धित थे। उत्पादकता विषय में राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC), नई दिल्ली से भी निरन्तर नियमित सन् 1992-1999 ईस्वी तक सात वर्षों में 164 पत्रों का पत्राचार किया। परिषद के अधिकारियों से मिलने नई दिल्ली भी गया, परन्तु उत्पादकता की परिभाषा की जानकारी नहीं हुई।
इन वर्षों में उत्पादकता विषय को समझने के उद्देश्य से पत्राचार के साथ-साथ अर्थशास्त्र के पुस्तकों के पन्ने हमने पलटे। पुस्तकों में उत्पादकता की गणना के सम्बन्ध में जानकारी थी, परन्तु उत्पादकता क्या है, अर्थात् उत्पादकता की परिभाषा पुस्तकों में लिखा हुआ नहीं पढ़ा, और तो और अर्थशास्त्र को परिभाषित नहीं किया जा सकता, यह अर्थशास्त्र के उन पुस्तकों में लिखा हुआ पढ़ा।
विज्ञान का स्नातक होने के कारण विश्वास नहीं हो रहा था कि कैसे कोई शास्त्र अपरिभाषित हो सकता है? अब अर्थशास्त्र और उसके प्रमुख पद (Terms) जैसे रुपए, बाजार आदि को परिभाषित करने की जिम्मेदारी भी आन पड़ी, तभी उत्पादकता को परिभाषित किया जा सकता था। इतना सब कुछ करते हुए सन् 2000 ईस्वी में उद्योग से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त मुझे होना पड़ा। मुद्रामंत्र का बीज मन-मस्तिष्क में बस चुका था।
कार्यरत उद्योग में उत्पादकता का दर्शन और उत्पादकता विषय में राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद से पत्राचार तथा अनेक मित्रों एवं विद्वानों से निरन्तर नियमित चर्चाओं के आलोक में स्वचेतना में यह तो स्पष्ट हो चुका था कि रुपए व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई है और रुपयों के लेन-देन में लोगों के सेवाओं (रुपए) का सममाप में आदान-प्रदान उत्पादकता है। उत्पादकता की यह अवधारणा नई थी जिसे सिद्ध करना आवश्यक था। इस उधेड़बुन में मास दर मास समय बीतता चला गया।
विचार किया, उत्पादकता की नई अवधारणा यदि सही है तो वह अन्य किसी रूप में प्रकृति में लोगों के जीवन में अवश्य होगा। अनायास वह दिखा भी, रिज़र्व बैंक द्वारा जारी बैंकनोटों पर “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूं“ लिखकर रिज़र्व बैंक गवर्नर 50रुपए अंकित किसी बैंकनोट के बदले में उस बैंकनोट के धारक को 50रुपए अदा करने का वचन देता है, गवर्नर का हस्ताक्षर होता है। संशय की गुंजाइश नहीं रही, सममाप में आदान-प्रदान की रिज़र्व बैंक गवर्नर की वचनबद्धता स्पष्ट है।
रुपए को व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई मान लें तो बैंकनोटों पर लिखा वचनखंड (Promise Clause) बैंकनोटों (रुपए) के लेन-देन में बदले में सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान की लोगों की वचनबद्धता को दर्शाता है, जिसे उत्पादकता कहा गया। उत्पादकता की इस अवधारणा में नया कुछ भी नहीं, यह तो स्वयं रिज़र्व बैंक के आचरण का विषय है, जिसे न मानने का प्रश्न ही नहीं है।
रुपए को व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई मानना, यह नई बात अवश्य है, किन्तु यह स्वयं प्रमाणित विषय है, जिसे कोई नकार नहीं सकता। लोग अपनी सेवाएं अन्य व्यक्ति को देते हैं, उन सेवाओं के बदले में लोगों से निर्धारित माप में रुपए लेते हैं, ऐसे में रुपए को व्यक्ति के सेवाओं के माप की इकाई मानने में गलत क्या है, बस इसे स्वीकार्य बनाना होगा।
स्वीकार्य बनाने की प्रक्रिया में बैंकनोटों के बदले में रुपए के लेन-देन के इतिहास को पढ़ा और बैंकनोटों पर लिखे वचन और गारंटी का अर्थ जानने के लिए सन् 2003 से 2009 ई0 तक रिज़र्व बैंक गवर्नर से 280 पत्रों का पत्राचार हमने किया।
भारतवर्ष में अतीत में सन् 1540 ई0 से ‘रुपए’ कहने का तात्पर्य सोना व चांदी से बने सिक्कों से था। बाद में सन् 1770 ई0 से ‘रुपए’ के नाम पर बैंकनोटों का लेन-देन किया जाने लगा। सिक्कों से बैंकनोटों का यह परिवर्तन “अदा करने के वचन” की संकल्पना के आधार पर हुआ।
“मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” यह वचन मुद्रित होने से बैंकनोट देकर बदले में सोना व चांदी के रुपए के सिक्के बैंक से प्राप्त करने का अधिकार बैंकनोट देने वाले व्यक्ति (धारक) को था। वस्तुतः इस अधिकार के कारण ही लेन-देन में बैंकनोटों का प्रयोग उस कालखंड में स्वीकार्य हुआ था।
यदि वह अधिकार बैंकनोटों के घारक को न मिलता तो लेन-देन में बैंकनोटों का प्रयोग अतीत में स्वीकार्य नहीं होता। “अदा करने का वचन” बैंकनोटों पर मुद्रित किए जाने से ही बैंकनोट चलन में आए इसलिए बैंकनोटों के धारक को बैंकनोटों के बदले में रुपए देने की बैंकों की “वचनबद्धता” वस्तुतः बैंकनोटों की आत्मा है।
बैंकनोटों पर केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत (गारंटी) लिखकर सरकारी मुहर (मुद्रा,अशोक स्तम्भ) मुद्रित होने से ही बैंकनोट भारतीय मुद्रा कहलाए और यही (मूल्य) बैंकनोटों की काया (शरीर) है। बैंकनोटों पर अंकित रुपए का माप जैसे 50 रु. 100 रु…आदि बैंकनोटों का नाम है। बैंकनोटों का नाम (माप) और बैंकनोटों की काया (गारंटी) तथा बैंकनोटों की आत्मा (वचन) तीन तत्व बैंकनोटों के होंगे।
भाषा का प्रयोग किए बिना जैसे संकेतों से व्यक्ति काम चला लेता है, वैसा ही बैंकनोटों पर चाहे वचन या गारंटी लिखा हो या न लिखा हो, सरकारी मुहर (मुद्रा) पर लोगों का भरोसा रिज़र्व बैंक की साख होती है, जो सरकार की रुपए अदा करने की वचनबद्धता का संकेत है। यह अन्य देशों के बैंकनोटों पर भी लागू होता है।
अमेरिका के केन्द्रीय बैंक द्वारा जारी बैंकनोटों पर 10 डालर, 20 डालर आदि माप अंकित होते हैं, जो उन बैंकनोटों के नाम हैं। उन बैंकनोटों पर अमेरिकी सरकार की गारंटी लिखा हो या न लिखा हो पर अमेरिकी सरकार की ‘मुहर’ (मुद्रा, गारंटी) उन बैंकनोटों पर अवश्य होती है, जिस आधार पर उन्हें अमेरिकी मुद्रा कहा जाता है, यह उन बैंकनोटों की काया (शरीर) है। अमेरिकी मुद्रा पर डालर अदा करने का वचन लिखा हो न लिखा हो तो भी सरकार के मुहर (मुद्रा) पर लोगों का भरोसा अमेरिका के केंद्रीय बैंक की डालर अदा करने की वचनबद्धता है, जिसे बैंकनोटों की आत्मा कहा गया है।
“मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचन का बैंकनोटों पर लिखे होने का व्यापक अर्थ और महत्व है। बैंकनोटों के लेन-देन में बैंकनोट लेने वाला व्यक्ति (मैं) ‘श्रम’ करता है। बैंकनोट देने वाले व्यक्ति (घारक) को ‘उत्पाद’ अदा होते हैं, जिन्हें अन्य व्यक्ति (मैं) बैंकनोट लेकर प्रदान करता है।
उत्पादों का आदान-प्रदान ‘बाजार’ में होता है और बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में ‘वस्तु आदि’ (उत्पाद) के आदान-प्रदान में लोगों के वचन निर्वाह से लोगों की ‘क्रयशक्ति’ बनती है। बैंकनोटों पर लिखे वचन में ‘रुपए’ शब्द वस्तुतः व्यक्ति (बैंकनोटों के धारक) की क्रयशक्ति है।
इस प्रकार “रुपए, श्रम, बाजार, उत्पाद, क्रयशक्ति” प्रमुख पांच विषय बैंकनोट व कहें रुपयों के लेन-देन से सम्बन्धित विषय हैं, यह पांच विषय बैंकनोटों पर लिखे “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूँ” इस वचन के पांच भाग हैं।
लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति का सम्बन्ध जहां रुपयों के लेन-देन से होता है वहीं रुपए के कारण किसी के बनने अथवा बिगड़ने का सम्बन्ध उनके आवश्यकताओं की पूर्ति से अवश्य होता है। अतः रुपयों का लेन-देन और व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के मध्य जो भी सम्बन्ध है उसे समझना होगा।
व्यक्ति की आवश्यकताएं उसकी मांग बने और अपने ‘मांग’ की पूर्ति के लिए व्यक्ति श्रम करे और आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का वह उत्पादन करे यह व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रथम सोपान है, जिसे व्यक्ति के ‘मांग का श्रम में रूपान्तरण’ कह सकते हैं। ‘वस्तु आदि’ के उत्पादन में श्रम करने से व्यक्ति को उसके श्रम के बदले रुपए (बैंकनोट) मिलते हैं, अर्थात् व्यक्ति का ‘श्रम रुपए में रूपान्तरित’ होता है, यह व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति का द्वितीय सोपान है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति सामुदायिक जीवन जीता है जहाँ अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति करने से स्वयं व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और इसे व्यापक अर्थ में ‘बाजार’ कहते हैं। बाजार में व्यक्ति बैंकनोटों (रुपए) के लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान करता है। ‘बाजार’ व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति का तृतीय सोपान है। इसे ‘रुपए का बाजार में रूपान्तरण’ कह सकते हैं, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति बाजार में रुपए का लेन-देन करेगा और बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ का आदान-प्रदान अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करेगा, उन अवसरों पर अन्य किन्हीं व्यक्तियों के आवश्यकताओं की पूर्ति व्यक्ति अवश्य करेगा।
बाजार में रुपयों के लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान की विधि सदैव बिना किसी अपवाद के सब लोगों के लिए और सब ‘वस्तु आदि’ के लिए एक समान होती है। समान विधि से किए जा रहे इस लेन-देन व आदान-प्रदान के बाद वस्तु, संसाधन, सेवाएँ आदि को उनके भिन्न नामों से नहीं बल्कि समान नाम ‘उत्पाद’ से बाजार में प्रत्येक ‘वस्तु आदि’ को जाना जाता है और बाजार में प्रत्येक व्यक्ति को समान नाम ‘उत्पादक’ से जाना जाता है।
उत्पादों का उत्पादन और उत्पादक बने रहने की सम्भावनाएँ उत्पदक की उत्पादकता के कारण बनती हैं। ‘उत्पादकता’ व्यक्ति (उत्पदक) के आवश्यकताओं की पूर्ति का चतुर्थ सोपान है, इसे ‘बाजार का उत्पादकता में रूपान्तरण’ कह सकते हैं।
उत्पादकता की उपलब्धियों के कारण व्यक्ति की क्रयशक्ति बनती है, इसे ‘उत्पादकता का क्रयशक्ति में रूपान्तरण’ कह सकते हैं, यह व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति का पांचवां सोपान है। उत्पादक (व्यक्ति) के उत्पादकता का व्यक्ति के क्रयशक्ति मे रूपान्तरित होना उनके आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक है।
अस्तु,आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति ‘श्रम’ करता है जो (श्रम) ‘रुपए में रूपान्तरित होकर और उस रुपए का रूपान्तरण ‘बाजार’ में होकर तथा बाजार में ‘उत्पादकता की उपलब्धियों के फलस्वरूप व्यक्ति का श्रम उसकी ‘क्रयशक्ति’ बनने से उसके आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
श्रम, रुपए, बाजार, उत्पादकता, क्रयशक्ति आदि व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के पांच सोपान हैं, इनका रुपयों के लेन-देन से सम्बन्धित पांच विषय रुपए, श्रम, बाजार, उत्पाद, क्रयशक्ति आदि से सम्यक् सम्बन्ध बैंकनोटों पर लिखे “मैं धारक को रुपए अदा करने का वचन देता हूं” इससे है।
रुपयों का लेन-देन और व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति के मध्य सम्यक् सम्बन्ध से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रुपए व्यक्ति के सेवाओं (श्रम) के माप की इकाई है और रुपयों या कहें बैंकनोटों के लेन-देन में सममाप में सेवाओं के आदान-प्रदान की लोगों की वचनबद्धता को उत्पादकता कह सकते हैं।
इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सुदीर्घ 23 वर्षों तक उत्पादकता विषय के संदर्भ में TTD उद्योग प्रबन्धन (191पत्र), NPC (164पत्र) और RBI (280पत्र) इन तीनों से निरन्तर नियमित रूप से किया गया 635 पत्रों का पत्राचार उत्पादकता विषय में प्रसव पीड़ा से कम न था। जिसे हमने प्रसव पीड़ा कहा है उसके कारण ‘मुद्रामंत्र’ स्पष्ट एक विचार बना,आप इसे मुद्रामंत्र विचार का जन्म भी कह सकते हैं।
सन् 2010 ईस्वी तक रुपए, श्रम, बाजार, उत्पाद, क्रयशक्ति, उत्पादकता आदि के सम्बन्ध में विषय बहुत कुछ स्पष्ट हो गया था। विचार आया क्यों न एक पुस्तक लिखा जाए, लिखने का प्रयत्न किया, लेखन पूरा करते तीन वर्ष बीत गए। साधन जुटाए, अपने खर्च पर पुस्तक का मुद्रण करवाया।
पुस्तक का शीर्षक ‘रुपए हितसाधन है’, इसका तात्पर्य है – अपने ‘हित’ में लोग ‘साधन’ बैंकनोटों का लेन-देन करते हैं, जहां बैंकनोट लेन-देन का साधन मात्र हैं और लोगों का हित बैंकनोटों के लेन-देन से आवश्यकताओं की पूर्ति होने में है।
रुपए हितसाधन है अवश्य, किन्तु रुपए ‘हितसाधन’ बना रहे इसके लिए लोगों को प्रयत्न करना होगा। जैसे लौह अयस्क कच्चा माल है, लौह अयस्क का प्रयोग कर विधिपूर्वक हम इस्पात बनाते हैं। रिज़र्व बैंक द्वारा जारी बैंकनोट कच्चा माल है।
व्यक्ति के पास बैंकनोट होने मात्र से आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती। यदि वह सम्भव होता तो लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी भी सरकार के लिए यह बहुत आसान कार्य होता कि सरकारें बैंकनोट छाप-छाप कर लोगों में वितरित कर दे और लोग वितरित उन बैंकनोटों के लेन-देन से आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेवें, ऐसा होता नहीं है। इस अर्थ में बैंकनोटों को कच्चा माल कहा गया।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लेन-देन के ‘साधन’ की भांति लोग बैंकनोटों का प्रयोग करते हैं। बैंकनोटों पर लिखा रुपए अदा करने के वचन का निर्वाह बैंकनोटों के लेन-देन की विधि है। बैंकनोटों के लेन-देन में वचन निर्वाह (विधि) से बैंकनोट ‘रुपए’ बनते हैं, रुपए बने बैंकनोटों के लेन-देन में बदले में आवश्यक ‘वस्तु आदि’ के आदान-प्रदान से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होने से रुपए मूल्यवान होती हैं, मूल्यवान रुपए को मुद्रा कहते हैं। मुद्रा कहने का अर्थ रुपए का मूल्य है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साधन बैंकनोटों (कच्चा माल) का प्रयोग किया गया। विधिपूर्वक (वचन निर्वाह) बैंकनोटों को रुपए (इस्पात) बनाया गया। विधिपूर्वक (मूल्य प्रदान कर) रुपयों को मुद्रा (इस्पात से बना हथौड़ी) बनाया गया। मुद्रा बने बैंकनोटों के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
यह प्रक्रिया “बैंकनोटों को रुपए बनाना और उन रुपयों को मुद्रा बनाना” जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से इतर लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति के अन्य उपाय नहीं है।
हमें याद रखना होगा कि बैंकनोटों के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती और न ही रुपयों के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति केवल और केवल मुद्रा (मूल्यवान रुपए) के लेन-देन से होती हे।
बैंकनोट, रुपए बनते हैं। रुपए, मुद्रा बनते हैं। बैंकनोट ही रुपए और वही मुद्रा कहलाते हैं, अर्थात् बैंकनोट, रुपए, मुद्रा में अन्तर नहीं है, वह एक होते हुए भी तीनों तीन विषय हैं। उदाहरण के लिए महिला जो अपने बाल्यकाल में किसी की बेटी कहलाती है, वही महिला उम्र के अगले पड़ाव में किसी की बहू कहलाती है और उम्र के अगले पड़ाव में वही महिला किसी की माता भी कहलाती है। समान महिला बेटी, बहू, माता की भूमिका में होती है, वैसा ही आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयोग में आने वाला साधन बैंकनोट, रुपए और मुद्रा की भूमिका में होता है।
बैंकनोटों (बेटी तुल्य) के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती। रुपयों (बहू तुल्य) के लेन-देन से भी लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती। केवल और केवल मुद्रा (माता तुल्य) के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। यह वैसा ही विषय है जैसे माता के गर्भ से संतान जन्म लेते हैं, वैसा ही मुद्रा (माता तुल्य) के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं (सन्तान तुल्य) की पूर्ति होती है।
मुद्रा कहने का अर्थ रुपए के मूल्य से है, अपने देश में रुपए के मूल्य से है, अंतराष्ट्रीय बाजार में रुपए का मूल्य सर्वथा भिन्न विषय है। अंतराष्ट्रीय बाजार में भिन्न देशों के मुद्राओं का अदला-बदली (Change) होता है, भिन्न देशों के मुद्राओं का लेन-देन (Excange) अंतराष्ट्रीय बाजार में नहीं होता है। Change और Exchange में अन्तर है।
अंतराष्ट्रीय बाजार में भारतीय मुद्रा (रुपए का मूल्य) जो कुछ है या जितने मूल्य का है, उस मुद्रा का लेन-देन (Excange) भारत में लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं होता। देश में रुपए का मूल्य (मुद्रा) जितना होगा उस मूल्य पर रुपयों (मुद्रा) का लेन-देन लोग अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते हैं, न कि अंतराष्ट्रीय बाजार में रुपए का मूल्य जो कुछ है उस पर लेन-देन करते हैं।
आवश्यकताओं की पूर्ति होने में लोगों का ‘हित’ है। जिस अनुपात में लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, उस अनुपात में बैंकनोटों (मुद्रा) के लेन-देन से लोगों का ‘हित’ सधता (Acheived) है। अपने हित में लेन-देन का साधन (बैंकनोट) मुद्रा के लेन-देन (प्रयोग) को हमने ‘हितसाधन’ कहा है।
आवश्यकताओं की पूर्ति होता रहे इसके लिए लोगों ने लेन-देन के साधन बैंकनोटों को हितसाधन (मुद्रा) बनाया। रुपए बने बैंकनोट हितसाधन (मुद्रा) बने इसके लिए केन्द्र सरकार तथा रिजर्व बैंक एवं बैंकनोट लेने वाले व्यक्ति के लिए निर्धारित वचनबद्धता का निर्वाह बैंकनोटों के लेन-देन में सुनिश्चित करना होगा।
रुपए बने बैंकनोटों के लेन-देन में किसी व्यक्ति द्वारा दिए गए बैंकनोटों को लेने वाले अन्य किसी व्यक्ति ने ‘वचन निर्वाह’ किया अथवा नहीं एवं लेन-देन के उन अवसरों पर रिज़र्व बैंक तथा केन्द्र सरकार की लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बंधित वचनबद्धता आदि का निर्धारण तभी हो सकेगा जब रुपए परिभाषित होगा और बैंकनोटों के लेन-देन से सम्बंधित विषय जैसे बाजार, उत्पाद, क्रयशक्ति आदि अनेक विषय परिभाषित होंगे। रुपए के लेन-देन से सम्बन्धित विषयों में जानकारी के आधार पर रुपए का लेन-देन करते हुए रुपए के लेन-देन में सुधार लाकर रुपए के लेन-देन से लोगों के आवश्यकताओं की पूर्ति (हित) का साधन रुपए को बनाना रुपए को ‘हितसाधन’ बनाना है।
रुपए हितसाधन बना रहे तो रुपए के लेन-देन से व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति होकर व्यक्ति सुधरेगा, क्योंकि आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होने से ही व्यक्ति के लिए बिगाड़ की सम्भावनाएँ बनती हैं। व्यक्ति सुधरेगा तो संस्था सुधरेंगे तथा समाज सुधरेगा एवं सरकारें भी सुधरेंगी।
समाज संस्थाओं से मिलकर बनता है और व्यक्तियों से मिलकर संस्था बनते हैं, जैसे मिट्टी से ईंट और ईंट से घर बनते हैं। घरों में साजो सामान जुटाने के बाद आवास (रहने) की व्यवस्था पूर्ण होती है। साजो सामान की तुलना सरकार से किया जाए तो व्यक्ति (मिट्टी), संस्था (इंट), समाज (घर) और सरकारों (साजो सामान) के सुधरने से लोगों के समस्याओं का समाधान (आवास) होगा। यह रुपए के लेन-देन में सुधार का लक्षण है।
रुपए के लेन-देन को सुधारो, समस्याओं का समाधान होगा, यही मुद्रामंत्र का विषय है।
रुपए हितसाधन है, पुस्तक लिखने के बाद के घटनाक्रम में ‘मुद्रामंत्र’ का विचार लोगों का विचार बने इसके लिए GJR Products की पहल पर जनता के मध्य सार्वजनिक मंच “नगरसखा उद्योग” नाम से मुद्रामंत्र विषय में लोगों की भागीदारी को व्यवस्थित किया जा रहा है।
शोधकर्ता और लेखक जी.जगन्नाथ राजू